Shree Yantra

श्रीयंत्र

 

यंत्र शिरोमणी महानतम् यंत्र
शिव और शक्ति का सम्पूर्ण स्वरूप

 

श्रीयंत्र श्रीविद्या त्रिपुर सुन्दरी ललिता देवी का पूजा चक्र

 

यह श्रीयंत्र मनुष्यों का सर्वथा कल्याण करेगा। श्री यंत्र परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महा त्रिपुर सुदंरी का आराधना स्थल है क्योंकि यह चक्र ही उनका निवास और रथ है। श्रीयंत्र में देवी स्वयं मूर्तिवान होकर विराजती हैं इसीलिए श्रीयंत्र विश्‍व का कल्याण करने वाला है। – महादेव

 

आपके घर व्यापार स्थल पर प्राणप्रतिष्ठित श्रीयंत्र अवश्य ही स्थापन हो, इसके बिना सब कुछ अधूरा है।

 

संसार के सभी धर्मों में प्राचीन काल से ही देवी देवताओं की पूजा का प्रचलन चला आ रहा है। सभी का अपना विशिष्ट महत्व है। देवताओं की पूजा करने के अनेकों विधान प्राचीन ग्रंथों में पाए जाते हैं, उनमें से एक विधान यंत्रों की पूजा करने का भी है। हर अवसर तथा देवों के यंत्रों के पूजन का जिक्र पौराणिक ग्रंथों में मिलता है लेकिन सभी यंत्रों में सर्वोपरि यंत्र श्रीयंत्र को माना गया है। सभी प्राचीन यंत्रों में यह श्रीयंत्र सर्वाधिक लोकप्रिय है।

 

श्रीयंत्र का सीधा सा मतलब है, लक्ष्मी यंत्र जो धनागम के लिये जरूरी है। श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिन्दु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चण्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, उसी प्रकार से सभी देवी-देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र श्रीयंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसी कारण से इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है।

 

श्रीयंत्र सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है, इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली एवं ललितादेवी का पूजा चक्र है, इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते हैं। यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह साधकों को सर्वसिद्धिप्रद, सर्वार्थ सिद्धि प्रदाता एवं सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है।

 

पौराणिक कथा

 

श्रीयंत्र के संदर्भ में एक कथा का वर्णन मिलता है। उसके अनुसार एक बार आदि शंकराचार्यजी ने कैलाश मान सरोवर पर भगवान शंकर को कठिन तपस्या कर प्रसन्न कर लिया। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उनसे वर मांगने के लिए कहा। आदि शंकराचार्य ने विश्‍व कल्याण का उपाय पूछा। भगवान शंकर ने शंकराचार्य को साक्षात लक्ष्मी स्वरूप श्रीयंत्र की महिमा बताई और कहा- यह श्रीयंत्र मनुष्यों का सर्वथा कल्याण करेगा। श्रीयंत्र परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महात्रिपुर सुदंरी का आराधना स्थल है क्योंकि यह चक्र ही उनका निवास और रथ है। श्रीयंत्र में देवी स्वयं मूर्तिवान होकर विराजती हैं इसीलिए श्रीयंत्र विश्‍व का कल्याण करने वाला है।

 

श्रीयंत्र आदिकालीन विद्या का द्योतक है वास्तव में प्राचीनकाल में भी वास्तुकला अत्यन्त समृद्व थी। श्रीयंत्र में सर्वप्रथम धुरी में एक बिन्दु और चारों तरफ त्रिकोण हैं, इसमें पांच त्रिकोण नीचे की ओर झुकते हैं जो शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और चार ऊपर की तरफ के त्रिभुज शिव को दर्शाते है। नीचे की तरफ झुके त्रिभुज पंचतत्व, पांच संवेदनाएं, पांच अवयव, पंचतंत्र और पांच जन्म बताते हैं। ऊपर की ओर उठे चार त्रिभुज – जीवन, आत्मा, मेरू, मज्जा व वंशानुगतता का प्रतिनिधत्व करते हैं। चार ऊपर और पांच नीचे की ओर केत्रिकोण मौलिक मानवीय संवदनाओं के प्रतीक हैं। यह एक मूल संचित कमल है। आठ अन्दर की ओर व सोलह बाहर की ओर झुकी हुई पंखुड़ियां हैं। ऊपर की ओर उठी अग्नि, गोलाकर, पवन, समतल पृथ्वी व नीचे मुड़ी जल को दर्शाती हैं जो ईश्वरानुभव, आत्मसाक्षात्कार को दर्शाती हैं। यही सम्पूर्ण जीवन का द्योतक है। यदि मनुष्य वास्तव में सुखी और समृद्व होना चाहता है तो उसे श्रीयंत्र स्थापना अवश्य करनी चाहिये।

 

श्रीयंत्र के अद्भुत और आश्‍चर्यजनक तथ्य –

 

1. श्रीयंत्र न केवल इस ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप है, बल्कि मानव शरीर का भी। श्रीयंत्र की प्रत्येक परिधि मानव शरीर के एक चक्र को परिलक्षित करती है और सतत घूमने वाला और विस्तारशील श्रीयंत्र इस ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करता है।

 

2. श्रीयंत्र-श्रीचक्र पांच नीचे की तरफ जाने वाले त्रिकोणों और चार ऊपर की तरफ जाने वाले त्रिकोणों के आरोपण से निर्मित होता है। जो स्त्री और पुरुष का सम्मिश्रण होता है।

 

नीचे की तरफ जाने वाले त्रिकोण स्त्री के विशिष्ट तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे कि शक्ति, ऊपर जाने वाले त्रिकोण पुरुष के विशिष्ट तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, जैसे कि शिव।

 

सभी 9 अन्तःपाशी त्रिकोणों से 43 छोटे त्रिकोणों की रचना होती है, और इनमें से प्रत्येक त्रिकोण एक देवता का प्रतिनिधित्व करता है।

 

3. श्रीयंत्र के बारे में कहा जाता है कि यह न केवल देवी की असीमित शक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह देवी का ज्यामितीय रूप है।

 

4. यह किसी के प्रज्ञा की रचना, या वेदान्त के केन्द्रीय उपदेशों का प्रतीक भर नहीं है। बल्कि यह माना जाता है कि इस ज्यामितीय स्वरूप का आभास योगियों को समाधि के दौरान होता है।

 

5. श्रीयंत्र की यह ज्यामितीय गणना इस कदर जटिल है कि गणितज्ञ इसे देख चकित होते रहते हैं। गणितज्ञ इस बात से आश्चर्यचकित हैं कि आधुनिक गणित का ज्ञान न होने के बावजूद वैदिक काल के लोगों ने कैसे इसकी रचना की होगी।

 

इस ज्यामितीय आकृति के बारे में हजारों वर्ष पहले वैदिक काल के लोगों को पता था।

 

6. श्रीयंत्र या श्रीचक्र साधकों को ब्रह्मांडीय चेतना से मिलाने की कोशिश करता है। माना जाता है कि श्रीचक्र एक ऐसा यंत्र है जो खुद में ब्रह्मांडीय ऊर्जा को समेटे हुए है। यह ब्रह्मांड में मौजूद पवित्र ध्वनियों का ज्यामितीय रूप है।

 

श्रीयंत्र में नवचक्र त्रिकोण –

 

श्रीयंत्र या श्रीचक्र ऐसा पवित्र ज्यामितीय प्रतिरूप है, जिसका उपयोग सहस्राब्दियों तक साधकों और उनके अनुगामियों ने ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने के लिए किया। नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं। इस प्रकार इस यंत्र में 43 त्रिकोण, 28 मर्म स्थान, 24 संधियां बनती हैं। तीन रेखाओं के मिलन स्थल को मर्म और दो रेखाओं के मिलन स्थल को संधि कहा जाता है। अद्वैत वेदान्त के सिद्धान्तों के मुताबिक यह ज्यामितीय पद्धति सृष्टि (जो आप चाहते हैं) या विनाश (जो आप नहीं चाहते) के विज्ञान में महारत हासिल करने की कुंजी है।

 

श्रीयंत्र की महिमा, वर्चस्व या महत्व को हम एक आलेख के माध्यम से वर्णित नहीं कर सकते।

 

श्रीयंत्र की दक्षिणाम्नाय उपासना करने वाले व्यक्ति को भोग की प्राप्ति होती है और ऊर्ध्वाम्नाय उपासना करने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए कहा जा सकता है कि यह श्रीयंत्र भोग तथा मोक्ष के लिए भी लाभदायक है। मूल रूप से यह श्रीयंत्र पार्वती अर्थात अंबिका हैं।

 

श्रीयंत्र को कई व्यक्ति रेखागणित की एक जटिल आकृति से अधिक कुछ नहीं समझते हैं। इस जटिल तथा गूढ़ यंत्र के रहस्य को समझने के लिए आदि शंकराचार्य द्वारा रचित सौंदर्य लहरी आदि ग्रंथ का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। यदि ध्यान से देखा जाए तो इस आकृति में दो त्रिकोण बने हुए हैं। एक भगवान शिव का रूप है तो दूसरा शक्ति का रूप है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। इस प्रकार एक श्रीयंत्र की पूजा से मनुष्य दोनों को ही पाने की क्षमता रखता है। इसलिए विभिन्न प्रकार की कामनाओं की सिद्धि के लिए श्रीयंत्र की साधना की जाती है। इस यंत्र को कामधेनु गाय के समान माना गया है जो सभी इच्छाओं की पूर्ति करती है। जो व्यक्ति इस यंत्र की नियमित रूप से पूजा करता है वह एक प्रकार से तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का पूजन करता है क्योंकि इस यंत्र में इन सभी का वास माना गया है।

 

त्रिपुर सुन्दरी स्वरूप – श्रीयंत्र

 

श्रीयंत्र मूलतः श्री विद्या त्रिपुर सुन्दरी का यंत्र है, तथापि श्रीयंत्र की पूजा के लिए लक्ष्मी जी के बीज मंत्र ऊं श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ऊं महालक्ष्मै नम: का प्रयोग भी हो सकता है और अदभुत लाभ भी मिलता है। अधिकतर लोग श्री यंत्र को कमला या लक्ष्मी का ही यन्त्र समझते हैं और उन्हें फल भी प्राप्त होता है। क्योंकि कमला जो लक्ष्मी का रूप है श्री कुल की ही महाविद्या हैं और इनकी पूजा श्री चक्र में होती भी है और की भी जा सकती है। कथानुसार महात्रिपुर सुन्दरी ने प्रसन्न होकर अपनी श्री उपाधि लक्ष्मी को प्रदान की थी, तबसे लक्ष्मी, श्रीलक्ष्मी कहलाने लगी। अतः लक्ष्मी, कमला, त्रिपुरा श्री विद्या सभी की आराधना श्री चक्र से हो सकती है। यहां तक की सभी महाविद्याओं की भी।

 

श्रीयंत्र पूर्ण भौतिक सुखों की प्राप्ति

 

श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री देवी महात्रिपुर सुन्दरी (षोडशी देवी) हैं। श्रीयंत्र के रूप में इन्हीं की पूजा की जाती है। इस यंत्र की पूजा से व्यक्ति को मोक्ष तथा भोग दोनों की ही प्राप्ति होती है। इस यंत्र की उपासना जब पूर्ण श्रद्धा से की जाती है तो साधक को आर्थिक रूप से लाभ मिलता है। इस यंत्र की पूजा, भगवान शिव की अर्धांगिनी महालक्ष्मी के रूप में भी की जाती है। इनकी पूजा से विशेष प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है।

 

इस यंत्र को अपनाने से समस्त सुख व समृद्धि प्राप्त होती  है। निर्धन धनवान बनता है और अयोग्य योग्य बनता है। इसकी उपासना से व्यक्ति कि मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस यंत्र को समस्त यंत्रों में श्रेष्ठतम् स्थान प्राप्त है।

 

श्रीयंत्र स्थायी लक्ष्मी

 

श्रीयंत्र ऐश्‍वर्यप्रदाता और लक्ष्मीप्रदाता है.। यह यंत्र आय में वृद्धि कारक व व्यवसाय में सफलता दिलाने वाला होता है। आज के समय में स्थायी धन की अभिलाषा सभी के मन में देखी जा सकती है.। अधिकतर व्यक्ति कितना भी कमाए परन्तु धन उनके पास जमा नहीं हो पाता व्यय बने ही रहते हैं। धन का संचय कर पाना कठिन काम हो जाता है ।

 

श्रीयंत्र की साधना, उपासना, अर्चना की विधि बहुत गूढ़ और क्लिष्ट है और कहा जाता है की बिना गुरु दीक्षा के इसका पूजन हीं करना चाहिए, किन्तु फिर भी सामान्य रूप से भी पूजित श्रीयंत्र अत्यंत प्रभावशाली और प्रभावकारी होता ही है। कहा जाता है की षोडशी मंत्र भी बिना योग्य गुरु की दीक्षा के नहीं करना चाहिए। किन्तु केवल श्रीयंत्र की पूजा और श्री सूक्त का पाठ, श्री यंत्र अभिषेक, कमला मंत्र जप, लक्ष्मी मंत्र जप इस पर हो सकते हैं और यह तीव्र लाभकारी भी होते हैं। इसका किसी भी रूप में उपयोग कल्याणकारी होता है।

 

श्रीयंत्र की घर के पूजा स्थान, व्यापार स्थल, तिजोरी अथवा धन रखने के स्थान पर स्थापना गुरु योग, रवि पुष्य योग, नवरात्रि, धन त्रयोदशी, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, बसंत पंचमी अथवा पौष माह की संक्रांति आदि सिद्ध मुहूर्तों में की जा सकती है।
इस यंत्र को पूजा स्थान के अलावा अपनी अलमारी में भी रखा जा सकता है, फैक्ट्री या कारखाने अथवा किसी महत्वपूर्ण स्थान पर भी स्थापित किया जा सकता है। जिस दिन से यह स्थापित होता है, उसी दिन से साधक को इसका प्रभाव अनुभव होने लगता है।
श्रीयंत्र पूजन स्थापन विधान

 

श्रीयंत्र का पूजन विधान बहुत ही सरल और स्पष्ट है। स्नान, ध्यान शुद्ध पीले रंग के वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर की ओर मुंह कर पीले या सफेद आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने एक बाजोट स्थापित कर उस पर लाल वस्त्र बिछा लें। गृहस्थ व्यक्तियों को श्रीयंत्र का पूजन पत्नी सहित करना सिद्धि प्रदायक बताया गया है। आप स्वयं अथवा पत्नी सहित जब श्रीयंत्र का पूजन सम्पन्न करें तो पूर्ण श्रद्धा एवं विश्‍वास के साथ ही पूजन सम्पन्न करें।

 

साधना में सफलता हेतु गुरु पूजन आवश्यक है। अपने सामने स्थापित बाजोट पर गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका स्थापित कर लें और हाथ जोड़कर गुरुदेव निखिल का ध्यान करें –

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्‍वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
निखिल ध्यान के पश्‍चात् गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका को जल से स्नान करावें –
ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि॥

 

इसके पश्‍चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें –

 

ॐ निखिलम् कुंकुम समर्पयामि।
ॐ निखिलम् अक्षतान समर्पयामि।
ॐ निखिलम्  पुष्पम् समर्पयामि।
ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि।
ॐ निखिलम् धूपम् आघ्रापयामि, दीपम् दर्शयामि।
(धूप, दीप दिखाएं)

 

अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका पर घुमाकर छोड़ दें। इसके पश्‍चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें –

 

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः

 

गुरु पूजन के पश्‍चात् मूल साधना-पूजन निम्न प्रकार सम्पन्न करें –

 

गणपति पूजन हेतु गुरुचित्र के समक्ष ही चावलों की ढेरी बनाकर उस पर एक सुपारी गणपति स्वरूप स्थापित कर लें। गणपति का पंचोपचार पूजन कुंकुम, अक्षत, चावल, पुष्प, इत्यादि से करें।

 

बाजोट पर गुरु चित्र के सम्मुख ही एक ताम्रपात्र में पुष्पों का आसन देकर श्रीयंत्र (ताम्र/पारद या जिस स्वरूप में हो) स्थापित कर लें।

 

इसके बाद एकाग्रता पूर्वक श्री यंत्र का ध्यान करें –

 

दिव्या परां सुधवलारुण चक्रयातां
मूलादिबिन्दु परिपूर्ण कलात्मकायाम।
स्थित्यात्मिका शरधनुः सुणिपासहस्ता
श्री चक्रतां परिणतां सततां नमामि॥
श्रीयंत्र ध्यान के पश्‍चात् श्रीयंत्र प्रार्थना करनी चाहिए। यदि नित्य इस प्रार्थना का 108 बार उच्चारण किया जाए, तो अपने आप में अत्यन्त लाभप्रद देखा गया है –
धनं धान्यं धरां हर्म्यं कीर्तिर्मायुर्यशः श्रियम्।
तुरगान् दन्तिनः पुत्रान् महालक्ष्मीं प्रयच्छ मे॥

 

ध्यान-प्रार्थना के पश्‍चात् श्रीयंत्र पर पुष्प अर्पित करते हुए निम्न मंत्रों का उच्चारण करें –

 

ॐ मण्डूकाय नमः। ॐ कालाग्निरुद्राय नमः। ॐ मूलप्रकृत्यै नमः। ॐ आधारशक्तयै नमः। ॐ कूर्माय नमः। ॐ शेषाय नमः। ॐ वाराहाय नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ सुधाम्बुधये नमः। ॐ रत्नद्वीपाय नमः। ॐ भैरवे नमः। ॐ नन्दनवनाय नमः। ॐ कल्पवृक्षाय नमः। ॐ विचित्रानन्दभूम्यै नमः। ॐ रत्नमन्दिराय नमः। ॐ रत्नवेदिकायै नमः। ॐ धर्मवारणाय नमः। ॐ रत्न सिंहासनाय नमः।

 

कमलगट्टे की माला से लक्ष्मी बीज मंत्र की एक माला मंत्र जप करें।

 

लक्ष्मी बीज मंत्र

 

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥

 

सबसे प्रभावपूर्ण एवं सर्वाधिक लाभप्रद लक्ष्मी बीज मंत्र है, जिसका प्रयोग मैंने अपने जीवन में किया है और जिन व्यक्तियों को भी मैंने इस बीज मंत्र के बारे में बताया है, उन्हें भी यह लक्ष्मी बीज मंत्र विशेष अनुकूल रहा है।

 

लक्ष्मी से सम्बन्धित ग्रंथों के अनुसार यदि मंत्रसिद्ध श्रीयंत्र के सामने ‘कमलगट्टे की माला’ से नित्य लक्ष्मी बीज मंत्र का एक माला मंत्र जप किया जाए, तो आश्‍चर्यजनक प्रभाव देखने को मिलता है।

 

मंत्र जप के पश्‍चात् साधक लक्ष्मी आरती सम्पन्न कर, अपनी मनोकामना प्रकट करें।

 

वस्तुतः आर्थिक उन्नति तथा भौतिक सुख-सम्पदा के लिए तो श्रीयंत्र से बढ़कर कोई यंत्र संसार में है ही नहीं। वास्तव में वह घर दुर्भाग्यशाली है, जिस घर में श्रीयंत्र स्थापित नहीं है।

 

इसमें कोई दो राय नहीं, कि श्री यंत्र में स्वतः ही कई सिद्धियों का वास है। श्रीयंत्र जिस घर में स्थापित कर इसकी पूजा की जाती है, तो उस घर में भौतिक दृष्टि से किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता। आर्थिक उन्नति तथा व्यापारिक सफलता के लिए तो यह यंत्र बेजोड़ है।

 

इसके अतिरिक्त ॠण मुक्ति, रोग निवृत्ति, स्वास्थ्य लाभ, पारिवारिक प्रसन्नता और आर्थिक सफलता प्राप्ति के लिए यह यंत्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है। मंत्रसिद्ध प्राणप्रतिष्ठायुक्त प्रामाणिक श्रीयंत्र को घर में स्थापित कर देना ही पर्याप्त है, क्योंकि मात्र स्थापित करने से ही यह असीम सफलता देने में सहायक बन जाता है।

 

वस्तुतः श्रीयंत्र पर जितना भी लिखा जाए, कम है। भौतिक और आर्थिक उन्नति के लिए इससे बढ़कर कोई अन्य यंत्र या साधन नहीं है।

 

ताम्र अंकित श्रीयंत्र – 450/-
पारद श्री यंत्र – 600/-, 1200/-
कमलगट्टे की माला – 240/-
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