Sadhana Samagri

साधना सामग्री क्यों आवश्यक
साधना सामग्री की प्राण प्रतिष्ठा क्यों आवश्यक
साधना सामग्री
आपकी जिज्ञासाएं
सद्गुरु समाधान

साधना में सफलता में अनेक रहस्य हैं, जिनके द्वारा ही साधक साधना में सफलता प्राप्त करता है। जब कोई साधक किसी साधना में संलग्न होता है तो सर्वप्रथम उसकी अपने गुरु और मंत्र पर अगाध श्रद्धा होनी चाहिये। जैसी श्रद्धा के साथ साधक साधना सम्पन्न करता है, उसी प्रकार उसको फल प्राप्त होता है, यह साधना सूत्र का आन्तरिक पक्ष है, दूसरे प्रत्यक्ष और बाह्य रूप में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं वे हैं – साधना में प्रयुक्त होने वाले उपकरण जिनको साधना सामग्री अर्थात् यंत्र, माला इत्यादि कहते हैं।

 

जिस प्रकार किसी सेना में चाहे कितने ही बहादुर सिपाही हों, चाहे कितना ही कुशल नेतृत्व हो, किन्तु उस सेना के पास आधुनिक और तीव्र हथियार न हों तो वह सेना युद्ध नहीं जीत सकती, उसी प्रकार कोई व्यक्ति चाहे कितना ही मंत्रों का ज्ञाता, विद्वान हो, किन्तु बिना प्राण प्रतिष्ठित साधना उपकरणों के वह साधना में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

 

साधना में संलग्न होने से पूर्व साधना उपकरणों का चैतन्य, प्राण तत्व से आपूरित होना (जिसे प्राण प्रतिष्ठा कहा गया है) आवश्यक है। बिना प्राण प्रतिष्ठा के सामग्री उसी प्रकार है जैसे बिना प्राण के शरीर, जिस तरह बिना प्राण के यह शरीर बेकार है, इसमें दुर्गन्ध आने लगती है, ठीक उसी प्रकार से बिना मंत्र चैतन्य प्राण प्रतिष्ठित सामग्री केवल पत्थर के टुकड़े हैं।

 

ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहम् प्राण इह प्राणः।
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहम् जीव इह स्थितः।
ॐ  आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहम् सर्वेन्द्रियाणि इह स्थितः।

 

जब हम पुराण के उपरोक्त मंत्रों के साथ साधना-उपकरणों के समक्ष इन मंत्रों का उच्चारण करते हैं तो उसमें मूल भाव यही होता है, की जिस प्रकार हमारे शरीर के अन्दर प्राण है, एक जीव है, उसी प्रकार इस यंत्र के अन्दर हम सम्बन्धित देवता की चेतना, प्राण तत्व समाहित कर रहे हैं।

 

और जब उस यंत्र के अन्दर सम्बन्धित देवता की प्रतिष्ठा की जाती है तो वह उस देवता का प्रत्यक्ष स्वरूप बन जाता है। किसी पत्थर को जब प्राण प्रतिष्ठित कर मन्दिर में स्थापित किया जाता है तो वह प्रत्यक्ष रूप से लोगों की मनोकामना पूर्ण करता है, क्योंकि प्राण प्रतिष्ठा द्वारा उसके अन्दर देवी-देवता की स्थापना की जाती है, बिना प्राण प्रतिष्ठा के वह केवल एक पत्थर है। महाभारत में एकलव्य का नाम कौन नहीं जानता, उसने अपने गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति बना उसे प्रतिष्ठित किया और उसके समक्ष ही धनुर्विद्या का अभ्यास किया और गुरु कृपा से वह ऐसा धनुर्धर बना कि गुरु द्रोणाचार्य को अर्जुन को विजय श्री दिलाने के लिये उससे गुरु दक्षिणा मांगनी पड़ी, उसने प्रत्यक्ष रूप से कभी गुरु से विद्या नहीं सीखी, उसने तो गुरु की प्रतिष्ठित प्रतिमा को आधार बनाकर ही ज्ञान प्राप्त किया।

 

अतः यंत्र, प्रतिमा में सम्बन्धित देवता का अंश का स्थापन ही प्राण प्रतिष्ठा है। प्राण प्रतिष्ठा केवल मंत्र उच्चारण और केवल कर्मकाण्ड से ही नहीं हेाती अधिकतर लोग शास्त्रोचित विधि से कर्मकाण्ड द्वारा ही प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न करते हैं किन्तु सद्गुरु स्पर्श द्वारा, दृष्टि द्वारा अनेक प्रकार से अपने प्राणों की ऊर्जा से उस पूजा सामग्री को चैतन्य करते हैं। जब सद्गुरु अपने तपस्यांश से यंत्र, माला को ऊर्जावान करते हैं तो वह भी प्राण प्रतिष्ठा कहलाती है और जब किसी व्यक्ति विशेष में उस ऊर्जा का स्थापन किया जाता है तो वह शक्तिपात कहलाता है।

 

मैं पूज्य गुरुदेव की सेवा में हूं कई साधक जब मेरे से मिलते हैं तो प्रश्‍न करते हैं कि हमने कोई सामग्री दो वर्ष पूर्व ली थी किन्तु उसका उपयोग नहीं कर पाये, तो क्या उसे अभी भी उपयोग में लाया जा सकता है। तो ऐसे साधकों से मेरा कहना है कि जिस प्रकार हर व्यक्ति की आयु निश्‍चित है, किसी की 60 अथवा 70 या 80 वर्ष, उसी प्रकार हर पूजा सामग्री की चैतन्यता की भी एक सीमा अवधि है। उसके बाद उसे विसर्जित अथवा जल में प्रवाहित करना ही पड़ता है। दूसरे वह सामग्री जिस स्थान पर रखी हुई है उस जगह का भूमि दोष भी उस सामग्री को प्रभावित करता है। अतः साधना सामग्री को बहुत समय तक ऐसे ही अपने पास पड़ा नहीं रहने दें। गुरुदेव से साधना सामग्री प्राप्त करते ही उचित समय पर साधना सम्पन्न कर लेनी चाहिये।

 

इसी कारण जब किसी विशेष दोष निवारण की कोई साधना सम्पन्न की जाती है, तो उसके बाद साधना सामग्री जल प्रवाहित की जानी चाहिए। कुछ दिन पूर्व मेरे पास एक गुरु भाई सुरेश का फोन आया उन्होंने बताया की जोधपुर कार्यालय से उन्होंने पापांकुशा साधना सामग्री का आर्डर दिया था और किसी कारणवश उन्हें साधना दिवस पर सामग्री प्राप्त नहीं हो पाई। उन्होंने अपनी बातचीत में बताया कि उन्हें इस साधना को सम्पन्न करने की तीव्र इच्छा भी है।

 

उनका प्रश्‍न था कि क्या वो बिना साधना सामग्री के भी साधना सम्पन्न कर सकते हैं क्या? ऐसे साधकों को मेरा सीधा आग्रह है कि – प्राण प्रतिष्ठित सामग्री की व्यवस्था कर साधना सम्पन्न करनी चाहिये। क्योंकि जिस प्रकार प्राण विहीन शरीर को ज्यादा देर घर में नहीं रखा जाता उसी प्रकार बिना प्राण प्रतिष्ठा की सामग्री के बिना कोई साधना सम्पन्न नहीं की जाती और जब चैतन्य मंत्रों से आपूरित पूजन सामग्री का प्रयोग किया जाता है तो साधक को निश्‍चित सफलता प्राप्त होती है क्योंकि उसके बाद वह सामग्री न होकर दिव्य विग्रह बन जाता है क्योंकि उसमें देवी-देवताओं का निवास होता है और जिन पत्थरों पर भगवान का नाम लिखने से वह पानी में तैर जाते है तो यह सामग्री तो साक्षात् उन्हीं का स्वरूप बन जाती है।

 

जब भी साधक को साधना करने की प्रबल इच्छा हो और उस समय उसके पास साधना सामग्री उपलब्ध न हो तो वो उपयुक्त मुहूर्त में साधना सम्पन्न करने का संकल्प अवश्य कर लें तथा जब भी कार्यालय से साधना सामग्री प्राप्त हो तो कार्यालय निर्देशानुसार साधना सम्पन्न करें।

Necessity of Sadhana Materials

Why enlivenment of Sadhana Materials is  Required

Why Prana Pratishtha of Sadhana Material is Needed

Sadhana Materials

Your Queries

Answered by SadGuru

 


The path to achievement of success in Sadhanas is a highly mysterious path. A Sadhak should have unflinching strong faith on his Guru and Mantra during the Sadhana practice. A basic inner aspect-foundation of the Sadhana practice is that the  Sadhak always receives the results of Sadhana according to the  depth of faith and trust. The materials used in the Sadhana constitute the second, most significant external aspects of Sadhana practice.

An army cannot win a war in absence of modern-intense weapons, even though it may have brave soldiers and efficient leadership. Similarly a person will not be able to achieve success in Sadhanas in absence of proper energized-sanctified materials, even though he might be a highly distinguished scholar of Mantras.

It is important to energize, sanctify and enliven the Sadhana articles ( also known as Prana-Pratishtha) before initiating the Sadhana. Without enlivenment, the Sadhana articles are absolutely useless, just like a body without any life. A body starts emitting bad odor in absence of any life. Similarly a Sadhana material is like a piece of stone, in absence of proper Mantra energization, sanctifcation and enlivenment processes.

 

|| Om Aam Hreem Kroum Yam Ram Lam Vam Sham Ksham Sam Ham SaH So~Ham Praan Iha PraanaH ||

|| Om Aam Hreem Kroum Yam Ram Lam Vam Sham Ksham Sam Ham SaH So~Ham Jeeva Iha SthitaH ||

|| Om Aam Hreem Kroum Yam Ram Lam Vam Sham Ksham Sam Ham SaH So~Ham Sarvendriyaani Iha SthitaH ||

 

The basic reason of chanting the above Puranaa Mantras in front of the Sadhana articles is to energize-enliven the Yantra with the conscious-soul-praana–energy of the related Devataa (God). The Yantra becomes a living entity full of life spirit, just like us.

And the effectuation (praana-pratishtha) of the related deity within the Yantra coverts it into a personified direct form of that God. When an enlivened-energized (praana-pratishthit) stone is installed in a temple, it fulfills the wishes of the worshippers, because the deity-form of God has been fully personified within it  through the enliven-energization (praana-pratishthit) process. It was just an ordinary stone before the enliven-energization (praana-pratishthit) process. Everyone  knows the Mahabharata story of Eklavya. He enlivened-energized (praana-prashthit) an idol of his Guru Dronacharya and practiced archery in front of the idol. He turned into such a distinguished archer with  Guru’s grace, that  Guru Dronacharya  had to demand his thumb as Guru Dakshina, to ensure Arjuna’s position as the best archer. He did not learn archery directly from the Guru, he obtained this knowledge and proficiency through the personified enlivened-energized (praana-pratishthit) icon of his Guru.

Thus the establishment of a tiny portion of the deity within the statue or Yantra is the enliven-energization (praana-pratishthit) process. This enliven-energization process can be done through many methods. A common process is through Mantra chanting and Karmakaanda rituals, and many people use this process. SadGurudev enlivens-energizes the Sadhana articles through His touch, sight and multiple other methods. The sanctification of a rosary or Yantra by SadGuru through His penance is also a form of the enliven-energization (praana-pratishthit) process. Transfer of such penance energy into a person is termed as Shaktipaat.

I have been in the service of Pujya Gurudev for many years. A common question of many sadhaks is whether they can use an unused  Sadhana article which they had purchased two-three years ago. My answer is that the consciousness of Sadhana articles has a definite life-span, just like humans have a life span of 60-70-80 years. It should be immersed in flowing water stream after that time period. Secondly the  Sadhana article also gets negatively impacted by the flaws of the place where it  has been stored. So you should not retain Sadhana articles with you for a long time. The Sadhana should be performed immediately at auspicious time after receiving the articles from Gurudev.

Therefore, the Sadhana articles of any specific Sadhana performed to eliminate any flaws-deficiencies, should be immediately immersed in a flowing stream of water. I received a phone-call from a Guru-brother named  Suresh few days ago, who had ordered Paapaakunsha Sadhana materials from Jodhpur Gurudham, but could not receive the relevant articles in time. He had a strong desire to accomplish this Sadhana, and wanted to know if he can perform it in absence of Sadhana articles.

My direct answer to all such Sadhaks is that the Sadhana should be performed only with the enlivened-energized (praana-pratishthit) Sadhana materials. A lifeless human body is not kept within the house. Similarly Sadhana cannot be performed in absence of enlivened-energized Sadhana articles. The Sadhak definitely achieves success after performing the Sadhana with properly enlivened-energized and sanctified Sadhana articles, because these processes bestow divinity within the articles. The divine energy-power of the Gods-Goddesses get personified-embodied within the article. Even the stones engraved with names of the Gods do not sink and float in the water. These Sadhana articles become a direct personification of the deity.

Whenever the Sadhak develops  a strong desire to perform a specific Sadhana, and if the relevant Sadhana articles are not  available to him at that time, then he should take a resolve-vow to accomplish that Sadhana in an  appropriate muhurta. Thereafter he should perform the Sadhana according to the instructions from Gurudham after receipt of the Sadhana articles.

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