Samraatabhishek Diksha

24-25 दिसम्बर 2016
आरोग्यधाम दिल्ली

 

सम्राटाभिषेक दीक्षा
साधना का सर्वोत्तम शिखर

 

निखिल ध्वज हाथ में
सर्वत्र विजय साथ में
नववर्ष के शुभारम्भ में गुरु अपने शिष्य को अद्वितीय अमृत भरे वरदान को शक्तिपात के माध्यम से प्रदान करते ही हैं। सम्राटाभिषेक जीवन का अमृतमय आनन्दपान है, मृर्त्योमा अमृतगमय का स्वरूप है।
सद्गुरु की कृपा दृष्टि, सद्गुरु का स्पर्श, सद्गुरु का आशीर्वाद, सद्गुरु द्वारा प्रदत्त शक्तिपात ही राज्याभिषेक से सम्राटाभिषेक की यात्रा है।

 

29 दिसम्बर 2013 को गुरुदेव ने शिष्यों को राज्याभिषेक दीक्षा प्रदान की। यह हम सबके जीवन का परम सौभाग्यदायक क्षण था। उस दीक्षा के, साधकों के अनुभव मैं लिखूंगा तो हजारों पृष्ठ भी कम पड़ेंगे।

 

गुरुदेव ने अपने अमृत वचनों में कहा – ‘जीवन तो सभी जीते हैं लेकिन इस संसार में सम्मान हर एक को प्राप्त नहीं होता है, इस संसार में आकर्षण तत्व हर एक को प्राप्त नहीं होता है।

 

राज्याभिषेक गृहस्थ जीवन में संन्यास और संन्यास जीवन में गृहस्थ के भाव का संयोग है। हम अपने जीवन के किसी भी भाव में रहें लेकिन अपनी मस्ती और अपने आनन्द में रहें। जो भी ‘इच्छाएं, कामनाएं हों वे हमारे अपने हाथ में हों।

 

यह ज्ञान, आकर्षण और यश का ‘राज्याभिषेक’ तभी संभव है जब योग्य गुरु, समर्थ गुुरु आपके भीतर देवत्व जाग्रत करें। राज्याभिषेक दीक्षा ही वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा यह सब संभव है। राज्याभिषेक द्वारा ही शरीर से हट कर प्राणों में विस्थापित हुआ जा सकता है, दिव्य दृष्टि जाग्रत की जा सकती है, अपने आप में पूर्णता प्राप्त की जा सकती है।

 

गुरुदेव ने हमें राज्याभिषेक दीक्षा प्रदान की और वह शक्ति हमारे रोम-रोम में स्थापित हो गई।

 

इसी क्रम में गुरुदेव ने 28 दिसम्बर 2014 को शिष्यों को जीवन यज्ञ में कर्म आहुति के लिये प्रेरित किया और शिष्यों के जीवन में एक विशेष अश्‍वमेघ यज्ञ क्रिया प्रारम्भ की उस क्रिया का स्वरूप ‘अश्‍वमेघ विराट् दीक्षा’ के रूप में स्पष्ट हुआ। संघर्षमय जीवन एक अवश्यंभावी सोपान है जीवन का और उस संघर्ष में साधक को विजय प्राप्त होनी आवश्यक है।

 

गुरुदेव ने कहा – ‘संघर्ष के समय मजबूत बनना आवश्यक है लेकिन यह मजबूती कौन दे सकता है? सफलता के समय आपके हजार सहयोगी हो सकते हैं, आपकी सफलता में आपके मित्र, सम्बन्धी और परिवार के सदस्य सभी अपनी-अपनी दावेदारी बताते हैं लेकिन संघर्ष के समय आपके पास केवल और केवल एक ही शक्ति रहती है और वह शक्ति है, ईश्‍वरीय शक्ति और गुरु जो इस ईश्‍वरीय शक्ति का प्रतिरूप हैं।’

 

गुरु के मन में संकल्प से ही शिष्य में शक्ति जाग्रत होती है क्योंकि गुरु के मन में सदैव शिष्यों के कल्याण के संकल्प ही होते हैं। जिसे वेदोें में ‘‘शिव संकल्पमस्तु’’ कहा गया है। शिष्य में इस शक्ति जागरण के लिए, गुरु के मन में शिष्य के कल्याण का ही भाव होता है। गुरु के संकल्प अनुसार शक्ति प्रवाहित होती है और शिष्य की चित्त शक्ति के संसर्ग (संयोग) में आती है।’’

 

यह भाव था अश्‍वमेघ विराट् दीक्षा का –

 

जब संघर्षशील शिष्य तपकर तैयार होता है, संसार की आग से गुजरता है तो वह समाप्त नहीं होता है क्योंकि उसकी रक्षा गुरु स्वयं करते हैं। गुरु उसे संघर्ष की इस आग में तपाकर उसकी अशुद्धियों को समाप्त कर उसे विशुद्ध बना देते हैं। वह तपकर स्वर्ण के समान नितांत खरा हो जाता है। उसके जीवन के मल-पाक, विक्षेप समाप्त हो जाते हैं।

 

इस अश्‍वमेघ दीक्षा से हमारे भीतर संघर्ष की दिव्य शक्ति का स्थापन हुआ।

 

संघर्ष की यह भाव भूमि बड़ी ही अनोखी भावभूमि है। जो शिष्य का पुराना आधार होता है वह हिल जाता है। लेकिन गुरु हर समय उसे संभाले रखते हैं। सांसारिक बंधन समाप्त नहीं होते लेकिन उन सांसारिक बंधनों के बीच भी वह अपने आपको मुक्त अनुभव करता है। तब गुरु द्वारा शिष्य में प्राण शक्ति तत्व का संचरण किया जाता है। इस प्राण संचरण क्रिया का नाम ही ‘तत्वमसि क्रिया’ है। जो प्रत्येक जीव, साधक के भीतर स्थापित है उस पर जन्म-जन्म के दोष, अंधकार छा जाते हैं। भीतर के प्राणतत्व – तत्वमसि पर स्मृति, आशा, मोह, शत्रुता, बल, घमण्ड, अभिमान का अंधकार छा जाता है तब सद्गुरु अपनी क्रिया द्वारा उसके ही शरीर में स्थित प्राण तत्व को स्पष्ट करते हैं। अपने स्वयं के प्राण तत्व को समझना, जिसका मूल वाक्य है –

 

मैं हूं… मैं हूं… मैं तत्व हूं… अपने भीतर के अश्‍वमेघ यज्ञ को, अपने भीतर के सूर्य को, अपने भीतर के राजस तत्व को जाग्रत करना तत्वमसि क्रिया है।

 

इस क्रिया को दीक्षा के द्वारा गुरुदेव ने 27 दिसम्बर 2015 को आरोग्यधाम की पवित्र भूमि पर प्रदान किया।

 

यह क्रिया शिष्य को स्वतंत्र करने की क्रिया थी, जहां आत्मसुख, आत्म भाव, आत्म तत्व से परिपूर्ण शिष्य – ‘पूर्णमद पूर्णमिदं…’ की क्रिया में गतिशील हो जाता है।

 

आज हर शिष्य को अपने आप पर गर्व है, वह स्वयं जानता है कि मेरे जीवन का लक्ष्य विशेष है और उस विशेष का स्थापन सद्गुरु ने मेरे भीतर किया है।

 

ऐसी उच्चतम स्थिति में गुरु शिष्य को अपनी भावभूमि में स्थापित करते हैं। तब शिष्य एक निम्नतर स्तर से ऊपर उठकर ऊर्ध्वगामी व्यक्तित्व बन जाता है। उसके जीवन के सारे रहस्य उसके सामने पल भर में प्रत्यक्ष हो जाते हैं। उसका लक्ष्य उसके सामने प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। उसके कदम उसी दिशा में निश्‍चित भाव भूमि से संकल्पबद्ध होकर गतिमान होने लगते हैं।

 

तब उसे गुरु जो दीक्षा प्रदान करते हैं वह महान् दीक्षा है – सम्राटाभिषेक दीक्षा

 

सम्राटाभिषेक के बारे में मैं अपनी ओर से कुछ विशेष नहीं कहना चाहता हूं। पर आप सन् 1997 के उस भाव संसार में जाएं, जब सद्गुरुदेव ने सम्राटाभिषेक मूल तत्व को स्पष्ट किया था।

 

जीवन की सम्पूर्णता किस तथ्य में निहित है? वह तथ्य है स्वयं मानव का यह जीवन। मानव का जीवन, उसके परम लक्ष्य से न जो विलग है और न ही उसमें बाधक। इसी कारणवश शास्त्रों में कथित-वर्णित, परम लक्ष्य, मोक्ष की धारणा तब तक अपूर्ण है जब तक उसमें जीवन की गरिमा को यथोचित स्थान नहीं दे दिया जाता और जीवन का तात्पर्य केवल जन्म से लेकर मृत्यु काल के मध्य बिखरे कुछ वर्ष ही नहीं हो सकते। जीवन तो काल की गणना के दुःसह्य आबद्धीकरण से पृथक एक अलग ही अवधारणा होती है, वस्तुतः जीवन की एक अविरल गति ही होती है।

 

जिस प्रकार नदी के दो तटों की वास्तविकता को नहीं नकारा जा सकता ठीक उसी प्रकार जीवन में भौतिकता के महत्व को भी नहीं नकारा जा सकता।

 

किन्तु पुरुष तो वही है जो एक सम्पूर्ण दृष्टि रखता हो। वस्तुस्थिति को सत्यता के साथ स्वीकार करता हो। जीवन के प्रति ऐसी दृष्टि विकसित करने के उपरांत ही जीवन के प्रवाह का साक्षीभूत बनने का अवसर उपलब्ध होता है और तब कहीं व्यक्ति अपनी उनींदी, लड़खड़ाती पगगति को साध, सही अर्थों में साधक बन जीवन का संगीत सुनने में सक्षम हो पाता है।

 

गुरु की प्रथम दीक्षा साधक को सर्वप्रथम इसी भावभूमि तक लाने का कार्य करती है। उसकी तन्द्रा तोड़ने का, उसे साक्षीभूत बनाने का उपक्रम करती है।

 

जीवन की यह यात्रा तो जैसे-तैसे सबकी पूरी हो ही जाती है, इसमें कोई विशिष्टता नहीं है। हमारे आस पास के हजारों लाखों लोग नित्य ही इस यात्रा को पूरा कर पुनः गर्भ में आने के लिए प्रस्थान कर ही रहे हैं- जिन्होंने न तो यह जीवन सम्पूर्णता से जीया होता है न ही उस  परम लक्ष्य को उपलब्ध हो पाते हैं।

 

तस्या भोक्ता स्वतन्त्राया भोग्यैकीकार एष यः। स एव भोगः या मुक्तिः स एव परमं पदम्।

 

भोग का कोई भी स्वरूप न तो हेय है न ही तुच्छ। परिष्कृत -अपरिकृष्त तो मानव मन की रचित परिभाषाएं हैं यद्यपि भोग की उत्कृष्टता व साफल्य तभी है जब उसमें मोक्ष की समाविष्टि हो।

 

मोक्ष है आत्म बोध की सूर्य रश्मियों से तप्त दिवस की वेला और भोग है असंख्य तारों से भरी किसी पूर्णिमा की रात्रि। दोनों ही अवस्थाओं का पृथक वैशिष्ट्य है किन्तु जहां ऐसे दिवस और ऐसी रात्रि की युति हो, वही गोधूलि की वेला जो भारतीय चिंतन में पवित्रतम वेला कही गई है। जीवन में यही वेला उतार लेना धर्म का मर्म है, यही तंत्र की भावभूमि भी है।

 

जिस प्रकार आध्यात्मिकता के तट पर चलता व्यक्ति भौतिकता के तट को और भौतिकता के तट पर चलता व्यक्ति आध्यात्मिकता के तट को बस निहार सकता है, जीवन की धारा को पार कर दूसरे तट को स्पर्श करने की कला नहीं जानता है, या यों कहें कि उसे वह पुल बनाना नहीं आता जिससे वह दोनों तटों का स्पर्श कर अपने जीवन में उपरोेक्त कथित समन्वय अथवा योग को स्थापित कर सके।

 

गुरु का महान् उपकार

 

जहां से मानव के स्वप्रयास समाप्त हो जाते हैं, जीवन में वहीं से गुरु की भूमिका प्रारम्भ होती है। जब मनुष्य अपनी क्षमताओं का आंकलन कर यह अनुभव कर लेता है कि स्वयं उसके प्रयासों से कुछ विशेष घटित होना संभव नहीं है (केवल आध्यात्मिक पक्ष में ही नहीं अपितु भौतिक पक्ष में भी) तथा वह अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है तभी से गुरु कृपा का मार्ग प्रशस्त होता है।

 

यहां पराजय का अर्थ अपमानबोधक नहीं वरन समर्पण की प्रथम अवस्था पग है। वही उस समर्पण की प्रथम मनः स्थिति होती है जिस समर्पण के अभाव में गुरु द्वारा दीक्षा प्रदान करने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। साधक द्वारा समर्पित हो जाने के उपरांत ही गुरु की वह क्रिया प्रारम्भ होती है जो साधक के दोनों तटों के मध्य एक पुल बनाने का कार्य प्रारम्भ कर देती है।

 

स्व से सम्राट की यात्रा –

 

गुरु का आग्रह अपने प्रत्येक शिष्य को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कराने का होता है। गुरु अपने प्रत्येक शिष्य को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सर्वोच्च बना देने के विशिष्ट आग्रह से युक्त होते हैं। वे अपने शिष्य को न केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में वरन् भौतिक क्षेत्र में भी उस स्थिति तक ले जाना चाहते हैं जहां उसकी एक पृथक पहचान हो, जहां वह समाज के अन्य  व्यक्तियों के मध्य एक गुमनाम सा जीवन जीकर इस संसार से विदा न ले ले, और जीवन में ऐसी स्थिति प्राप्त व्यक्तित्वों को ही ‘सम्राट’ की संज्ञा से विभूषित किया जा सकता है। ‘सम्राट का तात्पर्य अश्‍वारूढ़ हो, हाथ में तलवार ढाल ले, एक राज्य के बाद दूसरे राज्य को बाहुबल से विजित करने वाले व्यक्तित्व से नहीं होता और न ही किसी दरबार में स्वर्ण-सिंहासन पर बैठ नर्तकियों के नृत्य का आनंद उठाने वाले व्यक्तित्व से हो सकता है (यद्यपि ‘सम्राट’ शब्द सुन हमारे मन में यही चित्र उभरता है)।

 

जिस प्रकार जीवन अथवा भोग अपने आप में एक पृथक अवधारणा है ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक संदर्भो में ‘सम्राट’ भी एक पृथक अवधारणा है और प्रत्येक दीक्षा अपने आप में मूलतः एक आध्यात्मिक संक्रिया ही होती है- क्योंकि जीवन की गति भौतिकता से अध्यात्म की ओर है। यही ‘सम्राटाभिषेक दीक्षा’ का तात्पर्य है।

 

जिसने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जाकर विजय प्राप्त कर ली हो वही ‘सम्राट’ की पदवी से विभूषित करने योग्य व्यक्तित्व होता है। इतिहास साक्षी है कि ऐसे अनेक नायक हैं जिन्होंने अत्यंत सामान्य परिवार में जन्म लिया किन्तु जीवन के विविध सोपानों पर (बिना हाथ में तलवार या ढाल लिए) चढ़ते हुए कुछ ऐसा घटित किया कि वे लाखों हृदयों पर ‘शासन’ करने में समर्थ हुए। ऐसे व्यक्तित्वों का जीवन ही धन्य होता है जिनका नाम उनके वंशज गर्व से लेकर अपने को सम्मानित अनुभव करते हैं। ‘सम्राट’ शब्द की यदि शब्दकोशीय व्याख्या को प्राप्त करें तो ज्ञात होता है ऐसा राजा जिसने राजसूय अश्‍वमेघ यज्ञ सम्पन्न कर लिया हो। यह ‘राजसूय यज्ञ’ केवल राजाओं के क्रियाकलापों का विषय नहीं वरन् प्रत्येक मानव के अन्तर्मन का विषय है।

 

अश्‍वमेघ से आगे – सम्राट तत्व

 

मानव मन एक अश्‍व ही तो है जिसे हमने जीवन की समरभूमि पर अनेक ‘राज्यों’ को विजित करने के स्वप्न के साथ छोड़ रखा है। यह ‘राज्य’ आर्थिक सफलता का भी हो सकता है और शत्रु पर विजय प्राप्त करने का भी। राजनीतिक सफलता का भी हो सकता है और पद- ऐश्‍वर्य प्राप्त करने का भी। जीवन में ऐश्‍वर्य ग्रहण करना भी, किसी राज्य को विजित करने से क्या कम दुष्कर कार्य है? भौतिक सफलता हेतु राजसूय अश्‍वमेघ यज्ञ तो हममें से प्रत्येक व्यक्ति, प्रतिक्षण कर ही रहा है। इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है। यदि इसमें कोई अनुचित बात होती तो हमारे ॠषिगण एक सौ आठ प्रकार की लक्ष्मी वर्णित ही न करते। किन्तु इसमें जो दुःखद है वह यह है कि ऐसी विजय प्राप्ति की चेष्टा में हमारे मन का अश्‍व कभी किसी राज्य में तो कभी किसी अन्य ‘राज्य’ में बंदी बना लिया जाता है तथा जीवन का स्वप्न अधूरा ही रह जाता है। जीवन में किसी स्वप्न के अधूरे रह जाने से अधिक पीड़ादायक कुछ हो ही नहीं सकता, क्योंकि मनुष्य होने का तात्पर्य केवल उदर पूर्ति कर जैसे-तैसे जीवन को व्यतीत करना नहीं हो सकता। मन के अश्‍व को केवल आध्यात्मिकता के तट पर विजय के लिए छोड़ देना भी स्वयं में कोई, श्रेष्ठ धारणा नहीं है क्योंकि तब वह ‘अश्‍व’ कभी किसी सिद्धी, तो कभी चमत्कार की आशा के ‘राज्य’ में बंदी बना लिया जाता है जबकि उद्देश्य तो भोग व मोक्ष के समन्वय का है।

 

दो टूक शब्दों में कहा जाए तो ‘सम्राटाभिषेक दीक्षा’ एक पुल बना देती है जिससे व्यक्ति की गति भोग व मोक्ष में निर्बाध हो सके। वह उन्मुक्त विचरण कर सके और उन्मुक्त विचरण करने वाले पुरुष ही सही अर्थों में जीवनमुक्ति की ओर अग्रसर होने में समर्थ हो पाते हैं। यह तो जीवन का यज्ञ है। राज्यभिषेक दीक्षा जिस यज्ञ की स्थापना है, सम्राटाभिषेक दीक्षा उसी का अगला सोपान है।

 

हमारा सौभाग्य है इस वर्ष सद्गुरुदेव आरोग्यधाम, दिल्ली में सम्राटााभिषेक महादीक्षा शक्तिपात द्वारा आशीर्वाद के रूप में प्रदान कर रहे है।

 

धन्य है हमारा यह जीवन जिस जीवन में हमें सद्गुरु मिले। उस पथ की यात्रा प्रारम्भ की, जिस यात्रा में पल-पल गुरु का साथ हमारे साथ है।

 

आओं आप सब आरोग्यधाम, दिल्ली की दिव्य भूमि पर। गुरु आनन्द का अमृत झरना प्रवाहित कर रहे है, हम सब उस आनन्द अमृत से अपने जीवन को अमृतमय अवश्य बनायेंगे।
24-25 December 2016

Arogyadham, Delhi

 

Samraatabhishek Diksha

The Highest Pinnacle of Sadhana

 

With the Nikhil Flag in Hand,

Get Triumphant Victory everywhere

 

Guru provides the divine nectar Shaktipaat boon to His disciple at the onset of the new year. The Samraatabhishek is the divine joyous elixir of life, it is the immortality nectar.

 

The divine gaze of SadGurudev, the divine touch of SadGurudev, the divine blessings of SadGurudev, and the divine Shaktipaat from SadGurudev is the journey from Rajyabhishek to Samraatabhishek.

 

Gurudev granted Rajyabhishek Diksha to disciples on December 29, 2013. It was the ultimate fortunate moment for all of us. Even a thousand pages will be insufficient, if I start to write about the divine experiences of Sadhaks after that Diksha.

Gurudev stated in His immortal words – “Everyone survives in this life, but one does not get honour and respect, everyone does not become the centre of attraction.

The Rajyabhishek is culmination of Asceticism in Domesticity and Domesticity within Asceticism. We may choose to live in any of these two states, but we should live with full joy and rejoice. We should be able to achieve, whatever desires or wishes we have. “

This Rajyabhishek coronation of this wisdom, attraction and glory will only be possible, only when a capable, qualified Guru activates your latent divinity. This is possible only through Rajyabhishek Diksha. We can move from the physical body into the spiritual soul, only through Rajyabhishek Diksha. This will activate our sixth sense, and move us on the path to complete perfection.

Gurudev granted us Rajyabhishek Diksha initiation and this power permeated into each atom of our body.

As the next step in this series, Gurudev motivated the disciples on 28 December 2014 to offer Actions-Karma in the sacrificial fire of life. He initiated a unique Ashwamedha Yagya process within the life of disciples, and this process culminated within the Ashwamedha Viraat Diksha. A life full of struggles is inevitable, and it is essential for the Sadhak to obtain victory over those struggles.

Gurudev stated – “It is important to become strong at the time of struggle, but who can provide you this strength? Thousands will accompany you during success; your friends, relatives and family-members claim their hands during your success; but only one solitary power accompanies you during the struggle stage. This solitary power is the Divine power, and Guru is the manifestation of this Divine power.”

The strength awakens within the disciples only through the mental determination of Gurudev. Gurudev makes mental determinations only for the welfare of the disciples. The holy Vedas term it as “Shiva Sankalpmastu”. The Guru only desires the welfare of the disciples, while activating this latent power within the disciples. This energy transmits according to the determination-resolution of Gurudev, and it merges with the disciple’s mental energy.

This was the basic essence of the Ashwamedha Viraat Diksha.

When the hardened disciple becomes ready, when he prepares to face the fires of the world, he doesn’t get vanquished, because the Guru Himself protects him. Guru makes him pass through this arduous struggle to terminate his deficiencies, and make him pure-perfect. He becomes pure like the gold itself, all of his deficiencies and inadequacies disappear.

This Ashwamedha Diksha initiated divine power within ourselves to counter the struggles.

The platform of this struggle is very amazing. The entire old edifice of the disciple gets shaken. However, Guru gives him full care. The worldly relations don’t terminate, but he finds his freedom within this web of worldly relations. Then Guru transmits the Soul Shakti Element into him. This Soul Life Transmission process is termed as “Tatvamasi Process. The basic soul-Praana within each organism and Sadhak is covered with layers of darkness and defects of various lives. The dark layers of memory, hope, attachment, enmity, strength, pride, ego envelops the inner Soul-Prana element – Tatvamasi. Then SadGuru clears the Prana-element within the disciple with His own process. He motivates him to comprehend his own soul-prana element, whose root essence is –

I am … I am … I am the element … the activation of our inner Ashwamedha Yagya, the inner Sun, the inner Royal Rajas element is the Tatvamasi Process.

Gurudev granted this process through Diksha on December 27, 2015 at the holy site of Arogyadhaam.

This action was taken to liberate the disciple, wherein the disciple full of Self-joy, Self-expression and Self-perfection dynamically moves ahead towards “Poornamada Poornamidam…” process.

Today every disciple is proud of himself, he himself knows that there are unique goals in his life, and SadGurudev has setup that uniqueness within Him.

SadGuru brings such an elevated disciple into His own level. The disciple transforms from a low-level into an elevated personality. He gains understanding of all mysteries of his life. His goal is forever visible to him. His definite steps start moving dynamically with full determination towards that direction.

Then the Diksha initiation provided by Guru to him at that stage is, Samraatabhishek Diksha.

I do not want to say anything specific about the Samraatabhishek Diksha. But you ought to travel back in time to 1997 when SadGurudev explained the basic elements of Samraatabhishek.

 

Which element contains completeness of life? That specific element is the human life itself. The life, which is neither separate nor an obstacle towards his ultimate goal. Therefore the ultimate goal of Moksha-liberation as mentioned in the holy scriptures is incomplete until it imbibes the glory of life. The life is not limited to a few years between the birth and death. The calculation of life is a completely different concept, it is a continuous movement, outside the limits of time and death.

As we cannot ignore the presence of two shores of a river, similarly we cannot ignore the undeniable reality of materialism in life.

However a real person is the one, who sees with a complete vision. One who accepts the factual truth. Growth of such unique perspective enables the person to develop a detached vision of life. Only then does the person attain capability to hear the sweet song of life as a Sadhak with his faltering, dynamic steps.

The initial Diksha-initiation by Guru brings the disciple to this stage. It starts to eliminate his lassitude, and initiates him on the path of detachedness.

Everyone can complete this journey of life through whatever means, there is nothing special about it. Thousands of people around us complete this journey daily, to prepare to again return back to the womb – those who have neither lived life fully, nor have accomplished the supreme goal.

 

Tasyaa Bhoktaa Swatantraayaa Bhogyeikeekaara Eksha YaH |

Sa Eva BhogaH Yaa MuktiH Sa Eva Paramam Padam ||

 

None of the various forms of Bhoga-indulgence are despicable or worthless. The human brain has composed refined definitions. The real perfection and success of Bhoga-Indulgence occurs only when it is assimilated with Moksha-salvation.

We can think of Moksha-Salvation as a cool day full of pleasant sun-rays, and Bhoga-indulgence as a full-moon night full of infinite stars. Both are uniquely special in their own might. The merger of such a day and night is  the holy time of Godhuli-evening, which has been considered as the most pious and auspicious moment in the Indian philosophy. The essence of Dharma-religion is to imbibe such assimilating moment in the human life, this is basic foundation of the Tantra as well.

A person walking on the spiritual shore can only admire the person walking on the material shore from a distance; and similarly a person walking on the material shore can only admire the person walking on the spiritual shore from  a distance. Such a person cannot touch the other shore, nor is he capable to build bridges between the two shores, to assimilate the holy combination of both shores in the stream of his own life.

 

The Great Beneficence from Guru

The termination of person’s own efforts, heralds the beginning of Guru in the person’s life. The process of Guru grace starts when the person realises after his own self-analysis that he will not be able to achieve anything with just his own efforts (within both spiritual and material spheres of life), and concedes defeat.

The term defeat is not used here in any derogatory sense, rather it is the first step towards the dedication. This is the initial mental frame of dedication. There is no benefit in granting Diksha in absence of dedication. The process of Guru starts only after initiation of  dedication by the disciple, and this process is instrumental in building the bridge around the two shores of the human life.

 

The journey from self to Samraat (Emperor) –

The Guru always wants His disciple to achieve the first position, to be the best. Guru always desires His disciple to obtain perfection in all spheres of life. He wishes His disciple to reach an elevated, distinguished state both in spiritual and material spheres. He wants His disciple to attain a distinct identity instead of living a normal, anonymous life. Only such distinguished personalities can be honored with the title of Samraat or the emperor. A samraat (emperor-monarch) in this age neither means a horse-riding fighter carrying swords-sheaths and conquering multiple countries, nor can it refer to a person sitting on a golden throne enjoying the dance in his court. Such pictures are misleading.

The indulgence and life are two different concepts, and similarly the Samraat (emperor) and spirituality are two completely different concepts.  Every Diksha initiation is essentially a spiritual exercise, because the flow of human life is from materialism towards spiritualism. This is the basic essence of the Samraatabhishek Diksha.

Only one who has achieved victory-success in all walks of life, is entitled to be conferred the title of the Samraat-Emperor. History is full of multiple heroes, who, though born in normal family, governed millions of hearts through their actions, without using any sword or weapons. Such personalities are highly blessed, whose descendants proudly honour them. The literal meaning of Samraat-Emperor is a king, who has successfully accomplished the Rajasuya Ashwamedha Yagya. This Rajasuya Yagya-sacrifice is not limited to royal activities, rather it concerns the inner mind of each person.

 

Next Step of Ashwamedha – The Samraat Tatva-Element

The human mind is like a horse, which we have freed up with a dream to conquer multiple states in the battle of our life. This state can mean material-wealth or destruction-of-enemies. It can either mean political success or obtaining an honourable position. Is obtaining the material-luxuries in life a less cumbersome task than conquering countries. Each one of us has been performing the Rajasuya Ashwamedha Yagya for material success. There is nothing wrong in it. Our Sages would not have listed out one hundred and eight kinds of Lakshmi if it was wrong. However, the sad aspect is that the horse of our mind gets captured-confined in one state or the other in this race to win, leading to an incomplete dream. There is nothing more painful than an unfulfilled dream, because the human life is not meant to just eat and die. It is also not a good idea to let loose the horse of human mind in spiritual sphere, because this horse will get captured-confined in some miracle or siddhi-accomplishment state. The main goal is the balance between indulgence and salvation.

To state simply, the “Samraatabhishek Diksha-initiation” creates a bridge for uninterrupted progress in indulgence and salvation. It provides capability to move freely, and such liberated persons can only move towards enlightenment. It is the Yagya-sacrifice of life. The Samraatabhishek Diksha is the next stage of the Yagya, which was setup by the Rajyabhishek Diksha.

It is our fortune that Pujya Gurudev is blessing us with Samraatabhishek MaahDiksha Shaktipaat initiation at Arogyadhaam, Delhi this year.

Our life is blessed that we met SadGurudev in this life. We took steps on the journey, in which Guru is with us at each and every moment.

All of us should come to the divine ground of Arogyadhaam, Delhi. Guru is pouring a fountain of divine nectar of joy, we will make our life divine through this holy nectar of joy.

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