कालसर्प योग (KalaSarp Yog)

कालसर्प योग
कालसर्प दोष के कारण
कालसर्प दोष के प्रभाव
कालसर्प दोष के उपाय

 

कालसर्प, अर्थात् सर्प और काल, इसमें भी सर्प योनी के बारे में हमारे शास्त्रों में बहुत वर्णन आया है। गीता में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है कि पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति (जन्म) केवल विषय-वासना के कारण ही हुई है। जीव रूपी मनुष्य जैसा कर्म करता है उसी के अनुरूप उसे फल मिलता हैं। विषय -वासना के कारण ही काम-क्रोध, मद-लोभ और अहंकार का जन्म होता है इन विकारों को भोगने के कारण ही जीव को सर्प योनी प्राप्त होती है। कर्मों के फलस्वरूप आने वाली पीढ़ियों पर पड़ने वाले अशुभ प्रभाव को कालसर्प दोष कहा जाता है।

 

कालसर्प योग
कुंडली में जब सारे ग्रह राहू और केतु के बीच में आ जाते हैं तब कालसर्प योग बनता हैं। ज्योतिष में इस योग को अशुभ माना गया है लेकिन कभी-कभी यह योग शुभ फल भी देता है। ज्योतिष में राहु को काल तथा केतु को सर्प माना गया है राहु को सर्प का मुख तथा केतु को सर्प का पूंछ कहा गया है। वैदिक ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह की संज्ञा दी गई है, राहु का जन्म भरणी नक्षत्र में तथा केतु का जन्म अश्‍लेषा नक्षत्र में हुआ है। जिसके देवता काल एवं सूर्य है । राहु को शनि का रूप और केतु को मंगल ग्रह का रूप कहा गया है, राहु मिथुन राशि में उच्च तथा धनु राशि में नीच होता है, राहु के नक्षत्र आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा है, राहु प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम, द्वादस भावों में किसी भी राशि का विशेषकर नीच का बैठा हो, तो निश्‍चित ही आर्थिक, मानसिक, भौतिक पीड़ायें अपनी महादशा अन्तरदशा में देता हैं। मनुष्य को अपने पूर्व दुष्कर्मों के फलस्वरूप कालसर्प दोष लगता है। उसके जन्म जन्मान्तर के पापकर्म के अनुसार ही यह दोष पीढ़ी दर पीढ़ी चला आता है

 

कालसर्प दोष –
कालसर्प योग मुख्य रूप से 12 प्रकार के होते है जो मनुष्य जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं। इन सभी योगों का शुभ और अशुभ प्रभाव मनुष्य के जीवन को प्रभावित करता है। ये निम्न प्रकार के है –

 

अनंत कालसर्प योग – 
जब लग्न में राहु और सप्तम भाव में केतु हो और उनके बीच समस्त अन्य ग्रह हों तो अनंत कालसर्प योग बनता है । इस अनंत कालसर्प योग के कारण जातक को जीवन भर मानसिक शांति नहीं मिलती । वह सदैव अशान्त क्षुब्ध परेशान तथा अस्थिर रहता है, बुद्धिहीन हो जाता है। मस्तिष्क संबंधी रोग भी परेशानी पैदा करते हैं।

 

कुलिक कालसर्प योग –
जब जन्मकुंडली के द्वितीय भाव में राहु और अष्टम भाव में केतु हो तथा समस्त ग्रह उनके बीच हों, तो यह योग कुलिक कालसर्प योग कहलाता है।

 

वासुकि कालसर्प योग –
जब जन्मकुंडली के तीसरे भाव में राहु और नवम भाव में केतु हो और उनके बीच सारे ग्रह हों तो यह योग वासुकीकालसर्प योग कहलाता है।

 

शंखपाल कालसर्प योग –
जब जन्मकुंडली के चौथे भाव में राहु और दसवे भाव में केतु हो और उनके बीच सारे ग्रह हों तो यह योग शंखपाल कालसर्प योग कहलाता है।

 

पद्म कालसर्प योग –
जब जन्मकुंडली के पांचवें भाव में राहु और ग्याहरवें भाव में केतु हो और समस्त ग्रह इनके बीच हों तो यह योग पद्म कालसर्प योग कहलाता है।

 

महापद्म कालसर्प योग –
जब जन्मकुंडली के छठे भाव में राहु और बारहवें भाव में केतु हो और समस्त ग्रह इनके बीच कैद हों तो यह योग महापद्म कालसर्प योग कहलाता है।

 

तक्षक कालसर्प योग –
जब जन्मकुंडली के सातवें भाव में राहु और केतु लग्न में हो तथा बाकी के सारे इनकी कैद मे हों तो इनसे बनने वाले योग को तक्षक कालसर्प योग कहते है।

 

कर्कोटक कालसर्प योग
जब जन्मकुंडली के अष्टम भाव में राहु और दूसरे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को कर्कोटक कालसर्प योग कहते हैं।

 

शंखनाद कालसर्प योग –
जब जन्मकुंडली के नवम भाव में राहु और तीसरे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को शंखनाद कालसर्प योग कहते हैं।

 

पातक कालसर्प योग –
जब जन्मकुंडली के दसवें भाव में राहु और चौथे भाव में केतु हो और सभी सातों ग्रह इनके मध्य में अटके हों तो यह पातक कालसर्प योग कहलाता है।

 

विषाक्तर कालसर्प योग –
जब जन्मकुंडली के ग्याहरवें भाव में राहु और पांचवें भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य में अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को विषाक्तर कालसर्प योग कहते हैं।

 

शेषनाग कालसर्प योग –
जब जन्मकुंडली के बारहवें भाव में राहु और छठे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को शेषनाग कालसर्प योग कहते हैं।
आप निम्न प्रकार से स्वयं अपनी कुण्डली जांचकर कालसर्प योग की जांच कर सकते हैं। इसी प्रकार यदि सूर्य के साथ राहू की युति बनती है तो पितृदोष बनता है। इन दोषों का प्रभाव जीवन में स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसे व्यक्ति प्रयत्न करने पर भी जीवन में सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

 

आंशिक कालसर्प योग – 
जन्म कुण्डली में राहु और केतु के मध्य अन्य सातों ग्रह स्थित होने से पूर्ण कालसर्प दोष होता है। कुछ व्यक्तियों के जन्म चक्र में राहु और केतु के मध्य शेष सातों ग्रह न होकर एक या दो ग्रह बाहर होते है। इस स्थिति में यह आंशिक कालसर्प दोष कहलाता है। इसका प्रभाव भी उतना ही खतरनाक होता है जितना पूर्ण कालसर्प दोष का होता है। यह ध्यान रहे कि यदि शनि, शुक्र और बुध तीनों में से एक भी ग्रह राहु और केतु चक्र से अलग है तो बड़ा ही विचित्र शमनक दोष हो जाता हैं यह दोष भी पितृदोष, कालदोष कहा गया है।

 

राहु और कालसर्प योग
राहु के गुण -अवगुण शनि जैसे हैं, राहु जिस स्थान में जिस ग्रह के योग में होता है उसका व शनि का फल देता है। शनि आध्यात्मिक चिंतन, विचार, गणित के साथ आगे बढ़ने का गुण अपने पास रखता है, यही गुण राहु के हैं।
राहु का योग जिस ग्रह के साथ है वह किस स्थान का स्वामी है यह भी अवश्य देखना चाहिए। राहु मिथुन राशि में उच्च, धनु राशि में नीच और कन्या राशि में स्वगृही होता है। राहु के मित्र ग्रह – शनि, बुध और शुक्र हैं। राहु के शत्रु ग्रह – सूर्य, मंगल और केतु हैं। चन्द्र, बुध, गुरु उसके समग्रह हैं। कालसर्प योग जिस व्यक्ति की जन्म कुण्डली में है, उसे जीवन में बहुत कष्ट झेलना पड़ता है। इच्छित फल प्राप्ति और कार्यों में बाधाएं आती हैं, बहुत ही मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक कष्ट उठाने पड़ते हैं।
कालसर्प योग से पीड़ित जातक का भाग्य प्रवाह राहु, केतु अवरुद्ध करते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप जातक की प्रगति नहीं होती। उसे जीविका चलाने का साधन नहीं मिलता, अगर मिलता है तो उसमें अनेक समस्याएं पैदा होती हैं। जिससे उसको जीविका चलानी मुश्किल हो जाती है। विवाह नहीं हो पाता। विवाह हो भी जाए तो संतान-सुख में बाधाएं आती हैं।

 

कालसर्प योग के प्रभाव
कालसर्प योग व्यक्ति के जीवन में भाग्य के प्रवाह को बाधित कर देते हैं, जिसके फलस्वरूप उसके इस जन्म में और पूर्व जन्म में किये गये पाप कर्मों का प्रभाव बढ़ जाता है। एक प्रकार से कालसर्प योग व्यक्ति के जीवन में दुर्भाग्य को बढ़ाता है। मुख्यत ये दुर्भाग्य चार प्रकार के होते हैं –
  1. व्यक्ति को उसके परिश्रम का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता, उसके जीवन में निरन्तर धन का अभाव बना रहता है। 
  2. शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्बल बना रहता है। उत्साह की कमी के कारण जीवन बोझ सा व्यतीत होता है। 
  3. संतान पक्ष से भी कष्ट भोगने पड़ते हैं।
  4. गृहस्थ जीवन बहुत अस्त-व्यस्त हो जाता है, पति एवं पत्नि में निरन्तर कलह होता रहता है।
अतः प्रत्येक व्यक्ति को कालसर्प दोष निवारण साधना, मंत्र जप, अभिषेक, तर्पण-दान, पितृदोष मुक्ति, क्रिया एवं शमन क्रिया अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए।
शास्त्रों में यह भी लिखा है कि यदि आपको अपनी कुण्डली तथा परिवार के सदस्यों की कुण्डली की जानकारी नहीं है तो भी एक बार तो कालसर्प दोष निवारण पूजन अभिषेक परिवार के सभी सदस्यों के लिए अवश्य ही करना चाहिए।
Kalsarpa Yoga Reasons of Kalsarpa Dosh

Implications of Kalsarpa Dosh

Remedies for Kalsarpa Dosh

 

Are you getting continuous obstacles in your life?

Are your children always ill?

Is your family life not peaceful?

Do you encounter failure while climbing on steps for success?

Is your body always full of diseases and your mind always full of tension?

 

Kalsarpa, i.e a malefic combination of snake and time; has been described in detail in our holy scriptures. In the Gita, Lord Krishna himself has stated that the origin (birth) of man on earth occurred only because of human sexuality. A person gets the fruits as per the actions which he performs in his life. Yearning-anger, pride-greed and ego are born out of lust-desire, and the creature gets Snake Yoni to experience these vices. Kaalsarp Dosh is the malefic impact on future generations due to flawed actions.

 

Kalsarpa Yoga

The Kalsarpa Yog is created when all the planets in the horoscope come between Rahu and Ketu. This planetary combination is considered inauspicious in astrology but sometimes it also proves  auspicious. In astrology, Rahu is considered as Kaal (Time or Death) and Ketu is considered as a serpant, Rahu is called the mouth and Ketu is called the tail of the serpant. Vedic astrology describes Rahu and Ketu as shadowy planets, Rahu originated in Bharani Nakshatra and Ketu in Ashlesha Nakshatra. The presiding Gods are Kaal and Sun. Rahu has been termed as a form of Saturn planet and Ketu as a form of Mars planet, Rahu is benevolent in Gemini and malevolent in Sagittarius. The constellations of Rahu are Aadra, Swati and Shatbhisha. If Rahu is placed in 1, 2, 4, 5, 7, 8, 9 houses, especially as malefic in any Rashi, then it surely provides economic, mental and  physical problems in its Mahadasha Antardasha. A person gets afflicted with Kaalsarp Dosha due to the misdeeds of his past lives. This affliction continues across generations due to his sins in various lives.

 

Kalsarpa Dosha –

There are primarily 12 types of Kalsarpa Yoga which cause a great impact to the person. The Good and bad effects of these formulations affects human life. These types are –

 

Anant Kalsarpa Yoga-

When Rahu is Lagna and Ketu is in 8 house and all the other planets are between them, then Anant Kalsarpa Yoga gets created.  The person doesn’t get any mental peace throughout his life due to Anant Kalsarpa Yoga. He is always upset, distressed, dismayed and disturbed and becomes fatuous. The Neurological diseases also disturb him.

Kulik Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 2 house and Ketu in 8 house and all the other planets are between them, then Kulik Kalsarpa Yoga gets created.

Vasuki Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 3 house and Ketu in 9 house and all the other planets are between them, then Vasuki Kalsarpa Yoga gets created.

Sankhpal Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 4 house and Ketu in 10 house and all the other planets are between them, then Sankhpal Kalsarpa Yoga gets created.

Padma Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 5 house and Ketu in 11 house and all the other planets are between them, then Padma Kalsarpa Yoga gets created.

Mahapadma Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 6 house and Ketu in 12 house and all the other planets are enclosed between them, then Mahapadma Kalsarpa Yoga gets created.

Takshak Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 8 house and Ketu is in the Lagna and all the other planets are imprisoned between them, then Takshak Kalsarpa Yoga gets created.

Karkotaka Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 8 house and Ketu in 2 house and all the other planets are struck between them, then Karkotaka Kalsarpa Yoga gets created.

Shankhnaad Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 9 house and Ketu in 3 house and all the other planets are struck between them, then Shankhnaad Kalsarpa Yoga gets created.

Paatak Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 10 house and Ketu in 4 house and all the other planets are between them, then Paatak Kalsarpa Yoga gets created.

Vishaktr Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 11 house and Ketu in 5 house and all the other planets are struck between them, then Vishaktr Kalsarpa Yoga gets created.

Sheshnaag Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 12 house and Ketu in 6 house and all the other planets are between them, then Sheshnaag Kalsarpa Yoga gets created.

 

Thus you can yourself check your horoscope to ascertain about Kaalsarpa Yoga. Similarly if Sun gets paired with Rahu then Pitridosh gets created. The effect of these defects is fully  visible in the life. Such persons cannot achieve success inspite of various endeavors.

 

Partial Kalsarpa Yoga –

The location of other seven planets between Rahu and Ketu cause complete Kalsarpa Dosh. In some individuals, instead of all seven, 1 or 2 planets are outside the Rahu-Ketu combination. In this case it is called partial Kalsarpa Dosha. Its impact is as dangerous as that of full Kalsarpa Dosha. Note that if even one of the Saturn, Venus and Mercury, are outside the Rahu-Ketu combination, then this causes a very bizarre destructive defect. This Dosha is also called as Pitridosh Kaaldosh.

 

Rahu and Kalsarpa Yoga

The properties of Rahu are similar to those of Shani (Saturn); the location and planetary combination of Rahu provides appropriate results like Saturn. Saturn controls spiritual contemplation, consideration, quantitative capabilities,  Rahu has similar properties.

One should also consider the fact that Rahu is combined with which planet, and which house is it Lord of. Rahu is benefic in Gemini,  malefic in Sagittarius and normal in Virgo. The friendly planets of Rahu are Saturn, Mercury and Venus. The enemy planets of Rahu are Sun, Mars and Ketu. Moon, Mercury and Jupiter are its neutral planets. The person afflicted with Kalsarpa yoga in his  horoscope has to undergo tremendous suffering in his life. He gets obstacles in achieving his desired results and actions. He has to undergo very grave mental, physical and economic hardship.

Rahu and Ketu block the fate of a Kalsarpa yoga afflicted native. This results in stoppage of growth and progress of native. He does not obtain any job, even if he gets a job, then multiple problems develop in meeting his livelihood.  This makes it very difficult to live his life. Marriage does not take place. If marriage does take place then problems arise in children.

 

Effects of  Kalsarpa Yoga

Kalsarpa yoga blocks the flow of destiny in person’s life, which consequently increases the effects of his sins in this and prior lives. Kalsarpa Yoga thus increases misfortune in person’s life.  These misfortunes are of four types –

1. The person does not enjoy the full fruits of his labor in full, there is constant lack of money in his life.

2. The person remains physically and mentally weak. The lack of enthusiasm make life a burden.

3. The person has to bear suffering from the children’s side.

4. The domestic life of the person becomes  a mess, there is constant squabble and bickering between the  husband and wife.

 

So each person should definitely accomplish  Kalsarpa Dosh Nivarann Sadhana, Mantra-Chanting, Abhishek, Tarpan-Daan, Pitridosh Mukti Kriya and Shaman Kriya.

The holy scriptures even mention that if you are not aware of your and your family members’ horoscope; even then you should definitely accomplish Kalsarp Dosh Nivarann Poojan Abhishek at least once for all family members.

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