Transformation of Consciousness

चेतना का रूपान्तरण

 

सुप्त शक्ति से जाग्रत शक्ति
शक्ति की सम्पन्नता
दुःख और सुख की परिभाषा क्या है?
सुख शक्ति से मिलता है या चेतना से?
जब चेतना सबमें है तो वह शक्ति में रूपान्तरित क्यों नहीं होती?
मन का आनन्द कैसे प्राप्त हो?
शक्ति का विकास कैसे हो?

 

इन्हीं सब प्रश्‍नों का विवेचन करता यह आलेख –
साधक यह आलेख सजगता से पढ़ें –

 

यह बड़ी सरल बात है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने मन के अनुसार, अपनी इच्छा के अनुसार कर्म करने के लिये तो स्वतंत्र है लेकिन उसकी इच्छानुसार फल प्राप्ति के लिये वह स्वतंत्र नहीं है। हर कर्म का निश्‍चित फल और जैसा चाहो वैसा ही फल प्राप्त हो यह भी निश्‍चित नहीं है। इसलिये जब मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार उसे फल प्राप्त नहीं होता है तो वह दुःखी हो जाता है। वैसे मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह दुःखों को सहज भाव से स्वीकार कर लेता है। दुःख को ग्रहण करने का उसे ज्यादा अभ्यास हो जाता है। मनुष्य के इसी भाव के कारण थोड़ा सा दुःख भी उसे प्रभावित अधिक करता है क्योंकि दुःख उसे तत्काल स्पर्श करते हैं। यह सब जिस कारण से होता है उसे दृश्य जगत कहा जाता है। योगियों की भाषा में इसे माया कहा जाता है वास्तव में मनुष्य का अज्ञान ही उसके दुःखों का मूल कारण है। तो स्पष्ट है कि दुःखों से मुक्ति के लिये बाहर की अविद्या, बाहर के अज्ञान से मुक्त होना आवश्यक है। इस बाह्य अज्ञान से मुक्ति केवल मन में स्थित ज्ञान से ही संभव है। सत्य का ज्ञान, तत्व का ज्ञान मनुष्य को मानसिक रूप से स्वतंत्र कर सकता है। भीतर का तत्व ज्ञान सुख-दुःख से मुक्त कर सकता है। पर इसके लिये आवश्यक है कि जाग्रत भाव आए। मन पर पड़े हुए माया भाव का आवरण हटे और वास्तविक सत्य को देख सके।

 

सजग, जागरूक – वर्तमान में जीना

 

जागरूक बनना है, जागरूक रहना है, जागरूक होकर समझना है। प्रश्‍न बड़े ही मुश्किल लगते हैं लेकिन उत्तर बड़ा ही सरल है।

 

चेतना के साथ जीना और वर्तमान में जीना! जो भी कार्य कर रहे हैं उसके प्रति पूर्ण रूप से सजग होकर रहना ही चेतना है। सजग रहने का अर्थ वर्तमान स्थिति को देखना, परखना है। उस स्थिति के कारण अपना कोई निश्‍चित दृष्टिकोण नहीं बनाना है। वर्तमान स्थिति की आलोचना भी नहीं करनी है। यदि हम वर्तमान को सजग भाव से जीते रहें तो स्थितियां भी बदलती रहती हैं। हम जागरूक रहकर नवीन परिस्तिथियों के अनुसार क्रियाशील हो सकते हैं, इसे सजगता कहा गया है।

 

मन पर संयम कैसे करें –

 

तो मन की इस चेतना और जागृति प्राप्ति में बाधा क्या है? सबसे बड़ी बाधा है – मन की चंचलता। होता क्या है? हमें हमारा मन जिस ओर ले जाता है, हम उसी ओर बह जाते हैं। उसी मन के अनुरूप व्यवहार करने लगते हैं। इस मन की चंचलता को नियन्त्रित करना थोड़ा कठिन है। कारण यह है कि मन हमेशा ज्ञान को स्वीकार नहीं करता है। मन अपने अनुसार ही चलना चाहता है। ज्ञान होने का अर्थ है, मन में विचारों का समाप्त हो जाना। यदि मन के विचार नियन्त्रित हो जाएं तो यह मन अपनी मनमानी नहीं कर सकता है। इस मन के ऊपर एक शासन चाहिए। यह मन संकल्प करता है, यह मन नये-नये विकल्प ढूंढ़ता है। यह मन भ्रम की परिस्थितियां उत्पन्न करता है और इसीलिये हमारे शक्ति प्राप्ति के मार्ग में बाधाएं आती हैं।

 

यदि मन को संयमित करना है तो पहले मन की प्रवृत्ति को समझो किधर भाग रहा है? क्या प्राप्त करना चाहता है? क्यों उधर जा रहा है? इन सब प्रवृत्तियों को समझकर इस मन के ऊपर सुशासन स्थापित करो।

 

जब हमारा अपने मन के ऊपर नियन्त्रण हो जाता है तो यही मन हमारी मानसिक चेतना, भावनात्मक चेतना, आध्यात्मिक चेतना को उच्च स्तर पर पहुंचाने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम बन जाता है।

 

कैसे करें मन पर नियन्त्रण? और कैसे करें अपनी चेतना का रूपान्तरण? –

 

बड़ी ही छोटी-छोटी सरल बातें हैं, जिन्हें हर कोई अपना सकता है लेकिन हर कोई अपनाता नहीं है। थोड़ा सा ही फर्क है – जानते हुए भी नहीं अपनाना और यहीं से दुःखों की उत्पत्ति होती है। सरल उपाय हैं –

 

निखिल ज्ञान सूत्र –

 

1. सद्गुरु का मार्गदर्शन – सद्गुरु वह शक्ति भाव है, वह आत्मा है जिसमें परमात्मा की अभिव्यक्ति हो गई है। जो विराट ईश्‍वर का सांसारिक स्वरूप है उसका मार्गदर्शन। गुरु में ही वह सामर्थ्य होता है कि वह अपने शिष्य की आत्मा में, शिष्य के मन में आध्यात्मिक शक्ति का विकास कर सकें। देखिये ज्ञान तो विभिन्न पुस्तकों के माध्यम से भी प्राप्त हो सकता है। किन्तु ऐसा ज्ञान केवल जानकारियों का संग्रह ही होता है। एक आत्मा में ही ऐसी शक्ति होती है जो शब्दों को अर्थ देती है। एक आत्मा में ही वह शक्ति होती है जो हृदय को आन्दोलित कर सकती है और वह शक्ति है – गुरु। इसलिये गुरु का मार्गदर्शन निरन्तर और निरन्तर… आवश्यक है।

 

2. विश्‍वास – सबसे बड़ी समस्या यह है कि मनुष्य ईश्‍वर का चिन्तन, मनन, भजन, पूजन तो अवश्य करता है लेकिन ईश्‍वर पर उसका दृढ़ विश्‍वास नहीं होता है। केवल यह कह देने से कि ये ईश्‍वर की इच्छा है यह शुद्ध विश्‍वास नहीं है। जब तक आप ईश्‍वर को अपने मन से नहीं जानोगे तब तक ईश्‍वर की इच्छा में आपकी इच्छा का समावेश नहीं होता है। तब तक आपका विश्‍वास फलीभूत नहीं होता है केवल बोले हुए शब्द शाब्दिक वचन होते हैं। बिना शुद्ध विश्‍वास के ज्ञान की प्राप्ति, ईश्‍वर की प्राप्ति कैसे संभव है?

 

गुरु मिले बस अब तर्क छोड़ दो

 

जब आपको जीवन में ब्रह्मज्ञानी गुरु मिल जाएं तो उसके पश्‍चात् सब प्रकार के तर्क-वितर्क छोड़ दो। तर्क और हिसाब- किताब की बुद्धि से ईश्‍वर को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यदि आपको अपने गुरु के वचनों पर पूर्ण विश्‍वास हो तो ईश्‍वर प्राप्ति के लिये अधिक मेहनत की आवश्यकता नहीं है। शिष्य का गुरु के वचनों पर विश्‍वास एक बालक की भांति होना चाहिए। जिस प्रकार एक माता अपने बच्चे को जब अन्य रिश्तेदारों से परिचित करवाती है तो बच्चा विश्‍वास करता है कि यही सत्य है। इसी प्रकार जब शिष्य, गुरु के वचनों पर विश्‍वास करता है तो वह ईश्‍वरीय आनन्द प्राप्ति के मार्ग पर अपने-आप आगे बढ़ जाता है।

 

3. त्याग – मन से सम्पूर्ण त्याग किये बिना ईश्‍वर की प्राप्ति संभव नहीं होती। विषयों के प्रति आसक्ति का त्याग, चेतना जाग्रत करने के लिए आवश्यक है। जब तक चेतना जाग्रत नहीं होती तब तक ईश्‍वर के प्रति प्रेम जाग्रत नहीं हो सकता। मन से आसक्ति के जाने पर ही परमात्मा के प्रति व्याकुलता उत्पन्न होती है, मन स्वाभाविक रूप से इन्द्रियों के सुख के प्रति लालायित रहता है और उन सुखों की प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार के कर्मों में आसक्ति पैदा करवा देता है। यही भोग की प्रवृत्ति विभिन्न कष्टों का कारण बनती है। विषयों के भोग में रत रहने पर समस्त समय और ऊर्जा उसी में व्यर्थ हो जाती है और ईश्‍वर से योग हेतु समय और शक्ति दोनों ही शेष नहीं रहतीं। काम, क्रोध लोभ आदि को सहजता से एकाएक समाप्त नहीं किया जा सकता है। संसार में काम, क्रोध, वासनाओं और आसक्तियों इन सब के साथ निरंतर संघर्ष करना पड़ता है इसके लिए लम्बे समय तक सुव्यवस्थित प्रयास करना पड़ता है।

 

इस प्रयास को सहज करने के लिए उनकी दिशा ईश्‍वर की ओर मोड़ देनी चाहिए। अगर सुई पर मिट्टी लगी हो तो चुम्बक सुई को खींच नहीं सकता। यदि  मिट्टी साफ कर दी जाये तो सुई चुम्बक की ओर खींच जाती है, इसी तरह ईश्‍वर में आकर्षण का गुण विद्यमान है किन्तु हमारी अशुद्धियों के कारण हम ईश्‍वर की ओर जा नहीं पाते हैं। संस्कारों की तीव्रता के आधार पर विषयों के प्रति आकर्षण होता है। विषयों के प्रति इस आकर्षण के कारण हम ईश्‍वर से दूर हो जाते हैं। विषय बुद्धि का त्याग करने के लिए सत्व गुण का विकास, शारीरिक नियम और मानसिक अनुशासन का आश्रय लेना पड़ता है जैसे-जैसे सत्व गुण का विकास होता है वैसे-वैसे विषय कर्मों को मन त्याग देता है।

 

4. अभ्यास – मन में शंकाएं उठती हैं, उन शंकाओं का निराकरण गुरु द्वारा दिये गये ज्ञान पर चिन्तन करना ही मनन कहलाता है। यही तो अभ्यास है। मन की समस्त शंकाएं समाप्त हो भी जाएं तो भी यह आवश्यक नहीं है कि ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जाए। इसीलिये साधक को श्रवण और मनन के द्वारा जो ज्ञान प्राप्त हुआ है उस पर निरन्तर और निरन्तर ध्यान और अभ्यास करते रहना चाहिए। कोई भी विद्या हो, निपुणता के लिये लम्बे समय तक अभ्यास आवश्यक है। इसी प्रकार ईश्‍वरीय शक्ति को प्राप्त करने और ईश्‍वर से तार जोड़ने के लिये पूजा, जप, ध्यान आदि का निरन्तर अभ्यास करते रहें। अभ्यास से ही मन में आसाधारण शक्ति आ पाती है। इस शक्ति का उदय होने के पश्‍चात् इन्द्रिय संयम आ जाता है। फिर यह आपकी स्वाभाविक क्रिया बन जाती है।

 

5. साधना – साधना का अर्थ है नियमपूर्वक निर्धारित कर्म को नियमित समय पर करना। मंत्र जप, मुद्रा, आसन, प्राणायाम, अनुष्ठान इत्यादि कर्म जब विशेष व्यवस्था और अनुशासन के अंतर्गत किये जाते हैं तो यह प्रक्रिया साधना कहलाती है। साधना किये बिना शास्त्रों का सही अर्थ समझ नहीं आता है। उदाहरण के लिए दूध में मक्खन है, किन्तु मक्खन है ऐसा कहने मात्र से मक्खन प्राप्त नहीं  होता। मक्खन प्राप्त करने के लिए पहले दूध को ‘जमाकर’, दही बनाना होता है। इस दही को जब मथते हैं तभी मक्खन निकलता है। इसी प्रकार जब मन को एकत्र करके अर्थात विचारों को स्थिर करके मथनी रूपी तपस्या से मथने पर ईश्‍वर की कृपा प्राप्त होती है और कृपा से ही ईश्‍वर के दर्शन संभव होते हैं। ईश्‍वर दर्शन की बात लोगों को समझाई नहीं जा सकती है इसके लिए सत्संग अर्थात् गुरु का मार्गदर्शन और स्वयं को तपस्या में निरन्तर रत करना चाहिए।

 

6. प्रार्थना – अपनी आन्तरिक इच्छाओं को ईश्‍वर के सम्मुख व्यक्त करना ही प्रार्थना है। यह ईश्‍वर के साथ संवाद प्रारम्भ करने का प्रथम साधन है। प्रार्थना को ईश्‍वर तक पहुंचाने का माध्यम विश्‍वास और साधक की प्रबल इच्छा होती है। साधक का विश्‍वास अपने इष्ट पर जितना दृढ़ होता है और लक्ष्य प्राप्ति के लिए आकांक्षा जितनी तीव्र होती है प्रार्थना उतनी शीघ्र पूर्ण होती है। प्रार्थना का लक्ष्य केवल सांसारिक सुख की प्राप्ति नहीं होना चाहिए। जब प्रार्थना शांत मन से ईश्‍वर प्राप्ति हेतु की जाती है तो मन में विवेक और वैराग्य की उत्पत्ति होती है। जब विवेक और वैराग्य की उत्पत्ति होती है तो कर्मों में शुद्धता आती है और ईश्‍वर के प्रति शुद्ध समर्पण की भावना का उदय होता है।

 

7. समर्पण – जब पूर्ण एकाग्रता और विश्‍वास के साथ निरन्तर हो रहे प्रत्येक कर्म के फल को ईश्‍वर को समर्पित कर देते हैं तो ऐसा कर्म हमें बंधन में नहीं बांधता है। कर्म के फलों का सच्चे हृदय से समर्पण ईश्‍वर और गुरु पर पूर्ण विश्‍वास, लम्बे समय की साधना और अभ्यास के उपरान्त ही संभव हो पाता है।

 

8. व्याकुलता – व्याकुलता का अर्थ है – तीव्र उत्सुकता। मन में ऐसी व्याकुलता होनी चाहिए कि दूसरे सब कर्म भूल जाएं और केवल ईश्‍वर ध्यान, गुरु ध्यान ही एकमात्र लक्ष्य बन जाए। चेतना के रूपान्तरण के लिये आवश्यक है कि उसमें प्रेम का आवेग हो, व्याकुलता हो, हर समय प्रभु मिलन का भाव हो यही तो आपका रूपान्तरण है।

 

9. शारीरिक संयम –
चेतना रूपान्तरण का मूल तत्व क्या है – साधना।
साधना कैसे की जाए – नियम पूर्वक निर्धारित कर्म।
इसके लिये यह आवश्यक है कि हमारी इन्द्रियों पर हमारा नियन्त्रण होना चाहिए, संयम होना चाहिए।
हमारा मन क्या करता है? इन्द्रियों द्वारा जो सूचनाएं उसे प्राप्त होती हैं। उसमें वह अपनी इच्छाओं को जोड़ देता है, इससे हम व्यर्थ के कर्मों में उलझ जाते हैं।
इन्द्रिय संयम से मन की बाहर भागने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है। एक भाव पर स्थिर होने का गुण उत्पन्न होता है। इन्द्रिय संयम के लिये शारीरिक पवित्रता और  मानसिक पवित्रता दोनों के प्रति सचेष्ट रहना पड़ता है।
शरीर की पवित्रता
शरीर की शुद्धि के लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन चरणों पर एक-एक करके आगे बढ़ना होता है। यम का अर्थ होता है मन, वचन और कर्म से लोभ, हिंसा इत्यादि न करना, आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करना इत्यादि। नियम के अंतर्गत शरीर सम्बन्धी नियम – जैसे नित्य स्नान, नियंत्रित और सात्विक आहार इत्यादि आते हैं। प्रत्याहार प्रक्रिया में मन को अंतर्मुखी (खपींीेुेीव) करते हैं तथा उसे बाहर जाने से रोकते हैं। धारणा का अर्थ है एक विषय पर ध्यान केन्द्रित करना। इन सभी का अभ्यास सम्पूर्ण जीवन करने की आवशयकता होती है। ऐसा करने से मन समाधि में प्राप्त होने वाली ऊर्जा को ग्रहण करने और उसका समुचित उपयोग करने में समर्थ हो जाता है।
यही स्थिति आपकी चेतना को रूपान्तरित कर सकती है। सांसारिक भाषा में जिसे चमत्कारिक परिवर्तन कहते हैं। वह चमत्कार आपके भीतर से ही संभव हो सकता है।

 

10. मानसिक संयम – हर प्रकार की भावना से प्रभावित मत होईये। अपने मन का निरन्तर निरीक्षण करते रहिये, अपने विचारों को संयमित रखिये। यही तो मानसिक संयम है। जो विचार आपको शुभ फल प्रदान करने वाले नहीं हैं उनके प्रति निःशंक हो जाईये। अपने मन के शुभ भावों को पहचान कर उनका समुचित उपयोग करने के लिये निरन्तर प्रयास करना आवश्यक है। मन बार-बार भावनाओं के आवेग से आपको विचलित करने का प्रयास करता रहता है। इस पर नियन्त्रण तो इच्छा शक्ति के प्रयोग से ही संभव है। इच्छा शक्ति को सबल करने के लिये शुभ और अशुभ विचार, भावों के प्रवाह के लिये गुरु का मार्गदर्शन समय-समय पर प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है।

 

मैं इन्हें अपना सकता हूं
मैं इन्हें अपने जीवन में स्थापित करूंगा

 

सारभूत अर्थ –

 

ऊपर कही गई दस बातें अपनाना बहुत मुश्किल कार्य नहीं है पर बहुत सरल कार्य भी नहीं है। बस एक बार प्रारम्भ करने की आवश्यकता है। फिर उस मार्ग पर शंकारहित होकर उत्तरोतर आगे बढ़ना है। इसके लिये प्रयास, रूचि दोनों ही आवश्यक हैं। जब हम मन, वचन और कर्म से कोई कार्य करते हैं तो हमारी चेतना रूपान्तरित हो सकती है। मन को शंात करना अति आवश्यक है। इस मन में निरन्तर और निरन्तर अहम् का भाव बहुत आता है। जब तक यह अहम् का भाव रहता है तब तक ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है। इसलिये ज्ञान प्राप्ति के लिये अपने स्वयं की, अपने चित्त की शुद्धि आवश्यक है।

 

समर्पण का भाव केवल शुद्ध हृदय के साथ ही संभव है। जब तक पूर्ण समर्पण नहीं होता है तब तक ज्ञान प्राप्त नहीं होता है और जब तक ज्ञान नहीं होता है तब तक मन भेद भरा होता है। जब मन से भेद समाप्त हो जाता है तो पूर्ण समर्पण का सूर्योदय होता है। यह समर्पण गुरु के दिशा निर्देशन में शुभ कर्मों द्वारा चित्त शुद्धि के उपरान्त ही संभव हो पाता है।

 

सबसे सारभूत बात यह है कि जब गुरु और शिष्य दोनों योग्य होते हैं तो एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक शक्ति का उदय होता है। जिस प्रकार एक अच्छी जमीन में अच्छा बीज बोया जाए तो फसल अच्छी होती है। उसी प्रकार एक ऐसा गुरु जिसने आत्मज्ञान का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है, वह अपने शिष्य को उस स्थान तक ले जा सकता है, उसकी चेतना को रूपान्तरित कर सकता है।

 

जिस प्रकार अग्नि को प्रज्वलित करने के लिये अग्नि की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार गुरु वह अग्नि है जिनके भीतर अध्यात्म की ऊर्जा और प्रकाश है। वे ही अपने अध्यात्म की ऊर्जा से अपने शिष्य में आध्यात्मिक ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित कर सकते हैं। इसी प्रकार शिष्य का भी सुयोग्य होना अत्यन्त आवश्यक है।   मूल शक्ति तो भीतर ही है उसे साधना, समर्पण, संयम, विश्‍वास के द्वारा जाग्रत करना है। उसके लिये उस पर पड़ी अज्ञान की राख को हटाना आवश्यक है। यह क्रिया गुरु द्वारा सम्पन्न की जाती है और जब शिष्य में समर्पण का भाव होता है उसी समय गुरु और शिष्य का मिलन ‘शक्तिपात’ की क्रिया कहलाती है।
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