Mere Karm Mere Phal

मेरा कर्म – मेरा फल
मैं कर्त्ता – ईश्‍वर प्रदाता
शिष्यः गुरुदेव, मेरी एक जिज्ञासा है विज्ञान की सुनें तो हर क्रिया के बराबर और विपरीत अनुपात में फल भी मिलना चाहिए, पर वास्तविक जिन्दगी में ऐसा नहीं है। कई बार मैं कर्म तो पूरा करता हूं, पर फल आधा-अधूरा ही मिलता है, या फिर नहीं मिलता है। ऐसा क्यों होता है? मैं तो गुरु के चरणों में शरणागत हूं, फिर मेरे साथ भी ऐसा क्यों होता है? गुरुदेव! ये प्रश्‍न मेरे मन को बारम्बार मथते हैं। कृपया मार्गदर्शन कीजिए।

 

गुरुदेवः मेरे प्रिय, कर्म और फल संयुक्त नहीं हैं। आपके मन में कर्म को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। आप सोचते हैं कि अगर आपने कर्म किया है तो उसका फल आपको आपके तय मापदण्ड के अनुरूप अवश्य मिलना चाहिए। यहां गूढ़ बात यह है कि मापदण्ड आपका है जिस पर आप अपने कर्म की गहराई और उस अनुरूप फल की ऊंचाई नापते हैं।

 

कर्म और उससे जुड़े फल के सन्दर्भ में श्रीकृष्ण अर्जुन से कुरुक्षेत्र की रणभूमि में कहते हैं

 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अध्याय 02/श्‍लोक 47
यह ज्ञान श्रीकृष्ण उस अर्जुन को दे रहे थे जो उनके  सखा थे, पर उस समय युद्ध भूमि में अत्यधिक विचलित मन से उपस्थित थे। अर्जुन मोह में इस कदर भ्रमित हो गए थे कि उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह सांसारिक भोगों के लिए वे गुरुजनों, श्रेष्ठजनों, पितामह और बन्धु-बान्धवों की हत्या कर रहे थे। देख नहीं पा रहे थे अर्जुन कि युद्ध का ध्येय धर्म की स्थापना करना था और जिन्हें वे बन्धु-बान्धव कह रहे थे, वे अधर्म के साथ थे। अर्जुन के मन में अपने कर्म, युद्ध करने के प्रतिफल को लेकर अनेक प्रश्‍न थे और उनका सटीक उत्तर श्रीकृष्ण ने ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ श्‍लोक से दिया है।

 

निष्काम कर्म के सिद्धान्त को अपने में समेटे यह श्‍लोक चार बातों को रेखांकित करता है।

 

1.  कर्म करना आपके हाथ में है
2.  कर्म का फल किसी और के हाथ में है
3.  कर्म करते समय फल की इच्छा मत करो
4.  फल की इच्छा छोड़ने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि आप कर्म करना ही छोड़ दें

 

गुरु का यह उत्तर सुनकर शिष्य के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें उभरती हैं। उन चिन्ता की रेखाओं को  देखकर गुरु कहते हैं कि कहीं आप ऐसा तो नहीं सोच रहे कि श्रीकृष्ण मनुष्य को रोबोट बना देना चाह रहे हैं?

 

शिष्य गुरु की बात से सहमत है। फौरन कहता है,‘‘ऐसा तो सिर्फ मशीन के साथ संभव है। उसे प्रोग्राम कर दीजिए और वह बिना कोई सवाल किए, बिना कोई शिकायत किए चुपचाप कर्म करेगी। पर, मनुष्य में तो संवेदनाएं हैं, ऐसा कैसे होगा कि वह कर्म करे और एक बार भी नहीं सोचे कि उसके द्वारा किया गया अच्छा कार्य उसके घर-परिवार, समाज, सम्बन्धियों ने रिकॉगनाईज किया या नहीं। दो-चार प्रशंसा के बोल बोलें तो उसे लगता है कि – उसकी मेहनत का उसे फल मिला।

 

गुरुदेव, श्रीकृष्ण के इस सिद्धान्त की मानें तो परिश्रमी छात्र को अच्छे अंक की कामना नहीं करनी चाहिए। एक मेहनती किसान को अच्छी फसल की इच्छा नहीं करनी चाहिए, कर्मचारी को प्रमोशन के बारे में नहीं सोचना चाहिए और खिलाड़ियों को प्रतिस्पर्धा में अव्वल आने के बारे में नहीं सोचना चाहिए।

 

गुरुदेव कहते हैं, उत्तर सुनना चाहते हो तो खरी-खरी बताता हूं। हां! पहले यह समझो कि आपके कन्ट्रोल में, नियन्त्रण क्या है? कर्म या कर्म का फल?

 

यकीनन, अगर आप किसी कारक (फैक्टर) बात को नियन्त्रित कर सकते हैं तो वह कर्म है। एक छात्र के बस में है कि वह रोज चार घण्टे पढ़े या छह घण्टे। एक कर्मचारी इस बात को कन्ट्रोल कर सकता है कि वह अपना कार्य किस प्रकार से सम्पादित करे। एक खिलाड़ी अपनी ट्रेनिंग कितनी और कब करनी है, उसे कन्ट्रोल कर सकता है।

 

पर, फल वह तो हमेशा कल में होता है। फल आज में तो है नहीं, जहां कि आप उसे नियन्त्रित करेंगे। आपके पास तो सिर्फ आज है, पर आपके आज के कर्म, कल के फल की पृष्ठभूमि अवश्य तैयार करते हैं। इसलिए, कर्म करने में आपने आनाकानी की तो फल शर्तिया बिगड़ जाएगा।

 

क्या आवश्यकता थी श्रीकृष्ण को किंकर्त्तव्यविमूढ़ अर्जुन के साथ माथापच्ची करने की? क्या पूर्ण भगवान श्रीकृष्ण अधर्म का नाश स्वयं नहीं कर सकते थे?

 

अवश्य कर सकते थे, पर सृष्टि कर्म के सिद्धान्त के अधीन है। अगर, श्रीकृष्ण अधर्मियों का नाश महामारी या प्राकृतिक आपदा से करते तो समाज को कैसे यह अहसास होता कि स्त्री का अपमान राज-घरानों का नाश कर देता है।

 

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ का उद्घोष किस प्रकार फलित होता? कैसे समाज धर्म और कर्म के प्रति सचेत होता?

 

जीवन धारा में बहिए, कर्म कीजिए

 

जब आप कर्म करते हैं और आपके मन में यह भाव आता है कि मुझे इसका फल मिलना चाहिए लेकिन तब आप धारा के विपरीत खड़े हो जाते हैं। घोड़ागाड़ी में घोड़ा आगे होता है और गाड़ी पीछे। अगर इसे उलट दीजिएगा तो गाड़ी बढ़ेगी तो, पर उलटी दिशा में जिस ओर घोड़ा जाएगा वह उसी ओर गाड़ी को खींचेगा।

 

जितना ज्यादा आपका कर्म के फल या रिजल्ट पर फोकस होगा, उतना अधिक आप तनाव में रहेंगे। क्या है तनाव? तनाव उन चीजों, व्यक्तियों, परिस्थितियों से आता है जिन्हें आप नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं।

 

आपके द्वारा किए गए कर्म पर दूसरे की प्रतिक्रिया कैसी होगी, इसे आप कैसे कन्ट्रोल कर सकते हैं। फल की आकांक्षा में अधिकार का भाव है। जहां अधिकार है, वहां अहंकार है।

 

अधिकार बहुत मिसअण्डरस्टैण्डिंग, असमझ का भाव है क्योंकि यह हमेशा बाह्य होता है जबकि आपके नियन्त्रण में सिर्फ आप हैं और वह भी आपका कर्म, अधिकार को अनिवार्य समझा जाता है, पर एक का अधिकार दूसरे का कर्त्तव्य है।

 

समझिए, फल कल में है। जितना ज्यादा आपमें फल की इच्छा गहरी होगी, उतना अधिक आप कर्म से विमुख होंगे क्योंकि आपने फल से आशा को बांधना शुरू कर दिया है। एक उदाहरण देता हूं। आप सबने इसे कहीं न कहीं अनुभव किया होगा।

 

एक विद्यार्थी था। कक्षा 6 में पढ़ता था और उसे एक साईकिल चाहिए थी। माता-पिता ने वादा किया कि परीक्षा में अच्छे अंक ले आओ और तुम्हें साईकिल दिला देंगे। बच्चे ने खूब मेहनत की। सारे विषयों की परीक्षा अच्छे से दी। आखिरी विषय हिन्दी का था और हिन्दी उसे अच्छे से आती थी। रिवीजन करने बैठा परीक्षा से पूर्व तब मन पढ़ने में लग ही नहीं रहा था। आंखों के आगे साईकिल घूम रही थी और कैसे वह उसे फर्राटे से चला रहा था। अगली सुबह परीक्षा देने गया तब भी उसकी आंखों के आगे साईकिल घूम रही थी। प्रश्‍न-पत्र देखा तब मन खुश हो गया। बहुत आसान था। अब तो उसे साईकिल मिलना निश्‍चित लग रहा था, लेकिन हुआ क्या उससे। उत्तर भी नहीं लिखा जा रहा था उससे बस साईकिल ही साईकिल उसकी नजरों के आगे थी। दो घण्टे बीत गए, पर वह आधा प्रश्‍नपत्र भी नहीं कर पाया। टीचर ने उससे उत्तर पत्रिका ले ली और वह बच्चा सिर्फ आधा प्रश्‍न पत्र ही हल कर पाया था।

 

कर्म का फल कल में है

 

निःसंदेह फल पर अत्यधिक ध्यान केन्द्रित करने के कारण से हमारा होनहार छात्र कर्म से विमुख हो गया। फल की इच्छा से आप जितना दुराव रखेंगे आप अपना सब कुछ कर्म में झोंक देंगे। आपकी सारी चेतना सारा मन, सारी शक्ति सब कुछ इसी क्षण अभी कर्म में लग जाएगी। इसे ही समर्पण भाव से कर्म करना कहते हैं।

 

तब आप जीत और हार से ऊपर उठ जाते हैं। जितना कम आपका, फल पर ध्यान होगा, उतना अधिक फल आने की संभावना दृढ़ होगी। प्रकृति का यही रहस्य है। फल आपके हाथ में है ही नहीं, वह तो समय के अधीन है।

 

इसे और सरल करता हूं आपके लिए –

 

धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय॥
प्रकृति ने फल के विकसित होने का समय निर्धारित किया हुआ है और एक कुशल माली की खासियत है कि वह अपने पौधों के साथ धैर्य रखता है। गर्मियों में इस बात से दुःख नहीं करता है कि गुलाब का फूल नहीं खिला, ना ही सर्दियों में मोगरे के खिलने की प्रतीक्षा करता है। उसे तो बस अपने पौधों की भली प्रकार से देखभाल करनी है, उनमें खाद-पानी देना है और समय की प्रतीक्षा करनी है। पौधे खुद ब खुद खिल जाएंगे। पर अगर उसने अपने पौधों के प्रति अपना कर्म नहीं किया तो समय आने पर भी पौधे खिलेंगे नहीं।

 

श्रद्धावान हृदय कर्म करता है,
फल परमात्मा के हाथ में है-
फल (परिणाम) से थोड़ी सी दूरी, आपका अपने प्रति धैर्य है। धैर्य का ही दूसरा नाम विश्‍वास है और जब धैर्य कई पायदान ऊपर चढ़ जाता है तो उसे श्रद्धा कहते हैं। गुरु में, ईश्‍वर में श्रद्धा का भाव वास्तव में आपमें फल के प्रति आपकी अनासक्ति है।

 

आप जब फल की चिन्ता छोड़ देते हैं और अपना सारा ध्यान सिर्फ कर्म पर लगाते हैं, तब किसी को तो फल के विषय में सोचना पड़ेगा? जानते हो, उस क्षण फल प्रदान करने की चिन्ता का भार कौन लेता है?

 

फल की चिन्ता छोड़ने का अर्थ ही श्रद्धा है। यह श्रद्धा का भाव गुरु में, ईश्‍वर में प्रतिबिंबित होता है, तब गुरु को, ईश्‍वर को भी तो आपके फल का भार लेना पड़ता है।

 

दूसरी बात, फल की इच्छा वही छोड़ सकता है जिसे अपने कर्म पर पूरा भरोसा है। कोई किन्तु-परन्तु नहीं है। उसका कर्म स्वयं पूर्ण हो जाता है। ऐसे कर्म को सुफल प्रदायक तो होना ही है।

 

सुफल और सफल में अन्तर

 

मिलते जुलते से हैं सुफल और सफल, पर अन्तर है। सुफल नेक है। उसमें ईश्‍वरीय कृपा निहित है। उसे अपने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त है। सुफल में अहंकार नहीं है। वह फल के लिए बेचैन भी नहीं है और ना ही उसे श्रेय लेने की इच्छा है। उसे ‘मैंने ही किया’ की चाह नहीं है। हनुमानजी जब लंका में सीताजी को ढूंढ़ कर लौटते हैं तो उसका सारा श्रेय अपने प्रभु श्रीराम को देते हैं।

 

प्रभु की कृपा भयऊ सबु काजू
जन्म हमार सुफल भा आजू
सुफल के विपरीत सफल में जोड़-तोड़ छिपा है। सफल तो षड़यंत्र भी हो जाता है कुछ समय के लिए। सफल में बेचैनी भी है और वह कृपण भी है। सफल को नाम की चिन्ता है, विजय पताका की ललक है। इसलिए सफल तनाव में रहता है क्योंकि वह उतना ही प्रयास करना चाहता है जितने में कर्म सिद्ध हो जाएं। सफल प्रत्येक क्षण चुनाव में लगा रहता है, पर गुरु आपके प्रयास को सुफल करना चाहते हैं। गुरु चाहते हैं कि आप कर्म करें, पर फल से ग्रस्त होकर नहीं, लेकिन कर्म पूरे मन से करें।

 

जानते हैं, ऐसा कर्म सिर्फ एक बच्चा करता है। जब एक छोटा बच्चा चलना सीखता है तो कई बार गिरता है, पर उससे निराश नहीं होता है। ना ही, उसने लक्ष्य बनाया हुआ है कि वह एक मील एक दिन में चल ले। उसे तो बस इतना मालूम है कि उसके पैर लड़खड़ाएं या फिर वह गिरे, उसे खड़ा होकर चलना है और बिना फलाकांक्षा किए, एक दिन वही बालक मीलों दौड़ने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।

 

फल के विषय में सोचना भविष्य में चहल कदमी करने जैसा है। कितना भी चल लेंगे कहीं पहुंचेंगे नहीं क्योंकि आप उस धरातल पर खड़े ही नहीं हैं जहां पर लक्ष्य है। लक्ष्य बनाएं, जरूर बनाएं। उसे पाने के लिए पूरी मेहनत करें, पर उम्मीद बहुत ज्यादा नहीं जोड़ें क्योंकि फल प्रकृति के हाथ में है और प्रकृति हमें वही देती है जो हमारे लिए शुभ है। जितना ज्यादा उम्मीद फल से लगाएंगे, नाउम्मीदें उतनी ही बड़ी हो सकती हैं। इसलिए समता में रहें। जाग्रत रहें, कर्म करें और अगर फल नहीं मिले तो फिर से प्रयास करें क्योंकि ईश्‍वर ने, आपके गुरु ने आपके लिए कुछ बड़ा सोचा हुआ है और उसे पाने के लिए आपको भी बड़ा बनना पड़ेगा।
My Actions – my Results
I Do –  God Bestows

Disciple: Gurudev, I have a curious question. Science postulates the concept of equal and opposite reaction to every action. However, the real life is very different. Often I accomplish work completely, but I beget either partial or no results. Why is it so? I have surrendered myself completely to my Gurudev, yet I face this problem. Gurudev! These questions haunt my mind repeatedly. Please guide me.

Gurudev: My dear, karma (Actions) and fruits (Results) are not united to each other. There are many misconceptions about karma in your mind. You think that if you have done karma, then you should receive its results-fruits according to your criteria. The important essence is that you believe that your criteria should be used, which maps the depth of your karma and height of corresponding results as per your own belief.

 

Lord Shree Krishna advises Arjuna in the battlefield of Kurukshetra on Karma and its related results :

Karmanyevaadhikaaraste Maa Faleshu Kadaachana |
Maa Karmafalaheturbhurmaa Te Sangostvakarmani ||
Chapter 02 / Verse 47

Lord Shree Krishna was imparting this knowledge to His friend Arjuna who is highly distracted in the battlefield. Arjuna was so confused that he felt that he was killing his Gurus, Greats, elders and relations for worldly pleasures. He could not visualize that the goal of battle was to establish moral and ethical religion. His so-called relations were conniving with the wrong-doers. Arjuna had many questions in his mind about his actions and results of war. Lord Shree Krishna gave him a clear reply through the “Karmanyevaadhikaaraste Maa Faleshu Kadaachana” Verse.

This verse elucidates four points about impassive actions –

  1. You control what actions to take
  2. Someone else controls the results of these actions
  3. Do not desire specific results while performing actions
  4. The “Detachment from results of actions” does not mean that you stop performing any action

 

Anxiety lines develop on the brow of the disciple after listening to this reply from Gurudev. Sensing his worries, Guru hopes that the disciple does not misinterpret the answer by thinking  that Lord Shree Krishna wants to turn humans into robots.

The disciple agrees with Gurudev. He promptly replies – This is possible only with a machine. We can program the machine and it will perform all required tasks without any question or complaint. However humans have emotions and sensations. How is it possible to perform good work without considering any recognition by his family, society or relations. A few words of praises motivate him and he feels good fruits of his hard work.

Gurudev, if we follow this principle of Krishna,  then the diligent student should not wish for good marks. A hardworking farmer should not desire good harvest, the employee should not think about the promotion and the players should not think about winning the competition.

Gurudev replies, let me tell you the frank answer. But first, try to understand what is under your control – Actions or its results?

Obviously, if you can control any factor,  then that is the action itself. A student can control whether he wants to study for four or six hours. An employee can control how to perform his tasks. A player can make decisions about how and when to train.

However, the results, always occur tomorrow. The fruits do not appear today, so how will you control them. You only have today, but the actions of today, create a context for tomorrow.  Hence if you waver in your actions, then the results will certainly get jeopardized.

What was the need for Lord Shree Krishna to patiently explain to a confused Arjuna? Could Lord Shree Krishna not destroy the evil Himself?

Certainly, He could. However the creation follows the divine principle of actions. If Lord Shree Krishna had destroyed the wicked by pestilence or natural calamity, then how would have the society realized that insulting a woman destroys the empire?

How could the concept of “Yatra Naaryastu Poojyante Ramante Tatra DevataaH” be postulated? How could the society be made conscious of righteous religion and karma-actions?

 

Live through life, continue to work

When you perform actions with a feeling to get appropriate results, then you are working through the opposite direction. The horse is yoked ahead of the cart. If you reverse the order, then the cart will certainly travel, but in the opposite direction. The horse will pull the cart in the opposite direction.

The more you focus on the fruits or results of your actions, the more your stress will enhance. What is stress? The stress originates from those things, individuals, or situations which you cannot control.

How can you control the reactions of others, on the actions performed by you? The desire for results have a sense of right and authority. Authority is always accompanied by ego.

The authority is a sense of deep misunderstanding, because it is always external, outside your span of control. You can control only yourself and your actions. The rights are considered to be mandatory. However the right of one is the duty of another.

Try to comprehend it. The results belong to tomorrow. The more you indulge in desire of results, the more you will defocus away from the action, because you have started to relate hope with the results. Let me illustrate with an example. All of you must have experienced it somewhere.

There was a student. He was studying in class 6 and desired a bicycle. His parents had promised to reward him with a bicycle upon scoring good marks in the examination. The child studied diligently. He performed well in all subjects. Hindi was his last exam, and it used to be his favorite subject. He could not focus on study during the last revisions. He could only dream of riding the bicycle expertly. The same bicycle was clouding his vision when he entered the examination hall next morning. He got happy upon seeing the question paper. It was very easy. Now the reward of bicycle was definitely won. But what happened? He could not focus on writing the answers. He was lost in day-dreaming about the cycle. He could not complete even half paper even after two hours. When teacher took his answer-sheet, he could manage to complete only half of the paper.

 

The Result of the Actions belong to Tomorrow

Our brilliant student lost his way due to excessive focus on the results. The more you stay away from thoughts of the results, the deeper you will be able to engross in the action. Your consciousness, mind and entire energy will concentrate towards doing the action. This itself is called Action (Karma) through full dedication.

This enable you to rise above the mere thoughts of victory and defeat. The less focused your attention will be on the result, the more likely it will be. This is the secret of nature. The actual result is not in your hand, the vagaries of time controls it.

 

Let me make it easier for you to comprehend-

 

Do it slowly, with full focus of your mind,
The gardener plants a hundred, the fruits blossom in the season.

 

The nature has already scheduled a time for blooming of the fruit, and patience is a critical quality of a skilled gardener. He doesn’t care if the Rose does not flower in the hot summer, or the Jasmine does not bloom in the winter. He just concentrates on caring for his plants, and feeding them water and fertilizers, while waiting for the opportune moment. The plants will flower on their own, in due course of time. However, they won’t bloom at all if he does not do his work.

 

The faithful heart focuses on the actions,
The Providence bestows their fruits.

A little distant from the result (fruits), if your own patience. Trust is the synonym of patience, and the elevation of patience, turns it into the faith. The detachment from the fruits of your actions, is the real spirit of faith in the Guru and God.

Who thinks about the results, when you detach yourself from the results, and focus whole-heartedly onto the actions? Do you know, who undertakes the responsibilities to bestow the fruits of action in such situation?

Faith is the very act of detachment from the results of your actions. This faith reflects in the reverence of Guru and God. Guru and God have to bear responsibility to bestow appropriate results of your actions.

Secondly, only one who has full trust in his or her actions, can detach his mind from the thoughts of the results. There are no ifs or buts in this. Such an action gets completed automatically. Such actions will, obviously, lead to joy.

 

Difference between Beneficial and Successful

Both Beneficial (Sufal) and Successful (Safal) look alike in Hindi language, but they have very different meanings. Beneficial is a virtue. It imbibes divine blessings. It has divine grace of Guru. There is no space for ego in Beneficial (Sufal). It is neither restless for the results, nor does  it desire any credit. “I did it” is completely absent. Lord Hanuman gave the entire credit to Lord Rama, when He found Mother Sita in Lanka.

 

Prabhu Ki Kripa Bhayayu Sabu Kaju
Janam Hamaar Sufal Bhaa Aaju

 

On the contrary, Success hides a lot of manipulation and politics. Even a conspiracy achieves success, albeit for a short time period. Safal (Success) contains both anxiety and misery. Safal is more concerned with “taking of credit”,  or to advertise one’s name. Therefore Safal (Success) is always full of stress, as it wants to put in only as much effort as is required to gain success. Safal (Success) is always involved in politics. However Gurudev wants your effort to become Sufal (Beneficial). Guru wants you to perform your actions, with full focus, completely detached from their results.

Do you know, only a small child performs such detached actions. A small child falls many times, while learning to walk, but never gets disheartened. He also never sets a goal, for example to walk a mile per day. He just knows that he needs to get up and start walking again, whenever his feet falter or he falls down, without waiting for any result. One day, the same child acquires the ability to run a number of miles.

Thinking about the results-fruits is like going crazy for the future state. You may walk as much you can, but you will never reach anywhere, simply because you are not standing on the base which contains goals. You should certainly setup targets and goals. Exert your entire self to achieve them, but do not expect a lot. The nature controls the fruits of our action. The nature always grants us what is good for us. The more you enhance your hopes, the more you increase the chances of failure. Therefore, stay balanced. Be alert and active. Continue to work, and try again, even if you do not achieve the results. The Guru and God have made big plans for you, and you will have to grow big to realize them.

 

error: Content is protected !!