One Body One Mind

एक तन एक मन
मुक्ति का परमानन्द
बार-बार मुड़ कर पीछे न देखिये
आपके सामने आपका भविष्य है
अतीत का बोझ उतारिये
वर्तमान में जीवन्त रहिये
हंस श्वेतः बकः श्वेतः, को भेदः बकहंसयोः ।
नीरक्षीरविवेके तु हंसो हंसः बको बकः ॥

 


आज हम मन शरीर बुद्धिभाव के बारे में विचार करेंगे, इन चारों से मिलकर आपका सम्पूर्ण व्यक्तित्व बना है, सबसे पहले मन और शरीर –

 

क्या है आपका मन?

 

जिसे आप अपना शरीर और अपना मन कहते हैं, वह याददाश्त का एक ढेर है। दूसरे शब्दों में कहें तो आपका शरीर याददाश्त की एक गठरी है। उसी याददाश्त के कारण हर चीज अपनी भूमिका उसी तरह निभाती है और उसे आप याद रख पाते हैं।

 

आप भूल सकते हैं कि आप पुरुष हैं या स्त्री, मगर आपका शरीर यह याद रखता है। यही स्थिति आपके मन की है, आप कई चीजें भूल सकते हैं मगर आपका मन हर चीज याद रखता है और उसी के मुताबिक काम करता है।

 

याददाश्त का मतलब है अतीत। आप अतीत के साथ जितना चाहें खेल सकते हैं, मगर कुछ नया नहीं होगा। आपके पास जो पहले से है, उनमें आप अदला-बदली कर सकते हैं, उनका मिश्रण कर सकते हैं, पुराने को झाड़ा-पोंछा जा सकता है, मगर कोई नई चीज नहीं होगी। जब हम, आपके और आपके शरीर के बीच, आपके और आपके मन के बीच दूरी बनाने की बात करते हैं, तो हम एक ऐसी संभावना की बात करते हैं, जहां आप अतीत के दास नहीं होते, जहां कोई नई चीज हो सकती है। वह नई चीज क्या है? यह इस पर निर्भर करता है कि हम किस दिशा से उसकी ओर बढ़ते हैं।

 

अनुभव के आधार पर –

 

सामान्य मनुष्य अपने अनुभवों के बहुत बड़े भण्डार में ही खोया रहता है। एक ऐसा संग्रह जहां खोजने पर भी वो चीज नहीं मिलती जिसकी आवश्यकता है और वह चीज सुलभ ही उपलब्ध हो जाती है, जिसकी कभी आवश्यकता ही नहीं। आप स्वयं याद करें कब-कब और कैसे-कैसे आप अपने अनुभवों से उन क्षणों या घटनाओं को निकालकर उनमें खो जाते हैं जिनका आपके वर्तमान से कोई लेना-देना ही नहीं। इसीलिए गुरु लगातार प्रयत्न करते हैं कि आप उन सड़े-गले कूड़े, कर्कट को, अपनी याददाश्त के बोझ को अपनी बुद्धि, अपने विवेक, अपने जीवन से निकाल फेंकें।

 

अनुभवों, घटनाओं से मुक्ति की तलाश –

 

सामान्य जन में मुक्ति शब्द बहुत विशेष है, मुक्ति का सामान्य अर्थ लोगों ने इस जीवन से मुक्त होना निकाल लिया है। मुक्ति का मतलब कोई नई दुनिया या स्वर्ग जाना नहीं है।

 

मुक्ति का मतलब यह भी नहीं है कि अपनी जगह को बदलकर अपनी भूमिका को बदलकर मुक्त हो जाना। अगर आपकी बुद्धि बहुत सक्रिय है, तो जो भी नया है, वह 24 घंटों में पुराना हो जाएगा। अगर आप थोड़े मंद हैं, तो इसमें 24 साल लग सकते हैं, मगर वह पुराना होगा जरूर। वास्तव में आप किसी नई चीज की तलाश में नहीं हैं, आप हर पुरानी और नई चीज से मुक्ति की तलाश में हैं।

 

माफ करो और भूल जाओ

 

उपरोक्त दोनों स्थितियों को समाप्त कर अपने जीवन को सफल बनाने के लिये माफ करो और भूल जाओ की नीति अपनानी चाहिए। हम सभी का बीता हुआ समय या भूतकाल (अतीत) हमारे साथ है, लेकिन उसे वर्तमान में बार-बार लाने से हमारा वर्तमान प्रभावित होता है। कुछ लोगों को अपना बीता हुआ समय अपने वर्तमान से ज्यादा अच्छा लगता है और वे बार-बार अपने अतीत को याद करते हैं। लेकिन बार-बार अपने अतीत में लौटने की प्रवृत्ति न तो स्वयं के लिए और न ही दूसरों के लिए शुभ है।

 

हमारा चिंतन अतीत से निर्धारित होता है, इसलिए बार-बार हम अपने अतीत को याद करते रहते हैं, इन यादों में हम इतने घुले-मिले होते हैं कि हमें यह पता ही नहीं चल पाता कि कब हम अचानक ही अपनी अतीत की यादों में चले जाते हैं और ऐसा करने से हम अतीत से अपना पीछा नहीं छुड़ा पाते। परेशानी तो तब होती है, जब हम अतीत को अपने वर्तमान से जोड़ लेते हैं, इसके साथ कई तरह की भ्रांतियां मन में पाल लेते हैं और फिर हम वही बनते हैं, जो हमारा अतीत हमें बनाना चाहता है।

 

प्रसिद्ध कहावत है- भूतकाल बीत गया और भविष्य से हम अनजान हैं, तथा सिर्फ और सिर्फ वर्तमान हमारे हाथ में है।

 

वर्तमान में खुश रहिये ना

 

वर्तमान हमारी अनमोल संपत्ति है। असल में वर्तमान हमारा है और हम उसके मालिक हैं। अगर हमें यह पता हो कि वर्तमान हमें मिला हुआ सुनहरा मौका है तो हम अपना भविष्य सुरक्षित और संपन्न बना सकते हैं। वर्तमान में जीने से सफलता और अपने उज्ज्वल भविष्य की संभावना सुनिश्‍चित होती है। जीवन में जिन परिस्थितियों में परिवर्तन करना हमारे हाथों में नहीं है, उन्हें समय के हवाले कर देने में ही समझदारी है; क्योंकि समय ही एक ऐसी दवा है, जो ऐसी परिस्थितियों को ठीक कर सकती है। अतः हर पल क्या हो रहा है, इसके प्रति सतर्क रहना जरूरी है।

 

जो सही है, उसकी सराहना करनी चाहिए और अपने जीवन में सकारात्मकता धारण करनी चाहिए। यदि मनुष्य अपने मन में सुख-शांति चाहता है तो उसे, माफ करो और भूल जाओ की नीति अपनानी चाहिए, अन्यथा अतीत की यादें हमेशा सताएंगी।

 

जीवन में क्षमाशीलता ही एकमात्र ऐसी प्रवृत्ति है, जो वर्तमान और अतीत की चिंताओं से हमें मुक्त कर सकती हैं। जब कभी भी हम वर्तमान में अपने आप को दुःखी या असफल महसूस करते हैं तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि अतीत से शिक्षा लेने का समय आ गया है और ऐसी स्थिति में हमें अतीत में की हुई गलतियों से शिक्षा लेकर अतीत की तुलना में अपने वर्तमान को सुखमय बनाने में प्रयत्नशील हो जाना चाहिए। कहते हैं कि जो बीत गया, सो बीत गया, अब उसे क्या सोचना। अतीत की घटनाओं को बार-बार सोचना, गड़े मुर्दे उखाड़ने के समान ही है।

 

मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि – अतीत के विषय में सिर्फ सोचते रहने से अतीत बदल थोड़े ही जाता है, बल्कि यदि अतीत की घटनाओं से शिक्षा ली जाए और अपने वर्तमान में अतीत की गलतियों को न दोहराकर पहले से कुछ अच्छा किया जाए तो जीवन में अधिक आनंद आएगा और व्यक्ति अधिक विकास, उन्नति, प्रगति कर सकेगा।

 

मनुष्य अपने जीवन में कुछ नया कार्य तभी कर सकता है, जब वह अपने अतीत से मुक्त होकर अपने वर्तमान में पूरी तरह से एकाग्र होता है; क्योंकि ऐसा होने पर वह अतीत की जंजीरों, बंधनों से आजाद होता है और कुछ कर पाने में सक्षम होता है।

 

हम कभी भी अपने दिमाग से लगातार स्वतंत्र होकर नहीं रह सकते, लेकिन इतना हो सकता है कि हर दिन हम ऐसा मौका निकालें, भले ही थोड़े समय के लिए।

 

अतीत, वर्तमान और मनः स्थिति

 

व्यक्ति चार तरह की मनःस्थिति को साथ में लिए हुए जीता है – (1) वर्तमान मन, (2) अनुपस्थित मन, (3) दोहरा मन और (4) एकाग्र मन।

 

वर्तमान मन का अर्थ है कि अभी क्या चल रहा है, उसे देखने वाला मन।

 

अनुपस्थित मन का अर्थ है – मन का कार्यस्थल पर न होकर कहीं और होना।

 

दोहरे मन में व्यक्ति के दो मन बन जाते हैं। एक ओर, उसका मन कह रहा होता है कि किसी काम को करना चाहिए तो दूसरा मन कह रहा होता है कि अभी रुकना चाहिए। परंतु एकाग्र मन इन सारे व्यवधानों से विचलित हुए बिना, अपने लक्ष्य एवं उद्देश्य के प्रति सदा सजग एवं एकाग्र रहता है। जो व्यक्ति जीवन में वर्तमान और एकाग्र मन के साथ आगे बढ़ते हैं, वे सफलता पाते हैं और अनुपस्थित व दोहरे मन वाले व्यक्ति भटकते रहते हैं।

 

दुनिया के हर काम में सफलता प्राप्त करने के लिए एकाग्रचित होना आवश्यक है। हमारी एकाग्रता ऐसी होनी चाहिए कि हम अपने काम में पूरी तरह से लीन हो जाएं।

 

दोहरा और अनुस्थित मन, व्यक्ति को अपने लक्ष्य और कार्य से भटका देता है।

 

मन मस्तिष्क को चलाता है और मस्तिष्क शरीर को। इस तरह शरीर मन के आदेश का पालन करता है। मन के स्थिर होने को, चित्त के शांत होने को एवं व्यक्तित्व के समग्र होने को योग कहते हैं।

 

जीवन में समरसता, संतुलन, समत्व और जीवन की सर्वोच्चता बिना मन के एकाग्र हुए, बिना मन के वर्तमान क्षण को उपलब्ध हुए संभव ही नहीं है।

 

मनुष्य अपने एकाग्र व वर्तमान का उपयोग कर सके तो अनेक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों व सफलताओं को प्राप्त कर अपने जीवन को बदल सकता है; जबकि दोहरे एवं अनुपस्थित मन के कारण जीवन की स्थिति में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं होता और जीवन का स्तर ऊंचा उठने के बजाय, गिरता चला जाता है। इसलिए अपने मन को अतीत से जोड़ने के बजाय उससे कुछ सीखना अधिक उचित है। तभी हम अपने वर्तमान को सुधार सकेंगे और अपने भविष्य को संवार सकेंगे।

 

नववर्ष पर स्वयं को माफ करें और भूल जाएं –

 

मन दुःखद अनुभवों का रोना रोता रहता है और अशांत रहता है। क्योंकि बीते दिनों के दुःखद अनुभवों को याद करने से उनका दुःख बना रहता है।

 

पिछली घटनाओं को पिशाच की भांति मानें –

 

जैसा हम सोचते हैं या चाहते हैं वैसा ही प्राप्त करते हैं। जब तक हम पिछली बातों को याद करते रहेंगे तो वे बुरी आत्माओं की भांति हमें अपने वश में कर लेंगी। बीता समय भूतकाल या भूत होता है और इनके साथ भाईचारा करने से अर्थात् इनसे घिरे रहने से हमारा व्यवहार और तरीके भी इन्हीं की भांति हो जाते हैं।

 

भूतकाल की बुरी घटनाएं एक पिशाच की भांति हैं और हमें इनसे छुटकारा पाना होगा। हमें हमेशा आगे की ओर देखना होगा और अपनी जिन्दगी को अपने सिद्धांतों के अनुरूप ही अच्छा और रोशन करना होगा। क्योंकि हमारा भविष्य इस बात पर ही निर्भर करता है कि हम आज किस प्रकार सोचते और करते हैं।

 

अतीत को अतीत ही रहने दो –

 

अक्सर हम अतीत की बातों को याद कर-कर के शिकायत करते रहते हैं कि फलां ने मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, फलां ने मेरी मदद नहीं की। पर हम ये नहीं सोचते कि ये पुरानी बात थी और तब से अब तक उन व्यक्तियों में भी और हम में भी काफी बदलाव आ गया है।

 

हो सकता है तब वैसा हमारे ही किसी बुरे कर्म के कारण हुआ हो या किसी परस्थितिवश ऐसा हुआ हो। अब हमें इस बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। क्या बार-बार अतीत की बातों को याद करके हम अपने दर्द को बढ़ा ही नहीं रहे होते?

 

हर कोई शान्ति और खुशी चाहता है और हम भी चाहते हैं और इसके लिए हमें समझना होगा कि अतीत तो अतीत है और गुजर चुका है। अतैव हमें अपने भविष्य की और ध्यान देना चाहिए। उदासी को भगाकर के और खुशी के विभिन्न तरीके अपनाकर हमें अपने वर्तमान को और भविष्य को सुखद बनाना चाहिए।

 

हंस की तरह जीवन से मोती चुनो –

 

क्या हमें कौवे की तरह जो हमेशा कूड़े के ढेर पर बैठा रहता है और गंदगी से अपना भरण-पोषण करता है, हमेशा अतीत की कड़वी यादों के ढेर पर जो कि मैल का ढेर ही है, बैठे रहना चाहिए या एक हंस की भांति जो हमेशा मोती चुगता है, उसी प्रकार सद्गुणों को चुनना चाहिए और पुराने कड़वे अतीत को भुला देना चाहिए?

 

अतीत से केवल ये सीखना चाहिए कि हम आगे अतीत की गलतियों को न दोहरायें न कि बार-बार उन्हें रटकर फिर से वही गलती करें। हमें अतीत से केवल अनुभव प्राप्त कर आगे की ओर बढ़ना चाहिए।

 

समय निरंतर चलता रहता है –

 

हमें हमेशा ये ध्यान रखना चाहिए कि वक्त कभी नहीं रुकता। घटनाएं एक के बाद एक घटित होती रहती हैं और हमारे अतीत का हिस्सा बनती चली जाती हैं। यदि हम अपना वर्तमान समय अतीत के बारे में सोचने में नष्ट कर देंगे तो हमें बाद में पछताना पड़ेगा कि हमने अपना वर्तमान भी अपने हाथों से गंवा दिया है।

 

अतीत के साथ जीने से हम पिछला वक्त तो अफ़सोस में निकाल देते हैं और वर्तमान समय उस बीते समय की घटनाओं को याद करके नष्ट कर देते हैं। ऐसा न करके और उन महत्वहीन व्यक्तियों और घटनाओं को याद न करके हमें परमात्मा को याद करना चाहिए। क्योंकि ऐसा करके ही हम प्रसन्न रह सकते हैं और अपने जीवन को सम्पूर्णता से जी सकते हैं।

 

जैसे हम सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं। यदि हम अतीत की बुरी घटनाओं को ही याद करते रहेंगे और उनमें ही जीते रहेंगे तो हम भी वैसे ही बन जायेंगे। हमें अपने कर्मों को अच्छा बनाकर न केवल अपने वर्तमान को सुधार लेना चाहिए बल्कि अतीत के किये हुए बुरे कर्मों के दाग भी धो लेने चाहिये। कहीं ऐसा न हो कि हम अतीत में उलझे रहें और समय निकल जाए।
Desist from looking back frequently

Your future is staring ahead at you

Remove the burden of the past

Live in the present

 

A single Body

A single Mind

 

Ecstasy of Salvation

 

Hansa SwetaH BakaH SwetaH, Ko BhedaH BakaHansayoH |

Neerksheerviveke Tu Hanso HansaH Bako BakaH ||


Today, we will discuss thoughts about the mind, body and the intellect, your entire personality derives from these four elements. First about the mind and the body –

What is your mind?

What you call as your body and your mind is nothing more than a heap of memory. In other words, your body is a bundle of memories. Due to this memory, everything plays its role in the same way as you remember it.

You may forget whether you are a man or a woman, but your body remembers it. Your mind also has similar situation, you may forget many things but your mind remembers everything and works accordingly.

Memory means past. You can play as much as you want with the past, but nothing new will be created. You can swap in whatever you already have, mix them, wipe out the old, but nothing new will be created. When we talk about creating a distance between you and your body, between you and your mind, then we talk about a possibility, where you are not a slave of the past, where anything can be newly crafted. What is that new thing? It depends on our direction of approaching it.

Based on Experience

The common man is lost in a huge reservoir of his experiences. A collection of such collectibles where he cannot find whatever is actually needed, and easily accesses whatever is not required. You yourself try to recollect about those times from your experience, when you extracted and got lost within those old moments or events, which are not at all related to your current situations. Therefore Guru continuously tries to make you to throw away those rotten litter, wasteful, burden of your memories from your intellect, your conscience, and your life itself.

Looking for  liberation  from experiences and events –

The word salvation is very special to the general public, the general meaning of salvation is considered to be liberation from this life itself. Salvation does not mean transitioning to a new world or to heaven.

Salvation also does not mean achieving liberation by changing your place or your role. If your intellect is very active, then whatever is new now, will become old within 24 hours. If you are a bit slow-minded, it can take 24 years, but still it will certainly get old. In reality, you are not looking for something new, you are only looking for freedom from every old and new thing.

Forgive and Forget

One should adapt the policy of forgive and forget to terminate the above two situations. Our past is with us, but repeatedly bringing it into the present impacts our present. Some people find their past better than their present and they often recollect their past. But the tendency of repeatedly returning to the past is not effective for us or others.

Our past determines our thoughts and contemplations, so we repeatedly recollect our past. We get so immersed in these memories, that we do not realize when we suddenly run into the memories of our past. We cannot get rid of our past by doing so. Trouble occurs when we associate our present with the past, which creates many kinds of misconceptions in mind. Then we become whatever our past wants us to become.

A famous saying is- The past has passed and we are unaware of the future, and only the present is in our hands.

Be happy in the present

Present is our precious treasure. Actually, the present is our own and we are its owner. If we realize that the current opportunity is our golden chance, then we can make our future safe and prosperous. Living at present ensures the success and the possibility of a bright future. It is wise to handover the circumstances of life which are beyond our control, to the vagaries of the time. Time is the only medicine that can cure such conditions and situations. So it is important to stay vigilant about what is happening at every moment.

We should appreciate whatever is right, and bring positivity in our life. If a person wants happiness and peace in his mind, then he should follow the golden policy of forgive and forget, otherwise the memories of the past will always make him suffer.

Forgiveness in life is the only process, which can liberate us  from the worries of the present and the past. Whenever we feel sad or unsuccessful in our present time, then we should realize that the time has arrived to learn from the past and in such  situations, we should try to concentrate on improving our present by taking lessons from the mistakes committed in the past. It is said that whatever is past, has passed, now why to ponder about it. Frequently recollecting events of the past is similar to digging up the graves.

A person should remember that past does not change by just thinking about the past, but if lessons are learnt from the past, and the mistakes of the past are not repeated in the present, and if the present gets improved, then the quantum of happiness will increase in life and the person will be able to make better progress to grow and develop.

A person can do something new in his life only when he concentrates totally in his present and is completely liberated from his past. Then he is free from the chains and bondages of the past, and is able to do something fresh.

We can never achieve liberation from our mind, but it is possible to get some such opportunities daily, even if it is for a short duration.

Past, present and mental situation

The person lives together with four types of mental states – (1) present mind, (2) absent mind, (3) double mind, and (4) concentrated mind

The present mind implies that the mind knows and sees whatever is going on.

The absent mind indicates the presence of mind at some other location instead of at the required place.

In the double mind the person lives with two minds. One mind directs him to do some work while the other mind implores him to wait. However a focussed, concentrated mind is always alert and concentrated towards its goal and purpose, without distracting from these disruptions. The people who move ahead with the present and with a concentrated focussed mind in life, achieve success while the ones with absentee and double hearted mind keep wandering around.

It is necessary to be focussed and concentrated to achieve success in every field of work in the world. Our focus should be such that we are completely immersed within our work.

The double and absent mind makes a person stray away from his goals and actions.

The mind drives the brain and the brain runs the  body. Thus the  body obeys the commands of the mind. The stability of the psyche, the calmness of the mind and the wholeness of the person is called Yoga.

The harmony, equilibrium, balance and supremacy of life in life is not possible without a focussed concentration of mind, or without utilization of the present current moment.

If man utilizes his concentration and uses the current moment, then he can transform his life by obtaining many important achievements and successes. However a double or absent mind causes no significant change in the situation of life, and the level of life deteriorates instead of rising up. Therefore it is more appropriate to learn something from your past instead of merging your mind to the past. Only then will we be able to improve our present and enhance our future.

Forgive yourself on the new year eve and forget it all –

The mind keeps crying about the sad experiences, and remains disturbed. His sorrow stays with him due to remembrance of  the sad experiences of the past.

Treat past events as a vampire –

We get whatever we think about or whatever we want. The past experiences will control us like evil spirits as long as we keep remembering them. The Hindi meaning of past is Bhootkaal, or “Bhoot” (ghosts), and accompanying them will convert our behaviours and manners to become like theirs.

The past events of the past are like the ghosts-vampires and we should get rid of them. We should always look forward and illuminate our life according to our principles. Our future solely depends on how we think and do today.

Let the past remain buried within the past –

Often we recollect the past events and complain that someone did not behave well with us, or did not help us. But we do not realize that those were the incidents of the past, and now a lot of change has come within us and those people.

It is also possible that the cause of those incidents could be our own deeds of the past lives, or some specific situations. We should now accept this change. Are we not enhancing our own pain by frequently remembering those past events?

Like everyone else, we also want peace and happiness and for this we have to understand that the past is past and it has passed away. So we should pay more attention to our future. We should make our present and future more enjoyable by removing sadness and adopting different methods of finding happiness.

Choose Pearl from Life Like a Goose –

Do we wish to become like a crow who always sits on a pile of litter and feeds garbage to himself. Should we continue to sit atop a heap of the bitter memories of the past, which are similar to scum. Or should we choose virtues like a goose who always chooses pearls. And forget the old bitter past.

We should take just one single lesson from the past to not repeat the same old mistakes of the past. We should only obtain  experience from the past to move ahead.

Time continues to fly –

We should always bear in mind that the time never stops. The events-incidents occur one after another and become a part of our past. If we destroy our current time in thinking about the past, then we will have to regret later that we have lost our present through our own hands.

We lose the past time within the regret by living in the past, and destroy the present current time by recollecting the  past incidents. We should remember Almighty God instead of doing so and stop recollecting those insignificant people and events. Then we can live happily and achieve completeness in our life.

Whatever we think, we become. If we continue to remember the bad incidents of the past and continue to live in them, then we too will become like that. We should enhance our present by improving our actions, and wash away the stains of the bad deeds done in the past. We should beware lest we remain entangled in the past and the time passes away.

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