Shiksha – Diksha

शिक्षा परम आवश्यक है

पर

दीक्षा के बिना शिक्षा अधूरी है

दीक्षा और शक्तिपात एक चिन्गारी है…
दीक्षा एक बीज है…
जो फल अवश्य प्रदान करती है…

 

जीवन में शिक्षा और दीक्षा का समन्वय अनिवार्य है। उच्च शिक्षा आपके लिए उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त करती है, पर दीक्षा आपको जीवन मूल्यों का आधार प्रदान करती है।

प्राचीन काल में भारत में शिक्षा और दीक्षा पर समान बल दिया जाता था। शिक्षा का अर्थ सीखना होता है और ज्ञान जब विनीत भाव से गुरु चरणों में बैठकर ग्रहण किया जाता है, तब उसे दीक्षा कहा जाता है।

 

रामचरितमानस में श्रीराम की शिक्षा-दीक्षा के सम्बन्ध में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं-

 

गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्पकाल विद्या सब पाई।

 

पर, समय के साथ दीक्षा की परम्परा लुप्त हो गई, लेकिन आज भी जब विद्या अध्ययन समाप्त होता है, उस समय दीक्षान्त समारोह का आयोजन किया जाता है, जिसमें डिग्री प्रदान की जाती है।

 

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मनुष्य के भीतर संवेदना, प्रेम, भाईचारे की कमी, लुप्तप्राय दीक्षा का परिणाम है। पर, पहले यह जानिए कि दीक्षा क्या है?

 

का अर्थ दमन अर्थात् इन्द्रिय निग्रह है।
का अर्थ ईश्‍वर की उपासना है।
क्ष का अर्थ वासनाओं का क्षय है।
का अर्थ आनन्द है।

 

स्पष्टतः कहा जाए तो शिक्षा बाह्य ज्ञान है। इसे अर्जित किया जाता है। पर, दीक्षा अपने अन्दर स्थित परमात्मा के दर्शन कर लेना है। अन्तःकरण में जैसे-जैसे दिव्य चेतना का प्रकाश उभरता है, आप ब्रह्म के साथ तारतम्य स्थापित करना शुरू करते हैं। मूलतः हम सबमें परमात्मा की छवि है क्योंकि ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का नाद गुञ्जित है हम सबमें।

 

अध्यात्म में दीक्षा की अनिवार्यता

 

अध्यात्म के मार्ग में उन्नति बिना दीक्षा संस्कार के संभव ही नहीं है। अध्यात्म हमें अन्तर्मन की यात्रा पर ले जाता है, पर हमारी दृष्टि बहिर्मुखी है। उसे अन्दर की ओर मोड़ने के लिए एक खास किस्म की प्रेरणा, एक विशेष प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता होती है और यह ऊर्जा दीक्षा संस्कार में गुरु स्पर्श, नेत्रों अथवा स्पंदनों के माध्यम से शिष्य में प्रवाहित करते हैं।

 

दीक्षा संस्कार के सम्बन्ध में भगवान सदाशिव भोलेनाथ  देवी पार्वती से कह रहे हैं –

 

देवि! दीक्षा-विहीनस्य न सिद्धिं न सदगतिम्

 

दीक्षा विहीन व्यक्ति को ना तो सिद्धि मिलेगी और ना ही सद्गति। क्या समझते हैं आप सिद्धि से? सिद्धि का अर्थ लक्ष्य की प्राप्ति है। अब लक्ष्य चाहे कार्य में सफलता हो या फिर साधना में सफलता हो। दीक्षा आपको कर्मशील बनाती है, आपको एक जुझारूपन देती है क्योंकि बिना दीक्षा के आपके संस्कार कच्चे रह जाते हैं और आप सफलता हेतु गलत मार्ग भी चुन लेते हैं। देर-सवेर ही सही पर बुरे काम का नतीजा तो बुरा ही होता है। संभवतः यही कारण है कि कंस और रावण ने ज्ञानी होने के बाद भी पतन का मार्ग चुन लिया, जबकि श्रीराम और श्रीकृष्ण अनगिनत बाधाओं के बाद भी घबराए नहीं। ना उन्होंने शौर्य का साथ छोड़ा और ना ही धैर्य का, वरन् प्रभु कृपा से सारी बाधाओं के पार गए।

 

दीक्षा संस्कार शिष्यों, साधकों में विनय भाव जाग्रत करता है और इस विनय भाव के जाग्रत होने के बाद आपमें सद्विचार और सद्गुण स्वतः प्रस्फुटित होते हैं।

 

दीक्षा दिलाएगी निराशा से मुक्ति

 

मूलतौर पर अगर आज समाज में बढ़ रही निराशा पर मंथन करें तो पाएंगे कि सफलता की अट्टालिका जोड़ने में जीवन मूल्य कहीं पिछड़ से गए हैं। इसी कारणवश जब मन अनुसार सोचा नहीं होता है, तब मन अत्यधिक उदास हो जाता है। दीक्षा की शुरूआत ही इन्द्रिय-निग्रह से है। मन को मारना नहीं है, पर मन पर लगाम कसना अनिवार्य है, नहीं तो मन व्यर्थ भटकता रहता है।

 

समझने की बात है कि शिष्य जब गुरु के साथ मन के तार जोड़कर विद्या ग्रहण करता है, तब उसमें संस्कार, आस्था जैसे भावों का उदय होता है जो आजीवन उसका कठिन परिस्थितियों में मार्गदर्शन करते हैं और उसे टूटने नहीं देते हैं।

 

दीक्षा-शक्तिपात

 

दीक्षा के साथ शक्तिपात शब्द संयुक्त है। शक्तिपात की क्रिया द्वारा गुरु अपने शिष्य को ऊर्जा के एक विशेष स्तर पर ले जाते हैं जिससे मन में चल रही व्यर्थ की हलचल समाप्त हो जाती है। जरूरी नहीं शक्तिपात गुरु द्वारा ही सम्पन्न किया जाए। जब भी आप किसी ऊर्जा से परिपूर्ण वातावरण में शान्तिपूर्वक बैठकर उस सात्विक ऊर्जा को सोखते हैं तब शक्तिपात सम्पन्न होता है, जैसे मंदिर के प्रांगण में या सत्संग में शान्त भाव से तन्मयता के साथ बैठने पर मन स्वच्छ और प्रसन्न हो जाता है। विद्या प्राप्ति का प्रारम्भ शिक्षा के साथ होता है, पर विनय और पात्रता का मार्ग दीक्षा द्वारा सुलभ होता है।

 

कौन से दीक्षा संस्कार अति आवश्यक हैं?

 

* आप बच्चों को गुरु-दीक्षा प्रदान कराएं। गुरु की छत्र-छाया में बच्चों का बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास स्वयं हो जाएगा।
* वर्ष में एक बार सरस्वती पूजा या किसी विशेष परीक्षा के पूर्व सरस्वती दीक्षा लेने से बुद्धि परिष्कृत होती है। पर सिर्फ दीक्षा लेने से सफलता नहीं मिलेगी, अध्ययन भी करना पड़ेगा।
* किसी विशेष कार्य को शुरू करने से पूर्व शमन दीक्षा ग्रहण करें। इससे पूर्व जन्म और इस जन्म के दोष समाप्त होते हैं।
* काली दीक्षा और लक्ष्मी सिद्धि दीक्षा आपके उद्योग में सफलता सुनिश्‍चित करती है।

 

दीक्षा एक चिन्गारी है, दीक्षा एक बीज है और यह कभी निष्फल नहीं होती है। परन्तु दीक्षा ग्रहण करने के बाद भी आप परिश्रम नहीं करते हैं तो दोष आपका है और सिर्फ आपका।

ज्ञान एक अवस्था है और साधना उस अवस्था को प्राप्त करने का रास्ता, जैसे-जैसे मनुष्य साधना के द्वारा अपने तन-मन, बुद्धि-आत्मा को तपाता है वैसे-वैसे ‘ज्ञान’ रूपी अवस्था के ऊपर पड़ा कचरा, कूड़ा-करकट जलकर भस्म हो जाता है और उड़ जाता है। धीरे-धीरे साधक को उस परमतत्व का अहसास होने लगता है जो ‘ज्ञान’ के स्वरूप है जिन्हें जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता, अब किसी की तलाश बाकी नहीं रह पाती है। सबकुछ प्राप्त कर लेने, (पा लेने) की अवस्था का नाम है ‘ज्ञान’।

 

और इस उच्चतम ज्ञान अवस्था को प्राप्त करने की क्रिया का नाम ही ‘शक्तिपात दीक्षा’ है।
– सद्गुरुदेव नन्द किशोर जी श्रीमाली

दीक्षा एक बीज है जो एक बार बस मन में पड़ जाय तो फिर वह अपनी जिजीविषा से कैसी भी सख्त धरती क्यों न हो, उसको तोड़कर अंकुरित हो ही जाता है, तब घुटन और अंधकार के बाहर आशा का एक अंकुर फूटता ही है और वह उन्मुक्त आकाश की ओर निहारता हुआ, ऊंचा उठता है। दीक्षा में भी ऐसा ही होता है। शिष्य अन्धकार और घुटन से निकलकर चैतन्यता और नवीनता के साथ जीवन में उच्चता प्राप्त कर लेने की क्रिया प्रारम्भ करता है।
– सद्गुरुदेव नन्द किशोर जी श्रीमाली

पूर्वजन्म  के दोषों से आप क्या समझते हैं? हमेशा आपका आज विगत कल में बदल जाता है और फिर आप अफसोस करते हैं कि आपने समय रहते उचित निर्णय नहीं लिया। इसलिए द्वन्द्व, आलस्य और जड़ता आपके दोष हैं जिन्हें नष्ट करने के लिए दीक्षा की चिन्गारी पर्याप्त है, दीक्षा आवश्यक है…

दीक्षा तो जीवन का एक आनन्द है, सफलता की एक कुञ्जी है, पूर्णता का एक पात्र है, जीवन की अद्वितीयता का एक रंग है, जीवन का सौभाग्य है और शास्त्रों में जो कहा गया है ‘पूर्ण मदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णद्मुच्चते….’, उसका आधार है। इसलिए इस बात का प्रयास करें, कि सद्गुरु से दीक्षा एवं शक्तिपात दीक्षा प्राप्त हो…
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