Shree Yantra

मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त
श्रीयंत्र
क्या विशेषता है श्रीयंत्र में?
क्यों लक्ष्मी का वास माना जाता है श्रीयंत्र में?
कैसे रचना की जाती है श्रीयंत्र की?
क्यों श्री यंत्र ब्रह्माण्ड का स्वरूप है?
सर्वाधिक रहस्यमय

 

श्रीविद्या के यंत्र स्वरूप को ‘श्रीयंत्र’ या ‘श्रीचक्र’ कहते हैं। यह एक मात्र ऐसा यंत्र है, जो समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है। श्री शब्द का अर्थ लक्ष्मी, सरस्वती, शोभा, संपदा, विभूति से किया जाता है। यह यंत्र ‘श्री विद्या’ से संबंध रखता है। साधक को लक्ष्मी़, संपदा, विद्या आदि की ‘श्री’ देने वाली विद्या को ही ‘श्रीविद्या’ कहा जाता है।

 

श्रीयंत्र को यंत्रराज भी कहा जाता है, इसे यंत्रों में सर्वोत्तम माना गया है। कलियुग में कामधेनु के समान ही है जो साधक को पूर्ण मान-सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान करता है। श्री यंत्र को कल्पवृक्ष भी कहा गया है, जिसके सान्निध्य में सारी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

 

अचरज भरा अद्भुत सिद्धिप्रद यंत्र श्री यंत्र

 

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श्रीयंत्र का उल्लेख तंत्रराज, ललिता सहस्रनाम, कामकला विलास, त्रिपुरोपनिषद आदि विभिन्न प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। महापुराणों में श्री यंत्र को देवी महालक्ष्मी का प्रतीक कहा गया है। महालक्ष्मी स्वयं कहती हैं – ‘श्री यंत्र मेरा प्राण, मेरी शक्ति, मेरी आत्मा तथा मेरा स्वरूप है। श्री यंत्र के प्रभाव से ही मैं पृथ्वी लोक पर वास करती हूं।

 

श्रीयंत्र को यंत्रराज, यंत्र शिरोमणि, षोडशी यंत्र व देवद्वार भी कहा गया है। ऋषि दत्तात्रेय व दुर्वासा ने श्रीयंत्र को मोक्षदाता माना है। जैन शास्त्रों ने भी इस यंत्र की प्रशंसा की है। जिस तरह शरीर व आत्मा एक दूसरे के पूरक हैं उसी तरह देवता व उनके यंत्र भी एक दूसरे के पूरक हैं। यंत्र को देवता का शरीर और मंत्र को आत्मा कहते हैं। यंत्र और मंत्र दोनों की साधना उपासना मिलकर शीघ्र फल देती है। जिस तरह मंत्र की शक्ति उसके शब्दों में निहित होती है उसी तरह यंत्र की शक्ति उसकी रेखाओं व बिंदुओं में होती है। मकान, दुकान आदि का निर्माण करते समय यदि उनकी नींव में प्राण प्रतिष्ठित श्री यंत्र को स्थापित करें तो वहां के निवासियों को श्री यंत्र की अदभुत व चमत्कारी शक्तियों की अनुभूति स्वतः होने लगती है।

 

शास्त्रों में कहा गया है कि श्रीयंत्र की अद्भुत शक्ति के कारण इसके दर्शन मात्र से ही लाभ मिलना प्रारम्भ हो जाता है।
जन्मकुंडली में मौजूद केमद्रुम, दरिद्र, शकट, ऋण, निर्भाग्य, काक आदि विभिन्न कुयोगों को दूर करने में श्री यंत्र अत्यंत लाभकारी है। यह यंत्र मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष देने वाला है। इसकी कृपा से मनुष्य को अष्ट सिद्धि व नौ निधियों की प्राप्ति हो सकती है। श्री यंत्र के पूजन से सभी रोगों का शमन होता है और शरीर की कांति निर्मल होती है। इसकी पूजा से शक्ति स्तंभन होता है व पंचतत्वों पर विजय प्राप्त होती है।
श्रीयंत्र की कृपा से मनुष्य को धन, समृद्धि, यश, कीर्ति, ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति होती है। श्री यंत्र के पूजन से रुके हुए कार्य बनते हैं। श्री यंत्र की श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से पूजा करने से दुःख दारिद्र्य का नाश होता है। श्री यंत्र की साधना उपासना से साधक की शारीरिक और मानसिक शक्ति पुष्ट होती है। इस यंत्र की पूजा से दस महाविद्याओं की कृपा भी प्राप्त होती है। श्री यंत्र की साधना से आर्थिक उन्नति होती है और व्यापार में सफलता मिलती है।

 

लक्ष्मी और श्रीयंत्र

 

एक सुन्दर आख्यान आता है कि एक बार लक्ष्मी अप्रसन्न होकर बैकुण्ठ को चली गईं, इससे पृथ्वी तल पर काफी समस्याएं पैदा हो गईं। ब्राह्मण और वणिक वर्ग बिना लक्ष्मी के दीन-हीन, असहाय से घूमने लगे, तब ब्राह्मणों में श्रेष्ठ, वशिष्ठ ने निश्‍चय किया, कि मैं लक्ष्मी को प्रसन्न कर भूतल पर ले आऊंगा।
जब वशिष्ठ बैकुण्ठ में जा कर लक्ष्मी से मिले तो ज्ञात हुआ, कि लक्ष्मी अप्रसन्न हैं और वह किसी भी स्थिति में भूतल पर आने को तैयार नहीं हैं, तब वशिष्ठ वहीं बैठ कर विष्णु की आराधना करने लगे। जब विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए, तो वशिष्ठ ने कहा, कि हम पृथ्वी पर बिना लक्ष्मी के दुःखी हैं, हमारे आश्रम उजड़ गए हैं, चौपट हो गए हैं और जीवन की उमंग और उत्साह समाप्त हो गया है।
भगवान विष्णु, वशिष्ठ को साथ लेकर लक्ष्मी के पास गए और उन्हें मनाने लगे, परन्तु लक्ष्मी नहीं मानीं और उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा, कि मैं किसी भी स्थिति में भूतल पर जाने को तैयार नहीं हूं। क्योंकि पृथ्वी पर साधना और शुद्धि नहीं है।
हताश होकर वशिष्ठ पुनः भूतल पर लौट आए और लक्ष्मी के निर्णय से सबको अवगत करा दिया। सभी किंकर्त्तव्यविमूढ़ थे, कि क्या किया जाए? तब देवताओं के गुरु बृहस्पति ने कहा, कि अब एकमात्र ‘श्रीयंत्र साधना’ ही बची है, और यदि सिद्ध ‘श्री यंत्र’ बना कर स्थापित किया जाए, तो निश्‍चय ही लक्ष्मी को आना पड़ेगा।

 

बृहस्पति की बात से ॠषियों में हर्ष की लहर दौड़ गई और उन्होंने बृहस्पति के निर्देशन में धातु पर श्रीयंत्र का निर्माण किया और उसे मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त किया और दीपावली से दो दिन पूर्व धन त्रयोदशी को उस श्रीयंत्र को स्थापित कर विधि-विधान से उसका षोडशोपचार पूजन किया। पूजन समाप्त होते-होते लक्ष्मी स्वयं वहां उपस्थित हो गईं और बोलीं – मैं किसी भी स्थिति में यहां आने के लिए तैयार नहीं थी, यह मेरा प्रण था, परन्तु बृहस्पति की युक्ति से मुझे आना ही पड़ा। श्रीयंत्र मेरा आधार है और इसी में मेरी आत्मा निहित है। 

 

इस कथा से यह भली भांति स्पष्ट है, कि श्रीयंत्र अपने आप में लक्ष्मी का सर्वाधिक प्रिय स्थान है, और जहां यह यंत्र स्थापित होता है, वहां लक्ष्मी स्थायी रूप से रहती ही हैं। 
साधकों, ॠषियों, मुनियों और तपस्वियों ने एक स्वर से यह स्वीकार किया है, कि यह यंत्र अद्भुत धनप्रदायक यंत्र है। अन्य किसी भी प्रयोग या साधना से लक्ष्मी प्रसन्न हों या न हों, परन्तु श्रीयंत्र का स्थापन करने से निश्‍चय ही लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और वह साधक को पूर्ण भौतिक सुख, सफलता और सम्पन्नता प्रदान करती हैं।

 

जहां पर यह यंत्र स्थापित होता है, वहां पर दरिद्रता का विनाश होता है, ॠण मोचन में यह यंत्र पूर्ण सफलतादायक है। भारद्वाज ॠषि के अनुसार यह यंत्र स्वयं ही पूर्ण होता है, यदि यह श्रीयंत्र धातु निर्मित मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त हो

 

कणाद ने कहा है, कि श्री यंत्र यदि मंत्र सिद्ध है, तो इस पर अन्य किसी भी प्रकार का प्रयोग या उपाय करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह स्वयं ही चैतन्य हो जाता है और जहां पर भी यह स्थापित होता है, उसको अनुकूल फल और प्रभाव देने लग जाता है। जिस प्रकार अगरबत्ती किसी व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं होती, वह जहां पर भी जलाई जाती है, वहीं पर सुगन्ध बिखेरने लग जाती है, इसी प्रकार मंत्र सिद्ध चैतन्य श्रीयंत्र जहां पर भी स्थापित होता है वहीं पर यह अनुकूल फल देने में समर्थ हो जाता है।

 

श्रीयंत्र का स्वरूप

 

श्रीयंत्र अपने आप में रहस्यपूर्ण है। यह सात त्रिकोणों से निर्मित है। मध्य बिन्दु-त्रिकोण के चतुर्दिक् अष्ट कोण हैं। उसके बाद दस कोण तथा सबसे ऊपर चतुर्दश कोण से यह श्रीयंत्र निर्मित होता है। यंत्र ज्ञान में इसके बारे में स्पष्ट किया गया है

 

चतुर्भिः शिवचक्रे शक्ति चके्र पंचाभिः।
नवचक्रे संसिद्धं श्रीचक्रं शिवयोर्वपुः॥

 

श्रीयंत्र के चतुर्दिक् तीन परिधियां खींची जाती हैं। ये अपने आप में तीन शक्तियों की प्रतीक हैं। इसके नीचे षोडश पद्मदल होते हैं तथा इन षोडश पद्मदल के भीतर अष्टदल का निर्माण होता है, जो कि अष्ट लक्ष्मी का परिचायक है। अष्टदल के भीतर चतुर्दश त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो चतुर्दश शक्तियों के परिचायक हैं तथा इसके भीतर दस त्रिकोण स्पष्ट देखे जा सकते हैं, जो दस सम्पदा के प्रतीक हैं। दस त्रिकोण के भीतर अष्ट त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो अष्ट देवियों के सूचक कहे गए हैं। इसके भीतर त्रिकोण होता है, जो लक्ष्मी का त्रिकोण माना जाता है। इस लक्ष्मी के त्रिकोण के भीतर एक बिन्दु निर्मित होता है, जो भगवती का सूचक है। साधक को इस बिन्दु पर स्वर्ण सिंहासनारूढ़ भगवती लक्ष्मी की कल्पना करनी चाहिए।

 

इस प्रकार से श्रीयंत्र 2816 शक्तियों अथवा देवियों का सूचक है और श्री यंत्र की पूजा इन सारी शक्तियों की समग्र पूजा है।
श्री यंत्र का रूप ज्योमितीय होता है। इसकी संरचना में बिंदु, त्रिकोण या त्रिभुज, वृत्त, अष्टकमल का प्रयोग होता है। तंत्र के अनुसार श्री यंत्र का निर्माण दो प्रकार से किया जाता है- एक अंदर के बिंदु से शुरू कर बाहर की ओर जो सृष्टि-क्रिया निर्माण कहलाता है और दूसरा बाहर के वृत्त से शुरू कर अंदर की ओर जो संहार-क्रिया निर्माण कहलाता है।

 

अद्भुत त्रिकोण

 

श्री यंत्र में 9 त्रिकोण या त्रिभुज होते हैं जो निराकार शिव की 9 मूल प्रकृतियों के द्योतक हैं। मुख्यतः दो प्रकार के श्रीयंत्र बनाए जाते हैं – सृष्टि क्रम और संहार क्रम। सृष्टि क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 5 ऊध्वर्मुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शिव त्रिकोण कहते हैं। ये 5 ज्ञानेंद्रियों के प्रतीक हैं। 4 अधोमुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शक्ति त्रिकोण कहा जाता है। ये प्राण, मज्जा, शुक्र व जीवन के द्योतक हैं। संहार क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 4 ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव त्रिकोण होते हैं और 4 अधोमुखी त्रिकोण शक्ति त्रिकोण होते हैं।
श्री यंत्र में 4 त्रिभुजों का निर्माण इस प्रकार से किया जाता है कि उनसे मिलकर 43 छोटे त्रिभुज बन जाते हैं जो 43 देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मध्य के सबसे छोटे त्रिभुज के बीच एक बिंदु होता है जो समाधि का सूचक है अर्थात यह शिव व शक्ति का संयुक्त रूप है। इसके चारों ओर जो 43 त्रिकोण बनते हैं वे योग मार्ग के अनुसार यम 10, नियम 10, आसन 8, प्रत्याहार 5, धारणा 5, प्राणायाम 3, ध्यान 2 के स्वरूप हैं।

 

प्रत्येक त्रिकोण एवं कमल दल का महत्व

 

इन त्रिभुजों के बाहर की तरफ 8 कमल दल का समूह होता है जिसके चारों ओर 16 दल वाला कमल समूह होता है। इन सबके बाहर भूपुर है। मनुष्य शरीर की भांति ही श्री यंत्र की संरचना में भी 9 चक्र होते हैं जिनका क्रम अंदर से बाहर की ओर इस प्रकार है- केंद्रस्थ बिंदु फिर त्रिकोण जो सर्वसिद्धिप्रद कहलाता है। फिर 8 त्रिकोण सर्वरक्षाकारी हैं। उसके बाहर के 10 त्रिकोण सर्व रोगनाशक हैं। फिर 10 त्रिकोण सर्वार्थ सिद्धि के प्रतीक हैं। उसके बाहर 14 त्रिकोण सौभाग्यदायक हैं। फिर 8 कमलदल का समूह दुःख, क्षोभ आदि के निवारण का प्रतीक है। उसके बाहर 16 कमलदल का समूह इच्छापूर्ति कारक है। अंत में सबसे बाहर वाला भाग त्रैलोक्य मोहन के नाम से जाना जाता है। इन 9 चक्रों की अधिष्ठात्री 9 देवियों के नाम इस प्रकार हैं – 1. त्रिपुरा 2. त्रिपुरेशी 3. त्रिपुरसुंदरी 4. त्रिपुरवासिनी, 5. त्रिपुरात्रि, 6. त्रिपुरामालिनी, 7. त्रिपुरसिद्धा, 8. त्रिपुरांबा और 9. महात्रिपुरसुंदरी।

 

श्रीयंत्र निर्माण 

 

श्रीयंत्र कई प्रकार से निर्मित तथा कई रूपों में उपलब्ध होता है। विभिन्न प्रकार से अंकित श्रीयंत्रों का प्रभाव भी अलग-अलग तरह का होता है। सबसे विशेष बात यह है कि ताम्र पत्र पर अंकित और पारद निर्मित प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र ही सबसे अधिक प्रभावकारी होते हैं।
श्रीयंत्र का निर्माण और उसकी प्राण प्रतिष्ठा ही श्रीयंत्र के प्रभावशाली होने का सबसे बड़ा स्रोत है। वैसे तो आजकल सभी जगह श्रीयंत्र उपलब्ध है परन्तु उनकी विश्‍वसनियता नहीं है। श्रीयंत्र निर्माण अपने आप में जटिल प्रक्रिया है, और जब तक सही रूप में यंत्र उत्कीर्ण नहीं होता, तब तक उससे सफलता भी संभव नहीं। मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र के स्थापन से साधक शीघ्र लाभ प्राप्ति की स्थिति को प्राप्त करता है। श्रीयंत्र चाहे ताम्र पत्र पर उत्कीर्ण हो, चाहे पारद निर्मित श्रीयंत्र हो उसके प्राण प्रतिष्ठित होने पर ही उसका लाभ प्राप्त किया जा सकता है। 

 

श्रीयंत्र निर्माण की जटिल प्रक्रिया से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि आप जब भी घर में श्रीयंत्र स्थापित करें तो प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र ही स्थापित करें।

 

श्रीयंत्र स्थापन – मुहूर्त

 

श्री यंत्र का निर्माण सिद्ध मुहूर्त में ही किया जाता है। गुरुपुष्य योग, रविपुष्य योग, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी, दीपावली, शिवरात्रि, अक्षय तृतीया आदि श्रीयंत्र निर्माण और स्थापन के श्रेष्ठ मुहूर्त हैं।
अपने घर में किसी भी श्रेष्ठ मुहूर्त में श्रीयंत्र को स्थापित किया जा सकता है। ‘तंत्र समुच्चय’ के अनुसार किसी भी बुधवार को प्रातः श्रीयंत्र को स्थापित किया जा सकता है। इसकी स्थापना का विधान बहुत ही सरल है, शास्त्रों में इसके स्थापन का जो विधान है, वह आगे स्पष्ट किया जा रहा है।

 

शास्त्रों के अनुसार मंत्र सिद्ध चैतन्य श्रीयंत्र की नित्य पूजा आवश्यक नहीं है और न ही नित्य जल से स्नान आदि कराने की जरूरत है। यदि संभव हो, तो इस पर पुष्प, इत्र आदि समर्पित किया जा सकता है और नित्य इसके सामने अगरबत्ती व दीपक जला देना चाहिए, परन्तु यह अनिवार्य नहीं है। यदि किसी दिन श्रीयंत्र की पूजा नहीं भी होती या इसके सामने अगरबत्ती व दीपक नहीं भी जलाया जाता, तब भी इसके प्रभाव में कोई न्यूनता नहीं आती।

 

शुभ अवसरों पर श्री यंत्र की पूजा का विधान है। अक्षय तृतीया, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी, दीपावली, आंवला नवमी आदि श्रेष्ठ दिवसों पर श्रीयंत्र की पूजा का विधान है।

 

श्रीयंत्र स्थापन पूजन विधान

 

इस यंत्र को पूजा स्थान के अलावा अपनी अलमारी में भी रखा जा सकता है, फैक्टरी या कारखाने अथवा किसी महत्वपूर्ण स्थान पर भी स्थापित किया जा सकता है। जिस दिन से यह स्थापित होता है, उसी दिन से साधक को इसका प्रभाव अनुभव होने लगता है। 
श्रीयंत्र का पूजन विधान बहुत ही सरल और स्पष्ट है। स्नान, ध्यान शुद्ध पीले रंग के वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर की ओर मुंह कर पीले या सफेद आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने एक बाजोट स्थापित कर उस पर लाल वस्त्र बिछा लें। गृहस्थ व्यक्तियों को श्रीयंत्र का पूजन पत्नी सहित करना सिद्धि प्रदायक बताया गया है। आप स्वयं अथवा पत्नी सहित जब श्रीयंत्र का पूजन सम्पन्न करें तो पूर्ण श्रद्धा एवं विश्‍वास के साथ ही पूजन सम्पन्न करें।

 

साधना में सफलता हेतु गुरु पूजन आवश्यक है। अपने सामने स्थापित बाजोट पर गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका स्थापित कर लें और हाथ जोड़कर गुरुदेव निखिल का ध्यान करें –

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

 

निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका को जल से स्नान करावें –

 

ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि॥
इसके पश्‍चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –

 

ॐ निखिलम् कुंकुम समर्पयामि।
ॐ निखिलम् अक्षतान समर्पयामि।
ॐ निखिलम्  पुष्पम् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि।
ॐ निखिलम् धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि। 
(धूप, दीप दिखाएं)

 

अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके पश्‍चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –

 

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः

 

गुरु पूजन के पश्‍चात् मूल साधना-पूजन निम्न प्रकार सम्पन्न करें –
इसके पश्‍चात् एक गुरुचित्र के समक्ष ही चावलों की ढेरी बनाकर उस पर एक सुपारी गणपति स्वरूप स्थापित कर लें। गणपति का पंचोपचार पूजन कुंकुम, अक्षत, चावल, पुष्प, इत्यादि से करें।
बाजोट पर गुरु चित्र के सम्मुख ही एक ताम्रपात्र में पुष्पों का आसन देकर श्रीयंत्र (ताम्र/पारद या जिस स्वरूप में हो) स्थापित कर लें।
इसके बाद एकाग्रता पूर्वक श्री यंत्र का ध्यान करें –

 

दिव्या परां सुधवलारुण चक्रयातां 
मूलादिबिन्दु परिपूर्ण कलात्मकायाम।
स्थित्यात्मिका शरधनुः सुणिपासहस्ता
श्री चक्रतां परिणतां सततां नमामि॥

 

श्री यंत्र ध्यान के पश्‍चात् श्रीयंत्र प्रार्थना करनी चाहिए। यदि नित्य इस प्रार्थना का 108 बार उच्चारण किया जाए, तो अपने आप में अत्यन्त लाभप्रद देखा गया है –

 

धनं धान्यं धरां हर्म्यं कीर्तिर्मायुर्यशः श्रियम्।
तुरगान् दन्तिनः पुत्रान् महालक्ष्मीं प्रयच्छ मे॥

 

ध्यान-प्रार्थना के पश्‍चात् श्रीयंत्र पर पुष्प अर्पित करते हुए निम्न मंत्रों का उच्चारण करें –

 

ॐ मण्डूकाय नमः। ॐ कालाग्निरुद्राय नमः। ॐ मूलप्रकृत्यै नमः। ॐ आधारशक्तयै नमः। ॐ कूर्माय नमः। ॐ शेषाय नमः। ॐ वाराहाय नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ सुधाम्बुधये नमः। ॐ रत्नद्वीपाय नमः। ॐ भैरवे नमः। ॐ नन्दनवनाय नमः। ॐ कल्पवृक्षाय नमः। ॐ विचित्रानन्दभूम्यै नमः। ॐ रत्नमन्दिराय नमः। ॐ रत्नवेदिकायै नमः। ॐ धर्मवारणाय नमः। ॐ रत्न सिंहासनाय नमः।

 

कमलगट्टे की माला से लक्ष्मी बीज मंत्र की एक माला मंत्र जप करें।

 

लक्ष्मी बीज मंत्र 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥

 

सबसे प्रभावपूर्ण एवं सर्वाधिक लाभप्रद लक्ष्मी बीज मंत्र है, जिसका प्रयोग मैंने अपने जीवन में किया है और जिन व्यक्तियों को भी मैंने इस बीज मंत्र के बारे में बताया है, उन्हें भी यह लक्ष्मी बीज मंत्र विशेष अनुकूल रहा है।
लक्ष्मी से सम्बन्धित ग्रंथों के अनुसार यदि मंत्रसिद्ध श्रीयंत्र के सामने ‘कमलगट्टे की माला’ से नित्य लक्ष्मी बीज मंत्र का एक माला मंत्र जप किया जाए, तो आश्‍चर्यजनक प्रभाव देखने को मिलता है।

 

मंत्र जप के पश्‍चात् साधक लक्ष्मी आरती सम्पन्न कर, अपनी मनोकामना प्रकट करें।

 

वस्तुतः आर्थिक उन्नति तथा भौतिक सुख-सम्पदा के लिए तो श्रीयंत्र से बढ़ कर कोई यंत्र संसार में है ही नहीं। वास्तव में वह घर दुर्भाग्यशाली है, जिस घर में श्रीयंत्र स्थापित नहीं है।
इसमें कोई दो राय नहीं, कि श्री यंत्र में स्वतः ही कई सिद्धियों का वास है। श्रीयंत्र जिस घर में स्थापित कर इसकी पूजा की जाती है, तो उस घर में भौतिक दृष्टि से किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता। आर्थिक उन्नति तथा व्यापारिक सफलता के लिए तो यह यंत्र बेजोड़ है।

 

इसके अतिरिक्त ॠण मुक्ति, रोग निवृत्ति, स्वास्थ्य लाभ, पारिवारिक प्रसन्नता और आर्थिक सफलता प्राप्ति के लिए यह यंत्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है। मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त प्रामाणिक श्रीयंत्र को घर में स्थापित कर देना ही पर्याप्त है, क्योंकि मात्र स्थापित करने से ही यह असीम सफलता देने में सहायक बन जाता है।
वस्तुतः श्री यंत्र पर जितना भी लिखा जाए, कम है। भौतिक और आर्थिक उन्नति के लिए इससे बढ़ कर कोई अन्य यंत्र या साधन नहीं है।

 

ताम्र अंकित श्रीयंत्र – 450/-, पारद श्री यंत्र – 600/-, 1200/-
कमलगट्टे की माला – 240/-

 

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श्रीयंत्रों में विशेष – पारद श्रीयंत्र

 

पारद श्रीयंत्र तो अपने आप में ही भव्य और अद्वितीय माना जाता है, इसलिए कि इसका प्रभाव तुरंत और अचूक होता है, इसलिए कि जिस घर में भी पारद श्रीयंत्र होता है, उस घर में गरीबी रह ही नहीं सकती, जिस घर में पारद श्रीयंत्र स्थापित होता है, उसके घर में ॠण की समस्या संभव ही नहीं है, जिस घर में अपनी भव्यता के साथ पारद श्रीयंत्र स्थापित है, उसके घर में आठों लक्ष्मियां अपने सम्पूर्ण वेग के साथ आबद्ध रहती ही हैं।
पारद भगवान शिव का विग्रह कहलाता है, समस्त देवताओं का पुंजीभूत स्वरूप पारे को माना गया है, और लक्ष्मी ने स्वयं स्वीकार किया है, कि ‘‘पारद ही मैं हूं और मेरा ही दूसरा स्वरूप पारद है।’’
जब पारद श्रीयंत्र को स्थापित करते हैं, तो यह अपने आप में ही एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बन सकती है, यदि हम विधि-विधान के साथ पारद श्रीयंत्र को धन त्रयोदशी के दिन अपने घर में, दुकान में, कार्यालय में या व्यापारिक प्रतिष्ठान में स्थापित करते हैं, तो यह अपने आप में श्रेष्ठता, भव्यता और पूर्णता की ही उपलब्धि है।

 

लक्ष्मी सूक्त के अनुसार इस पारद श्रीयंत्र को अपने घर में स्थापित कर इसके दर्शन करें, और श्रद्धा के साथ इसको अपने घर में स्थापित करें, तो निश्‍चय ही यह आपके लिए इस वर्ष की महत्वपूर्ण घटना मानी जाएगी।
श्रीयंत्र, विशेषकर पारद श्रीयंत्र के माध्यम से तो आठों प्रकार की लक्ष्मियां पूर्ण रूप से आबद्ध होकर, उसे स्थापित करने वाले व्यक्ति के घर अपना प्रभाव देती ही हैं, संतान लक्ष्मी, व्यापार लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, स्वास्थ्य लक्ष्मी, राज्य लक्ष्मी, वाहन लक्ष्मी, कीर्ति लक्ष्मी और आयु लक्ष्मी के साथ-साथ जीवन के अभाव, जीवन की दरिद्रता और जीवन के कष्ट दूर करने में इस प्रकार का श्रीयंत्र अपने आप में ही अनुकूलता और भव्यता प्रदान करता है।

 

श्रीसूक्त’ के अनुसार जिसके भी घर में पारद श्रीयंत्र स्थापित होता है, स्वतः ही वहां पर लक्ष्मी का स्थायी वास होता है, जिसके भी घर में पारद श्रीयंत्र होता है, अपने आप में वह व्यक्ति रोग-रहित एवं ॠण-मुक्त होकर जीवन में आनन्द एवं पूर्णता प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है।

 

श्रीयंत्र कई प्रकारों में मिलता है, चन्दन पर अंकित श्रीयंत्र सफेद आक पर अंकित श्रीयंत्र, ताम्र पत्र पर अंकित श्रीयंत्र, पारद निर्मित श्रीयंत्र और यदि गणना की जाए तो लगभग 108 तरीकों से श्रीयंत्र अंकित किए जाते हैं, सबका अलग-अलग महत्व है, अलग-अलग विधान है।

 

Dhan Trayodshi

Mantra Siddh Prana Pratisthayukt Shree Yantra 

Why is it special?

Why is it Lakshmi’s abode?

How is it constructed?

Why is this a microcosm of Universe?

Highly Mysterious

 

The Yantra form of Shree Vidhya is called as “Shree Yantra” or “Shree Chakra”. It is the only Yantra which is a microcosm of the entire universe. The term “Shree” refers to Lakshmi, Saraswati, beauty, opulence, greatness etc. This Yantra is related to “Shree Vidhya”. The science which provides the “Shree” Vidhya i.e. Wealth, Luxury, Education etc. is called
 

“Shree Vidhya.”
 

Shree Yantra is also known as Yantra-Raaj, it is considered as the most excellent Yantra, which is akin to Kaamdhenu in Kalyuga, as it provides complete honour-respect and dignity. Shree Yantra is also called as “Kalpvriksha”, under whose shade all desires get fulfilled.
 

The astonishing amazing Siddhi-provider Yantra – “Shree Yantra”
 

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The Shree Yantra has been mentioned in Tantraraj, Lalita Sahastranama, Kaamkala Vilaas, Tripuropanishad and other ancient Indian texts. The Mahapuraanas have termed Shree Yantra as a symbol of Goddess MahaLakshmi. MahaLakshmi herself states – ‘Shree Yantra is my life, my energy, my soul, and my form. I dwell on the earth through the influence of Shree Yantra.
 

Shree Yantra has also been called Yantraraaj, Yantra Shiromani, Shodashi Yantra and Devdwaar. Rishi Duttatreya and Durvasa have considered Shree Yantra as Provider of the Salvation. The Jain scriptures have also praised this Yantra. As the body and soul are complementary to each other, similarly the Gods and their Yantras complement each other. The Sadhana prayer-Upasana performed with Mantra-Tantra combination grants fruits quickly. As the power of Mantra is rooted in its words, similarly the power of the Yantra is based within its lines and points. If you setup Mantra consecrated Life anointed Shree Yantra within the foundations of a house of shop during construction, then the residents automatically start experiencing the amazing and miraculous powers of Shree Yantra.
 

The scriptures state that one gets benefits just by merely gazing at the Shree Yantra due to its amazing power.
 

Shree Yantra is extremely beneficial in removing various malefic combinations of horoscope like Kemdrum, Poverty, Shakat, Debt, Misfortune, Kaak etc. This Yantra provides Morality, Wealth, Opulence and Salvation to humans. A person can obtain Asht Siddhis and Nav Niddhis through its grace. Prayers to Shree Yantra can cure all diseases of the body, and transforms it with pure radiance. Its prayer yields capability to converge energies, and control over the five basic elements.
 

A person can obtain wealth, prosperity, fame, honour, glory, etc. through the grace of Shree Yantra. The prayers to Shree Yantra helps in restarting pending tasks. Regular devoted proper prayers to Shree Yantra destroys poverty and sorrow. The Sadhana-Upasana of Shree Yantra enhances the mental and physical strength. One also obtains blessings and grace of Ten Mahavidhyas through pooja of this Yantra. The Sadhana of Shree Yantra bestows material development and success in business.

 

Lakshmi and Shree Yantra
 

There is a beautiful legend that once Mother Lakshmi got displeased and went over to Beikunth, this led to a lot of suffering at earth. The brahmins and traders started to move around in a wretched-miserable helpless state in absence of Goddess Lakshmi, then the most proficient brahmin, Vashisht decided that – I will please Lakshmi and bring her back to earth plane.
 

When Vashisht went to Beikunth and met Goddess Lakshmi, then he realized that Mother Lakshmi was unhappy and not ready to go back to earth plane under any condition, then Vashisht sat there and started to worship Lord Vishnu. When Lord Vishnu appeared, then Vashisht, pleaded that – We are distressed on earth due to absence of Mother Lakshmi, our ashrams have been ruined, destroyed; and all joys and delights have vanished from our lives.
 

Lord Vishnu took Vashisht along with Him and went to Mother Lakshmi to convince Her, but Mother Lakshmi did not softened and uttered with full determination that – I am not ready to go to earth under any circumstance, because earth is not pure and lacks Sadhana.
 

The frustrated Vashisht returned back to earth and conveyed Mother Lakshmi’s decision to everyone. All were perplexed, and did not know what to do. Then the Guru of Gods Brihaspati advised that only Shree Yantra Sadhana is the last resort and if a consecrated Shree Yantra is setup, then Mother Lakshmi will certainly have to return back.
 

Brishaspati’s words sent a wave of joy to the sages and they prepared Shree Yantra using metal according to Brihaspati’s directions, and made it Mantra Siddh Prana Pratisthayukt (Mantra Consecrated, sanctified and life instantiation), and by installing that Shree Yantra two days before Deepawali on Dhan Trayodashi, performed Shodhsopchaar poojan of the Yantra with complete rites and rituals. Goddess Lakshmi appeared there within the culmination of the poojan-worship, and stated that – I was not ready to come here in any case, it was my vow, but I had to succumb to Brihaspati’s plan and come back here. Shree Yantra is my base and  my soul is rooted in this Yantra.
 

This story clearly clarifies that Shree Yantra in itself is the favourite place of Mother Lakshmi, and Mother Lakshmi resides permanently wherever Shree Yantra is properly setup and installed.
 

Sadhaks, sages, ascetics and monks have all unanimously accepted it, that this Yantra is an amazing wealth-provider Yantra. Mother Lakshmi might not get pleased by any other Sadhana-prayog, but She definitely gets pleased with Shree Yantra installation, and She definitely bestows complete physical pleasures, success and prosperity.
 

Wherever this Yantra is installed, it causes destruction of poverty around it, this Yantra is fully successful in redemption of debts. According to Rishi Bhardwaj, this Yantra is complete in itself, if Shree Yantra is Dhaatu Nirmit Mantra Siddh Praan Pratistha Yukt.
 

Kanaad has stated that if Shree Yantra is Mantra-siddh, then there is no need to do any Sadhana-prayog or upaaye on it, because it gets activated by itself, and wherever it is installed, it starts to bestow favourable effects and results. As the incense is not related to any particular person, and starts to spread fragrance wherever it gets lit, similarly wherever Mantra Siddh Cheitanye Shree Yantra is installed, it becomes capable to yield favourable fruits.

 

Format of Shree Yantra
 

Shree Yantra is enigmatic in itself. It consists of seven triangles. An octagon surrounds the central point triangle. There are ten angles above it, and this Shree Yantra is made above that with Tetradecagon. The Yantra Gyaan gives clear knowledge about it-
 

Chaturbhi Shivchakre Shakti Chakre PanchaabhiH |

Navchakre Sansiddham Shreechakram ShivyorvapuH ||

 

Three lines are drawn at the boundary of Shree Yantra. These lines are symbols of three great Shaktis. Shodash Padmadal (Sixteen Petalled-Lotus) are setup beneath it, and a Ashtadal (Eight-petalled lotus) is formed within the Shodash Padmadal; which is symbol of Ashta Lakshmi. Fourteen triangles are constructed within the Ashtadal, to reflect the fourteen Shaktis, and we can clearly see 10 triangles inside, which symbolise the 10 wealths. Eight triangles are constructed within ten triangles, which symbolise the Ashta Devis. A triangle is formed within it, which is known as Lakshmi Trikon (triangle). A point is drawn within this Lakshmi triangle, which symbolises Mother Bhagwati. The Sadhak should meditate on Goddess Bhagwati Lakshmi seated on a gold throne at this point.

Thus Shree Yantra is an indicator of 2816 Goddesses or Shakti powers, and prayer of Shree Yantra is a collective prayer to all these Devis.

Shree Yantra has a geometrical structure. Various shapes like point, triangle, circle and Ashtakamal are used to draw it. According to Tantra, there are two methods to draw this Shree Yantra structure – the process to start from the inside point to outwards is called Shristi-Kriya Nirmaan (Formation through Creation), and the second method of starting from outer circle towards inside is called Sanhaar Kriya Nirmaan (Formation through destruction).

 

Wonderful Triangle

Shree Yantra contains 9 triangles, which symbolise 9 basic natures of Nirakaar (Formless) Shiva. Primarily two types of Shree Yantra are constructed – creation order and destruction order. The Shree Yantra formed as per creation order has 5 upturned triangles, which are called Shiva-triangles. These symbolise 5 Gyanendariyas (senses of knowledge). There are 4 downturned triangles, which are called Shakti-triangles. These symbolise soul, marrow, semen and life. The Shree Yantra constructed through destruction order has 4 upturned Shiva-triangles and 4 downturned Shakti-triangles.

The four triangles in Shree Yantra are constructed in such a fashion, that they together make 43 small triangles, which represent the 43 Gods. The smallest triangle in the centre contains a point, which indicates Samadhi, i.e. this indicates merger of Shiva and Shakti. The 43 triangles which are formed around it are representative of 10 Yam, 10 Niyam, 8 Asana, 5 Pratyahara, 5 Dhaarana, 3 Pranaayam and 2 Dhyaan according to Yoga.

 

The Signficance of Each triangle and Lotus-petal

There is a group of 8 lotus petals outside these triangles, which in turn is surrounded by a group of 16 lotus petals. The Bhupur is located outside it. The structure of Shree Yantra also contains 9 Chakras, similar to humans; whose order starting from inside-out is as follows – Centralised point, followed by triangle which is called Sarvsiddhiprad (Granter of all wishes). Then there are 8 Sarvrakshakaari (Protective) triangles. The 10 triangles located outside are Sarv Rognaashak (Destroyer of diseases).  Then 10 triangles represent Sarvaarth Siddhi (Accomplishment of All wishes). Then the outer 14 triangles represent Shoubhagyadayak (Fortune).  The 8 Kamaldal (lotus-petals) symbolize riddance from sorrow, anger etc. The outer 16 Kamaldal group causes fulfilment of wishes. The outermost area is known as Treilokya Mohan. The 9 presiding dieties for these 9 chakras are –

  1. Tripura
  2. Tripureshi
  3. Tripur Sundari
  4. Tripur Vasini
  5. Tripurari
  6. Tripura Malini
  7. Tripur Siddha
  8. Tripuramba and
  9. Maha Tripur Sundari.

 

Construction of Shree Yantra

Shree Yantra is constructed in many ways, and it is available in many forms. The Shree Yantras drawn by different methods demonstrate different effects. The main point is that the Shree Yantra drawn on Copper sheet and mercury made Praan Pratishthit Shree Yantra is the most beneficial.

The main cause of Shree Yantra power is its construction and Praan Pratisthita. The Shree Yantras are available at almost all places these days, but they lack trust and reliability. The construction of Shree Yantra is a complex process, and one cannot obtain successful results from a Shree Yantra unless it has been properly engraved and consecrated. The Sadhak achieves quick gains only by setting up a Mantra Siddh Praan Pratishthit Shree Yantra. Shree Yantra might be engraved on a copper sheet, or Shree Yantra might be made of mercury, it yields beneficial results only after its Praam Pratisthit (Life instantiation).

The complex process of building Shree Yantra clarifies that whenever you setup Shree Yantra in your house, you should setup a Praan Pratishthit Shree Yantra.

 

Shree Yantra Setup –  Auspicious Muhurath

The Shree Yantra is constructed only in Siddh Muhurath. Gurupushya Yog, Ravipushya Yog, Navraatri, Dhan-Trayodshi, Deepawali, Shivaraatri, Akshaye Tritiya etc. are the best Muhuraths to construct and install Shree Yantra.

The Shree Yantra can be setup at any excellent Muhurath moment in your home. According to “Tantra Samuchchaye“, Shree Yantra can be setup in the morning of any Wednesday. The setup process of Shree Yantra is very easy, the process of its setup as per scriptures is being detailed below.

According to the scriptures, neither daily prayer nor daily ritual bath with water is necessary for a Mantra Siddh Cheitanya Shree Yantra. If possible, one should offer flowers, perfumes etc. and light incense & deepak lamp daily, but it is not mandatory. If prayers for Shree Yantra are not performed on some day, or incense or deepak lamp is not lit on some day, even then there is no impact on its beneficial effects.

There is a process to worship Shree Yantra on auspicious moments. There are rules to worship Shree Yantra on auspicious days like Akshaye Tritiya, Navraatri, Dhan-Trayodashi, Deepawali, Aamla-Navami etc.

 

Shree Yantra Setup Worship Process

This Yantra can also be placed in an almirah instead of in the worship-altar, it can be placed in factory or any important location. A Sadhak can start experiencing its beneficial effects, right from the day of setup.

The worship process of Shree Yantra is very simple and clear. Take bath, wear pure yellow robes, sit facing east or north direction on a yellow or white asana and meditate. Setup a wooden board in front of you, and spread red cloth on it. It is highly beneficial for married men to perform this worship along with their spouse. When you worship Shree Yantra, either alone, or with spouse, you should always worship with full faith and confidence.

Guru Pujan is essential for success in Sadhana. Setup Guru photo/Statue/Yantra/Paduka on the wooden board in front of you and meditate on Gurudev Nikhil with folded hands –
 

Gururbrahma GururvishnuH  Gururdevo MaheshwaraH |

GuruH Sakshaat Par Brahma Tasmei Shree Guruve NamaH ||

 

After Nikhil dhyaan, bathe Guru Photo/Statue/Yantra/Paduka with water-

Om Nikhilam Snaanam Samarpyaami ||

 

Then wipe with clean clothes. Perform Panchopchar worship Kumkum, Akshat (Rice),  Flowers, Neivedh, Dhoop-Deep whilest chanting below Mantras-

Om Nikhilam Kumkum Samarpyaami |

Om Nikhilam Akshtaan Samarpyaami |

Om Nikhilam Pushpam Samarpyaami |

Om Nikhilam Neivedhyam Nivedyaami |

Om Nikhilam Dhoopam Aardhyapyaami, Deepam Darshyaami |

(Show Dhoop, Deep)

 

Now revolve three Achmani water on Guru Photo/Statue/Yantra/Paduka and drop the water. Then chant 1 mala of Guru Mantra with Guru Mala –

Om Param Tatvaaye Narayanaaye Gurubhayo NamaH

 

After Guru Poojan, perform the main Sadhan-poojan as follows-

 

Make a agglomerate of rice in front of Guru photo, and setup a Supaari Ganpati form on top of it. Perform Panchopchaar poojan of Ganpati with Kumkum, Akshat, Rice, Flowers etc.

 

On the Wooden board, in front of Guru Photo, setup Shree Yantra (Copper/Paarad or in whatever form) in a copper plate on a seat of flowers.

 

Then Dhyaan (meditate) with full concentration on Shree Yantra –

Divya Paraam Sudhvalaarun Chakryataam

Mooladibindu Paripoorn Kalatmkaayaam |

Sthityaatmika ShardhanuH Sunipaasahasta

Shree Chakrataam Parintaam Satataam Namaami ||

 

You should perform Shree Yantra Prarthana after Shree Yantra Dhyaan. If this prayer is chanted 108 times daily, then this itself yields beneficial results –

Dhanam Dhaanyam Dharaam Hamaryam KirtimrayuyarshaH Shriyam |

Turgaan DantinaH Putraan Mahalakshmi Prayacch Me ||

 

After Dhyaan-Prarthana, chant following mantras while offering flowers on Shree Yantra –

Om Mandukaaye NamaH |

Om Kalaagnirudraaye NamaH |

Om Moolprakrityei NamaH |

Om Aadhaarshaktyei NamaH |

Om Kumaarya NamaH |

Om Sheishaaye NamaH |

Om Vaaraahaaye NamaH |

Om Prithivye NamaH |

Om Sudhaambudhaye NamaH |

Om Ratnadweepaye NamaH |

Om Bheirave NamaH |

Om Nanadanvanaaye NamaH |

Om Kalpvrikshaaye NamaH |

Om Vichitraanandbhumaye NamaH |

Om Ratnamandiraaye NamaH |

Om Ratnavedikaaye NamaH |

Om Dharmvaarnaaye NamaH |

Om Ratna Sinhaasanaaye NamaH |

 

Chant 1 mala of Lakshmi Beej Mantra with Kamalgatta Rosary –

 

Lakshmi Beej Mantra

Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamlalaye Praseed Praseed Shreem Hreem Shreem Om Mahalakshmayei NamaH ||

 

This is the most effective and most beneficial Lakshmi Beej Mantra, which I have used in my life and it has been especially favourable to the people whom I have told about this Lakshmi Beej Mantra.
 

According to Lakshmi related scriptures, if one chants daily 1 mala of Lakshmi Beej Mantra with “Kamalgatta Rosary” in front of Mantra Siddh Shree Yantra, then one can experience amazing benefits.

 
The Sadhak should perform Lakshmi Aarti after Mantra Jaap, and then express your wishes.

Indeed, there is no better Yantra in this world than Shree Yantra to obtain financial development and physical pleasure-wealth. In fact, that home in unlucky, where Shree Yantra is not setup.
 

This is an established opinion that Shree Yantra automatically houses several Siddhis. The house in which Shree Yantra is worshipped after proper setup, that house lacks nothing from material perspective. This Yantra is incomparable for financial development and business success.
 

Moreover this Yantra has been termed as the best Yantra to obtain riddance from debts, recovery from illnesses, good health, family happiness and financial successes. It is enough to setup an authentic Mantra Siddh Praana Pratishthit Shree Yantra in your home, because it becomes helpful in providing limitless success just by installing it.
 

In reality, one cannot write enough about Shree Yantra. There is no other Yantra or medium for material and financial success.

Copper Shree Yantra – Rs. 450 / –

Paarad Shree Yantra – Rs. 600 / – 1200 / –

Kamalgatta Rosary – Rs. 240 / –

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Special among Shree Yantras – Paarad Shree Yantra
 

Paarad Shree Yantra is considered unique and endearing, because its effect is immediate and unmistakable, because a home which contains Paarad Shree Yantra, poverty cannot enter such a dwelling, a home where Paarad Shree Yantra has been setup, debt problems are simply not possible in that home, a house where Paarad Shree Yantra is setup with its full magnificence, all the Eight Lakshmis reside in that home with their full grandeur and power.
 

Paarad is considered as a deity of Lord Shiva, mercury has been considered as a collective symbol of all the Gods, and Lakshmi has Herself admitted that ‘I am mercury and mercury is my second nature.
 

When we setup the Paarad Shree Yantra, then it becomes a significant achievement in itself, if we setup Paarad Shree Yantra with complete rites and rituals on the holy day of Dhan-Trayodashi in our home, our shop, our office or our business establishment, then it is in itself an achievement of elegance, superiority  and perfection.
 

According to Lakshmi Sukta, you should setup this Paarad Shree Yantra in your home, and reverentially adore it, and install it with full faith in your home, then this will be considered as the most significant event of the year for you.
 

With Shree Yantra, especially through Paarad Shree Yantra, all the eight types of Lakshmis are bound together to grant beneficial effects to the person in whose home it is installed, such a Shree Yantra bestows favourable and elegant benefits by providing  riddance from the deficiencies of life, the miseries from life and all problems of life; along with granting Child Lakshmi, Trade Laskhmi, Wealth Lakshmi, Health Lakshmi, State Lakshmi, Vehicle Lakshmi, Glory Lakshmi and Long-life Lakshmi.
 

According to “Shreesukt‘, whomsoever has Paarad Shree Yantra installed in his house, Lakshmi starts to automatically reside there, a person whose house has Paarad Shree Yantra, such a person becomes capable to lead life with full joy and perfection, by becoming disease-free and debt-free.
 

Shree Yantra is available in various types, Shree Yantra drawn on Chandan (sandalwood), Shree Yantra drawn on White Aak, Shree Yantra engraved on copper sheet, Shree Yantra made from mercury, and if one starts to count, then Shree Yantras are engraved by 108 different methods, each one of them has its own importance, and each has a different process.

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