Sanyaas Panch Ratna

संकल्प सिद्धि दिवस
संन्यास सिद्धि दिवस
आषाढ़ कृष्ण द्वितीया 4 जून 2015
सिद्धाश्रम जयन्ती संस्कार प्राप्ति महादिवस
आषाढ़ कृष्ण नवमी 11 जून 2015
पूर्णता दिवस गुरु पूर्णिमा
आषाढ़ पूर्णिमा – 31 जुलाई 2015
पूरे मास धारण करें, साधनाएं करें
संन्यास सिद्ध पंचरत्न
ॠषि पाराशर के मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठित

*****संन्यास का सरलतम अर्थ है – ‘स’ + ‘न्यास’ अर्थात् कार्य के साथ मुक्त हो जाना।
तुम्हें संन्यासी बनना है और कर्म के साथ संन्यासी बनना है। जब कर्म के साथ संन्यासी बनोगे तो निश्‍चित रूप से जीवन में एक बार नहीं, पल-पल मुक्त हो सकते हो, हर-पल मुक्ति का आनन्द ले सकते हो, एक बार आनन्द नहीं, पल-पल नित्य, नवीन आनन्द प्राप्त हो सकता है लेकिन इसके लिये आवश्यक है तुम्हारा संन्यास के पथ पर चलना, संन्यास का तात्पर्य जीवन से भागना नहीं है। उसी प्रकार गृहस्थ का तात्पर्य भी जीवन में डूब जाना, लिप्त हो जाना नहीं है। गृहस्थ भी संन्यासी बन सकता है और हर रोज अपने जीवन को संन्यस्त भाव से जी सकता है। बस भोग, विलास में डूबना नहीं है।
संन्यासी उसे कहा गया है जो मुक्त हो, आनन्द से युक्त हो, इसीलिये वास्तविक संन्यास उसे कहा जाता है जो अमरत्व प्राप्ति की यात्रा हो, निश्‍चिंतता, निर्भिकता की यात्रा हो।
– गुरुदेव श्री नन्दकिशोर श्रीमाली जी

जब जीवन प्राप्त हुआ है तो जीवन में कई प्रकार के संयोग वियोग बनते हैं। हर संयोग किसी कार्य का निमित्त बनता है। लेकिन ऐसा कौनसा कार्य है जो व्यक्ति स्वतंत्र रूप से कर सकता है? जब व्यक्ति सम भाव से जीवन जीना प्रारम्भ कर देता है, स्वाध्याय और स्वयं से वार्तालाप प्रारंभ कर देता है तथा समष्टि भाव आ जाता है तो व्यक्ति स्वतंत्र हो जाता है और वही संन्यासी बन सकता है। संन्यासी भाव अपने भीतर आत्म अवलोकन करने का हमारा दर्शन है यह अपने पिछले संस्कारों को जानने और उन्हें परिष्कृत करने का मार्ग है। जीवन चक्र से मुक्त होना जीवन से भागना नहीं है। कर्त्तव्य भाव से कर्म से ही संन्यास प्राप्त हो सकता है।
इसी लिये हजारों वर्षों पूर्व महर्षि पाराशर ने संन्यास, संन्यासी और जीवन के दस नियम बताये। ये नियम व्यवहार में लाने योग्य नियम है और जो व्यक्ति इन नियमों का पालन करता है वह संन्यासी बनकर जीवन का आनंद प्राप्त कर सकता है। वह छोटे  गांव में रहे अथवा बड़े शहर में वह नौकरी पेशा हो अथवा व्यवसायी, वह स्त्री अथवा पुरुष हो इसमें कोई अंतर नहीं पड़ता इसीलिये महर्षि पाराशर कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति संन्यासी बन सकता है उसे जीवन से भागने की आवश्यकता नहीं है।
संन्यासी का तात्पर्य यह है कि वे गृहस्थ में रहते हुए भी गृहस्थ के कलह से अपने आपको बचाए रख सकें, जो निरन्तर साधना की ओर अग्रसर हो और जिसके मन में यह बलवती इच्छा हो कि मैं अपने जीवन में साधना में अवश्य ही सफलता प्राप्त करूंगा – स्वर्ण विज्ञान, रसायन विज्ञान, आयुर्वेद विज्ञान या किसी भी एक क्षेत्र में पूर्णता के साथ सफलता प्राप्त करूंगा।

संकल्प
 हम प्रायः कामनाएं करते है, इच्छा रखते हैं लेकिन वो सभी संकल्प नहीं होते। जब हमारी कामनाओं के साथ उसे परिपूर्ण करने का दृढ़ मनोबल भी जुड़ जाता है तो वो संकल्प बन जाता है। संकल्प से ही कार्य में सफलता की रूपरेखा सुनिश्‍चित होती है।
जब कभी हम कोई कामना, इच्छा करते हैं तो वो केवल एक विचार भर होता है लेकिन जब उस कामना, इच्छा की पूर्णता के लिये हम अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा, दृढ़ मनोबल और पूर्ण समर्पण जोड़ देते हैं तो हमारे भीतर अगम्य शक्ति का प्रवाह होता है। उस शक्ति के प्रभाव से हम कामनाओं की पूर्ति और संकल्प की सिद्धि करने में समर्थ बनते हैं।
तस्मे मनः शिव संकल्प मस्तु’ अर्थात् मन की शक्ति के साथ संकल्प को जोड़ने और उसके प्रति पूर्ण निष्ठा मय समर्पण से अमोघ सिद्धि स्वतः प्राप्त होती है।
संकल्प प्रथा वह अनुष्ठान है जिसमें साधक अमुक अनुष्ठान कर्म के प्रति दृढ़ निष्ठा और आत्म सम्मान की भावना से युक्त होकर कर्त्तव्य पालन में संलग्न हो जाता है।
संन्यास संकल्प दिवस क्या है?
वर्णाश्रम व्यवस्था में संन्यासाश्रम आयु का यह चतुर्थ भाग होता है, जिसमें व्यक्ति अपने सांसारिक दायित्वों को पूर्ण कर पूर्ण रूप से वैरागी हो जाता है परन्तु पूज्य गुरुदेव ने तो गृहस्थ संन्यास के महत्व को ही प्रेरित किया है, अर्थात् परिवार के मध्य पूर्ण प्रेम भाव से रहते हुए भी निर्लिप्त रहना और जिस दिन व्यक्ति के मानस में ऐसा चिन्तन आ जाए, तो वह दिन ही उसके लिए ‘संन्यास दिवस’ हो जाता है … शास्त्रों की मान्यता है, कि संन्यास दिवस के अवसर पर साधक या शिष्य प्रयत्न करके भी, गुरु चरणों में पहुंचे, भक्ति भाव के साथ उनके चरणों में बैठे और अगले एक वर्ष के लिए किसी एक साधना या किसी एक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त करने की प्रतिज्ञा करे। वह गुरु के सामने यह शपथ ले कि मैं यह एक वर्ष आपके चरणों में समर्पित कर रहा हूं, मेरी इच्छा और आकांक्षा अमुक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की है, इसके साथ ही साथ वह गुरु से उस गोपनीय विद्या की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करे।
गुरु तो प्रत्येक ज्ञान या जानकारी शिष्य को देने का प्रयत्न करते हैं, वे इस बात को देखते रहते हैं कि शिष्य में कितनी परिपक्वता या कितना स्नेह-सम्बन्ध आ पाया है। वह जितना ज्यादा गुरु के प्रति समर्पित होगा, वह जितना ज्यादा गुरु की साधना में लीन होगा, गुरु उतनी ही तेजी के साथ उसे उस ज्ञान को देेने का प्रयत्न करेंगे, इसके लिए पूरा प्रयत्न शिष्य की तरफ से ही होता है।
…और यदि गुरु के द्वार तक पहुंचना संभव न हो या कुछ ऐसी परिस्थितियां आ जायं जिनकी वजह से यात्रा न कर सकें, या गुरु से प्रत्यक्षतः न मिल सके तो अपने घर में ही गुरु चित्र के सामने स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर बैठ जाय और पूर्ण विधि के साथ गुरु पूजन करे और हाथ में जल लेकर यह दृढ़ संकल्प करे कि मैं यह पूरा वर्ष गुरु चरणों लीन रहता हुआ अमुक साधना में पूर्णता प्राप्त करने के लिए ही व्यतीत करुंगा और अमुक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त करूंगा।
इसके साथ ही साथ जब वह ऐसा दृढ़ निश्‍चय कर लेता है तो उच्चकोटि के योगी, संन्यासी और उसके प्रिय गुरु का भी प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है, जिससे वह अवश्य ही अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर लेता है।
वह जीवन ही क्या जो गुमनामी के साथ व्यतीत हो जाय, उस जीवन का मकसद ही क्या, जिसके द्वारा आप हजारों लाखों लोगों का कल्याण न कर सकें, वह जीवन जीवन कहा ही नहीं जा सकता, जो पूरे देश में प्रसिद्धि प्राप्त न कर सके, जो अपने जीवन में अद्वितीय न बन सके, और जो साधना के क्षेत्र में पूर्ण सफलता न प्राप्त कर सके।
यह दिवस ‘दृढ़ संकल्प दिवस (संन्यास सिद्धि दिवस)’ है, मनोयोग पूर्वक पूर्ण निश्‍चय का दिवस है, मन के चिन्तन और आत्मावलोकन का दिवस है। यह दिवस इस बात का साक्षी है, कि मैंने अपने जीवन में अब तक क्या प्राप्त किया है, और मुझे क्या प्राप्त करना है, मैंने अब तक जो जीवन बिताया है, उसका क्या प्रयोजन रहा है, और मुझे इस एक वर्ष में जीवन की पूर्णता के लिए क्या कार्य, क्या साधना सम्पन्न करनी चाहिए, और यदि ऐसा आत्म विश्‍लेषण शिष्य दृढ़ता पूर्वक कर लेता है, तो ये विशिष्ट दिवस उसके लिए परिवर्तनकारी और सौभाग्यशाली होता है।
संन्यास सिद्ध पंचरत्न
साधना में या जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्ति के लिए संन्यासी पंचरत्नों का प्रयोग करते हैं, और इसीलिए वे दीर्घायु होते हैं, इसीलिए उनका शरीर स्वस्थ, सौन्दर्ययुक्त और अत्यन्त सुन्दर बना रहता है, इसीलिए हजारों भक्त और व्यक्ति उनके चरणों में झुके रहते हैं, और इसीलिए वह अद्वितीय व्यक्तित्व बन जाता है।
गृहस्थ साधक भी पंचरत्नों का प्रयोग कर सकता है, और इसके माध्यम से वह अपने जीवन में प्रत्येक दृष्टि से पूर्णता सफलता और श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है।

1. सिद्ध कंकण
यह अंगूठी के आकार का महत्वपूर्ण कंकण माना गया है जिसे संन्यासी अपनी उंगली में धारण किये रहते हैं, इसके माध्यम से उन्हें अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती रहती है, एक प्रकार से देखा जाय तो उनके जीवन में कठिन या असंभव नाम की कोई चीज नहीं होती। प्राचीन समय से ही संन्यासियों को सिद्ध कंकण पहनने की सलाह दी गई है, जिससे कि वे अपने जीवन में निश्‍चिन्त और निर्भीक हो सकें, वे अपने जीवन में आगे बढ़ सकें और सफलता प्राप्त कर सकें।
इसके निर्माण में रांगा, शीशा, जस्ता, चुम्बक पत्थर अथवा सिद्ध धातु में से किसी एक धातु को कूट पीस कर कपड़े से छान कर उसकी पिस्टी बना लेनी चाहिए और फिर इसे गूलर के दूध में घोट कर खूब कूटना चाहिए, कूटते कूटते जब इसमें से तार निकलने लगे, तब उसे अग्नि में जारण कर उसे चिकना और कड़ा बना देना चाहिए और उस गर्म तार की मुद्रिका बनाकर जब वह लाल सुर्ख हो, तब उसे जाग्रत पारे में डुबो कर सिद्ध बना लेनी चाहिए, इसी को ग्रन्थों में ‘सिद्ध कंकण’ कहा गया है, यह अपने आप में अद्वितीय और दुर्लभ होता है, और प्रत्येक संन्यासी के लिए तो एक प्रकार से अनिवार्य है ही, प्रत्येक साधक के लिए भी जरूरी है।
किसी भी शुभ दिन इस कंकण को अपनी उंगली में धारण कर लेना चाहिए जिससे कि साधना के क्षेत्र में उसे निरन्तर सफलता प्राप्त हो सके, ऐसा कंकण निरन्तर शरीर को स्पर्श किये रहता है जिससे शरीर में बराबर विद्युत प्रवाह बना रहता है, शरीर रोग रहित, सुन्दर, आकर्षक और अद्वितीय बन जाता है और यदि श्रद्धापूर्वक उसे धारण किये रहें, तो उसके जीवन के प्रत्येक कार्य सफल होते रहते हैं। एक प्रकार से देखा जाय तो साधना और सिद्धि के लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण और दुर्लभ कंकण कहा जाता है।
तंत्र ग्रंथों में यह बताया गया है कि गृहस्थ को यदि अपने  प्राण प्रिय हैं, अपना शरीर प्रिय है तो उसे यह कंकण भी उतना ही प्रिय होना चाहिए क्योंकि इसी के द्वारा वह प्रत्येक कार्य में सिद्धि और सफलता प्राप्त करने में समर्थ एवं सफल हो पाता है।
न्यौछावर – 450/-
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2. सिद्ध जल कड़ा
हकीकत में देखा जाय तो इसको ‘योगी कड़ा’ या ‘संन्यासी कड़ा’ कहा जाता है। गोरखनाथ ने इसे जल कड़ा या जलमुद्रा कहा है। अपने हाथ की कलाई में संन्यासी लोग इस प्रकार का कड़ा धारण किये रहते हैं।
संन्यासियों के लिए या गृहस्थ व्यक्तियों के लिए यह कड़ा पूर्ण सौभाग्यशाली माना गया है। ऐसे कड़े को वे हृदय की सात परतों में छिपा कर रखते हैं, कुछ योगी इसे अपने हाथ में धारण भी कर लेते हैं।
इसके माध्यम से उन पर किसी प्रकार का मारण मोहन या वशीकरण नहीं हो पाता। एक प्रकार से वह निर्भय और निश्‍चिन्त होता है। यदि गृहस्थ भी इस कड़े को धारण करता है, तो उस पर किसी प्रकार की तांत्रिक क्रिया सम्पन्न नहीं हो पाती। भूत-प्रेत पिशाच आदि उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। वह जहां कहीं भी रहता है, शत्रुओं से पूर्णतः सुरक्षित रहता है। शत्रु अपने आप परास्त होते रहते हैं और किसी भी प्रकार से शत्रु ऐसे व्यक्ति पर न हावी हो सकते हैं और न उसके शरीर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे व्यक्ति को किसी प्रकार की बाधा या अड़चन नहीं आ सकती है।
कड़े के निर्माण में तीन धातुओं को परस्पर मिला कर उसके ऊपर चैतन्य पारे का लेप किया जाता है, और फिर उसे जल मुद्रा में बांधा जाता है क्योंकि धातु पर पारे का लेप करना अत्यन्त कठिन है। इस प्रकार से जल बन्धन कर फिर उसे अग्नि ताप दे कर कड़े को पूर्ण सक्षम बनाया जाता है। यदि इसके निर्माण में थोड़ी सी भी गलती होती है तो सारा रसायन चौपट हो जाता है और वह कड़ा किसी लायक नहीं रहता, यह सारी क्रिया कठिन है, और इस प्रकार का कड़ा निर्माण करने पर काफी व्यय आ जाता है। मगर इतना व्यय करने के बावजूद भी यह कड़ा बन जाय तो सौभाग्य ही समझना चाहिए।
संन्यासी इस कड़े को धारण करते हैं या झोली में रख देते हैं। गृहस्थ इस कड़े को पहन सकते हैं या सुरक्षित रख सकते हैं। वास्तव में ही यह जल कड़ा सौभाग्यदायक और श्रेष्ठ माना गया है।
न्यौछावर – 600/-
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3. सिद्ध वज्रदण्ड
यह ताबीज के आकार का अत्यन्त दुर्लभ रसायन प्रयोग होता है, जिसे प्रत्येक संन्यासी अपने गले में धारण किये रहता है। आगे के योगियों ने इसको गन्डा भी कहा है। इसके माध्यम से संन्यासी को कई प्रकार की सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। इसको धारण करने के बाद जब साधक थोड़ी तांत्रिक साधना सम्पन्न करे, तो उसे निश्‍चय ही शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है।
अनुभव में आया है कि वज्रदण्ड जहां साधक को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है, सैकड़ों शत्रु मिल कर के भी उसका किसी प्रकार से कोई अहित नहीं कर सकते, किसी भी क्षेत्र में शत्रु परास्त रहते हैं। साथ ही साथ इस वज्रदण्ड की यह विशेषता होती है कि कुछ सिद्धियां तो उसे स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। भूत-प्रेत सिद्धि या भूतों को वश में करना, उनसे मनचाहा कार्य करवा देना, तीव्र और उग्र साधनाओं को सिद्ध करना, योगिनियों को वश में करके उनसे मनचाहा द्रव्य प्राप्त करना, आदि साधनाएं थोड़े से प्रयत्न से ही सिद्ध हो जाती हैं।
इस वज्रदण्ड के द्वारा ही संन्यासी अपने भक्तों के कई कार्य सम्पन्न कर लेता है और वह सिद्ध माना जाता है। इस प्रकार के वज्रदण्ड के निर्माण के लिए निवडग तथा थूहर को मिलाकर एक गोल गोली बनाई जाती है और अश्‍वत्थ के सफेद दूध में इस गोली को घोट कर उसे वज्रदण्ड के रूप में सिद्ध किया जाता है। फिर इसे ताबीज में भर कर धारण किया जाता है। इस सारी क्रिया पर भी काफी अधिक व्यय हो जाता है, ऐसा वज्रदण्ड कोई भी पुरुष या स्त्री धारण कर सकती है, जो जीवन में पूर्ण सफलता चाहते हैं, उन्हें इस प्रकार का वज्रदण्ड अवश्य ही धारण करना चाहिए।
न्यौछावर – 450/-
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4. विश्‍वबेधी सुदण्ड
संन्यासियों में यह इसी नाम से पुकारा जाता है और यह अंगूठी के आकार का होता है, परन्तु गुरु गोरखनाथ ने कहा है, कि जो पूरे संसार पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं, जो पूरे संसार पर राज्य करना चाहते हैं उनको यह विश्‍वबेधी  सुदण्ड धारण करना चाहिए।
इसमें वशीकरण की अन्यतम विशेषता होती है। उच्चकोटि के गृहस्थ साधक या संन्यासी इसे अंगूठी में धारण किये रहते हैं। इसकी विशेषता यह है कि सामने वाले किसी स्त्री पुरुष की नजर इस मुद्रिका पर पड़ती है तो वह पुरुष स्वतः वश में हो जाता है, या यदि इस अंगूठी का स्पर्श जिससे भी हो जाता है, वह वश में बना रहता है और जीवन भर उस संन्यासी या धारण करने वाले व्यक्ति की आज्ञा मानता रहता है।
एक प्रकार से देखा जाय तो यह सम्मोहन अथवा वशीकरण मुद्रिका है इसके निर्माण में बड़ के दूध में पारद को बांध कर फिर उसमें धातु का जारण किया जाता है और उसे अग्नि वेध कर उसे मुद्रिका का आकार दिया जाता है। इस प्रकार यह मुद्रिका सिद्ध हो जाती है और इसमें दूसरों को सम्मोहित करने या वशीकरण करने की अद्भुत क्षमता आ जाती है।
ऐसा साधक विश्‍व में कहीं पर भी असफल नहीं होता और सम्पूर्ण विश्‍व को अपने वश में करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है। साधक स्वयं इस प्रकार की मुद्रिका तैयार कर अथवा कहीं से भी प्राप्त कर इस दिवस को धारण कर जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकता हैं।
न्यौछावर – 450/-
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5. समुद्र सिद्ध कायाकल्प कंकण
इसे ‘गोरख कंकण’ भी कहा जाता है, किसी पात्र में समुद्र का जल भर कर आंच पर रख कर उसमें धीरे-धीरे मधु का जारण किया जाता है। जब यह मोम बन जाये तो उसमें पारे का संस्कार कर उस मोम को त्रिधातु पर लपेट कर चौबीस घण्टे उसे समुद्र जल में ही पकाया जाता है, इससे इस प्रकार का कायाकल्प कंकण तैयार हो जाता है।
इसके धारण करने से स्वतः पूरे शरीर में परिवर्तन होता रहता है और यदि संन्यासी को या साधक को किसी प्रकार का रोग हो, तो वह रोग निश्‍चित ही समाप्त हो जाता है।
शास्त्रों में यह बताया गया है कि इस कंकण में रोग मुक्त करने की अद्भुत क्षमता है, यदि इस कंकण को रात भर साफ पानी में रख कर सुबह वह पानी रोगी को पिला दें तो रोगी का रोग दूर होना शुरु हो जाता है।
इसमें तो कोई दो राय नहीं कि इसे धारण करने वाले व्यक्ति के शरीर के रोग तो समाप्त होते ही हैं, उसकी वृद्धावस्था समाप्त होने लगती है, सिर पर काले और घने बाल आने लगते हैं, आंखों की रोशनी और शरीर में पूर्ण पौरुष के साथ-साथ वह एक ऐसा व्यक्तित्व बन जाता है, कि सामने वाला देखता ही रह जाता है।
एक प्रकार से धीरे-धीरे पूरे शरीर का कायाकल्प हो जाता है। वास्तव में ही यह अपने आप में दुर्लभ और सिद्ध  ‘कायाकल्प कंकण’ कहा जाता है। इसे गृहस्थ साधक अथवा संन्यासी धारण किये रहते हैं, जिससे उनका शरीर दर्शनीय चमत्कारिक और आश्‍चर्यजनक हो जाता है।
ऊपर संन्यासी पंचरत्नों का विवेचन किया गया है। इन पांचों दुर्लभ वस्तुओं से ही संन्यासी सम्पूर्ण विश्‍व में सम्मान, यश, प्रसिद्धि और पूर्णता प्राप्त करने में समर्थ, सफल हो पाते हैं। इनको बिना किसी कर्मकाण्ड के मात्र धारण किया जाता है।
न्यौछावर – 450/-
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Resolution accomplishment DaySanyaas Siddhi DiwasAashaadh Krishna Dwitiya June 4, 2015

Siddhashram Jayanti

Aashaadh Krishna Navmi June 11, 2015

Guru Poornima

Aashaadh Poornima  July 31, 2015

 

Wear them, Perform Sadhana

 

Sanyaas Siddhi Panchratna

 

Consecrated with Sage Parashar Mantras

 

The simplest meaning of Sanyaas is  – “Sa” + “Nyaas” i.e Becoming Free with Work

 

You have to become a Sanyaasi (Monk) and you have to become an action-filled monk. When you become a saint with actions, then you can certainly become free not just once, but each and every moment, you may savor joy of independence at each moment. Not just once, but a new joy of eternal salvation each moment; but it is necessary to progress on the path of recluse. Monkhood does not mean running away from your life. Similarly a family-life does not mean immersion in life, forgetting everything else. A normal householder can also become a monk and lead his life with ascetic expressions. One should not immerse completely into luxury or indulgence.

 

A saint is one, who has been liberated, who is full of joy, therefore actual monkhood is the attainment of immorality, certainty and bravery.

 

–    Gurudev Nand Kishore Shrimaliji

 

When we have attained life, we have also started to experience many coincidences. Every coincidence becomes the basis of a new task. But which is the task, which an individual can perform independently. When a person starts living with a balanced perspective, starts self-learning and conversing with self, and start getting feeling of the whole; then the person becomes liberated, and only such a person can become a saint. The sainthood is state to analyze the inner self,  it is the philosophy to understand our past experiences and refine them. Freedom from the eternal cycle of life does not mean running away from life. Sainthood is performing actions with a deep sense of duty and responsibility.

Thousands of years ago, Maharishi Parashar enunciated ten rules for the sainthood, saint and life. These rules should be practiced and a person following these rules, can enjoy the joy of life becoming a saint. He may live in a small village or a large city, he may be a businessman or a professional, he may be a male or female; all of these don’t  cause any difference. Therefore Sage Parashar states that each person can become a saint, he does not need to run away from the life.

The characteristic of a saint is that he can protect himself from the discord of domestic life, while living a family life;  one who is continuously progressing in Sadhanas, and the one who has a strong inner desire to achieve success in Sadhana in life – to attain Perfection in Gold Alchemy,  Chemical Science, Ayurveda Science or in any area with complete success.

 

Resolution

We often tend to have desires and wishes, but all of them are not resolutions. When our desires get combined with a strong willpower to accomplish, then it becomes a resolution. The resolution outlines the plan to ensure success in the task.

Whenever we desire something, or make a wish, it is just a mere thought but when we complement it with our entire energy, strong determination and combine dedication for achievement of that wish or desire; then an incomparable drive flows through our inner self . We achieve capability to fulfil the desires and accomplish the pledge through this divine energy.

“ Tasme ManaH Shiv Sankap Mastu” i.e Insurpassable Power is obtained by connecting power of mind with resolution and maintaining full dedication and commitment.

The practice of Resolution is the ritual in with the Sadhak engages in fulfilling his responsibilities towards Anusthaan actions with a deep sense of loyalty, determination and self-respect.

 

What is Sanyaas Sankalp Diwas?

The Sanyaashram is the fourth quadrant of the Varnashrama system, in which the person becomes fully recluse after completing his worldly obligations; however Pujya Gurudeva has always emphasized on Grihasth-Sanyaas i.e living a eremite existence with full love within the family and the day such a thought enters the conscience of a person; that day becomes the “Sanyaas Diwas” for him… The scriptures state that the Sadhak or the disciple should endeavor to meet, reach divine Guru-feet, sit at his feet with full devotion and make a resolution to accomplish a Sadhana or achieve success in a particular sphere within next year. He should take an oath in presence of Gurudev to dedicate the next year to His feet, should have desire and aspiration to achieve success in a particular field, and he should also try to obtain guidance and confidential information from Gurudev.

Guru always endeavors to grant all knowledge and information to each disciple, he keeps on evaluating the progress of maturity and affection in the disciple. The more dedicated he is towards Gurudev, the more absorbed he is into Guru-Sadhana, the quicker will Gurudeva endeavor to grant him knowledge; all the efforts and exertions in this process should be from the  disciple.

… And if it is not possible to reach the gate of Gurudev, or if circumstances forbid him from travelling  or to meet Gurudev personally; then he should sit wearing pure robes in front of Guru-picture  and accomplish complete Guru poojan; and take a determined pledge with water in hand that – I will devote this entire year to achieve completeness in the particular Sadhana and will achieve complete success in the particular field whilest staying at the holy feet of revered Gurudev.

When he makes such a firm determination, then he gets visible-invisible blessings from the superior Yogis, Sanyasis and even his beloved Gurudev; which enables him to certainly achieve success in his field.

What is life which is spent in anonymity, what is the purpose of a life in which you cannot perform welfare of millions of people;  a life cannot be called life if we cannot achieve fame in the entire nation,  cannot become unique and superior in the life and cannot achieve complete success in the Sadhana.

This Day is “Dhrid Sankalp Diwas” (Sanyas Siddhi Diwas) or Absolute-Determination Day, a day of firm-attentive resolution, a day to do introspection and meditation of mind.  This day bears witness to the fact, that what all I have attained until now and what remains to be achieved, what was the purpose of life spent until now, and what all tasks, and Sadhanas are required to be accomplished by me in the next year to obtain perfection and totality in life.  If a disciple performs such a spiritual analytical introspection firmly, then this special day becomes a transformational fateful day for him,

 

Sanyaas Siddh Panchratna

The saints and monks use Panchratnas to obtain success in life or Sadhanas, and therefore, they enjoy longevity, their bodies are healthy, handsome and vigorous,  and thousands of devotees and people bow at his feet, and so they become a unique magnificent personality.

A domestic family-Sadhak can also perform Panchratnas, and he can achieve success, perfection and excellence in all spheres of his life.

 

These Panchratnas are self consecrated and sanctified, and you do not need to perform any Prayog or Mantra-jap on them. It is enough to wear them… and it is not mandatory to wear them on Sanyas Diwas or any significant day.

This is the basic platform of Sanyas, when you adorn these divine ornaments dedicating yourself into Gurudev’s holy feet.

 

 

  1. Siddh Kankan Ring

This is a significant ring-shaped Kankan which the monks wear in their finger, and they obtain success in all spheres of life through this. As a matter of fact, the words difficult or impossible do not exist in their dictionary. From ancient time, the monks and saints have been advised to wear Siddh Kankan, so that they remain confident and fearless, they can progress forward in their lives and achieve success.

It is created by grinding tin, lead, zinc, magnet, or any of the Siddh metals; creating a pisti after filtering with a fine fabric filter; tempering well after mixing in the milk of Gular; and when this becomes ductile into wires, then it should be smoothened and stiffened by burning in hot fire; and the ring made of this red-hot wires should be immersed in activated mercury; such a consecrated ring is called “Siddh Kankan” in ancient scriptures. It is unique and rare; and is mandatory for a monk to wear, and is similarly important for each Sadhak.

You may wear this Kankan in your finger on any auspicious day, so that you may achieve success in Sadhana practices; such a Kankan always remain in contact with the body continuously transferring an electric current, the body becomes disease-free, handsome, beautiful, charming and attractive. If worn continuously with full dedication, then he keeps getting success in all his endeavors. In a way, this is a very important and significant Kankan for Sadhana and Siddhis.

The tantric scriptures state that if a householder loves his life, adores his body; then this Kankan should be similarly beloved as it makes him capable to achieve success and siddhis in each endeavor.

 

Cost – Rs. 450 / –

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  1. Siddh Jal Kara Bracelet

In reality it is called “Yogi Kara” or “Sanyasi Kara”. Gorakhnath has termed it as Jal-Kara or Jal-mudra. The monks wear it on the wrist of their hand.

This bracelet has been considered highly fortunate for the ascetics or householders. They conceal such a kara in the seven layers of their heart, some yogis also carry it in their hands.

The Maaran, Mohan or Vashikararn actions do not impact wearer of such a kara. He becomes fearless and secure. If a householder adorns this kara, then he is completely protected from black-magic attacks. The ghosts or vampires also cannot trouble him.  Wherever he goes, he remains completely protected from any vile act of his foes. The enemies keep getting vanquished automatically and they can neither dominate him nor harm his body. Such a person does not face any hindrance or obstacle.

To create this kara, three metals are mixed together and  a coating of activated mercury is applied; and then it is fixed with jal-mudra as it is very difficult to coat a layer of mercury on a metal. After such a water-fastening, it is heated in hot flame at high temperature to compile it. Any single mistake during the creation ruins the entire chemical balance and that kara becomes worthless. This entire process is very complex and manufacture of such a kara is very expensive. Even after all these exertions, if one manages to create proper kara, it should be considered as a good fortune.

Saints wear this kara or keep it in their bag. The householders can either wear it or keep it secure. In fact, such a Jal-Kara is very fortunate and magnificent.

 

Cost – Rs. 600 / –

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  1. Siddh Vajradand

An extremely rare chemical is utilized in this amulet shaped article, and every monk wears it round his neck. Some of the recent Yogis have also termed it as Ganda. The monk acquires many siddhis automatically through this. When a sadhak performs a little amount of Sadhana after adorning this, he certainly obtains quick accomplishment.

It has been experienced that Vajradand provides complete security to the Sadhak, hundreds of enemies combined cannot cause him any harm, and the foes remain vanquished in all fields. Moreover a special feature of this Vajradand is that some siddhis get automatically accomplished. Controlling ghosts or demons, or quelling ghosts, getting desired tasks done by them, accomplishing powerful and strong Sadhanas, controlling yoginis to obtain desired money, etc. Sadhanas can be easily accomplished with a little effort.

The saint is able to complete many wishes of his devotees through this vajradand, and he is considered as a Siddh. To construct such a vajradand, a round pill is created by mixing nivdag and thuhar;  and it is then ground in milk of ashwatattha, into the form of Vajradand. Then it is filled in an amulet and worn. This entire process is very costly, such a vajradand can be adorned by any man or woman. Anyone who desires success in their life, should surely wear such a vajradand.

Cost-  – Rs. 450 / –

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  1. Vishwabedhi Sudand

The ascetics called it by the same name and it is ring-shaped, but Guru Gorakhnath has stated that those who wish to conquer the whole world, those who wish to rule over the whole world, should wear this Vishwabedhi Sudand.

It has a rare attribute to captivate and hypnotize. The Superior saints wear it on their finger. Its specialty is that any man or woman who notices this ring, automatically gets hypnotized; or whoever touches this ring, gets hypnotized, and keeps following the orders of the ascetic or the ring-wearer.

As a matter of fact, it is a sammohan or vashinkaran mudrika (ring). To construct this, mercury is confined within milk of bad, and the metal is activated within it, and then it is given a shape of ring by passing it though fire. Such a ring gets Siddh and it gains amazing quality to hypnotize or captivate others.

Such a Sadhak never encounters failure in his life, and he gains power to hypnotize the entire world. A Sadhak can prepare such a ring himself or wear one by obtaining from somewhere else, to obtain full success in life.

Cost – Rs. 450 /-

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  1. Samudra Siddh Kayakalp Kankan

It is also known as “Gorakh Kankan”, some sea water is heated in a vessel, and honey is gradually added  to it. When it melts into wax, then after accomplishing mercury process, the wax is wrapped on a tri-metal and cooked for 24 hours in sea-water,  then such a Kayakalp Kankan is created.

Wearing of this, causes changes in the whole body , and if the saint or monk suffers from any illness, that illness certainly gets cured.

The scriptures state that this Kankan has incredible power to cure diseases; if this Kankan is kept in clean water overnight, and given to the sick person to drink, then his illness gradually starts getting cured.

There is no confusion that the sickness of this Kankan-wearer gets cured, his old-age also gets reversed; thick black hairs start appearing on head, the eye-sight improves and the personality which gets developed with increased vigor is the one, which others can only envy.

Thus gradually the entire body undergoes a transformation. Certainly this is a rare and Siddh “Kayakalp Kankan”. The householder Sadhaks or ascetics wear this, which transforms their body into an incredible magnetic personality.

The Sanyasi Panchratnas are detailed above. The sages are able to obtain respect, fame, distinction and perfection through these five rare articles. These can be adorned without performing any worship.

Cost – Rs. 450/-

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