Sanyas

भगवान शिव ब्रह्माण्ड के प्रथम संन्यस्थ
संन्यास
स्वयं को संकल्पबद्ध करने की क्रिया

 

संन्यास का सम्बन्ध वेशभूषा अथवा एक विशेष प्रकार के आचरण से नहीं है। संन्यास का सीधा सम्बन्ध संकल्पों की सिद्धि से है।

 

एक गृहस्थ भी संन्यासी हो सकता है, एक वृद्ध भी संन्यासी हो सकता है, एक बालक भी संन्यासी हो सकता है, एक स्त्री भी संन्यासी हो सकती है। शर्त केवल इतनी है कि संकल्प होना चाहिए, जीवन में कुछ प्राप्त करने का निश्‍चय होना चाहिए, जीवन में स्पष्टता होनी चाहिए।

 


भगवान शिव ब्रह्माण्ड के प्रथम संन्यासी पुरुष हैं। संन्यास यानि जहां विकारों का समापन हो जाए, संन्यास अर्थात् जहां मनोकामनाओं को पूर्णता प्राप्त हो जाए, संन्यास अर्थात् जीवन में सर्वकल्याण का संकल्प आ जाए।

 

भगवान सदाशिव सर्वकल्याणकारी हैं। शिव की अद्धांगिनी भगवती दुर्गा शक्ति की अधिष्ठात्री हैं, उनके पुत्र गणेश देवताओं में प्रथम पूजनीय है, उसके प्रमुख गण ‘कुबेर’ धन-धान्य के अधिष्ठाता हैं। यक्ष, किन्नर, भूत-प्रेत-पिशाच, योगिनियां, अप्सराएं, काल सभी उनके सेवक हैं। समस्त देवी-देवता उनके समक्ष प्रार्थना की मुद्रा में खड़े हैं। इन सबके बावजूद भगवान सदाशिव को किसी से भी किसी भी प्रकार की कामना (अपेक्षा) नहीं है, किसी से भी किसी भी प्रकार का सहयोग प्राप्त करने की आकांक्षा नहीं है।

 

भगवान शिव अपने एकमात्र संकल्प ‘कल्याण’ की पूर्णता में ध्यान मग्न हैं। भगवान शिव ने कल्याण की कामना में कभी भी भेदभाव नहीं किया। किसी को कम अथवा ज्यादा, ऊंचा या नीचा स्थान नहीं दिया। जिसने भगवान शिव से जितना मांगा, उसे उसी अनुरूप प्रदान किया। राम और रावण पर भी एक ही दृष्टि से दृष्टिपात किया।

 

भगवान शिव स्वयं ‘महाकाल’ स्वरूप हैं। उन्हें काल का पूरा ज्ञान है, इसके बावजूद भगवान शिव ने राक्षसों को उनकी साधना-आराधना के अनुरूप शक्तिवान बनाया, अपना आशीर्वाद प्रदान किया। भगवान शिव का यह ‘कल्याकारी स्वरूप’ ही ‘संन्यास’ की मूल अवधारणा है। भगवान शिव ने मात्र अपने संकल्प के अनुरूप ‘कल्याण की कामना’ से अपने भक्तों को सद्गुरु की भांति आशीर्वाद प्रदान किया।

 

‘संन्यास’ को समझने के लिये भगवान शिव के स्वरूप को समझना आवश्यक है। भगवान शिव ने अपने लिये महलों का चयन नहीं किया, अपने जीवन में कामनाओं को स्थान नहीं दिया, उन्होंने केवल अपने एक चिन्तन, एक संकल्प की पूर्णता पर ध्यान दिया जो है – ‘सर्वकल्याण’ अर्थात् सभी का कल्याण।

 

शिव के इसी कल्याणकारी स्वरूप का ध्यान कर जब साधक अपने ‘संकल्प’ को सिद्ध करने के उद्देश्य से आगे बढ़ता है तो उसे ‘संन्यासी’ कहा जाता है। इसी कारण कहा भी जाता है कि ‘संन्यास’ का कोई विकल्प नहीं क्योंकि इसमें संकल्प है।

 

संन्यास – विकल्प का समापन

 

जिसके संकल्प में विकल्प नहीं होता, उसके संकल्प की सिद्धि हो जाती है। इसलिए सिद्ध पुरुष वे ही हैं, जो अपने संकल्प में विकल्प नहीं रखते। गृहस्थ के पास विकल्प ज्यादा होते हैं। कोई भी बात सोचेगा – यह नहीं होगा तो यह कर लूंगा, या फिर यह कर लूंगा। यही करना है – इस पर सारा ध्यान क्यों नहीं लगाते?

 

वास्तव में जीवन में विकल्प होना ही नहीं चाहिए। विकल्प रखते ही क्यों हैं? विकल्प होगा, तो कभी पूरा सामर्थ्य नहीं लगेगा। जो इस जगत में कुछ पाने की इच्छा रखते हैं, उन्हें उसे पाने का संकल्प कर लेना चाहिए। अगर उसने अपने संकल्प के साथ विकल्प को नहीं जोड़ा तो अवश्य ही उसका संकल्प पूरा होगा और संन्यास इसी प्रकार के संकल्प को कहते हैं जिसमें कोई भी विकल्प नहीं होता।

 

गृहस्थ का अर्थ घर-बार, बीवी-बच्चे नहीं हैं। गृहस्थ का वास्तविक अर्थ है – विषय-वासनाओं से ग्रसित होना, जो उसे बार-बार परेशान करें, और संन्यासी उसे कहते हैं, जिसने इनका न्यास कर दिया, जो इन विषय-वासनाओं से अलग हो गया, मुक्त हो गया। गृहस्थ यदि सुखी हो तो समझना कि वह गृहस्थ नहीं है – वह संन्यासी हो गया। हां, वह गृहस्थ के ढंग से रह रहा होगा। घर में, पत्नी-बच्चों में रह रहा होगा- पर है वह संन्यासी, क्योंकि विषय-वासनाओं से मुक्त है।

 

सुखी वही हो सकता है, जो विषय-वासनाओं से मुक्त हो। इसी तरह संन्यासी कभी दुःखी नहीं हो सकता। यदि संन्यासी दुःखी है तो वह ऊपर से ही संन्यासी है। शायद रहने-सहने का ढंग संन्यासी जैसा होगा, पर संन्यासी वह है नहीं।

 

सामान्य रूप से मनुष्य दो प्रकार की अवस्थाओं में जीवन व्यापन करते हैं – पहले तो वे, जिनके पास जीवन में संकल्प भी बहुत से होते हैं और विकल्प भी बहुत से होते हैं। अभी यह कह रहे हैं, थोड़ी देर में वह कह रहे हैं। जिसके जीवन में संकल्प-विकल्प दोनों मौजूद होते हैं, वह गृहस्थ हैं या कहें कि विषय-वासनाओं से ग्रसित हैं, क्योंकि संकल्प-विकल्प वासनाओं पर ही आधारित हैं।

 

और जिनके जीवन में संकल्प हैं, विकल्प नहीं – वे सिद्ध पुरुष हैं अर्थात् संन्यासी हैं। संन्यास एक प्रकार का संकल्प ही है, स्वयं को ऊपर उठाने का संकल्प, स्वयं को सिद्ध करने का संकल्प।

 

उक्त दो प्रकार के लोगों के अलावा तीसरे प्रकार के भी  लोग होते हैं, जिन्होंने अपने जीवन को संकल्प- विकल्प से भी ऊपर उठा लिया, जिनके जीवन में न तो संकल्प-विकल्प हैं और न ही संकल्प-विकल्प का द्वंद्व ऐसे व्यक्तियों को गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने संत कहा है। गीता में कहा गया है कि – संत के जीवन में संकल्प-विकल्प नहीं होते।

 

गृहस्थ संन्यास

 

संन्यास का सम्बन्ध वेशभूषा अथवा एक विशेष प्रकार के आचरण से नहीं है। संन्यास का सीधा सम्बन्ध संकल्पों की सिद्धि से है। प्राचीन काल में हमारे ॠषि-मुनियों ने अपने संकल्पों की सिद्धि के लिये थोड़ा कठिन जीवन व्यापन करते हुए एक विशेष प्रकार की जीवन शैली का अपनाया था। कालान्तर में अज्ञानी पुरुषों द्वारा उस जीवन शैली को संन्यास का नाम दे दिया गया है। जबकि संन्यास का सम्बन्ध जीवन शैली से नहीं बल्कि स्वयं को साधने के संकल्प से है, जीवन में कुछ प्राप्त करने के संकल्प से है।

 

एक गृहस्थ भी संन्यासी हो सकता है, एक वृद्ध भी संन्यासी हो सकता है, एक बालक भी संन्यासी हो सकता है, एक स्त्री भी संन्यासी हो सकती है। शर्त केवल इतनी है कि संकल्प होना चाहिए, जीवन में कुछ प्राप्त करने का निश्‍चय होना चाहिए, जीवन में स्पष्टता होनी चाहिए।

 

गृहस्थ संन्यासी का तात्पर्य यह है कि वे व्यक्ति जो परिवार में रहते हुए भी गृहस्थ जीवन की कलह से अपने आपको बचाए रख सकें, जो निरन्तर जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने की ओर लगे हों। वे लक्ष्य चाहें उसकी स्वयं की बुद्धि और समझ के अनुसार हों अथवा सद्गुरु द्वारा प्राप्त निर्देशों के अनुसार हों।

 

संकल्प

 

हम प्रायः कामनाएं करते हैं, इच्छा रखते हैं लेकिन वो सभी संकल्प नहीं होते। जब हमारी कामनाओं के साथ उसे परिपूर्ण करने का दृढ़ मनोबल भी जुड़ जाता है तो वो संकल्प बन जाता है। संकल्प से ही कार्य में सफलता की रूपरेखा सुनिश्‍चित होती है।

 

जब कभी हम कोई कामना, इच्छा करते हैं तो वो केवल एक विचार भर होता है लेकिन जब उस कामना, इच्छा की पूर्णता के लिये हम अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा, दृढ़ मनोबल और पूर्ण समर्पण जोड़ देते हैं तो हमारे भीतर अगम्य शक्ति का प्रवाह होता है। उस शक्ति के प्रभाव से हम कामनाओं की पूर्ति और संकल्प की सिद्धि करने में समर्थ बनते हैं।

 

पूज्य गुरुदेव ने तो गृहस्थ संन्यास के महत्व को ही प्रेरित किया है, अर्थात् परिवार के मध्य पूर्ण प्रेम भाव से रहते हुए भी निर्लिप्त रहना और जिस दिन व्यक्ति के मानस में ऐसा चिन्तन आ जाए, तो वह दिन ही उसके लिए ‘संन्यास दिवस’ हो जाता है …

 

गुरु तो प्रत्येक ज्ञान या जानकारी शिष्य को देने का प्रयत्न करते हैं, वे इस बात को देखते रहते हैं कि शिष्य में कितनी परिपक्वता या कितना स्नेह-सम्बन्ध आ पाया है। वह जितना ज्यादा गुरु के प्रति समर्पित होगा, वह जितना ज्यादा गुरु की साधना में लीन होगा, गुरु उतनी ही तेजी के साथ उसे उस ज्ञान को देेने का प्रयत्न करेंगे, इसके लिए पूरा प्रयत्न शिष्य की तरफ से ही होता है।

 

यह दिवस ‘दृढ़ संकल्प दिवस (संन्यास सिद्धि दिवस)’ है, मनोयोग पूर्वक पूर्ण निश्‍चय का दिवस है, मन के चिन्तन और आत्मावलोकन का दिवस है। यह दिवस इस बात का साक्षी है, कि मैंने अपने जीवन में अब तक क्या प्राप्त किया है, और मुझे क्या प्राप्त करना है, मैंने अब तक जो जीवन बिताया है, उसका क्या प्रयोजन रहा है, और मुझे इस एक वर्ष में जीवन की पूर्णता के लिए क्या कार्य, क्या साधना सम्पन्न करनी चाहिए, और यदि ऐसा आत्म विश्‍लेषण शिष्य दृढ़ता पूर्वक कर लेता है, तो यह विशिष्ट दिवस उसके लिए परिवर्तनकारी और सौभाग्यशाली होता है।

Lord Shiva – The First Ascetic of the Universe

 

Sanyaas (Asceticism)

 

 

The process to inculcate Self-Determination

 

The word Asceticism  is not  related to any particular costume or a specific kind of behaviour. Asceticism is directly connected to  the fulfilment of the resolutions.

Any householder can be an ascetic, an elderly can also be an ascetic, a child can also be an ascetic or a  woman can also be an ascetic. The only requirement-condition is presence of a determination-resolution, coupled with a strong will-power to achieve something in life. There should be a high degree of clarity in life.

 

 


 

Lord Shiva is the first male ascetic of the universe. Asceticism is the state of termination of disorders. The asceticism signifies fulfilment of desires, or rather, asceticism indicates the arrival of a resolution to dedicate oneself towards  universal welfare in life.

 

Lord Sadashiv is the universal benefactor. Lord Shiva’s consort  Goddess Durga is the basic core of  Shakti-power in the universe. Their son Ganesha is the first among the Deities to be worshipped, and Their primary Gana “Kuber” is the Lord of wealth and prosperity. All celestial beings – Yakshas, Kinnars, Bhoot-Pret-Pishaach, Yoginis, Apsaras, Kaal (death) are His servants. All Gods-Goddesses pray and worship Him.  In spite of all this, Lord Sadashiva has no desire of any kind, He has no wish to obtain any kind of support from anyone.

 

Lord Shiva is always completely engrossed in meditation to fulfil His sole resolution of universal welfare. Lord Shiva has never discriminated. He has never accorded anyone a low or high status or position. One received whatever one sought from Lord Shiva. He treated both Rama and Ravana with the same perspective.

 

Lord Shiva Himself  is the form of “Mahakaal”. He has supreme knowledge of the Time, yet He strengthened the demons according to their meditation-worship, and gave His blessings. This “Welfare-Bestower” form of Lord Shiva is the basic foundation of asceticism. Like SadGurudev, Lord Shiva bestowed divine blessings to His devotees for their welfare and well-being.

 

It is important to comprehend the nature of Lord Shiva to understand asceticism. Lord Shiva did not chose castles or palaces for Himself, He never desired for anything. He focused and concentrated only on one thought, a single determination to complete a sole resolve – “Universal Welfare” i.e.  the welfare of all.

 

When a Sadhak considers this beneficial nature of Lord Shiva and progresses ahead to fulfil his resolves, then he can be termed as a ascetic or Sanyaasi. Thus it is said that asceticism path is devoid of alternatives, because it is imbibed with the resolution.

 

 

Asceticism – Termination of Alternative-Options

 

Only those who remove alternatives from their resolution, are able to succeed in achieving their resolutions. Therefore an accomplished person is the one, who desists from thinking about any option in their resolves. A worldly householder has many alternative options. He ponders – If this  does not work out then I will do this, or try this another option.  If you have to accomplish this – Then why not exert your entire focus only on this.

 

As a matter of fact, there should not  be any alternative options in life. Why do you even think about having options?  An option in mind will not let you exercise your complete will-power. Anyone desirous to obtain anything in this world should resolve to obtain it with full determination.  You will always achieve complete success if you desist from adding any option into your resolves.  The asceticism is a way wherein the resolutions are completely devoid of any alternative options.

 

Being a worldly householder does not indicate presence of a home, spouse or family. The real definition  of  a householder is the one who is – completely afflicted with his desires and wishes. These temptations will continuously trouble him, and an ascetic is the one who has – completely terminated these temptations, has completely renounced himself from these wishes-desires and has become free from their trappings. A householder who is joyous,  is no longer an householder, he has transformed into an ascetic. Outwardly he might seem as a worldly householder cohabiting with his spouse and family, but he is an ascetic from within, since he has achieved freedom from desires.

 

Only one who has obtained liberations from wishes-desires can be termed as really joyous and happy. Thus an ascetic is never sad.  If an ascetic becomes sad, then he is an ascetic only externally, and not from within.  He might resemble an ascetic but he is not a one in the real sense.

Generally humans tend to belong to one of the two kinds – first those having a lot of resolutions in life and an equal number of alternative options. They easily transcend from one option to another.  Presence of  both resolutions and options indicate that they are worldly householders, suffering from an endless cycle of wishes-desires, because the resolutions-options are directly related to temptations.

 

And those whose  life consists of only resolutions, without any sign of  any alternative-options, are the perfect personage. Such persons can only be termed as the ascetic. The asceticism is a  kind of resolution, a determination to raise oneself, to accomplish.

 

Apart from the above two types of people, there is a third kind of persons,  who have lifted their lives above the resolution-option, those whose life has neither any resolution nor any alternative. They do not face any conflict between  resolutions and  options.  Lord Shree Krishna has termed them as the Saint in Geeta.  Geeta clearly states that there are no resolutions-alternatives in the life of a saint.

 

 

Domesticity Asceticism

 

The asceticism is not related to any  specific costume or a particular kind of behaviour. The asceticism is directly connected to accomplishments of  resolutions. In ancient times, our sages-ascetics had  adopted a special lifestyle of leading a little hard life,  for accomplishment of their resolutions. Currently the ignorant society has termed that lifestyle as asceticism. The asceticism is not connected to any lifestyle, rather it is related to a determination to achieve the resolutions, a will-power to achieve something in life.

 

Any householder can be an ascetic, an elderly can also be an ascetic, a child can also be an ascetic or a  woman can also be an ascetic. The only requirement-condition is presence of a determination-resolution, coupled with a strong will-power to achieve something in life. There should be a high degree of clarity in life.

 

The term  householder-ascetic refers to  a person who can insulate himself from the discontent of domestic life, while living in the family. It means someone who is constantly endeavouring to achieve the goals of life. These goals may be set-up either according to his own  intelligence-understanding or can be  in accordance with the  instructions-guidance from Sadguru.

 

 

Resolution

 

We often have a desire, or multiple wishes, but all of these are not resolutions. When our desire gets merged with a strong willpower to achieve, then it takes the shape of a resolution. The determination ensures success of the resolution.

 

A general desire or wish is only a specific idea.  A strong flow of  infinite power gets initiated, when we add our  entire energy, strong determination and full dedication to  our desires. This strong power enables us to fulfil our desires and accomplish our determinations.

Pujya Gurudev has always encouraged the importance of renunciation for the domestic householder, that is, living with the family with full love in an insulated state.  The day such a thought enters the mind of a person, then that day becomes the “Sanyaas Diwas” for him….

 

Guru tries to provide every kind of  knowledge and wisdom to the disciple, keeping the disciple’s maturity and affection in mind. The more a disciple is  devoted to the Guru, the deeper he is absorbed in the spiritual practice of Guru Sadhana, the faster will be the pace of granting the knowledge-wisdom from the Guru. The disciple has to try to exert the entire effort.

 

This day is “Complete Determination Day (Sanyaas Siddhi Diwas)“. It is a day of  complete determination, and is the day of contemplation and decision. This day symbolizes whatever I have achieved in my life so far, and what I still need to achieve. This is the day to reflect upon the purpose of whatever kind of life I have led so far. This is the day to determine what work and what Sadhana do I need to accomplish in the next year to achieve perfection in life.  If a disciple is able to complete such a deep  self analysis, then this special day becomes a transformational fortunate event for him.

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