Shri Vidya RajaRajeshwari Shodashi Tripura Sundari

श्री विद्या

राज राजेश्‍वरी

षोडशी त्रिपुर सुन्दरी

 

आध्यात्मिकता और भौतिकता प्रदायक

 

जीवन में चाहे किसी भी प्रकार का अभाव हों, कष्ट हों, पीड़ाएं हों, बाधाएं हों, दुःख हों, दैन्य हों, न्यूनताएं हों, उन सबको एक ही झटके में समाप्त करने की अगर कोई साधना है, तो वह षोडशी त्रिपुर सुन्दरी साधना है। इसके अतिरिक्त भौतिक सुखों को भी पूर्णता के साथ देने में यह महाविद्या सर्व समर्थ है।
त्रिपुरा का अर्थ तीन पुरों की अधीश्‍वरी हैं। त्रिमूर्ति- ब्रह्मा, विष्णु और महेवर के पूर्व जो विद्यमान थीं तथा जो वेद, त्रयी, ॠग, यजुः और साम के पूर्व जो ज्ञान का प्रसार कर रही थीं एवं त्रिलोकों स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल के लय होने पर भी जिनकी शक्ति बरकरार रहती है, वे देवी त्रिपुर सुन्दरी ही हैं।

 


त्रिगुण शक्ति – त्रिपुर सुन्दरी राजराजेश्‍वरी

 

संसार के सभी पदार्थ- जड़ या चेतन, सजीव या निर्जीव-मात्र तीन गुणों के संयोजन से ही गतिशील होते हैं। मनुष्य की समस्त गतिविधियां, जीवन शैली, जीवन में उतार-चढ़ाव, गुण-दोष,  स्वभाव, मात्र इन तीन गुणों अर्थात् ‘सत्व’, ‘रज’ एवं ‘तम’ से ही बनते हैं। इन तीनों गुणों का जिस परा शक्ति से प्रादुर्भाव होता है, उसी की अधिष्ठात्री देवी महा त्रिपुर सुन्दरी हैं। देवी त्रिपुर सुन्दरी की ही परा शक्ति से सारा चराचर जगत उत्पन्न होता है, उन्हीं से संसार का पालन एवं समय आने पर नाश भी होता है। वे ही रोगों और दुःखों को हरने वाली हैं।

 

वे ही इच्छा, ज्ञान, क्रियाशक्ति वाली हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव के रूप में वही गतिशील हैं। वे ही ब्रह्मा रूप में इस चराचर जगत की सृृष्टि करती हैं, वे ही विष्णु रूप में स्थित हो पालन करती हैं तथा उन्हीं से संयुक्त हो शिव प्रलय और सृजन करते हैं। जिसकी योनि में आज भी यह सारा संसार परिवर्तित हो रहा है, जिसके महाप्रलय के समय यह संसार लीन हो जाता है तथा जहां से पुनः उत्पन्न भी होता है, उन राजराजेश्‍वरी त्रिपुर सुन्दरी की आराधना साधना से ऐसी कौन सी वस्तु है, जो प्राप्त नहीं हो सकती, अर्थात् सब कुछ प्राप्त हो सकता है।

 

कलिका पुराण’ के अनुसार शिव जी की भार्या त्रिपुरा श्री चक्र की परम नायिका हैं। परम शिव उन्हीं के सहयोग से सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से स्थूल रूपों में क्रियाशील होते हैं। वास्तव में जहां काली, तारा, छिन्नमस्ता, बगलामुखी, मातंगी, धूमावती, आदि महाविद्याएं अपेक्षाकृत कठोर हैं, वहीं भुवनेश्‍वरी, त्रिपुर सुन्दरी, कमला और त्रिपुर भैरवी माधुर्यमयी हैं। इसमें भी राजराजेश्‍वरी त्रिपुर सुन्दरी तो पूर्ण वात्सल्यमय हैं और करुणा तथा भक्तानुग्रहाकांक्षा में सर्वोपरि हैं। वे अपने साधक के शत्रुओं का स्तम्भन कर साधक के जीवन में नाना प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं।

 

त्रिपुर सुन्दरी – ज्ञान और लक्ष्मी का संयोग

 

ऐसा ज्यादातर पाया जाता है, कि ज्ञान और लक्ष्मी का मेल नहीं होता है। व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो वह लक्ष्मी की पूर्ण कृपा प्राप्त नहीं कर सकता है और जहां लक्ष्मी का विशेष आवागमन रहता है, वहां व्यक्ति पूर्ण ज्ञान से वञ्चित रहता है लेकिन त्रिपुर सुन्दरी की साधना, जो कि श्री विद्या की भी साधना कही जाती है, इसके बारे में लिखा गया है, कि जो व्यक्ति पूर्ण एकाग्रचित्त होकर यह साधना सम्पन्न करता है, उसे शारीरिक बाधा, मानसिक बाधा नहीं होती है, वह दरिद्रता अथवा मृत्यु के पाश से नहीं डरता, वह व्यक्ति जीवन में पूर्ण रूप से धन, यश, आयु, भोग और मोक्ष को प्राप्त करता है।

 

यह शक्ति वास्तव में त्रिशक्ति स्वरूपा है। षोडशी त्रिपुर सुन्दरी साधना कितनी महान साधना है, इसके बारे में ‘वामकेश्‍वर तंत्र’ में लिखा है – जो व्यक्ति यह साधना जिस मनोभाव से करता है, उसका वह मनोभाव पूर्ण होता है। काम की इच्छा रखने वाला व्यक्ति पूर्ण शक्ति प्राप्त करता है, धन की इच्छा रखने वाला पूर्ण धन प्राप्त करता है, विद्या की इच्छा रखने वाला विद्या प्राप्त करता है, यश की इच्छा रखने वाला यश प्राप्त करता है, पुत्र की इच्छा रखने वाला पुत्र प्राप्त करता है, कन्याएं श्रेष्ठ पति को प्राप्त करती हैं, इनकी साधना से अज्ञानी भी ज्ञान प्राप्त करता है, हीन भी गति प्राप्त करता है।

 

यह साधना करने वाला व्यक्ति कामदेव के समान हो जाता है और वह साधारण व्यक्ति न रहकर लक्ष्मीवान, पुत्रवान व स्त्रीप्रिय होता है। उसे वशीकरण की विशेष शक्ति प्राप्त होती है, उसके भीतर एक विशेष आत्मशक्ति का विकास होता है और उसके जीवन में पाप शांत होते हैं। जिस प्रकार अग्नि में घास तत्काल भस्म हो जाती है, उसी प्रकार राजराजेश्‍वरी त्रिपुर सुन्दरी की साधना करने से व्यक्ति के पापों का क्षय हो जाता है, वाणी की सिद्धि प्राप्त होती है और उसे समस्त शक्तियों के स्वामी की स्थिति प्राप्त होती है और व्यक्ति इस जीवन में ही मनुष्यत्व से देवत्व की ओर अग्रसर होने की क्रिया प्रारम्भ कर लेता है।

 

राजराजेश्‍वरी स्वरूप

 

राजराजेश्‍वरी त्रिपुर सुन्दरी का जो स्वरूप है, वह अत्यन्त ही गूढ़ है। जिस महामुद्रा में वे भगवान शिव की नाभि से निकल, कमल दल पर विराजमान हैं, वे मुद्राएं उनकी कलाओं को प्रदर्शित करती हैं और जिससे उनके कार्यों तथा उनकी अपने भक्तों के प्रति जो भावना है, उसका सूक्ष्म विवेचन स्पष्ट होता है।
सोलह पंखुड़ियों के कमल दल पर पद्मासन मुद्रा में विराजमान त्रिपुर सुन्दरी मातृ स्वरूपा हैं तथा वो सभी पापों और दोषों से मुक्त करती हुईं अपने भक्तों तथा साधकों को सोलह कलाओं से पूर्ण करती हुईं उन्हें पूर्णता का वर प्रदान करती हैं। त्रिपुर सुन्दरी के हाथों में माला, अंकुश, धनुष और बाण साधकों को जीवन में सफलता और श्रेष्ठता प्रदान करते हैं। दायें हाथ में अंकुश, इस बात को इंगित करता है, कि जो व्यक्ति अपने कर्मदोषों से परेशान है, उन सभी कर्मों पर वह पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर उन्नति के पथ पर गतिशील हो और उसे जीवन में श्रेष्ठता, भव्यता, आत्मविश्‍वास प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त शिष्य के जीवन में आने वाली प्रत्येक बाधा, शत्रु, बीमारी, गरीबी अशक्तता सभी को दूर करने का प्रतीक, उनके हाथ में धनुष-बाण हैं।

 

देवी साधना के हजारों स्वरूपों की व्याख्या करना कुछ पृष्ठों में संभव नहीं है, देवी का प्रत्येक स्वरूप अपने आप में कल्याणकारी, पूर्णतायुक्त एवं साधक को पूर्ण अभय प्रदान करने वाला है, मोटे तौर पर साधक महाविद्याओं की साधनाओं के हजारों विवरण पढ़ता है, लेकिन बहुत कम साधक ऐसे होते हैं, जो कि उन पर पूर्ण रूप से मनन करते हुए, सम्पूर्ण साधना सम्पन्न करते हैं, इन साधनाओं में सबसे महत्वपूर्ण साधना त्रिपुर सुन्दरी साधना है, यह देवी का सर्वश्रेष्ठ शौर्य, आशीर्वाद, फलप्रदायक स्वरूप है, और इस स्वरूप की साधना कभी भी व्यर्थ जा ही नहीं सकती है, इस स्वरूप में इतनी अधिक शक्ति भरी है, कि साधक, साधना करते-करते स्वयं शक्तिमान हो जाता है।

 

महाकल्याणकारी है देवी त्रिपुर सुन्दरी की साधना

 

षोडशी त्रिपुर सुन्दरी साधना के इतने अधिक आयाम हैं, कि जिसे लिखा जाए, तो एक पूर्ण ग्रंथ तैयार हो सकता है। इस साधना के कुछ लाभ जो साधकों ने अनुभव किए हैं, वे इस प्रकार हैं –

 

1.  इस साधना के माध्यम से साधक को जीवन में चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की प्राप्ति होती है। साधक को जीवन में एक साथ भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

 

2.  इसको साफल्य साधना भी कहा जाता है, क्योंकि यह साधना अन्य साधनाओं में भी पूर्णता देने में सक्षम है। कोई भी साधना हो, वह चाहे अप्सरा साधना हो, दैवी साधना हो, शैव साधना हो, वैष्णव साधना हो, उनको पूर्णता के साथ सिद्ध कराने में यह त्रिपुर सुन्दरी साधना समर्थ हैं – यदि इस साधना को पहले सम्पन्न कर लिया जाए।

 

3.  जीवन में चाहे किसी भी प्रकार का अभाव हो, कष्ट हो, पीड़ा हो, बाधा हो, दुःख हो, दैन्य हो, न्यूनता हो, उन सबको एक ही झटके में समाप्त करने की अगर कोई साधना है, तो वह षोडशी त्रिपुर सुन्दरी साधना है। आध्यात्मिक पूर्णता के साथ ही साथ भौतिक सुखों को भी पूर्णता के साथ देने में यह महाविद्या सर्व समर्थ है।

 

4.  इस साधना की एक विशेषता यह भी है, कि इससे कायाकल्प भी संभव हो जाता है, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री हो। इस साधना से साधक का चेहरा अपने आप में तेजस्वी, अद्वितीय दमक से युक्त ललाट, सिंह के समान दर्पौन्नत वक्षस्थल बन जाता है।

 

5.  इस साधना से जीवन में निरन्तर धन प्राप्त होता ही रहता है और आय के सैकड़ों स्रोत खुल जाते हैं, चाहे वह व्यापार करता हो, चाहे वह नौकरी करता हो।

 

6.  ‘पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाव शिष्यते’… उपनिषद् की यह उक्ति, यह स्थिति इस साधना के माध्यम से सम्भव है, इसीलिए यह साधना जीवन की जाज्वल्यमान, तेजस्वी, अद्वितीय और श्रेष्ठ तथा परमोपयोगी साधना है।

 

वास्तव में वे अत्यन्त अभागे और दुर्भाग्यशाली होते हैं, जो इस प्रकार की साधना सम्पन्न नहीं कर पाते। वास्तव में उनके भाग्य ही न्यून होते हैं, जो इस साधना से परे हटते हैं। यह साधना अपने आप में स्वयं सिद्ध है; ‘षोडशी त्रिपुर सुन्दरी’ तो त्रिलोकी की देवी हैं, जो समस्त साधकों को और भक्तों को, साधुओं को और संन्यासियों को समान रूप से प्रिय हैं।

 

षोडश कलाओं से पूर्ण राजराजेश्‍वरी षोडशी त्रिपुर सुन्दरी अपने दिव्य स्वरूप में जब साधक के समक्ष प्रकट होती हैं, तब वह आनन्द से अभिभूत हो जाता है। षोडशी की तेजस्विता साधक के शरीर के अणु-अणु में रोम-रोम में प्रवेश कर जाती हैं, जिससे उसका चेहरा अपने आप में दैदीप्यमान हो उठता है। फिर उसके जीवन में लड़ाई, झगड़े, द्वंद्व, पीड़ा, अभाव, कष्ट और न्यूनता नहीं रह पाते। इसलिए षोडशी त्रिपुर सुन्दरी दस महाविद्याओं में सर्वश्रेष्ठ महाविद्या मानी गई हैं।

 

सदाशिव और त्रिपुर सुन्दरी का त्रिगुणात्मक संसार

 

षोडशी त्रिपुर सुन्दरी देवी की उपासना-साधना स्थान, सम्प्रदाय, स्वरूप और ध्यान भेद से भिन्न-भिन्न नामों से की जाती है। नारद संहिता में लिखा है कि वेद, धर्म, शास्त्र, पुराण, पंचरात्र आदि शास्त्रों में एक परमेश्‍वरी का वर्णन है, नाम चाहे भिन्न-भिन्न हों।

 

सरल शब्दों में कहा जाए तो त्रिपुरा का अर्थ तीन पुरों की अधीश्‍वरी हैं। त्रिमूर्ति- ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पूर्व जो विद्यमान थीं तथा जो वेद, त्रयी, ॠग, यजुः और साम के पूर्व जो ज्ञान का प्रसार कर रही थीं एवं त्रिलोकों स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल के लय होने पर भी जिनकी शक्ति बरकरार रहती हैं, वे देवी त्रिपुर सुन्दरी ही हैं।

 

नाडीत्रयं तु त्रिपुरा सुषम्ना पिंड्गला त्विडा
मनो बुद्धिस्तथा चितं पुरत्रयमुदाहृतम्
तत्र-तत्र वसत्येषा तस्मात तु त्रिपुरा माता
त्रिपुरार्णव ग्रंथ में कहा गया है कि सुषुम्ना, पिंगला और इड़ा ये तीनों नाड़ियां हैं, एवं मन, बुद्धि और चित्त ये तीन पुर हैं इस त्रिपुर नगरी (मन, बुद्धि और चित्त) में जिन देवी का निवास है, वे त्रिपुरा हैं।

 

शिव और उनकी शक्ति के रूप में त्रिपुर सुन्दरी सृष्टि के मूल में प्रेरणा की तरह कार्य करती हैं। महाप्रलय के बाद जब शिव, त्रिपुर सुन्दरी के साथ संयुक्त होकर ‘एकोहम बहु स्याम प्रजाये’ की कल्पना करते हैं, तब सृष्टि का पुनः सृजन आरम्भ होता है।

 

षोडशी श्रीविद्या साधना प्रणाली को शिव ने परम कल्याणी माता पार्वती के अनुरोध पर प्रकट किया। एक बार देवी पार्वती ने शिवजी से प्रश्‍न किया कि, ‘आपके द्वारा प्रकाशित तंत्र शास्त्र की साधना से जीव के आधि-व्याधि, शोक-संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जाएंगे किन्तु गर्भवास और मृत्यु के असह्य दुःखों की निवृत्ति कैसे होगी? इन दुःखों से जीवों की निवृत्ति कैसे होगी?’

 

इन दुःखों की निवृत्ति सिर्फ षोडशी त्रिपुर सुन्दरी राजराजेश्‍वरी साधना-पूजन से सम्भव है इनकी साधना-पूजन मात्र से जीवन में धनाभाव से जुड़े सारे कष्ट और पुनरपि जननं पुनरपि मरणम् का संताप सदा के लिए दूर हो जाते हैं।

 

श्रीविद्या त्रिपुर सुन्दरी के परम आराधक दुर्वासा ॠषि हुए आदि गुरु शंकराचार्य ने भी श्रीविद्या के रूप में इन्हीं षोडशी देवी की उपासना की थी।

 


गुरु पूर्णिमा और चन्द्रग्रहण
27 जुलाई 2018

 

के अद्वितीय मुहूर्त पर त्रिपुर सुन्दरी साधना

 

पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ प्रकाशित होता है। नवग्रहों में चन्द्रमा पृथ्वी के सर्वाधिक समीप है पृथ्वी से चन्द्रमा की इस निकटता के कारण उसका प्रभाव सबसे अधिक हमारे ऊपर पड़ता है। वैसे भी चन्द्रमा मन का स्वामी है। मन, चित्त और बुद्धि ये शरीर के तीन पुर (लोक) हैं और इन तीनों लोकों की त्रिपुरा रूप में स्वामिनी त्रिपुर सुन्दरी हैं।

 

चन्द्रमा को मस्तक पर त्रिपुरारी शिव ने धारण किया है और चन्द्रमा के स्वामी भी शिव हैं। शिव जब शक्ति रूप में त्रिपुर सुन्दरी से संयुक्त होते हैं तो सृष्टि में त्रिगुणात्मक रचना विस्तार होता है।

 

साधना कोई भी हो गुरु के आशीर्वाद के बिना उसका सफल होना संभव ही नहीं है। प्रत्येक साधना का आरम्भ गुरु पूजन से किया जाता है। गुरु पूर्णिमा गुरु पूजन का श्रेष्ठतम मुहूर्त है, और इस बार गुरु-पूर्णिमा के शुभावसर पर चन्द्रग्रहण भी हो रहा है।

 

साधक जानते हैं कि ग्रहण काल में की गई साधनाएं शीघ्रातिशीघ्र फल देती हैं और त्वरित गति से सिद्ध हो जाती हैं। चन्द्रग्रहण, त्रिपुर सुन्दरी साधना के इस अद्वितीय मुहूर्त को और भी श्रेष्ठ बनाता है, यह भी सत्य है कि गुरु पूर्णिमा के अगले दिन से शिव का श्रावण मास प्रारम्भ हो जाता है। पूरे मास भर भक्तगण शिव का अभिषेक करेंगे, पर शिव की कृपा का मार्ग शिवा से गुजरता है। इसलिए, गुरु पूर्णिमा और चन्द्रग्रहण के अद्वितीय मुहूर्त पर त्रिपुर सुन्दरी साधना सम्पन्न करके जब आप श्रावण में शिव का अभिषेक करेंगे तो आपकी मनोकामनाओं को शिव और शक्ति का संयुक्त आशीर्वाद प्राप्त होगा। पूर्णिमा के चन्द्रग्रहण में सम्पन्न की गई त्रिपुर सुन्दरी साधना के प्रभाववश जीवन में अभाव जनित न्यूनताएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं और जीवन में सुख, समृद्धि का उदय होता है। स्वप्न स्वतः साकार हो जाएंगे। जब त्रिपुरा संग आशीष मिल जाएगा त्रिपुरारी का और इस साधना को सम्पन्न करने का श्रेष्ठतम मुहूर्त गुरुपूर्णिमा पर चन्द्रग्रहण का संयोग है।

 

जब आद्याशक्ति आप पर प्रसन्न होंगी तब श्रावण मास में शिव की साधनाएं भी शीघ्रता से फलित होंगी।

 

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