You have Knowledge Now become Wise

तुम ज्ञानी हों
अब समझदार बन जाओं
प्रश्‍न – गुरुदेव ‘मैं’ बहुत होशियार हूं, ‘मैं’ बहुत पढ़ा लिखा हूं और ‘मैं’ बुद्धिजीवी भी हूं, इसके उपरान्त भी ‘मैं’ दूसरों से बहुत अधिक प्रभावित हो जाता हूं इसका क्या कारण है? ‘मैं’ सही गलत का भेद जानते हुए भी दूसरों के विचारों से क्यों प्रभावित हो जाता हूं? इसका नतीजा यह होता है कि ‘मैं’ अपने नजदीकी लोगों के हाथों का एक मोहरा  (ढेेश्र) मात्र बनकर रह जाता हूं। कई बार मेरा, मेरी काबिलियत का वे अपने फायदे, अपनी उन्नति के लिये इस्तेमाल कर लेते हैं। मैं क्या करुं, कैसे अपने आपको समझाऊं?
 


उत्तर – प्रिय आत्मन,
तुमको यह आभास तो है कि तुम होशियार, बुद्धिजीवी एवं पढ़े लिखे हो परन्तु यह जान लो कि इन तीनों शब्दों का मर्म क्या है और इनमें अंतर क्या है।
किसी विषय वस्तु के बारे में प्रारम्भिक सूचना, सामान्य ज्ञान ‘जानकारी’ कहलाती है। जानकारी के बारे में तथ्यों, अनुभवों, पुस्तकों से प्राप्त सार को (जिसे तुमने अपने वातावरण, परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में जांचा परखा है) ‘ज्ञान’ कहलाता है और उसी ज्ञान और जानकारी से प्रेरित क्रियात्मक पक्ष, व्यवहार, क्रिया को ‘समझ’ कहा जाता है।
विभिन्न स्तरों , परिक्षणों, चुनौतियों से गुजरने के पश्‍चात् ही कोई जानकारी या ज्ञान – समझ का रूप धारण करती है।

 

यह तुम्हारा भ्रम है कि तुम ज्ञान प्राप्त कर, समझदार हो गये हो। तुमने पढ़ लिया है और इस प्रकार बहुत समझदार हो गये हो। समझदार होने का अर्थ है, पूरा जीवन ही रूपान्तरित होना और यह समझ किसी एक क्षेत्र में नहीं आती। समझ आती है तो सम्पूर्ण रूप से आती है। ऐसा नहीं होता है कि एक बात समझ में आ गई और दूसरी बात समझ में नहीं आई। समझ आती है तो सारी बातें अपने आप समझ में आ जाती हैं। एक परदा हटता है तो सौ परदे एक के बाद एक हटते चले जाते हैं।
तुमने किताबों से, दुनिया से और गूगल से बहुत ज्ञान प्राप्त किया है और इस ज्ञान को मन के एक कोने में सजा कर रख लिया है। जिस प्रकार अपने घर में ड्राईंग रूम में वस्तुएं सजाकर रखते हो, वैसे ही इस तथाकथित ज्ञान को अपने अन्दर अलग-अलग जगह सजा दिया है। क्या तुम्हारे मन में कभी यह विचार आया कि – मैं अपने ज्ञान को केवल सजा कर नहीं रखूं, बल्कि अपने पूरे जीवन को ही बदल दूं। तुम वास्तव में चाहते हो कि ‘मैं’ जो हूं, वही रहूं और दूसरों से प्रभावित होना भी बंद कर दूं, ज्ञानी भी रहूं, समझदार भी रहूं।

 

प्रत्येक मनुष्य अपने पूरे जीवन में हजारों धारणाओं से घिरा हुआ है। वह जानता ही नहीं कि वास्तव में कौन उसका मित्र है, कौन उसका सहयोगी है, कौन उसका शत्रु है और कौन गुप्त शत्रु (चतुर चालाक) है? वह तो धारणाओं के नशे में एक पूर्वाग्रह में चल रहा होता है और ऐसा मानता है कि वह अच्छे से अपना जीवन जी रहा है।
गलती यहां होती है कि जो ज्ञान हमने प्राप्त किया है, उसे हम समझदारी मान लेते हैं। ज्ञान तो एक नॉलेज है, जानकारी है। कोरा ज्ञान कभी समझ नहीं बन सकता है। तुम जहां भी रहोगे, ज्ञान तो बहुत मिल जायेगा, जानकारी तो बहुत मिल जायेगी।

 

यदि कोई व्यक्ति मन से हिंसक है, आतंकवादी है तो इसका अर्थ है कि वह मन से तो डरपोक है और अपने डर अपनी कायरता को छुपाने के लिये हिंसा का सहारा लेता है यदि व्यक्ति इस प्रकार का है डरपोक है तो वह क्या करेगा? वह अपनी हिंसा बढ़ाने के लिये, अपने डर को मिटाने के लिये और अधिक ज्ञान को ग्रहण करेगा। वह इस प्रकार की जानकारी प्राप्त करेगा कि मैं और अधिक किस प्रकार प्रभावी बन सकता हूं।

 

‘मन से जो डरपोक होते हैं, वे बड़े ही हिंसक होते हैं।’ उन्हें हर समय अपने ऊपर मानसिक आघात का डर लगा रहता है। इसलिये वे तत्काल ‘उग्र’ हो जाते हैं, डरपोक व्यक्ति सदैव अपने कार्यों से, अपने वचनों से हावी होने का प्रयास करता रहता है। वह अपने भीतर के भय से, अपने भीतर की आशंका से हर समय ग्रसित रहता है और उसकी यही आशंका उसे और अधिक उग्र बनने की इच्छा शक्ति देती है, प्रेरणा देती है।

 

अब तुम बताओ कि वह भय से ग्रस्त व्यक्ति किस प्रकार का ज्ञान, नॉलेज बढ़ा रहा है। उसका ज्ञान उसके मन को किस दिशा में ले जायेगा। यह तुम अच्छी तरह समझ सकते हो।

 

तुमने यही समझा है ना कि यह तो ज्ञान का लक्षण है। भीतर से तो जैसे तुम हो, वैसे ही तुम रहते हो और उसके साथ ही साथ और अधिक जानकारी, ज्ञान इक्ट्ठा करते रहते हो, तो यह ज्ञान केवल और केवल तुम्हारे उद्देश्यों की पूर्ति के लिये है।

 

ज्ञान के ऊपर समझदारी है जो आत्मबोध या स्वयं का बोध कहलाती है। इसके लिये तुमको अपने भीतर के द्वार को पूरा खोलना है, अपने भीतर के सारे पर्दे एक साथ खोलने हैं। केवल ज्ञान और जानकारी के बल पर तो जो तुम हो, वही रहोगे, जबकि समझ से तुम अपने आपको बदल सकते हो, रूपान्तरित (ढीरपीषेीा) कर सकते हो। यह समझ तुम एकत्रित नहीं कर सकते, जानकारी को एकत्र कर सकते हो। ज्ञान को एकत्र कर सकते हो।

 

समझ का अर्थ यही है कि – जो तुम्हें और तुम्हारे स्वः को बदल दे। इसके लिये तुम्हें अपने आपसे पूछना पड़ेगा कि क्या मैं समझ गया हूं? क्या मेरे मन का मूलभूत स्वभाव बदला है? क्या मेरी दृष्टि नवीन हो गई है? या तुमने यह निश्‍चय कर लिया है कि अपने अंहकार को तो कायम रखोगे, जिन सिद्धान्तों पर तुम चल रहे हो, उन सिद्धान्तों को तो नहीं बदलोगे। जो तुम्हारी गहरी से गहरी आदतें हैं, उन्हें नहीं छोड़ोगे, जो तुम्हारा आकर्षण है, मोह है उसको पकड़े रखोगे और उसके उपरान्त भी ज्ञान प्राप्त कर तुम समझदार हो जाओगे?

 

मेरे भाई ऐसा नहीं हो सकता है…
अपने भीतर के तार को बजाओ…
ज्ञान से भी महत्वपूर्ण क्या है?
समझ का अर्थ क्या है? जो तुमने अपने आपको माना है, उस तत्व को तुम्हें छोड़ना पड़ेगा। समझ का अर्थ है – तुम्हारे सारे भीतर के तार टूटें, तुमने अपने मन में जो सिस्टम बना रखा है, तुमने अपने मन में जिस ‘मैं’ को बिठा दिया है वह ‘मैं’ ज्ञानी हूं, ‘मैं’ सब समझ गया हूं, यह भाव हटे तब तुम समझना कि ‘मैं’ अर्थात् तुम समझदार हो गये हो। यदि भीतर से ‘अहं’ का भाव नहीं हटे तो तुम समझदार नहीं बने हो। तुमने तो यह जिद्द कर ली है कि मैं भीतर से तो स्वयं को नहीं बदलूंगा। मुझे दो चार बातें बता दीजिये, मैं ज्ञान एकत्र करता रहूंगा। यह ज्ञान ठीक है, अच्छी चीज है, दूसरों को बताने के काम आता है और दूसरों का ज्ञान, किताबों का ज्ञान जानकर तुम प्रभावित भी हो जाते हो। अगर ज्ञान से ही सब कुछ हो जाता तो दुनिया में अब तक सब कुछ बदल जाता। हजारों साल से लोग गीता पढ़ रहे हैं लेकिन मन में डर को बिठाया हुआ है, फिर कैसी गीता पढ़ी? ज्ञान तो आया, पर समझ नहीं आई। यह पूरा जीवन उथला-उथला और नकली ही रहा।

 

इसलिये जो तुम ज्ञान की बात करते हो, वह तुम अपने अहंकार को पालने-पोषने और बढ़ाने के ही काम में लेते हो। किसी सामान्य व्यक्ति को तो तुम कह सकते हो कि देख भाई तुझे कुछ पता नहीं है, मैं ज्ञानी हूं, मैंने जानकारी एकत्र की है, अनुभव एकत्र किया है। ऐसी ही बातें तथाकथित ज्ञानी करते हैं।

 

समझ तो शांति है –
समझ बिल्कुल अलग है, समझ कभी भी अहंकार के हाथ का खिलौना नहीं बन सकती है। समझ तो अहंकार को नष्ट ही कर देती है और यह समझ कब आती है? जिस दिन भीतर ही भीतर कुछ टूटता सा लगे, जिस दिन दुनिया नई-नई सी लगे, जिस दिन तुम्हारे मन में शांति का अनुभव हो, जिस दिन काम होने और नहीं होने दोनों ही स्थितियों में तुम एक जैसा अनुभव करो, तब तुम मानना कि तुम्हारे भीतर ‘समझ’ आई है।

 

जब समझ आ जाती है तो क्या होता है? इसे भी समझ लो।
समझ आने पर ऐसा अनुभव हो सकता है कि तुम्हें अपने पैरों तले जमीन खिसकती नजर आये। ऐसा लगे कि हमारे जीवन का सारा आधार छिन रहा है। यह जीवन का आधार केवल और केवल आन्तरिक अहंकार है। जब यह अहंकार समाप्त होता है तब हमारी धारणाएं टूटती हैं। डर भी लगता है। गुस्सा भी आता है। तब यह समझना कि कुछ समझदारी पूर्ण घटित हो रहा है। क्योंकि चोट केवल और केवल तुम्हारे अहंकार को लगती है। मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? यह तुम्हारे अहंकार पर प्रभाव है। तब समझना कि कुछ-कुछ समझदारी आ रही है।

 

समझदारी का दूसरा अनुभव यह हो सकता है कि अचानक ऐसा लगे कि इसी क्षण सारे बंधन खुल गये हैं। मैं मानसिक रूप से मुक्त हो गया हूं, तब समझना कि अब समझदारी आ गई है।

 

ज्ञान तुम्हें हर समय बांधे रखता है और समझदारी तुम्हें मुक्त कर देती है।

 

यदि ऊपर वाले दोनों अनुभव न होने लगें तो केवल ऐसा ही होगा कि तुम्हारे पुराने ज्ञान के ऊपर कुछ और नई जानकारी आ गई है और इस नयी जानकारी को तुमने ज्ञान समझ लिया है और यह जानकारी केवल शब्दों तक ही सीमित रह गई है। केवल इन्टेलिजेन्ट, जानकार बनना ही पर्याप्त नहीं है। तुमने जो ज्ञान, जानकारी भीतर एकत्र कर ली है, उसे तुम्हें क्या मिल गया है। यदि भीतर कुछ प्रहार हुआ है तब जानना कि कुछ हो रहा है। प्रारम्भ में तुम्हारे मन में एक गहरा प्रतिरोध भी आयेगा तो उसी समय मन के एक कोने में उस स्थिति का स्वागत भी होगा। जब मन के भीतर स्वागत का भाव उठे, तब समझना कि तुम्हारी समझ तुम्हें भीतर से बदल रही है, तुम्हें नया जन्म मिल रहा है, जो पुराना सड़ा-गला था वह समाप्त हो रहा है।

 

जब मन में यह भाव आये कि पुराना समाप्त हो रहा है और मैं नये शांत जीवन में प्रवेश कर रहा हूं तब समझना कि थोड़ी समझदारी आई है।

 

यह समझदारी बहुत सस्ती नहीं है। तुमने कह दिया कि गुरुजी आपकी बातें सुनीं और मैं समझ गया। अगर तुम ऐसा सोचते हो कि यह समझ इतनी सरल है तो तुम यह गलत सोच रहे हो।
जब तक तुम भीतर से तैयार नहीं हो और यदि तुमने भीतर ही भीतर तय कर लिया है कि मुझे अपने अन्तर्मनः को तो बदलना ही नहीं है तो फिर यह समझ प्राप्त करना बड़ा ही मुश्किल काम है और सदैव रहेगा।
ज्ञान का स्वागत करो और इस ज्ञान को अपनी समझ में बदल दो। अपने भीतर सदा नया-नया अनुभव घटित होने दो। अपने आप एक असीम शांति व्याप्त होती चली जाएगी और संसार को एक अलग भाव से देखने की दृष्टि विकसित होने लगेगी और अंततः अर्न्तदृष्टि आ ही जायेगी।

 

वैसे समझदार बनने में ही समझदारी है। ज्ञानी तो हजारों हुए, पढ़े-लिखे लाखों हुए, समझदार तो कोई-कोई ही हो पाता है।

 

और तुम्हें समझदारी के पथ पर आगे बढ़ना है…
You have Knowledge

Now become Wise

 

Question – Gurudev, I’m very smart, I am highly educated and I am an intellectual; however in-spite of this, I get easily influenced by others, what could be the reason? Why do I get influenced by others even when I can differentiate between the right and wrong? As a result, I become a pawn (tool) in the hands of people close to me. People use me and my capabilities for their own advancement. What should I do, how do I guide myself?


Answer – Dear Atman (soulmate),

You are aware that you are smart, intellectual and educated; however do you understand the meaning and difference among these three words.

Any initial information about any subject or topic is called “Information“. The testing of this information with the facts, experiences or books (which you have analysed within your own environment or circumstances) is called “Knowledge“; and the behaviour, actions and functions driven by this information and knowledge is called “Wisdom“.

A fact of information passes through different challenges, tests and levels to become wisdom.

It is your illusion that you have become wiser after gaining knowledge. You feel that you have become wiser after studying all the facts. Wisdom indicates transformation of the entire life, and it is not limited to a particular field. Wisdom is holistic and all-round. One cannot be wise in one field and not in another. Wisdom indicates understanding of the entire contexts. Removal of one layer triggers removal of hundreds of layers of ignorance.

You have collected a lot of knowledge from the books, worldly experiences and Google; and have arranged this knowledge in a corner of your mind. You have arranged this knowledge in various parts of your mind like we decorate and arrange items in the drawing room of our home. Have you ever wondered about – Transforming my own life through this knowledge instead of storing this knowledge in my mind. In reality you wish to remain whatever you are, and to stop getting influenced by others, apart from being wise and sensible.

Every person is surrounded by thousands of conceptions in his life. He does not know exactly who is his friend, who is his partner, who is his enemy and who is the secret enemy (clever, cunning)? He runs his life drunk in his preconceived notions, and therefore believes that he is properly leading his life.

The mistake is that whatever knowledge we receive, we think of it as wisdom. Knowledge is just a set of different pieces of information. Basic knowledge cannot become wisdom. Wherever you live, you will definitely find a lot of information and knowledge.

If a person shows aggressive, violent tendencies, then it means that his mind is full of fears, and that he is using violence to hide his fear. What will such a timid person achieve? He will accumulate more information, more knowledge to get rid of his fear. He will like to obtain more information on how to become more effective and influential.

The people with timid mind are the most violent“. They always live in fear of their own trauma, and so turn aggressive very quickly. A timid person always attempts to dominate through his words and actions. He is always plagued by his inner fears and apprehensions, and that inspires him to go to the extremes.

Now you tell me what kind of knowledge such a timid person is accumulating. Where will such knowledge lead such a person to. You can yourself understand it very well.

You believe that this is a sign of wisdom. However, you remain same as whatever your inner nature is, and you keep on accumulating additional information and knowledge. You obtain this knowledge just to fulfil your purposes.

The wisdom exists at a higher plane than knowledge, and it opens the doors to self-realization. You need to open your inner doors, and for this you need to open all the inner layers together. You will continue to remain at the same level at which you currently are, through information and knowledge. You can transform yourself only through wisdom. You cannot collect this wisdom. You can collect only information and knowledge.

The real meaning of wisdom is – Whatever transforms you and your self. You will have to ask this question to yourself – Have I understood? Has the basic nature of my mind changed? Can I see with a new perspective? Alternatively, you may have decided to retain your ego, and not to change your fundamental principles. You will not leave your deep habits, you will continue to bind yourself with attraction and infatuation. Do you still wish to attain wisdom, with all this?

My dear brother, it is simply not possible …

You need to vibrate your inner strings …

 

What is more important than knowledge?

What does wisdom mean? Whatever you have believed until now, you will have to discard it. Wisdom means – splitting up of all your inner strings, your inner system of considering self to be all-supreme. Only when the thoughts of “I” am knowledgeable, “I” am wise, leave your mind, then you should consider yourself to be wise. You do not become wise by retaining the inner ego of “I” within yourself. You have stubbornly decided not to alter your inner nature. You only ask for 2-4 facts, to collect the information. This information is also a good thing, we can share this information with others. You also get influenced by reading the facts from the books. If knowledge was everything, then everything on this earth would have completely changed by now. People have been reading Geeta for thousands of years, and yet their minds are still filled with fear. What is the use? Learnt the facts but did not understand them. The whole life remained shallow and fake.

Therefore whenever anyone talks about knowledge, he or she uses it only to feed his or her ego. You can impress any normal average person that he does not know anything, only you are knowledgeable as you have collected all the information and experience. The so-called intellectuals speak in such vein.

 

Wisdom is peace –

Wisdom is completely different. It can never become a toy in the hands of any ego. The wisdom eliminates the ego, and how does one get this wisdom? The day something breaks within you, the day this world looks anew, the day you feel peace in your heart, the day you feel same both in success and failure, on that day, you should understand that wisdom has entered your mind.

 

What happens when one attains wisdom. Learn about this fact as well.

It is possible that you feel the earth slipping from your feet on the day, you attain the wisdom. You may feel elimination of the entire base of your life. This basic support is nothing else but your own ego. Our conceptions break when this ego terminates. We feel scared. We also get angry. At that moment, you should understand that something wise is happening, because only your ego is getting injured. Why did this happen to me? This is due to influence of your ego. At that time you should comprehend that some wisdom is entering your mind.

The alternative experience of wisdom could be that you may feel complete breakage from all bonds, and  experience total mental freedom. At that moment you should comprehend that some wisdom is entering your mind.

 

The knowledge always binds you in chains, while wisdom liberates you.

 

If you do not feel any of the above two experiences, then it means that you have just obtained some more information, and you believe these facts of information to be knowledge. However this knowledge is limited to just  few words. It is not enough to be intelligent and informative. What have you gained by collecting the various pieces of knowledge and information till now. Only when something strikes within, then you should realize that something new has happened.

Initially your mind will also feel a resistance, and this resistance will be welcomed in a corner of your mind as well. When this welcome feeling arises in your mind, you should realize that your wisdom is changing you from inside, you are getting a new birth, and the old-tattered is disappearing.

When the mind gets filled with a feeling that – the old is dying and I am entering a new quiet life, then you should realize that some wisdom has entered your mind.

This wisdom is not so easy to attain. You may think that I have heard Guruji’s talk and I have understood. You are wrong if you feel that this thought is so simple.

Attainment of this wisdom becomes very difficult unless your mind is fully ready or if you do not desire any change in your inner mind.

Welcome the knowledge and transform this knowledge into wisdom. Let something new happen within you. You will keep on attaining a deep quiet peace, you will develop a new perspective on the world, and will eventually attain clairvoyance.

It is wise to be sensible. Thousands are knowledgeable, millions are literate, however only one or two become wise.

And you have to proceed on the path of wisdom …

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