Sadhak Experiences

साधक साक्षी

 

गुरु कृपा बरसती है
गुरु ही तो बाधाएं हरण करते है
गुरु कृपा ही केवलम्… गुरु कृपा ही केवलम्…

 

 

बदल गया जीवन

 

जय गुरुदेव,

 

यूं तो मैं किसी पहचान का मोहताज नहीं क्योंकि ‘निखिल शिष्य’ होना ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है, पहचान है। पर जीवन के भौतिक पक्ष से देखा जाये तो मैं अमरावती (महाराष्ट्र) में नरसम्मा कॉलेज में केमिस्ट्री का प्रोफेसर हूं। नैनोटेक्नोलॉजी में मेरा रिसर्च है। देश-विदेश में लेक्चर दे चुका हूं। पांच विद्यार्थी मेरे मार्गदर्शन में पी.एच.डी. कर रहे है। खैर …..

 

29 दिसम्बर 2005 का वो दिन मुझे आज भी बखुबी याद है। कहते है कि जीवन की वो ही घटनायें हमें याद रह जाती है जिसने आपके अंतरमन को झिंझोड़कर रख दिया हो। 29 दिसम्बर का वो दिन भी इन्हीं पलों में एक था। पिछले कुछ महिनों से चली आ रही मानसिक तथा आर्थिक परेशानियों से जीवन कठिन होने लगा था। नतीजन 29 दिसम्बर 2005 को मेरे शरीर के बायें हिस्से में पैरॉलेसीस हो गया और मैं कॉलेज कैम्पस में ही गिर पड़ा। बस वो दिन था जहां से जिंदगी का अंत साफ नजर आने लगा था। बच्ची और पत्नी की चिंता सताने लगी। बार-बार एक ही सवाल मन में आता था कि मेरे बाद इन सबका क्या होगा? मेरी बच्ची का क्या होगा? मेरा उपचार तो शुरु हुआ परन्तु मैं डिप्रेशन के अंधकार में धीरे-धीरे खोने लगा था। दोस्तों ने और कुछ अपनों ने किनारा करना शुरु कर दिया था। वो कहते है ना लोग यहां उगते सूरज को नमन करते है डूबते को नहीं।

 

मैं जैसे-तैसे अपने आपको संभालता हुआ, हिम्मत देता हुआ तीन महिनों में सहारा लेकर चलने के काबिल हुआ। मार्च 2006 में जब हॉस्पिटल चेकअप के लिए जा रहा था तो सिटी बस का धक्का लगने से मेरा दांया पांव फे्रक्चर हो गया। मुश्किलें जब आती है तो सारी दिशाओं से आती है, इसका मैं साक्षी था। बड़ी मुश्किल से बिस्तर से उठकर जैसे-तैसे चलने लगा था और वापिस डेढ़ महिने का प्लास्टर हो गया और मैं फिर बिस्तर पर लौट आया। अपने आप पर तरस आने लगा था। एक कमरे में अपने आपको बंद कर रखा था। परिवार में भी किसी से मिलता न था। एक-एक पल गिन-गिनकर कटने लगा।

 

इसी दौरान मेरे बचपन का एक मित्र मुझे मिलने आया। बहुत समझाया उसने, ये करना चाहिए वो नहीं करना चाहिए। उसकी एक सलाह मुझे बहुत पसंद आयी वो थी कुछ पढ़ना शुरु कर मन लगा रहेगा। बुरे विचार मन में नही आयेंगे। उसके जाते ही मैंने पत्नी से कहकर सारी पुरानी किताबें निकलवाई। इन किताबों के बीच मुझे ‘मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान’ का अक्टूबर 1997 का अंक हाथ लगा, जो मैंने कभी सफर में खरीदा था। 8 साल बाद फिर वहीं पत्रिका को मैं बड़े गौर से पढ़ने लगा। इस पत्रिका में सद्गुरुदेव के प्रवचन और शिष्य धर्म से मैं बहुत प्रभावित हुआ। यूं मानों एक नई उम्मीद जागी। पत्रिका में छपे लेख को मैंने बार-बार पढ़ा और पत्रिका को सदा सिरहाने रखने लगा।

 

4 अप्रैल 2006 की सुबह पहली बार ॠषि स्वरूप में सद्गुरुदेव ने सपने में दर्शन दिये। पहले तो मैंने सोचा पत्रिका के जो लेख मैंने पढ़े उसके असर की वजह से ये हो रहा है। पर ये तो सिलसिला ही बन गया। बात यही नहीं रुकी, यही घटनायें मेरे पत्नी तथा बच्ची के साथ होने लगी। अब ये मामला मुझे महसूस हुआ और मैंने उसे गंभीरता से लिया। ॠषि स्वरूप व्यक्तित्व को जानने की तीव्रता मन को सताने लगी और एक दिन मैंने पत्रिका में दिये फोन नम्बर पर जोधपुर ऑफिस फोन लगाकर इन तेजस्वी व्यक्तित्व के बारे में जानने का प्रयास किया। फोन पर बताया गया कि जून महिने में मनाली में शिविर का आयोजन किया है, वहां आईये वहीं आपको आपके सारे सवालों के जवाब मिल जायेंगे।

 

बिना सोचे मैंने मनाली जाने का निश्‍चय किया। इन दिनों मेरा प्लास्टर तो खुल चुका था पर सहारा लेकर चलना पड़ता था। ताज्जुब (आश्‍चर्य) तो तब हुआ जब मैंने मनाली जाने की बात कि तो घर पर किसी ने रोका नहीं, न मेरा विरोध किया। चार-पांच दिन बाद जाना था और मुझे रिजर्वेशन भी मिल गया। जैसे सारी सृष्टि मुझे वहां पहुंचाने में मदद कर रही थी। मैं मनाली शिविर में पहुंचा, सद्गुरुदेव के बारे में वहां जाकर पता चला कि सद्गुरुदेवजी का तो निर्वाण हो चुका है। मैं नर्वस भी हुआ और ये सुनकर लगा मेरी खोज अधूरी रह गई। मैंने वापस जाने का मन बना लिया था।

 

वहां मेरा परिचय एक शर्मा नामक मंडी निवासी हम उम्र व्यक्ति से हुआ। जिसने मुझे बताया की निर्वाण के बाद सद्गुरुदेवजी कण-कण में बसने लगे। तेरा यहां आना सही है, तुम आये नहीं तुझे बुलाया गया है। फिर भी तेरा मन ना माने तो गुरुजी से मिलकर, वापस चले जाना। वो मुझे लेकर गुरुजी के दर्शनार्थ लाईन में ले गया। जब दर्शन के लिए मेरा नंबर आया, तो आंखों से यकायक आंसू बहने लगे। शायद कई जन्मों का कुंठीत संचित सब आंखों बहने लगा। तभी गुरुजी बोले, सब लोग गुरु दीक्षा ले लो। मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पाया।

 

कुछ कहने को बचा ही नहीं था। सारी दौड़, सारे सवाल, सारी खोज पूर्ण हो चुकी थी। जीवन के सबसे स्वर्णिम अध्याय की शुरुआत होने जा रही थी। दीक्षा लेने के लिए गुरु चादर ओढ़ें आंखें मुंदकर बैठा तो सद्गुरुदेव को अपने आस-पास पाया। उस अनुभव को शब्दों को बयान करना मेरे बस की बात नही।

 

दीक्षा संस्कार होते ही मैं ‘निखिल शिष्य’ हो गया, ‘निखिल गोत्रीय’ हो गया। इससे बड़ा सौभाग्य किसी मनुष्य का क्या हो सकता है कि उसे गुरु प्राप्त हो गये। अब तक तो न था पर अब ब्रह्माण्ड में मेरा विशेष अस्तित्व निर्मित हो गया था।

 

मुझे याद है इसी बीच शास्त्री जी ने धूमावती मंत्र का सस्वर जप करवाया था। हजारों साधकों के मुख से उच्चारित मंत्र स्वर जब मनाली के पवित्र वातावरण में फैल रहे थे तो समस्त ब्रह्माण्ड जैसे साधना में लीन हो गया था। 10 मिनट के उस मंत्र जप के बाद मानों मुझमें दुनिया जीतने का हौसला आ गया था। ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का तात्पर्य अनुभव होने लगा।

 

मनाली शिविर से दीक्षित होकर लौटने के चौथे दिन मैं ग्राउण्ड पर क्रिकेट खेल रहा था। मेरा डॉक्टर, मेरे प्रोफेसर दोस्त आज तक ये सोच के हैरान है कि मनाली में उन दो दिनों में मेरे साथ ऐसा क्या घटित हुआ, जिससे किसी का सहारा लेकर चलने वाला व्यक्ति अपने बलबूत्ते पर चलने भी लगा तथा सामान्य खिलाड़ी की तरह खेलने भी लगा। सच तो ये है कि जो भौतिक विज्ञान को हम जानते है वह उस अध्यात्मिक विज्ञान का जो हमें सद्गुरुदेव ने दिया है उसका एक अंश भी नहीं, एक कतरा भी नहीं और वो सभी गुरु भाई परम सौभाग्यशाली है जिनका शिष्यत्व निखिलेश्‍वरानंदजी के प्रति समर्पित है। अंत में मैं गुरुदेव से यही प्रार्थना करता हूं कि सदगुरुदेवजी के सपनों को पूरा करने का सामर्थ्य सभी गुरुभाई को प्रदान करें।

 

जय गुरुदेव!
डॉ. महेन्द्र सिंह पंवार
अमरावती

 


मौत भी हार गई

 

जीवन के संघर्ष में मेरा भी एक संघर्ष का अनुभव है इस संघर्ष की स्थिति में पूज्य गुरुदेव जी पल-पल मेरे साथ खड़े रहे और मुझे इस कठिन परिस्थिति से निकाल कर जीवन दान दिया, और आज जो मेरी श्‍वास चल रही है तो वह गुरुदेव जी की कृपा और उनके उस शक्तिपात के माध्यम से है। जो उन्होेंने मुझे अपने आशीर्वाद के माध्यम से दिया।

 

पूज्य गुरुदेव जी की कृपा को मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता, क्योंकि पूज्य गुरुदेव ने जो कृपा मुझ पर की है। उसे मैं अपने भावों के साथ व्यक्त कर रहा हूं।

 

क्योंकि मेरी यह घटना ऐसे लोगों के लिए प्रेरणाप्रद है, जो पूजन मंत्र-जप आदि नही कर सकते, और यदि गुरुदेव चाहे तो अपनी शक्ति के माध्यम से शिष्य के समस्त दुख कष्टों, बीमारी का हरण कर शिष्य को जीवन पथ पर गतिशील करते है।

 

मैं पूज्य गुरुदेव जी से उस समय मिला, जब चारों ओर से असफलता और निराशा से में घिर चुका था और मेरी बीमारी के लिए बड़े-बड़े अस्पताल के बड़े-बड़े डॉक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर दिये थे। तब गुरुदेव जी मेरे जीवन में महामृत्युन्जय स्वरूप में आये, मेरी दाहिंनी किडनी में ट्यूमर हो गया था जिसका पता मुझे 2011 में लगा, और इसके इलाज हेतु मैंने आयुर्वेद, होम्योपैथी, सभी विधियों से प्रयास किए, किन्तु पूर्ण समाधान प्राप्त नही हुआ, जिसने जहां जो इलाज बताया मैंने वह सब किया, किंतु मेरी बीमारी पर उसका कोई असर नहीं हुआ, और मेरी बीमारी बढ़ती जा रही थी, और शरीर के कष्ट के साथ-साथ मेरा मानसिक मनोबल भी कमजोर पड़ रहा था। तब मैंने इस समस्या के लिए परम पूज्य गुरुदेव से भेंट की, और अपनी समस्या विस्तार पूर्वक गुरुदेव जी को बतायी और पूज्य गुरुदेव जी को यह भी बताया कि मैंने 26 मई 2015 को वेदांता अस्पताल गुड़गांव में ऑपरेशन कराया जो असफल रहां और उसके बाद स्थिति बिगड़ गई, और युरिन के साथ ब्लड भी आने लगा और डॉक्टरों का स्पष्ट कहना था, कि दूसरा ऑपरेशन करने में जान का खतरा है और बीमारी घातक स्तर तक पहुंच चुकी थी और पूर्व में किये ऑपरेशन करने पर मेरी समस्या जस की तस थी। जिस कारण मैं दोबारा ऑपरेशन नही करवाना चाहता था, पूज्य गुरुदेवजी ने मेरी समस्या को विस्तारपूर्वक सुना और मुझे महामृत्युन्जय अमृत आरोग्य दीक्षा तीन चरणों में प्रदान की, और विशेष पूजन और मंत्र जप ना देकर इतना कहा कि हर महिने मिलते रहना, इसके बाद में जून 2015 से हर दो महिने बाद पूज्य गुरुदेवजी से दिल्ली, आरोग्यधाम में मिलता रहा, और हर बार जब मैं पूज्य गुरुदेव जी से मिला उन्होंने मुझे मानसिक बल प्रदान कर अपना आशीर्वाद प्रदान किया, उस समय मैं नही समझ पाया था कि हर महिने गुरुदेव जी ने मिलने के लिए क्यों बोला, किंतु मुझे बाद में समझ आया कि जब-जब मैंने पूज्य गुरुदेव जी के दर्शन किये मैंने अपने अंदर एक नवीन शक्ति का संचार अनुभव किया और गुरुदेव जी के आशीर्वाद से मैंने एम्स में जो जांच कराई उससे यह सिद्ध हुआ कि मुझे कैंसर नही है और डॉक्टरों ने जो रेडियोथैरेपी/कीमोथैरेपी केे लिये कहा था आज उसकी भी जरूरत नही पड़ी, यह चमत्कार मैंने साक्षात् अनुभव किया। अब इसे मैं चमत्कार कहुं, गुरुदेव का आशीर्वाद कहुं, कुछ भी कहुं किंतु यह पूर्णतः सत्य है कि जिस बीमारी से में चार वर्ष से पीड़ित था, उसे पूज्य गुरुदेव जी ने समाप्त कर अपनी कृपा कर मुझे नवीन जीवन प्रदान किया।

 

जय गुरुदेव!
विकास वर्मा
कापनुर

प्रत्येक साधक का अनुभव निराला होता है, शक्तिपात हो या साधना गुरु तो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप में कृपा करते ही हैं। गुरु कहते हैं तुम अपने-प्राणों के तार गुरु से जोड़ने का प्रयत्न करते रहो। कई-कई बार प्रयत्न करने पर प्राण गुरु से अवश्य जुड़ जाएंगे, प्रयत्न हमें करना है। सद्गुरु की कृपा प्राप्त करने हेतु स्वयं को ‘पात्र’ बनाना है। संसार के सारे दुःख गुरु कृपा से ही समाप्त हो सकते है, गुरु से निरन्तर जुड़े रहना, निरन्तर शक्तिपात प्राप्त करना ही शिष्य के जीवन का लक्ष्य होना चाहिये। गुरु कृपा कब बरसती है, कैसे बरसती है, इसे हम कैसे जाने? पर यह निश्‍चित है कि गुरु कृपा अवश्य ही प्राप्त होती है, हम अपने पथ से विचलित न हो, निरन्तर गुरु सेवा में संलग्न रहे।

We have witnessed Divinity

Sadhak Experiences

Showering of  Guru’s grace

Guru is the remover of obstacles

Guru Kripa Hi Kevalam… Guru Kripa Hi Kevalam…

Just the Guru’s Grace… Just the Guru’s Grace…


 

Life Transformed

Jai Gurudev,

Even though I do not need any introduction because “Nikhil Disciple” is my greatest accomplishment, and identity. But from the worldly perspective, I am a Chemistry Professor in Narsamma College in Amravati (Maharastra). My area of Research is Nanotechnology. I am a regular speaker at lectures both domestic and overseas. Five students are doing PhD under my guidance. Well…

I still vividly remember that day of December 29, 2005. They say that you always remember those events of your life which impact your innermost soul. The day of 29 December was also one of those moments.  My life had become difficult due to mental and economic issues for the last few months. As a result, on December 29, 2005; the left side of my body suffered a paralytic stroke and I fell down in the college campus. I could visualize the end of my life on that day. I became anxious about my daughter and wife. The only question repeatedly flashing in my mind was what will happen to them after I am gone? What will happen to my daughter? My treatment started, but I was slowly losing myself in the darkness of depression. Friends and loved ones had started edging out. It is correctly stated that people here only salute the rising sun and ignore the setting sun.

I somehow handled myself and got courage to start to walk again with assistance in three months. In March 2006, when I was going to the hospital for a checkup, then a jolt in the city bus fractured my right foot. When trouble arrives, it comes from all directions; I was certainly a witness to this fact.  I had started to somehow leave the bed and started to walk with great difficulty, and now again after 1.5 months my leg got plastered confining me to bed. I started to wallow in self-pity.  I locked myself in a room. I stopped meeting family members too. It was difficult to pass every single moment.

Meanwhile, one of my childhood friends came to visit me. He provided many advises on what to do and what not to do. I liked one of his advice to start reading to keep the mind busy. This will stop bad thoughts from entering the mind. As soon as he left, I asked my wife to take out all old books. I chanced upon the “Mantra Tantra Yantra Vigyan” magazine October 1997 issue which I had bought during some journey. I started to read the same magazine with great concentration after 8 years. I was very impressed with SadGurudev’s discourse and guidance to disciples. A new hope surged in my mind. I frequently re-read the magazine articles and kept the magazine at my bedside.

SadGurudev appeared to me in my dream in ascetic form on the morning of April 4, 2006 for the first time. At first I thought that this was due to influence of the magazine articles which I had read. But this became a regular occurrence. It didn’t stop here, similar incidents started with my wife and child. Now I decided to take this matter seriously. My mind grew impatient to understand more about this ascetic personality and one day I phoned Jodhpur Office as per the number on the magazine to learn more about this stunning personality. I was advised on phone to attend an upcoming Sadhana camp in Manali in June, and that I will get the answers to all of my queries there.

Without thinking much, I decided to go to Manali. These days, my plaster had been cut-out, but I could walk only with assistance. The bigger surprise to me was that no-one in the family stopped or opposed my trip to Manali. I was due to leave in 4-5 days, and I also easily got the train reservation. It was like the entire Providence was assisting me to go there. I reached Manali camp to find about SadGurudev and came to know that SadGurudev has now attained Nirvana. I got nervous and it felt that my search was fruitless. I got determined to return back.

I met a person of my age named Sharma from Mandi. He told me that SadGurudev now exists in each particle after His nirvana. You took a correct decision to arrive here, you did not come on your own, you have been sent for. Even then if your heart wishes otherwise, then return after meeting Guruji. He took me to the queue for meeting Guruji. When my turn came, then suddenly tears started to flow from my eyes. Maybe the karmas accumulated over several lifetimes started flowing together. Then Guruji advised everybody to obtain Guru Diksha. I could not utter even a single word.

There was nothing left to say. All the rush, all the questions, the entire search got completed. This was the start of a new glorious chapter of life. When I sat down wrapped in Guru Shawl and closed my eyes, I sensed SadGurudev around me. It is beyond my ability to write down that experience in words.

After the “Diksha Sanskar”, I turned into “Nikhil Shishya” and “Nikhil Gotriya”. What can be greater fortune than obtaining a Guru. From being nobody, I now had a particular existence in the universe.

I remember that Shashtriji got everyone to recite and chant Dhoomavati Mantra. When thousands of Sadhaks started pronouncing the mantra in the holy atmosphere of Manali, then it seemed that the entire universe got absorbed in Sadhana meditation. I got inspired to conquer the world after 10 minutes of mantra chanting. I started to realize the actual implication of “Aham Brahmasmi”.

Four days after returning as a Dikshit from Manali, I was playing cricket on the ground. My doctor, my professor friends still cannot fathom what happened to me in those two days in Manali, that a person who couldn’t walk without assistance, started to walk on his own and also started to play like a normal player. The truth is that the physical science which we know, isn’t even a single iota or a single fraction of that spiritual science which SadGurudev has gifted to us, and all those fellow Guru disciples are extremely fortunate whose discipleship is offered to Nikhileshwaranadji. Finally, I pray to Gurudev to grant ability to all fellow Guru disciples to fulfill the dreams of SadGurudevji.

Jai Gurudev!

Dr. Mahendra Singh Panwar

Amravati


 

Death also got Defeated

I also have an experience of a struggle during the multiple life struggles. Pujya Gurudevji stayed closely with me at each moment during that struggle and granted me life through the tough circumstances, and each one of my breathe is only through His grace and Shaktipaat, which He imparted through His blessings.

I cannot describe Pujya Gurudevji’s grace in words. I can only express my feelings and emotions emanating through His blessings.

Because my this incident can inspire even those people who cannot perform worship, mantra-chanting  etc., and  if Gurudev wishes, He can wipe out all the suffering, misery and ailments through His power to guide the disciple on the path of life.

I met Pujya Gurudevji when I was completely surrounded on all sides within a web of failure and disappointment, and even the prominent doctors of large hospitals could not find a cure for my illness. Then Gurudevji arrived in my life in Mahamrityunjay form, a tumor had grown in my right kidney, and I came to know about it in 2011, and I tried for its treatment through all Ayurveda, Homeopathy methods, but this could not be successfully healed, I tried whatever anyone recommended, but this had no impact on my affliction, and my sickness was growing, and my mental morale was decreasing along with the physical pain. Then I met the Holiness Param Pujya Gurudevji and explained my problem in detail, and I also told Pujya Gurudevji that I got a surgical operation done on May 26, 2015 in Vedanta Hospital in Gurgaon which was unsuccessful and that the situation had grown worse, and blood had started to flow with urine; and the doctors had clearly stated that it was fatally risky to perform a repeat operation, and that my illness had reached serious complex stage, and the original problem was still intact in spite of the previous operation. So I did not want to be operated again, Pujya Gurudevji listened to my problem in full detail, and granted me Mahamrityunjaye Amrit Arogya Diksha in three stages, and without recommending any special worship of mantra-chant, just asked me to meet Him every month; after this from June 2015 I met Pujya Gurudev every two months in Arogyadham Delhi, and whenever I met Pujya Gurudevji, He granted me mental strength through His blessings; I could not comprehend at that time why He asked me to meet Him every month; but I comprehended later that whenever I met Pujya Gurudevji, I felt a transfer of new energy within myself, and with Gurudevji’s blessings when I got my next checkup done at AIIMS, it showed that I do not have any cancer and the Radiotherapy/Chemotherapy which the doctors had previously recommended is no longer required, I have myself experienced this miracle. Now I may term it as a miracle, or call it a fruit of Gurudev’s blessings; but the salient fact is that the illness which I was suffering from for last four years, Pujya Gurudevji terminated it with His grace and gifted me a new life.

Jai Gurudev!

Vikas Verma

Kanpur


 

Each Sadhak’s experience is unique, Shaktipaat or Sadhana, Guru always extends His grace either in visible or concealed form.  Guru advises to keep endeavoring to link your life-soul wires to Guru. After multiple trials, our soul will certainly connect to Guru, we have to keep trying. We have to make ourselves “eligible” to obtain the grace of SadGuru. All the pains of this world can surely be eliminated through Guru’s grace, the mission of a disciple’s life should be to stay continuously connected with Guru, and to regularly obtain Shaktipaat. How do we know when the Guru’s grace will shower, how will it shower? But this is certain that the Guru’s grace surely showers, we should not deviate from our path, and should be continuously involved in the Guru service.

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