SadGurudevs Blessing to Disciple – Samratabhishek Diksha

24-25 दिसम्बर 2016
आरोग्यधाम, दिल्ली
उत्तरोत्तर प्रगति यात्रा
राज्याभिषेक से सम्राटाभिषेक
सद्गुरु द्वारा शिष्य को वरदान
सम्राटाभिषेक महादीक्षा

 

जब सद्गुरु शिष्य को अपने पास बुलाकर उसके मस्तक पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं तो उसके मन मस्तिष्क में परम शांति का भाव व्याप्त हो जाता है, उसके लिये जीवन का प्रत्येक क्षण मधुर-मधुर और नवीन होता है और उसे एक नवीन चेतना प्राप्त हो जाती है।

 

फिर जब सद्गुरु शिष्य को अपने पास बुलाकर उसके नेत्रों में दृष्टिपात कर शक्तिपात की क्रिया करते हैं तो एक ही क्षण में शिष्य आन्तरिक रूप से रूपान्तरित हो जाता है, शिष्य के मन में भावों का झरना बहने लगता है, भौतिक जीवन में उसके कार्य तीव्र गति से सम्पादित होने लगते हैं, आध्यात्मिक रूप से शिष्य ज्ञान भाव से युक्त हो जाता है

 

सम्राटाभिषेक दीक्षा तो भौतिक और आध्यात्मिक जीवन का संगम है, जहां ज्ञान की गंगा है, प्रेम की यमुना है, चेतना की सरस्वती है।

 

 

सद्गुरु वह दिव्य आत्मा हैं, दिव्य रूप हैं जिनमें परमात्मा की अभिव्यक्ति हो गई है। गुरु में ही वह सामर्थ्य होता है कि शिष्य के मन में, आत्मा में आध्यात्मिक शक्ति का विकास कर सकें। उसे यह एहसास दिला सकें कि तेरा जन्म और तेरा संसार में आना और जीना विशेष कार्य के लिये हुआ है। सद्गुरु ही शिष्य को उचित भाव शक्ति प्रदान कर सकते हैं। ज्ञान तो विभिन्न पुस्तकों के माध्यम से भी प्राप्त किया जा सकता है लेकिन ऐसा ज्ञान केवल जानकारियों का संग्रह मात्र ही होता है। गुरु वह दिव्य शक्ति है जो शिष्य के हृदय में उत्कण्ठा और आनन्द को स्थापित करते हैं।

 

यह तो धु्रव सत्य है कि जीवन में उन्नति के लिये उस विषय विशेष में रुचि होना आवश्यक है। कोई भी क्षेत्र हो यदि आपकी अभिरुचि नहीं है तो उस क्षेत्र में आप बिल्कुल भी आगे नहीं बढ़ सकते हैं। कोई भी आपके ऊपर किसी भी क्रिया को आरोपित नहीं कर सकता है। जब गुरु को समर्पित शिष्य, विश्‍वास युक्त शिष्य प्राप्त होता है तो एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक शक्ति का उदय होता है। जैसे अच्छी जमीन में यदि अच्छा बीज बोया जाए तो अवश्य ही अच्छी फसल पैदा होती है। इसी प्रकार शिष्य को सद्गुरु प्राप्त हो जाएं जो अपने लक्ष्य पर पहुंच गये हैं, जिन्होंने स्वयं सत्य का चिन्तन किया है, सत्य का अनुभव किया है। वे व्याकुल शिष्य के लिये पूर्ण सहायक बनकर यर्थाथ रूप में उसे ज्ञान मार्ग पर ले जाकर उसकी कमियों को दूर कर, उसे उन्नति के विराट शिखर पर स्थापित करते हैं। गुरु शिष्य को रंक से राजा बनाने की क्रिया नहीं करते हैं। गुरु तो लघु से विराट की क्रिया करते हैं। शिष्य को केवल समर्थ ही नहीं, अपने मन का सम्राट बनाने की क्रिया करते हैं, जिससे वह निश्‍चिन्त, निर्भय और निर्द्वंद्व हो सके। द्वंद्व से गिरा हुआ शिष्य अपने स्थान पर ही ठहर जाता है और जो द्वंद्व से रहित होता है वह गुरु कृपा का अधिकारी बन जाता है। तब गुरु अपनी कृपा कटाक्ष से अपने आशीर्वाद से शिष्य को निरन्तर और निरन्तर ऊपर उठाते रहते हैं।

 

सद्गुरु ज्योति से सम्राटाभिषेक

 

जिस प्रकार अग्नि प्रज्वलित करने के लिये अग्नि की ही आवश्यकता होती है अन्य किसी माध्यम से अग्नि प्रज्वलित नहीं हो सकती है। उसी प्रकार सद्गुरु के भीतर अध्यात्म और ज्ञान की विशेष अग्नि है और वह अपनी अग्नि शिष्य को प्रदान कर शिष्य के भीतर अध्यात्म और ज्ञान प्रज्वलित करते हैं। यही क्रिया महादीक्षा अभिषेक क्रिया राज्याभिषेक, सम्राटाभिषेक कही जाती है।

 

सद्गुरु ही शिष्य को सीमाओं से परे जाने की क्षमता प्रदान कर सकते हैं लेकिन यह क्रिया योग्य शिष्य को ही प्राप्त हो सकती है। योग्य गुरु वह है जिसने सत्य को अपने त्याग और तपस्या से प्राप्त किया है। अपनी इच्छाओं को वशीभूत कर लिया है और जिनके व्यवहार में सत्य भाव होता है। ऐसे सद्गुरु शिष्य को आत्मज्ञान प्रदान करने की क्षमता रखते हैं, साथ ही शिष्य के मार्ग में आने वाली कठिन परिस्थितियों को सहज करने की क्षमता रखते हैं और क्षमता देते हैं।

 

सद्गुरु जब योग्य शिष्य को तैयार करते हैं तो उसकी आध्यात्मिक, भौतिक यात्रा श्रेष्ठ रूप से सम्पूर्ण होने में कोई संदेह नहीं रहता है।

 

गुरु शिष्य मिलन – सम्राटाभिषेक

 

शिष्य कौन? जो जिज्ञासा से युक्त हो, किस प्रकार की जिज्ञासा उसमें होनी चाहिए। संसार के दुःखों से मुक्ति और आत्म उन्नति की भावना। जिसके अन्दर आत्म उन्नति की इच्छा नहीं होती है उसे स्वयं भगवान भी कुछ भी प्रदान नहीं कर सकते हैं। जब शिष्य के भीतर उत्कर्ष की इच्छा का उदय होता है तभी उसे गुरु मिलते हैं। जितनी प्रबल उत्कण्ठा, जितना तीव्र भाव होगा और शुद्ध इच्छा होगी तो गुरु भी श्रेष्ठतम् ही प्राप्त होते हैं।

 

‘गुरु’ भौतिक देह व आवरण में आबद्ध प्रतीत होते तेज के पुंज की एक विशिष्ट संज्ञा ही हैं, जो प्रत्येक काल में समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी चेतना से प्रकाशित कर, आत्मबल दे, उत्तरोत्तर उन्नति की ओर अग्रसर करते रहते हैं। यदि समाज में गुरु का गुरुत्व ही समाप्त हो जाए, तो मनुष्य समाज व पशु समाज में अंतर ही क्या रह जाएगा? एक-एक व्यक्ति को स्पर्श करते हुए ‘गुरु’ की भूमिका एक सुदृढ़, सुसंस्कृत और आनंद की अनुभूति में निमग्न समाज बनाने की होती है। गुरुत्व प्राप्त व्यक्तियों ने सदा सर्वदा से समाज में यही क्रिया की है।

 

इसी ‘क्रिया’ को आध्यात्मिक जगत के पारिभाषिक पद मेें ‘दीक्षा’ कहते हैं, यद्यपि गुरु के पास ज्ञान देने के लिए तो अगणित उपाय होते हैं।

 

सद्गुरु द्वारा सम्राटाभिषेक शक्तिपात

 

सद्गुरु द्वारा शक्तिपात देने और शिष्य द्वारा शक्तिपात ग्रहण करने की क्रिया में क्या आवश्यक है, इसके लिये छः बिन्दु अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं –

 

1. ऊर्जा देने वाले सद्गुरु का परम चेतना के साथ सम्बन्ध।
2. ऊर्जा के आह्वान और हस्तानान्तरण के समय मन की स्थिति।
3. अनुकूल समय
4. ऊर्जा देने वाले सद्गुरु का ज्ञान, अनुभव और कौशल
5. शक्तिपात करने वाले सद्गुरु और शक्तिपात ग्रहण करने वाले शिष्य के मध्य सम्बन्ध।
6. स्थान, मन और कर्म के कारण सद्गुरु और शिष्य के मध्य अन्तर अर्थात् दूरी।

 

सद्गुरु तो पारमेष्ठि होते हैं, परम चेतना से युक्त होते हैं और वे पूर्ण क्षमता के साथ शिष्य में शक्ति का प्रवाह करते हैं। उस शक्ति आह्वान के समय शिष्य के मन में जो स्थिति होती है। उस स्थिति के अनुसार ही शिष्य शक्ति को प्राप्त करता है।

 

शक्तिपात हेतु और विशिष्ट शक्तिपात हेतु गुरु ही काल और समय का निर्धारण करते हैं। गुरु द्वारा जो तिथि निर्धारित की जाती है, उस तिथि को दिव्य तिथि समझकर शिष्य को शक्तिपात ग्रहण करना चाहिए। इस पूरी क्रिया में गुरु और शिष्य के सम्बन्ध का विशेष महत्व है। दोनों स्थान से दूर हो सकते हैं लेकिन मन से गुरु और शिष्य जब संयुक्त होते हैं तो शक्तिपात की क्रिया सम्पन्न होती है।

 

सामान्य दीक्षा क्रम तो गुरु दीक्षा से प्रारम्भ होता है, किन्तु जहां व्यक्ति के भौतिक जीवन को उन्नत करते हुए, उसे आध्यात्मिकता के आयामों से परिचित कराते हुए, उसे समाज के शिखर पर पहुंचाने की क्रिया सम्पन्न करनी होती है, तो फिर सद्गुरु वहां से राज्याभिषेक, सम्राटभिषेक जैसी दुर्लभ दीक्षाओं का क्रम प्रारम्भ करते हैं और इतिहास साक्षी है, कि ‘गुरु’ ने यह क्रिया एक नहीं अनेक बार सम्पन्न की है।

 

वस्तुतः ‘सम्राट’ बनते नहीं, बनाए जाते हैं। स्वयं गुरु ही उनका निर्माण करते हैं। ऐसा वे किस विराट चिंतन के वशीभूत होकर करते हैं? अथवा क्यों अपनी तपःराशि को भगवान शिव की ही भांति औदार्य से लुटाने को तत्पर हो जाते हैं? इसको समझने के लिए किसी भी व्यक्ति को स्वयं गुरु के चितंन के समकक्ष आना पड़ेगा। सद्गुरु को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता है, कि समाज उनके किस कार्य का क्या मूल्यांकन करता है क्योंकि गुरु जानते हैं कि उनकी निर्मल जलधारा को आलोचना का कोई भी गंदा नाला अपवित्र नहीं कर सकता।

 

सत्य तो यह है कि ऐसी दुर्लभ दीक्षा को प्रदान करने के लिए जिस तेज और तप की आवश्यकता होती है (और वह भी किसी एक अथवा दो शिष्य को नहीं, अपितु हजारों-हजारों शिष्यों को एक साथ, एक समान रूप से देने में) उसका तो बस हम सभी केवल अनुमान ही कर सकते हैं।

 

तीव्रतम शक्तिपात सम्राटाभिषेक

 

इसीलिये गुरु कभी मन्द, मध्यम और तीव्र शक्तिपात करते हैं। गुरु द्वारा सम्राटाभिषेक की क्रिया तीव्र शक्तिपात की क्रिया है। उस तीव्र शक्तिपात के काल में मन का स्थिर और एकाग्र होना आवश्यक है। यह शक्तिपात ऐसे ही प्राप्त नहीं हो जाता है, यह तो गुरु शिष्य के सम्बन्ध पर निर्भर करता है कि वह उस स्थिति में अपने मन को ऊर्जा के लिये कितना तैयार कर रहा है। गुरु द्वारा इस तीक्ष्ण क्रिया में एक क्षण के लिये ऐसा लगता है कि बहुत बड़ा विद्युत प्रवाह गुरु से शिष्य के भीतर जा रहा है। उन क्षणों को तनाव रहित होकर सहज भाव से अपने मन में उतरने देना है। अपने मन के सारे विरोधी भावों को हटाना है, अपनी चित्त शक्ति को शुद्ध और स्थिर रखना है, अपने आवेश और भीतर के कोलाहल को नियन्त्रित करते हुए शांत रहकर इस सम्राटाभिषेक शक्तिपात को प्राप्त करना है।
गुरु द्वारा तीव्र शक्तिपात की यह क्रिया रोज-रोज सम्पन्न नहीं होती है। नित्य प्रति तो साधक अपनी साधना सम्पन्न करता है। अपनी ओर से पूरा प्रयास करता है लेकिन काल खण्ड के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जिनमें गुरु अपना परम प्रयास लगा देते हैं और शिष्य के मन के भीतर की भाव भूमि को अपने प्रयत्नों से स्वच्छ कर अपने ज्ञान का, अपनी चेतना का बीज उसमें आरोपित कर ही देते हैं। इस महाआरोपण की क्रिया को ही सम्राटाभिषेक कहा गया है।

24-25 December 2016

Arogyadhaam, Delhi

Progress Upliftment Journey

Rajyabhishek to Samraatabhishek

Divine Boon from SadGurudev to Disciple

Samraatabhishek Maha Diksha

 

When SadGurudev beckons the disciple towards him, and blesses him by placing His hand on his forehead, then divine peace engulfs the mind of the disciple, his life transforms into a new sweet state, and he obtains a novel energy flow.

Thereafter, when SadGurudev calls his disciple and performs Shaktipaat by looking into his eyes, then the disciple gets completely transformed within an instant. A cascade of emotions starts flowing within him, his tasks start getting accomplished with full speed in his physical life, and the disciple gets fulfilled with divine knowledge within the spiritual space.

Samratabhisek Diksha is the confluence of physical and spiritual life, wherein the  knowledge of the Ganges, the love of the Yamuna, and the  consciousness of the Saraswati merge together.

 

SadGurudev is the divine soul, the divine form, the expression of the Divine Almighty. Only the Guru is capable of spiritual growth within the mind and soul of the disciple. He can make the disciple realize the special purpose behind his birth and coming into this world. Only SadGurudev can grant the proper sense of power to the disciple. One can obtain knowledge from various books, but this knowledge is merely a collection of various bits of information. Guru is the divine power to initiate the joy and enthusiasm with the disciple.

It is irrevocable truth that one should have a genuine interest in a particular subject, to progress further. In any field, if you do not have any specific interest, then you cannot progress further within that. Nobody can force any action on you. An unprecedented spiritual power unfolds when a Guru meets a devoted, faithful disciple. A good quality seed sown into a fertile field definitely yields a bumper harvest, similarly a disciple gets blessed upon meeting SadGurudev, who has achieved His goals, who has Himself reflected upon the truth, and has experienced the truth Himself. He sets up the disciple on the highest pinnacle of success by guiding the agitated disciple, and removing his defects by providing practical knowledge and wisdom. Guru does not transform a pauper disciple into the king. Guru transforms from a mere speck into greatness. He not only enhances the capability of the disciple, rather He converts him into the Emperor of his own mind, to make him confident, fearless and free of duality. The confusion over duality stops the growth of a disciple, while a disciple lacking duality gets blessed with Guru’s benevolence. The benevolent Guru continuously keeps uplifting the disciple with his constant blessings.

 

SadGuru Light to Samraatabhishek

We require fire to light a fire, fire cannot be ignited by any other means. Similarly SadGurudev has unique spiritual knowledge fire within Him, and He ignites the spiritual knowledge fire within each disciple by providing him His own fire. This process is called MahaDiksha consecration process Rajyabhishek Samraatabhishek.

Only SadGurudev can provide capability to the disciple to go beyond the limits, but this can be imparted only to the worthy eligible disciple. A suitable Guru is one who has realized the truth through His own sacrifice and penance, one who has overcome His desires and whose behaviour is an expression of the truth. Such a SadGuru is capable of imparting enlightenment to the disciple, along with the ability to smoothen the future difficult conditions, and granting capability to face them.

When SadGuru prepares a worthy disciple, then there is no doubt about the perfection of his physical and spiritual progress.

 

Guru Disciple union – Samraatabhishek

Who is a disciple? One, who is full of curiosity. What type of Curiosity? Liberation from worldly suffering and the spirit of self-advancement. Even God Almighty cannot grant anything to one who does not desire self-advancement. A disciple meets a Guru when his mind is full of desire to progress. The stronger the yearn, the deeper will be the intensity, and when the desire is pure, one will definitely meet the perfect Guru.

“Guru” is a specific noun description of an intensity bound within a physical body and form. He continuously guides each section of the society towards elevated growth by granting His consciousness and spiritual power, in each period of time. Elimination of Gurutatva from the society will remove all differences between the humanity and animalism. The role of “Guru” is to create a strong, cultured and joyful society by touching each and every person. The Gurutava individuals have always performed this role within the society.

This “process” is defined within the spiritual world as “Diksha”, even though a Guru has innumerable mediums to impart knowledge.

 

Samraatabhishek Diksha by SadGuru

The following six points are very significant during the process of Shaktipaat grant by SadGuru and receipt of Shaktipaat by the disciple –

  1. Relationship of SadGuru imparting divine energy with the supreme consciousness.
  2. The state of mind during the invocation and transfer of Divine energy
  3. Suitable favourable time
  4. The knowledge, experience and skills of SadGuru imparting Divine energy
  5. The relationship between Shaktipaat granting SadGuru and Shaktipaat receiving disciple
  6. Distance between SadGuru and disciple due to location, mind and deeds

 

SadGuru is Paarmesthi, He is equipped with Supreme consciousness and He transfers divine energy into the disciple with full capacity. The disciple receives the Divine energy according to his mental situation at that particular time.

Guru determines the time and location to impart Shaktipaat and special Shaktipaat. The disciple should obtain Shaktipaat on the date specified by Guru, considering it as the Divine date. There is special significance to the relationship between Guru and disciple within this entire process. Both might be separated by distance, however the Shaktipaat process gets accomplished on the union of their minds.

The general Diksha process starts with Guru Diksha, however, when the process to elevate the person to the pinnacle of the society has to take place, through uplifting his physical material life, and expanding and introducing him to various dimensions of spirituality, then SadGuru initiates the order of rare Dikshas like Rajyabhishek, Samraatabhishek etc. The history is witness to the fact that “Guru” has done this process not once, but multiple times.

Really, the “Emperors” are not self-made, they are created. The Guru Himself creates them. What great contemplation drives Him to do this? Why He becomes ready to dissipate His penance power  with the readiness of Lord Shiva? One has to raise one’s thinking to Guru’s level to understand this. SadGuru does not worry about the valuation of His actions by the society because He knows that it is beyond the power of any dirty drain of criticism  to pollute His pure consciousness stream.

The truth is that we can only guess about the intensity and penance required to grant such rare Diksha (Not just to one or two, but rather to thousands of disciples together, at the same level)

 

Intense Shaktipaat Samraatabhishek

Therefore Guru sometimes grant mild, moderate or intense Shaktipaat. The Samraatabhishek Shaktipaat process is an intense Shaktipaat process. It is mandatory to have stable focussed mind during that Shaktipaat moment. One does not get this Shaktipaat just like that, it is dependent on the Guru-disciple relationship, that how much has the disciple prepared his mind to obtain the Shaktipaat energy. During this intense process, it seems for a moment that a huge flow of current passes from Guru into the disciple. You need to let that spontaneity come within your self during those stress-free moments. You should remove all conflicting sentiments from your mind, you should keep your mind pure and stable, and you should obtain this Samraatabhishek Diksha by staying calm controlling your excitement and the inner clamour.

This intense Shaktipaat process by Guru does not take place daily. The Sadhak completes his Sadhana daily. He tries his best but there are some specific moments of time when Guru exerts His full force and plants a seed of His consciousness and knowledge by cleaning and purifying the emotional platform of the disciple.  This grand plantation process is called as Samraatabhishek.

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