Self Evaluate and Understand

ज्वलंत प्रश्‍न सरल समाधान
स्वयं समझना है
स्वयं विचार करना है
अधिकार निर्बलता इच्छा-आशा दण्ड प्रार्थना समर्पण सुख-सुविधा संस्कार श्रेष्ठता धर्म

 

जीवन के सरल-विरल सूत्र

 

प्रार्थना

 

जब-जब मनुष्य के सामने कोई विकट स्थिति आती है तब मनुष्य ईश्‍वर से प्रार्थना करता है। ईश्‍वर के समक्ष याचना करता है कि वे उसे उस स्थिति से उबारे!
किन्तु इस प्रार्थना का वास्तविक रूप क्या है? क्या ये हमने कभी सोचा है?
प्रार्थना का अर्थ है अपनी सारी आंशकाएं, सारी चिंताएं, सारे संकल्प, सारे विकल्प एवं सारी योजनायें ईश्‍वर के चरणों में रख दें अर्थात अपने कर्म का फल क्या होगा इसकी चिन्ता न करके धर्म के अनुरूप कर्म करना ईश्‍वर की योजनाओं को अपनी नियति मान लेना।
यही प्रार्थना है न?
किन्तु ईश्‍वर की योजना को समझ पाना, क्या सम्भव है?
वो योजनाएं तो हमारे कार्यों के परिणामों के रूप में प्रकट होती हैं हमेशा, किन्तु यदि कोई कर्मों का ही त्याग कर दे।
क्या वो प्रार्थना है?
वास्तव में कर्म ही जीवन है और फल के प्रति मोह न रखना ही सच्ची प्रार्थना है। जो प्रार्थना कर्म में बाधा बन जाये मनुष्य को कार्य ही न करने दे। वो प्रार्थना है या पराजय?
‘‘स्वयं विचार कीजिए!’’
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अधिकार

 

अधिकार की लालसा सबके हृदय को घेरे रहती है। प्रत्येक व्यक्ति अपना स्वयं का एक संसार बनाने का प्रयत्न अवश्य करता है।
फिर आपकी इच्छा, आपका संसार बहुत बड़ा हो या फिर अपने परिवार तक सीमित हो प्रत्येक व्यक्ति अधिकार प्राप्त करने का प्रयास अवश्य करता है।
किन्तु इस अधिकार का वास्तविक रूप क्या है?
एक मनुष्य जितने अधिक लोगों के जीवन को प्रभावित कर सके, जितने अधिक लोगों की स्वतंत्रता पर अंकुश रख सके। उतना ही अधिक वह अपने अधिकार का अनुभव करता है।
अधिकार का वास्तविक रूप ही है अन्य के जीवन पर स्वयं का प्रभाव।
किन्तु क्या वास्तविक अधिकार (प्रभाव) प्रेम, करुणा, दया और धर्म से निर्मित नहीं होता?
जब भी मनुष्य अधर्म और कठोरता से अधिकार प्राप्त करने का प्रयास करता है तब वह दूसरों के हृदय में विरोध अथवा विद्रोह को जन्म देता है और उसका परिणाम नाश होता है। हां, कुछ समय के लिए वह स्वयं को प्रभावी और शक्तिशाली अवश्य पाता है किन्तु वो वास्तविक सत्ता नहीं होती।
यही कारण है कि भृगु और वशिष्ट जैसे ऋषियों की आज भी पूजा की जाती है। रावण, कंस अथवा हिरण्यकश्यप की नहीं।
‘‘स्वयं विचार कीजिए!’’
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इच्छा-आशा

 

जब किसी की आशा या इच्छा भंग होती है तो उसका हृदय क्रोध से भर जाता है जिस व्यक्ति के कारण आशा और इच्छा भंग होती है उसे अपना विरोधी या अपराधी समझता है उस व्यक्ति को दण्ड देने का प्रयत्न करता है।
पर क्या हमारी इच्छा या आशा का भंग होना क्या हमेशा ही किसी का अपराध होता है?
इच्छाओं के अपूर्ण रहने के तो कई कारण हो सकते हैं?
कुछ तो संयोग के कारण अधूरी रह जाती हैं और कुछ नियति के कारण और कभी-कभी इच्छाओं का स्वरूप ही ऐसा होता है कि वो पूर्ण नहीं हो पातीं। बिना परिस्थिति पर विचार किये किसी को अपराधी मान लेना न्याय नहीं प्रतिशोध है। न्याय का आधार तो दया, करूणा है और प्रतिशोध का आधार क्रोध, अंहकार है।
अर्थात हृदय में करुणा धारण किये बिना किसी के अपराध के विषय में विचार करना, किसी को दण्ड देना हुआ न।
क्या यह अपने आप में ही अन्याय नहीं है?
‘‘स्वयं विचार कीजिए!’’
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निर्बलता

 

संसार में प्रत्येक व्यक्ति में किसी न किसी प्रकार की निर्बलता अवश्य होती है। जैसे कोई बहुत तेज दौड़ नहीं पाता तो कोई अधिक भार नहीं उठा पाता। कोई असाध्य रूप से पीड़ित (बीमार) रहता है तो कोई पढ़े हुए पाठों (अध्याय) को याद नहीं  रख पाता या किसी के शरीर में कोई अन्य समस्या होती है। ऐसे अनेकों उदाहरण और भी हैं।
क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं? जिसे सब कुछ प्राप्त हो?
और हम जीवन की उसी एक निर्बलता को जीवन का केन्द्र मान कर जीते हैं, इस कारणवश हृदय में हमेशा दुःख और असन्तोष रहता है। निर्बलता मनुष्य को जन्म और संजोग से प्राप्त होती है।
लेकिन उस निर्बलता को मनुष्य का मन अपनी मर्यादा (सीमाएं) बना लेता है। परन्तु कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं। जो अपने पुरूषार्थ और श्रम से उस निर्बलता को पराजित कर देते हैं।
क्या अन्तर है उन लोगों में और अन्य लोगों में?
बहुत ही आसान सा उत्तर है इसका – जो व्यक्ति निर्बलता से पराजित नहीं होता जो हृदय में पुरूषार्थ करने का साहस रखता है और निर्बलता पर विजय प्राप्त कर जाता है। अर्थात निर्बलता अवश्य जन्म से हो सकती है लेकिन पुरुषार्थ द्वारा ही मनुष्य का मन, मर्यादा निर्मित करता है।
‘‘स्वयं विचार कीजिए!’’
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दण्ड

 

व्यक्ति को जब उसके अपराध का दण्ड मिलता है, तब कभी-कभी उस न्याय को देख कर हमारा मन हमें क्यों कचोेटता है?
प्रश्‍न उठता है मन में कि जब वो अपराध हुआ, तब व्यक्ति भिन्न था। उसके बाद उसने इतने पश्‍चाताप किये स्वयं में इतना परिवर्तन किया। फिर उसे दण्ड क्यों मिला?
पर जहां आघात होता है तो वहां प्रति आघात भी होता है जैसा कर्म वैसा फल। यदि किसी को प्रेम दोगे तो सुख प्राप्त होगा। यदि किसी की हत्या करोगे तो मृत्यु दण्ड मिलेगा।
जैसा कार्य वैसा ही न्याय। तो फिर प्रायश्‍चित और पश्‍चात्ताप का कोई मूल्य नहीं? जरूर… है… अवश्य है मूल्य…… प्रायश्‍चित और पश्‍चात्ताप मनुष्य की आत्मा को बलवान करता है आने वाले दण्ड को स्वीकार करने के लिए मनुष्य को तैयार करता है।
अर्थात बिना प्रायश्‍चित के दण्ड स्वीकार करने का कोई मूल्य है?
‘‘स्वयं विचार कीजिए!’’
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सुख-सुविधा

 

मनुष्य का स्वभाव है कि वह स्वयं को, अपने परिवार को, अपनी सन्तानों को अधिकतम सुख प्रदान करे, ऐसी इच्छा रखता है।
इसी कारण हम सदा श्रम और कष्ट से अन्तर (दूरी) रखते हैं। विश्राम और सुविधाओं के बीच सामंजस्य बिठाने का प्रयास करते हैं।
स्वंय अपने जीवन का विचार कीजिए? क्या यह सत्य नहीं कि हम अपनी सन्तानों के लिए सदा ही विश्राम और सुविधाओं का आयोजन करते हैं। पर क्या कभी सोचा है केवल विश्राम से क्या लाभ प्राप्त होता है? केवल सुख और सुविधा जिन्हें प्राप्त हो उनका जीवन कैसा होता है?
शरीर जब श्रम करता है तो अधिक स्वस्थ बनता है बुद्धि भी जब कठिन चुनौतियों का सामना करती है तब अधिक तेजस्वी बनती है यह हम सबका अनुभव है पर हम शायद यह भूल जाते हैं कि मन और आत्मा को जब अधिक कठिनाइयां प्राप्त होती हैं तब वह भी अधिक बलवान होती है।
अर्थात जब भी हम अपनी सन्तानों को श्रम और दुःख से दूर रखने का प्रयास करते हैं। तो क्या हम वास्तव मे उनके सुख का मार्ग बन्द नहीं कर देते?
‘‘स्वयं विचार कीजिए!’’
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संस्कार

 

इस संसार में आने वाला प्रत्येक बालक सम्पूर्णतः संस्कार रहित होता है उसके अन्तर (मन) पर न किसी अच्छे संस्कार के चिन्ह अंकित होते हैं और न ही बुरे संस्कार के।
अर्थात जन्म से बालक में  न कोई गुण होता है और न ही कोई दोष। तो उसे ये दोष अथवा गुण किस प्रकार प्राप्त होते हैं? क्या हमने कभी विचार किया है?
जो बात माता-पिता के मुख से निरन्तर सुनी जाती है जो उसके घर में वातावरण होता है वो ही बात उनकी संतानों के हृदय का संस्कार बनती है। जैसे किसी गांव में नदी तट पर एक पगडंडी (गली) बन जाती है केवल उसी मार्ग पर बार-बार चलने के कारण।
अर्थात माता-पिता के हृदय की इच्छाएं उनकी सन्तानों के हृदय का दोष अथवा गुण बनकर जन्म लेती हैं।
क्या यह सत्य नहीं ?
पर फिर भी उनकी संतानों  में  दोष दिखाई देता है तो माता-पिता आश्‍चर्य और दुख से भर जाते हैं। माता-पिता का हृदय यह प्रश्‍न करता है कि उनकी सन्तानों में यह क्रूर संस्कार आये कहां से?
सत्य तो यही है कि माता-पिता अपनी सन्तानों को अनजाने में ही क्रूर संस्कारो के बीज दे देते हैं। जो उनकी सन्तानों की हृदय भूमि पर क्रूर संस्कार का वृक्ष बन कर उग जाते हैं।
अर्थात अपनी सन्तानों को संस्कारी और धर्ममय बनने की आशा रखने वाले प्रत्येक माता-पिताओं को सबसे पहले प्रथम अपने हृदय की इच्छाओं पर अंकुश रखना क्या अनिवार्य नहीं? प्रत्येक माता-पिता इस पर विचार अवश्य करें।
‘‘स्वयं विचार कीजिए!’’
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श्रेष्ठता

 

श्रेष्ठता का क्या अर्थ है? विचार करो?
श्रेष्ठता का अर्थ है दूसरे से अधिक ज्ञान प्राप्त करना अर्थात मूल्य इस बात का नहीं कि स्वयं कितना ज्ञान प्राप्त किया…
मूल्य इस बात का है कि प्राप्त किया हुआ ज्ञान दूसरों से कितना अधिक है अर्थात श्रेष्ठता की इच्छा ज्ञान प्राप्ति को भी प्रतियोगिता बना देती है और प्रतियोगिता में विजय अन्तिम कब होती है?
कुछ समय के लिए तो श्रेष्ठ बना जा सकता है परन्तु हमेशा के लिए कोई श्रेष्ठ नहीं रह पाता…
फिर वही असन्तोष, पीड़ा और संघर्ष जन्म लेता है किन्तु श्रेष्ठ बनने के बदले में अगर हम उत्तम बनने का प्रयत्न करें तो क्या होगा?
उत्तम का अर्थ है कि जितना प्राप्त करने योग्य हैं वो सब प्राप्त करना। किसी से अधिक पाने की इच्छा से नहीं मात्र आत्मा की तृप्ति हेतु कुछ प्राप्त करना…
उत्तम के मार्ग पर किसी अन्य से प्रतियोगिता नहीं होती स्वयं अपने आप से प्रतियोगिता होती है अर्थात उत्तम बनने का प्रयत्न करने वाले को देर-सवेर सारा ज्ञान प्राप्त हो ही जाता है बिना प्रयत्न के ही वो श्रेष्ठ बन जाता है।
किन्तु जो श्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करता है वो श्रेष्ठ बने या न बने परन्तु उत्तम कभी भी नहीं बन पाता।
‘‘स्वयं विचार कीजिए!’’
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धर्म

 

अपने ही धर्म के विषय में, किसी अन्य के धर्म के विषय में, किसी के अधर्म को लेकर चर्चाएं होती ही रहती हैं कोई भी ऐसा नहीं है जो धर्म के बारें मे विचार न करता हो…
किन्तु वास्तव में धर्म है क्या?
क्या कोई यह समझ पाया है?
धर्म मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ… समस्त सृष्टि के साथ जोड़ता है… यही करण है कि किसी धर्म के स्थान पर मनुष्य को सदा ही शान्ति प्राप्त होती है।
क्या यह आपका अनुभव नहीं?
अर्थात धर्म मनुष्य के सारे संघर्षों का नाश करता है। पर यह किस प्रकार सम्भव है कि किसी मनुष्य का किसी अन्य के साथ कोई संघर्ष न हो।
जहां प्रेम होता है वहां संघर्ष भी होता है आप कहोगे ‘हां’ अवश्य होता है किन्तु आप थोड़ा और विचार करोगे तो ये जान जाओगे कि जिस समय संघर्ष होता है उस समय प्रेम का विस्मरण हो जाता है और फिर इच्छाएं जागती हैं। अंहकार जागता है क्रोध बढ़ जाता है पर प्रेम नहीं जागता।
किन्तु जहां प्रेम जागता है वहां सारे संघर्ष, सारे विवाद, सारे झगड़े नष्ट हो जाते हैं।
‘‘स्वयं विचार कीजिए!’’
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समर्पण

 

एक ही गुरु के पास शिक्षा प्राप्त करने वाले सारे शिष्य एक समान विद्या प्राप्त नहीं कर पाते। सारे शिष्य गुरु की बातें सुनते हुए अवश्य दिखाई देते हैं उनकी पूजा करते हुए दिखाई अवश्य देते हैं किन्तु एक समान विद्या प्राप्त नहीं कर पाते?
क्या कभी विचार किया है ऐसा क्यों होता है? तथ्य तो यह है कि विद्या न प्राप्त करने वाले शिष्य समर्पण का दिखावा तो करते हैं किन्तु समर्पण का वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते। गुरु के चरणो में फूल चढ़ाने से अथवा गुरु का आदेश मानने मात्र से क्या समर्पण सिद्ध होता है?
नहीं… समर्पण का वास्तविक अर्थ है जब गुरु के प्रति मन में कोई सन्देह न रहे। गुरु के मुंह से आदेश निकले उससे पूर्व शिष्य उस कार्य को पूरा कर दें।
गुरु के विचारों के साथ शिष्य के विचार एक हो जाएं जिससे जब तक अपने गुरु में ईश्‍वर का रूप न देख लें। तब तक उसका समर्पण सत्य नहीं। वास्तव में समर्पण किसी कार्य का नाम नहीं। हृदय की भावना और मन की स्थिति का नाम है।
अर्थात् हमारे अज्ञान में क्या केवल दोष हमारे मन का नहीं?
‘‘स्वयं विचार कीजिए!’’
– श्री अजय सैनी, मुरादाबाद

 

Simple solutions to burning questions

Understanding yourself

Comprehending yourself

Simple Principles to Lead Life

PrayerWhenever a person faces a grim situation, then he prays to God. He pleads to God to free him from the troubling situation!

But what is the real basis of this prayer? Have we ever thought about it?

Prayer means submitting all the tensions, all the worries, all the resolutions, all choices and all plans to the feet of God, ie, Performing righteous deeds as per ethics instead of worrying about the fruits of our actions. Assuming God’s plan as our destiny.

Isn’t this Prayer?

But, Is it possible to understand and comprehend God’s plan?

Those plans always manifest to us as the results of our actions, what if someone stops performing all actions.

Is that the prayer?

In reality, the Karma (actions) is life and true prayer means refraining from any obsession with fruits of actions. The prayer which interrupts the deeds, and does not let one work. Is that the prayer or debacle?

“Think About It”

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Authority

Everyone’s heart craves for Rights and Privileges. Each person tries to create a world of his own.

Then one’s wish, one’s world might be vast or limited to family, one attempts to gain authority.

But what is the reality of this authority?

The more people a person can influence, the more people he can control,  that much authority the person feels.

The only real authority is –  impact of self on other’s lives.

But doesn’t actual power (influence) flow from the love, compassion, mercy, and faith?

Whenever a person tries to unjustly and harshly obtain authority, then he creates resistance or rebellion into other’s heart and the end result of this is destruction. Yes, he turns himself into strong and powerful for a limited time, but that is not the real authority.

This is the reason that even today we worship sages like Bhrigu and Vashisht, and not Ravana, Kansa or Hiranyakashyap.

“Think About It”

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Wish-Hope

Whenever someone’s wishes or hopes dissolves, his heart gets filled with anger, he considers the person ruining his hope-desire as his enemy or criminal and tries to punish that person.

But is the rupture of our desire or hope always someone’s crime?

There can be multiple reasons for desires to be incomplete?

Some remains incomplete due to coincidence, others due to fate and sometimes wishes themselves are of a form that they cannot be fulfilled. Assuming someone to be a criminal without considering the situation is not justice, it is vengeance. The base of justice is pity & compassion; and of vengeance is rage & pride.

So thinking about someone’s crime without compassion in heart is itself an act of punishment.

Isn’t is injustice in itself?

“Think About It”

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Emaciation

Each person in the world suffers from weakness of one type or the other.  For instance, someone cannot run very fast, or other cannot carry heavy weight. Someone suffers from an incurable illness or other cannot memorize the study lessons or there could be some other problem in the body. There are numerous such examples.

Do you know someone? Who has everything?

And we concentrate the entire life around that center of weakness, this causes sorrow and dissatisfaction in the heart. The human frailty originates through birth and fate.

But the human mind considers that weakness as its limits or restrictions. But there are some individuals who vanquish this weakness through their courage and labor.

What is the difference between them and the others?

The answer is very simple – A person who does not bow to weakness, whose heart has mettle for  courage, he conquers weakness. So weakness might have originated at birth, but the limitation is set by human mind through courage and fortitude.

“Think About It”

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Punishment

Why do we feel bad when  we sometimes witness someone enduring punishment for his crime?

The question arises,  that was a different person when the crime took place. Then he repented so much and changed himself. Why did he, then, get punishment?

But every action has an equal reaction. One gets fruits of his actions. If you give love to someone, you will get joy. If you kill someone, you will get death-sentence.

The justice is as per the deed. Then is there any value of atonement and repentance? Yes.. there sure is… definitely…. The  atonement and repentance strengthens the human spirit, and makes it stronger to accept punishment.

So, Is there any value in accepting punishment without atonement?

“Think About It”

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Comfort

It is human nature to desire maximum comfort for himself, his family and his children.

Therefore, we always differentiate between labor and suffering. We strive to reconcile between relaxation and facilities.

Consider your own life? Is it not true that we always organize relaxation and comfort for our children. But have we ever thought what are they gaining from only relaxation?  He who only receives only comfort and convenience, what their life is like?

A body becomes healthier when it labors. The mind also becomes sharper when it faces difficult challenges.  All of us know this, but we probably forget that the mind and spirit gains strength only when it faces difficulties.

So, we strive to keep our children away from labor and sorrow. Then don’t we actually stop the path of their happiness?

“Think About It”

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Values

Every child arriving into this world is completely void of values, his mind doesn’t have any imprint of neither any good value nor any bad value.

This means that a child has zero virtue and zero defect at birth. Then how does he obtain these virtues or vices? Have we ever thought about it?

Whatever is continuously heard from the parents, whatever is the home environment, those words become the sacraments of their hearts. Like a tiny trail gets formed at a riverbank in a village, only due to repeatedly walking on the same route.

Therefore, the desires of parents’ hearts manifest as the virtues or vices within their children’s hearts.

Is it not the truth?

Yet when they notice the defects in  their offspring, the parents are filled with wonder and sorrow. The parents question where these cruel defects in their progeny’s heart came from?

The truth is that parents unknowingly grow the seeds of cruel defects in their children. These seeds germinate on their hearts as brutal trees of vice.

So is it not mandatory for each parent hoping to develop their children as cultured and religious to first keep a check on the desires of their own hearts? Every parent should contemplate on this.

“Think About It”

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Superiority

What is superiority? Any Ideas?

Superiority means gaining more knowledge than the other i.e. the quantity of knowledge one gained is itself not important…

The importance is how much more is the received knowledge compared to others, so the desire of superiority makes even learning as a contest and when does one obtain final victory in the competition?

One can become superior for some time but no one can remain superior for  ever…

Then the same resentments, suffering and struggle arises, but what will happen if we strive to become the perfect instead of becoming superior?

Perfection means, obtaining whatever is needed to obtain. Not from a desire to obtain more than others, but rather to gain for mere fulfillment of the spirit…

There is no contest with others on the path to perfection, one competes with self, so the one striving to become perfect gains entire knowledge sooner or later, he become superior without even trying.

However one who tries to become superior may or may not become the best, but he will never become the perfect one.

“Think About It”

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Religion

There are always discussions about own religion, concerning religion of another, or non-religion of others, there isn’t anyone who doesn’t think about religion….

But what actually is religion?

Has anyone understood this?

Religion connects a person with another person… with the entire creation… this is the reason that one always finds peace at a religious spot.

Is that not your experience?

Meaning religion destroys all the struggles of humans. But how is it possible that any man will not get into conflict with another.

Where there is love there is a conflict too, you will say “yes” but if you think a little more deeper, then you will understand that when conflict starts, the love gets erased from the memory and wishes take birth. Pride arises,  anger increases but love doesn’t awaken.

But where love awakens, there all struggles, all controversy, all conflicts get destroyed.

“Think About It”

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Dedication

All disciples studying under same Guru cannot receive the same education. All will seem to listen to Guru’s voice, will be surely visible worshipping Him, but they cannot obtain equal knowledge.

Have you ever considered why this happens? The fact is, the disciple without education surrenders to show off but does not understand the real meaning of surrender. Does merely offering flowers at Gurudev’s feet or obeying His instructions prove the dedication?

No…. The dedication actually means a stage when there is no doubt in the mind regarding Gurudev. The disciple completes the task before the order emanates from Gurudev’s mouth.

The thoughts of disciple merge with the thoughts of Gurudev, until one sees God in the form of Gurudev. Till then the dedication is not complete. In reality, dedication doesn’t refer to any task. It refers to a an emotion of heart and a state of mind.

So, isn’t the flaw of our ignorance only of our mind?

“Think About It”

 

– Mr. Ajay Saini, Moradabad

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