Shashtri Ji view on Mahabodhi Tatvamasi Diksha

 

26-27 दिसम्बर 2015

महाबोधि तत्वमसि दीक्षा
गुरु कृपा का विस्तार
शिष्य में अमृत सिंचन

 

जय गुरुदेव… जय गुरुदेव… जय गुरुदेव…

 

दीक्षा के द्वारा एवं गुरु प्रदत्त विभिन्न साधनाओं के फलस्वरूप साधक-शिष्य अपने जीवन में अनेकानेक चुनौतियों, बाधाओं, रुकावटों को पार करता हुआ सफलता के सोपान चढ़ता ही जाता है यद्यपि इन सोपानों को कुछ शिष्य-साधक शीघ्र पा लेते हैं तो कुछ विलम्ब के बाद क्योंकि उनके पूर्वजन्म के दोष ही उनकी सफलता को अवरुद्ध किए देते हैं।

 

जब साधक-शिष्य अपने जीवन में कुछ भौतिक सफलताओं और जीवन को सरस बनाने के साधनों को पा लेता है तो भी उनके मन में एक अशांति, एक बैचेनी सदा बनी रहती है कि कैसे वह पूर्ण शांति को प्राप्त करे, अपने जीवन की पूर्णता को प्राप्त करे।

 

अपनी बाधाओं की समाप्ति के लिये अपने जीवन में मुक्त भाव की प्राप्ति के लिये मनुष्य लगातार छटपटाता रहता है तब वह अन्ततः गुरु की शरण में जाता है।

 

जब शिष्य अपने जीवन में संतप्त, दग्ध, हताश, निराश, उदास हो जाता है तो कातर स्वर में विगलित कण्ठ से यही प्रार्थना करता है कि हे गुरुदेव! ‘अब मेरा उद्धार करो, अब मुझे ज्ञान प्रकाश दो, अब मुझे आत्म प्रकाश दो, अब मुझे तत्व ज्ञान प्रदान करो।’

 

यह मानव-शरीर अद्भुत है। इस शरीर में ही समस्त तीर्थ, समस्त मंत्र, समस्त तंत्र, समस्त बीजाक्षर, मूलाक्षर और विहगाक्षर हैं,  पर मानव अपने-आपको समझने में असमर्थ रहा है, इसीलिए भटक रहा है। मनुष्य वास्तव में क्या है? इस तथ्य से साक्षात्कार गुरु ही करवाता है।

 

पर गुरु कौन? वह व्यक्तित्व जो शिष्य की अन्तःशक्ति जगा सके, उसे आत्मानन्द में लीन कर सकें, शक्तिपात द्वारा कुण्डलिनी जाग्रत कर सकें; जो ज्ञान दें, मस्ती दें, प्रेम दें, निष्कामना दें और जीते जी इष्ट के दर्शन करा सकें, वही तो गुरु हैं; ऐसे ही गुरु ‘शिव’ पद के, कल्याण पद के अधिकारी हैं।

 

यो गुरुः स शिवः प्रोक्तः यः शिवः स गुरुः स्मृतः। उभयोरन्तरं नास्ति गुरोरपि शिवस्य च॥

 

अर्थात् ‘जो गुरु हैं वही शिव हैं और जो शिव हैं वही गुरु हैं। गुरु और शिव में कुछ भी अन्तर नहीं है’

 

मानव-जीवन की सार्थकता तभी कही जा सकती है कि जिस कार्य के निमित उसका जन्म हुआ हो, वह अपने उस कार्य को सही प्रकार से सम्पन्न कर दे। इस कार्य की सम्पूर्णता को पहिचानने और पूर्ण कराने का उत्तरदायित्व श्रेष्ठ गुरु पर ही निर्भर करता है। इसीलिए लोकोक्ति है- ‘जिसने श्रेष्ठ गुरु प्राप्त कर लिया, उसने पूर्ण जीवन एवं उसकी सार्थकता प्राप्त कर ली।’

 

गुरु शक्तिपात दीक्षा के द्वारा जिस प्रकार संसार – बन्धन से मुक्त करते हैं एवं उसे सर्वज्ञत्व आदि ऐश्‍वर्य, धर्म प्रदान करते हैं, उसी प्रकार साधक की प्रतिभा, ज्ञान से फल प्राप्त होता है।

 

शक्तिपात के समय योग्यता पर विचार नहीं किया जाता, गुरु – शक्ति की महिमा ही ऐसी है कि एक बार शक्तिपात होने पर साधक को उच्चता प्राप्त कराए बिना शांत नहीं होती – इसमें कोई संदेह नहीं। गुरु-शक्ति-संचार ही साधक के पूर्णत्व लाभ का एकमात्र उपाय है।

 

योगवसिष्ठ में है –

 

दर्शनात् स्पर्शनात् शब्दान् कृपया शिष्यदेह के। जनयेत् यः समावेशं शाम्भवं स हि देशिकः॥

 

योग्य शिष्य का उद्धार करना और अयोग्य शिष्य को योग्य बनाकर उद्धार करना, यही गुरु का कार्य है।

 

अ-त्रिनेत्रः सर्वसाक्षी अ-चतु र्बाहु रच्युतः। 
अ-चतुर्वदनो ब्रह्मा श्री गुरुः कथितः प्रिये ॥

 

अर्थात् गुरु में तीनों देवों की त्रिगुणात्मक शक्ति समाहित है, गुरु ही भूलोक में प्रत्यक्ष देव हैं।

 

अयं मयांजलिर्बद्धो दया सागरवृद्धये। 
यदनुग्रहतो जन्तु श्‍चित्रसंसार मुक्तिभाक् ॥

 

गुरु की कृपा प्राप्ति के लिए शिष्य को बारम्बर हाथ जोड़कर प्रार्थना करते रहना चाहिए। गुरु के अनुग्रह मात्र से जीव जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। इस संसार-सागर से पार उतारने का एकमात्र सेतु श्री गुरु ही हैं, अतः उनकी दिव्यता का, सार्वभौमिकता का चिन्तन करते रहना चाहिए, उनके अनुग्रह के बिना कुछ भी सम्भव ही नहीं है, अतः उनकी निरन्तर कृपा प्राप्ति के लिए करबद्ध होकर पुनः-पुनः उनके चरणों में नमन है।

 


यह गुरुदेव की महती कृपा है कि हम सब परम साक्षात्कार, आत्म साक्षात्कार, ज्ञान साक्षात्कार की क्रिया में संलग्न होने जा रहे हैं। जीवन में आत्मबोध होना, महाबोधि तत्व है। महाबोधि तत्वमसि का ज्ञान ही शक्ति जागरण का आधार है सब शक्तियों का प्रस्फुटन इसी क्रिया के पश्‍चात् होता है।

 

यह क्रिया केवल और केवल गुरु द्वारा ही सम्पन्न हो सकती है, इसीलिये तो गुरुदेव सभी शिष्यों को यह महान् दीक्षा प्रदान कर रहे हैं। जीवन में सिद्धाश्रम, ज्ञानगंज की प्राप्ति हो, यह जीवन सिद्धियों से परिपूर्ण हो, वे सिद्धियां जो जीवन के अंधकार को समाप्त कर दें जो हमारे भीतर आनन्द तत्व का बीज अंकुरित कर दें यही तो गुरु का आशीर्वाद है।

 

गुरु की महिमा के बारे में लिखना, सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। यह जीवन का सौभाग्य है कि गुरु और शिष्य का इस प्रकार मिलन हो रहा है और आप सभी इस महान् क्षण के साक्षी बनने के लिये, उस क्षण को जीने के लिये गुरुदेव के पास आरोग्यधाम आ रहे हैं। आपको आना ही है, अपने पूरे परिवार के साथ, अपने इष्ट मित्रों, सहयोगियों के साथ।

 

गुरुदेव ने केवल एक आवाज दी है, संकेत दिया है। उस संकेत मात्र ने हमारे जीवन में हलचल मचा दी है। तन-मन मयूर नाच रहा है, आनन्द से रोम-रोम में ऊष्मा-ऊर्जा भर गई है।

 

हे गुरुदेव आपको वंदन है, आप सभी शिष्यों पर यह महान् कृपा कर रहे हैं। हम तो जन्म-जन्म से आपके ॠणी हैं, आपकी कृपा की यह वर्षा हमारे जीवन में आनन्द की वर्षा है। जिस प्रकार सीप स्वाति नक्षत्र की प्रतीक्षा करती है कि कब स्वाति नक्षत्र आए, आसमान से मेघ की वर्षा हो और उस मेघ की केवल एक बूंद को ग्रहण कर अपने जीवन में मोती की संरचना करूं, जिससे मेरा सीप का जन्म सार्थक हो सके।

 

हम सभी सीप की भांति उस महानक्षत्र रवि पुष्य की जो 26-27 दिसम्बर 2015 की शुभ घड़ी में है, प्रतिक्षा कर रहे हैं। जब आपश्री द्वारा ‘महाबोधि तत्वमसि दीक्षा’ प्राप्त होगी।

 

हे गुरुदेव! आप अपनी एक अमृत बूंद हमारे मस्तक पर प्रवाहित कर दें, उस अमृत बूंद को ग्रहण कर हम अपने जीवन में ज्ञान मोती को आलोकित कर देंगे।

 

जय गुरुदेव… जय गुरुदेव… जय गुरुदेव…

 

आपका शिष्य – राम चैतन्य शास्त्री
26-27 December 2015Mahabodhi Tatvamasi Diksha Initiation

Expansion of Guru Grace

Sprinkling of Nectar onto Disciple

Jai Gurudev…Jai Gurudev…Jai Gurudev…

A Sadhak disciple keeps on climbing the success ladder crossing the various challenges, obstacles and impediments through the Dikshas and Sadhanas granted by Gurudev. Some disciple –Sadhaks achieve these successes quickly while others get delayed due to blockages by the past sins of their previous lives.

Even when the Sadhak-disciple attains some physical successes in his life and obtains the means of a good life, his mind continues to remain disturbed and restless as how to achieve full peace, how to achieve complete perfection in his life.

A person keeps trying to remove his obstacles to obtain freedom in his life, and so he ultimately seeks shelter of Guru.

When a disciple gets tormented, anguished, desperate, frustrated and depressed in his life, then he profoundly prays with whole-hearted tears that my Gurudev! “Please uplift me now, please grant me the light of the knowledge, please enlighten my self, please grant me Tatva Gyan of the basic elements.”

The human body is highly incredible. All the pilgrimages, all the mantras, all the tantras, all the root-words, all the glyph-words  and all the basic-elements are housed in the body itself, but the man has been unsuccessful in comprehending the self,  and therefore, has been wondering aimlessly. What actually is a man? Only the Guru grants this knowledge?

But who is the Guru? A personality who can activate the inner-powers of the disciple, who can enthrall him into the divine bliss, who can activate his Kundalini through Shaktipaat, who can grant him knowledge, joy, love, detachment and divine visualization, only He is the Guru, such a Guru is entitled to the Shiva-form, for the welfare.

 

Yo GuruH Sa ShivaH ProktaH YaH ShivaH SaH GuruH SamritaH|

Ubhyorantaram Naasti Gurorpi Shivasya Cha ||

 

Meaning “Whomsoever is Guru, He is the Shiva, and Whomsoever is Shiva, He is the Guru. There is absolutely no difference between Guru and Shiva.”

The significance of human-life can be completed only when he fully accomplishes the task, for what he was born for.  The responsibility to fully comprehend the extent of the task, and to finish it fully, is dependent only on a perfect Guru. There is a famous proverb – “One who has acquired a great Guru, he has obtained a Total life and accomplished it perfectly.”

As the Guru grants freedom from the attachments of the worldly-bondages, and grants him perfection including luxuries and virtues, through Shaktipaat Diksha, similarly a Sadhak obtains fruits of the knowledge and the skills.

The eligibility is not considered at the time of the Shaktipaat, the glory of Guru-Shakti is such that it does not rest until the Sadhak has achieved elevation after the Shaktipaat – there is not a single iota of doubt in this. Guru-Power-Energization is the only way to gain perfection for the Sadhak.

Yogavashisht states that –

 

Darhanaat Sparshanaat Shabdaan Kripya Shishyadeha Ke |

Jayanet YaH Samavesham Shambhavam Sa Hi DeshakaH||

 

The Guru’s task is to uplift the worthy disciple and uplift the unworthy disciple by transforming him into a worthy disciple.

 

A-TrinetraH Sarvsaakshi A-Chatu Brahu RachyutaH |

A-Chaturvadano Brahma Shree GuruH KathitaH Priye ||

 

Meaning the triad Trigunatmak power of Tridevas, Three-Dieties is concentrated within the Guru, Guru is the only direct God in the mortal world.

 

Ayam Mayaanjalibardhvo Daya Saagarvridvaye |

Yadnugrihato Jantu Shchitrasansaar Muktibhaak ||

 

A disciple should continuously repeatedly pray with folded hands to obtain Gurudev’s grace.  The Guru’s grace is enough to grant him freedom from the cycle of birth and death.  Guru is the only passage to cross this world-ocean, so the disciple should continuously meditate on his Divinity and Universality, nothing is possible without his permission, so an incessant tribute to His Holy Feet with folded hands, to receive His unceasing grace.

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This is through Gurudev’s divine grace that all of us are going to join the process of ultimate-realization, self-realization and knowledge-realization. The Self-realization in life is a Mahabodhi Tatva element. The knowledge of Mahabodhi Tatvamasi is the basis of energy-activation, all the powers bloom only after this process.

This process can only and only be performed by the Guru, therefore Gurudev is granting this marvelous Diksha to all the disciples. We attain Siddhashram-Gyanganj in this life, this life becomes full of accomplished Siddhis, the Siddhis to extinguish the darkness in our lives, and to sprout the seeds of joy in our own selves, this is the essence of Gurudev’s blessings.

Writing about Guru’s greatness is akin to exhibiting a lamp to Sun. We are fortunate for the union of the Guru and disciple in this mode, and all of you are coming over to Arogyadhaam to witness this divine event, and to live that special moment. You have to come, with your entire family, with your close friends and associates.

Gurudev has given only one calling, he has given us an indication. This signal has created ripples in our lives. Both the body and mind are dancing in unison, each cell of our body is full of joyous elation and jubilation. Dear Gurudev, we salute thou, you are bestowing this grace to all the disciples. We are indebted to you for multiple lives, this shower of bliss from you is a joyous rainfall in our lives.  As the Oyster shell awaits the Swati constellation, that when the Swati constellation occurs, the clouds will rain from the sky and absorption of a single drop of this rain triggers creation of a pearl, to realize the accomplishment of the oyster-shell life.

All of us are awaiting the auspicious moment of the great Nakshatra Ravi Pushya like the oyster-shell, which is on the pious 26-27 December; when we shall receive the “Mahabodhi Tatvamasi Diksha” from your greatness.

Dear Gurudev! Please direct a drop from the nectar flow on our foreheads, we will absorb this divine drop and illuminate the wisdom pearl in our lives.

Jai Gurudev… Jai Gurudev… Jai Gurudev…

Your disciple – Ram Chetanya Shastri

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