Mahabodhi Tatvamasi Diksha

तत्वमसि : तत्वम्+असि

 

निखिल अविरल प्रकाश पथ

 

शरीर से प्राण तत्व की यात्रा
अज्ञान से पूर्ण ज्ञान की यात्रा
संताप से पूर्ण आनन्द की यात्रा
अंधकार से पूर्ण प्रकाश की यात्रा

 


रोग-शोक-दुःख से आरोग्य-हर्ष-सुख की यात्रा
देह, प्राण, रोम, प्रतिरोम, चैतन्यता की यात्रा

 


थकना नहीं, रुकना नहीं, डरना नहीं, रोना नहीं
चिन्ता नहीं, संताप नहीं, विषाद नहीं, विवाद नहीं
यही है शरीर से प्राण की यात्रा
तत्वमसि महाबोधि ज्ञान की क्रिया…

 

देवर्षि नारद विष्णु भक्त परमज्ञानी थे, सारा ज्ञान प्राप्त कर लेने के पश्‍चात् भी उनके मन को शांति नहीं आई तब वे अपने गुरु सनत्कुमार के पास गये और निवेदन किया। हे गुरुदेव! मेरा मन अशांत क्यों है? क्या मेरा ज्ञान अधूरा है? मेरे मन में तुष्टि क्यों नहीं है? मेरा मन लक्ष्य की ओर एकाग्र क्यों नही है? हे भगवन्! मुझे ज्ञान दीजिये, जिससे मैं ‘सत्’ को प्राप्त कर सकूं। अपने ‘तत्वमसि’ को जान सकूं और स्वयं के आत्म भाव और मूल तत्व का मुझे पूर्ण ज्ञान हो सके।

 

गुरु ने कहा कि – पहले तुम बताओ कि तुमने अब तक क्या शिक्षा-दीक्षा ली है। तब मैं तुम्हें पूर्ण ज्ञान का आधार ‘तत्वमसि ज्ञान’ प्रदान करूंगा।

 

नारद ने कहा कि मैंने सारे वेद – ॠग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, शल्य विज्ञान, राशि शास्त्र, गणित शास्त्र, विधि शास्त्र, अर्थ शास्त्र, वाको-वाक्य शास्त्र, तर्क शास्त्र, एकायन, नीति शास्त्र, भूत विज्ञान, भौतिक, रसायन और प्राणी शास्त्र, ज्योतिष, ललित कला सब का अध्ययन किया है और सारे विषयों में पारंगत हूं। इन सबको पढ़कर मुझे शब्द ज्ञान तो हो गया है लेकिन आत्म ज्ञान नहीं हुआ है, मन शांत नहीं हो पाया है। मैंने सुना है कि –

 

‘तरति शोकम् आत्मवित्, तरति शोकम् तत्वमसि’

 

जो आत्मा को जान लेता है, स्वयं को जान लेता है वह दुःख सागर से ऊपर हो जाता है। मैं इतना ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त भी त्रस्त हूं। मुझे इससे ऊपर उठना है।

 

सनत्कुमार ने कहा कि – हे नारद! तुमने अब तक जो सीखा है वह ‘शिक्षा (शास्त्र, शब्द) ज्ञान’ है। यह तो पहली सीढ़ी है, यह तो ज्ञान का प्रारम्भ है लेकिन केवल ‘शिक्षा ज्ञान’ पर ही मत रुक जाना। तुमने जो विद्याएं पढ़ी हैं, उनका ज्ञान ‘शिक्षा’ ही कराती है। संसार में सारे पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, जल-तेज, आकाश सबका ज्ञान ‘शिक्षा’ से प्राप्त होता है।

 

केवल शिक्षा से परम ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है। शिक्षा से कौशल प्राप्त होता है, इसलिये मैं तुम्हें क्रमबद्ध रूप से समझाऊंगा कि शिक्षा से आगे क्या-क्या आयाम हैं और तुम्हें जो पथ समझ आए उस पर चलना।

 

सारे शास्त्र वेद, पुराण, भौतिक, रसायन, ललित कला, गणित शास्त्र, कानून शास्त्र केवल शिक्षा हैं। तो नारद ने पूछा कि ‘शिक्षा (शास्त्र, शब्द) ज्ञान’ से बड़ा क्या है? सनत्कुमार ने कहा – ‘वाणी’ ही तो शिक्षा से बड़ी है। ‘शिक्षा (शास्त्र)’ से बड़ी, ‘वाणी’ है।

 

वाणी – वाणी से ही शास्त्र का ज्ञान होता है, पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, तेज, मनुष्य, पशु, पक्षी, वन, जंगल, वनस्पति सबका ज्ञान वाणी द्वारा होता है। वाणी से ही धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, सहृदय-असहृदय सबका ज्ञान होता है। यदि वाणी न होती तो धर्म, अधर्म, सत्य-असत्य, अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं होता। इसलिये शास्त्र ज्ञान से बड़ी वाणी है। वाणी से ही ज्ञान दूसरे तक पहुंचता है। नारद जी ने प्रश्‍न किया तो, ‘वाणी’ से बड़ा क्या है?

 

मन (Knowing) – शिक्षा और वाणी दोनों मन से ही अनुभव किये जा सकते हैं। यह मनुष्य पहले मन में ही सोचता है कि मैं मंत्र (वाक्य) शास्त्र पढूं या कर्म करूं? सारी कामनाओं की इच्छाएं मन में होती हैं तभी उसकी पूर्ति की वह इच्छा करते हुए उन्हें पा लेता है इसलिये यह मन ही मानो आत्मा है, मन ही मानो लोक है इस मन की प्रेरणा से वाणी शास्त्र का उच्चारण करती है इसलिये मन महान् है। लेकिन इस मन की भी गति सीमित है, तो फिर मन से बड़ा क्या है?

 

संकल्प (Willing) – संकल्प मन से बड़ा है, जब मनुष्य विचार का बीज मन में डालता है तब मन उस संकल्प का बार-बार मनन करता है। मनन के बाद वह वाणी को प्रेरणा देता है, वाणी इस प्रेरणा को प्राप्त कर शास्त्र अर्थात् शब्द का उच्चारण करती है। शब्द ही सम्पूर्ण क्रिया कलाप की इकाई है। शब्द में ही मंत्र समा जाते हैं। शब्दों के समूह को मंत्र कहते है।

 

मन से लेकर शिक्षा (शास्त्र, शब्द) तक सबका आधार संकल्प ही है। संकल्प ही इन सब की आत्मा है, इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रत्येक पिण्ड में धरती-आकाश-बादल-वायु सब में एक संकल्प ही कार्य कर रहा है। इस संकल्प के कारण ही वर्षा होती है, वर्षा में जो संकल्प होता है उसी से अन्न होता है, अन्न में जो संकल्प चलता है उसमें प्राण होता है, प्राण के संकल्प से मंत्र, मंत्र के संकल्प से कर्म और कर्म के संकल्प से ही यह सारा लोक चल रहा है। विश्‍व में सब जगह प्रत्येक अणु-अणु में ‘संकल्प ही संकल्प’ है।

 

जो संकल्प को ईश्‍वर मानकर उपासना करता है, वह संताप रहित होकर सिद्धि प्राप्त कर लेता है लेकिन संकल्प की गति सीमित है। लेकिन तुम यहीं पर मत रुक जाना क्योंकि संकल्प से बड़ा है चित्त

 

चित्त (भाव अनुभूति – Feeling) – जब किसी विषय की चेतना होती है तो हमारे मन में अनुभूति जाग्रत होती है। इसी आधार पर संकल्प भी तीव्र हो जाता है और तब मन, वाणी, शब्द, मंत्र, कर्म सब गतिशील हो जाते हैं। चित्त आधारभूत है, यह किसी प्राणी की मूल आत्मा है। इसलिये कहा जाता है कि कोई व्यक्ति ज्यादा शास्त्रों का पढ़ा लिखा हो जाए लेकिन यदि वह चित्त अर्थात् ऋशशश्रळपस से शून्य है तो उसका ज्ञान व्यर्थ है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति कम जानकारी है लेकिन वह अपने चित्त से प्रबल है तो सब उसकी बात ध्यान से सुनते हैं।

 

तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मानि चित्ते
प्रतिष्ठितानि तस्माद्यद्यपि बहुविदचित्तो भवति नायमस्ती
त्यवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वान्नेत्थमचित्तः स्यादित्यथ
यद्यल्पविच्चित्तवान्भवति तस्मा एवोत शुश्रूषन्ते। 
चितं् ह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति॥

 

जो अपनी चित्त भावना को आधार बनाकर संसार में कर्मशील रहता है, वह जहां तक चित्त की गति है वहां तक पूर्ण सिद्धि प्राप्त करता है। नारद ने प्रति प्रश्‍न किया तो चित्त से भी बड़ा कोई और है क्या?

 

ध्यान (Concentration) – प्रत्येक मनुष्य को अनेकों अनुभूतियां हो सकती हैं लेकिन ध्यान एक का ही होता है। एक अनुभूति में चित्त को निरन्तर लगाना ही ध्यान है। साधना का आधार ही ध्यान है। एकाग्र होना ध्यान का आधार है। अपने चित्त को, अपनी शक्तियों को ध्यान के द्वारा ही तीव्र किया जा सकता है। इस सृष्टि में पृथ्वी, आकाश, जल, पर्वत, मनुष्य सभी तो ध्यान मग्न हैं। संसार में जिन थोड़े लोगों को सफलता प्राप्त होती है, उसका आधार ध्यान ही है।
ध्यान से ही प्रभुता और महानता प्राप्त हो सकती है लेकिन ध्यान की सीमा है क्योंकि ध्यान से भी बड़ा कुछ है, विज्ञान।

 

विज्ञान – विज्ञान का अर्थ है, पूर्ण जानकारी – गहनता। गहरे उतरना, सभी पक्षों को समझना, आदि-अन्त सभी स्वरूपों को समझना। प्रत्येक मनुष्य में अनुभूतियां अच्छी और बुरी दोनों हो सकती हैं। उन अनेक अनुभूतियों में एक विषय पर निरन्तर अनुभूति को ध्यान कहा गया है। ध्यान के माध्यम से मनुष्य अल्प और प्रभुत्व दोनों हो सकता है। लेकिन जब ध्यान की गहनता में अपने मानस को लीन कर देता है, मानस से एकाकार हो जाता है तब वह मूल तत्व, परमतत्व विज्ञान को अपनाता है। इस विज्ञान तत्व के द्वारा ही सब वेद, शास्त्र, वायु, आकाश, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य सबका ज्ञान हो जाता है। इस गहन विज्ञान तत्व द्वारा मनुष्य विषय के प्रत्येक तत्व को समझ लेता है। तब व्यक्ति का मानस ज्ञान और विज्ञान दोनों लोकों की सिद्धि प्राप्त कर लेता है लेकिन विज्ञान की भी एक सीमा है। नारद ने कहा कि विज्ञान तो सबसे बड़ा हो गया, अब इससे बड़ा क्या है? जिसे मैं जानूं?

 

ॠषि ने कहा कि – विज्ञान से बड़ा, बल है।

 

बल (Strength) – विज्ञान तो एक मानसिक तत्व है, लेकिन बल शारीरिक, मानसिक, आत्मिक सभी तत्वों को जाग्रत करता है। एक बलवान सौ वैज्ञानिकों को भयभीत कर सकता है लेकिन जब विज्ञान से युक्त व्यक्ति बलवान हो जाता है और कुछ करने के लिये उठ खड़ा होता है तब परिवर्तनकारी, क्रान्तिकारी घटना होती है।

 

विज्ञान युक्त बलवान जब किसी गुरु की सेवा में पहुंचता है और अपनी वाणी, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान द्वारा गुरु की सेवा में संलग्न हो जाता है तो वह गुरु का प्रिय बन जाता है।

 

गुरु सेवा के लिये साधक में शिक्षा, शास्त्र ज्ञान, वाणी, मन, संकल्प, भाव, ध्यान, विज्ञान सब कुछ होना चाहिए। तब उसे गुरु प्रसाद मिलता है। तब गुरु उसके भीतर के तत्व को जाग्रत करते हैं। वह स्वयं तत्व ज्ञान का स्वरूप बन जाता है। विज्ञाता हो जाता है।

 

 यह क्रिया बड़ी ही सूक्ष्म है जब गुरु अपने शिष्य को सामान्य व्यक्ति से दृष्टा और कर्त्ता बनाते हैं। वही शिष्य विज्ञाता हो सकता है।

 

बल से ही सारे ग्रह, नक्षत्र अपनी-अपनी गति करते हैं। भगवान के नियम रूपी बल से सब लोक अपनी-अपनी मर्यादा में स्थित हैं लेकिन बल की भी एक सीमा है, यह बल मूल रूप से उत्पन्न कहां होता है? उसे जानना आवश्यक है। बल की उत्पत्ति अन्न और जल से होती है। इसीलिये बल प्राप्ति की लिये अन्न और जल आवश्यक कहे गये हैं। संसार में सभी प्राणी अपने मूर्त रूप में अन्न और जल ग्रहण करते हैं लेकिन अन्न और जल को सिद्ध सार्थक करने के लिये तेज की आवश्यकता रहती है। तेज का तात्पर्य है प्रकाश, उष्मा, तीव्रता। इस तेज के कारण ही सृष्टि में जल वर्षा होती है, तेज के कारण ही अन्न होता है, तेज के कारण ही मनुष्य अन्न, जल ग्रहण करने में सक्षम है। सूर्य का प्रकाश तेज का ही स्वरूप है। इसलिये –

 

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं। 
भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

 

हे! सूर्यदेव हम तेजस्विता को प्राप्त करें।

 

तेज ही तो देह, मन, बुद्धि सबको आलोकित कर देता है लेकिन इस तेज की भी सीमा है। तो नारद ने प्रश्‍न किया तो तेज से बड़ा क्या है? सनत्कुमार ने कहा कि तेज से बड़ा आकाश है।

 

आकाश – वह आकाश जो सीमा रहित, खुला, बाधा रहित और सब लोकों को अपने भीतर स्थापित रखता है वह आकाश ‘परब्रह्म’ है। इस आकाश में ही अलग-अलग लोक स्थापित हैं। पाताल लोक से आकाश लोक, समुद्र तल से मेघ, सूर्य से यम तक यह आकाश ही सब जगह परिपूर्ण है, सभी तो इसमें गतिशील हैं। इसी आकाश मण्डल में ही सारे ग्रह, नक्षत्र, तारे स्थित हैं। यह आकाश अनन्त है, यह आकाश अनन्त परमात्मा का स्वरूप है। तुम्हें इस आकाश की उपासना सिद्धि प्राप्त करनी है, लेकिन इस आकाश की भी सीमा है।

 

नारद ने कहा, आकाश की भी सीमा कैसे हो सकती है? यह तो सीमा रहित पूर्ण विस्तारित है। इसी में सब कुछ समाया हुआ है। इस आकाश, शून्य के अलावा और कोई बड़ा कैसे हो सकता है। सनत्कुमार ने कहा कि – प्रिय नारद! आकाश से बड़ी ‘स्मृति’ है।

 

स्मृति – स्मृति तो महानतम् तत्व है, आकाश में तो शब्द आते हें, जाते हैं लेकिन स्मृति ऐसा तत्व है जहां शब्द स्थिर होकर बैठ जाता है। ‘स्मृति’ का आधार ‘स्मरण शक्ति’ है। सोचो एक स्थान पर पचासों लोग बैठे है और उनके पास स्मरण शक्ति नहीं है तो वे पास बैठे हुए भी एक-दूसरे को न जान सकेंगे, न समझ सकेंगे, न एक-दूसरे की बात सुन सकेंगे। लेकिन जैसे ही स्मरण शक्ति, स्मृति शक्ति आ जाती है तो सब एक दूसरे को सुन सकेंगे, जान सकेंगे, समझ सकेंगे। इस स्मृति शक्ति के द्वारा ही मनुष्य अपनी संतान, माता-पिता, मित्र-बन्धु-बांधव, शत्रु, यहां तक की जानवरों को भी पहचानता है। यह स्मृति शक्ति ही इस जगत को चला रही है। हजारों लाखों वर्ष पूर्व हुई घटनाओं को हम अपनी स्मृति में संजो सकते हैं। आगे भविष्य की कल्पना को भी हम अपनी स्मृति में संजो सकते हैं।

 

ज्ञान-विज्ञान, अन्न-जल, आकाश, वाणी, ध्यान, चित्त, संकल्प, मन इत्यादि सभी तो स्मृति के अधीन हैं। यदि एक क्षण के लिये भी किसी की स्मृति विलीन हो जाए तो कैसा हो जाता है? इसलिये हे नारद! तुम पूर्णत्व प्राप्त करने के लिये स्मृति शक्ति की आराधना करो, उपासना करो और पूर्णता प्राप्त करो।

 

सनत्कुमार ने कहा लेकिन इस स्मृति की भी एक सीमा है, नारद को पुनः आश्‍चर्य हुआ कि स्मृति से बड़ा क्या हो सकता है? सब कुछ तो स्मृति के चारों ओर ही घूम रहा है। कल्पना, सत्य, दृश्य सब कुछ स्मृति का ही भाव है। गुरु, ब्रह्म, परमात्मा, ईश्‍वर, देव, तीर्थ सब हमारी स्मृति का भाव है इसीलिये इनकी उपासना, साधना का बार-बार निर्देश दिया जाता है।

 

सनत्कुमार ने कहा – हे नारद! स्मृति से बड़ी आशा है। 

 

आशा (Hope) – स्मृति-स्मरण शक्ति का सम्बन्ध तो केवल भूतकाल से है। जैसा देखा, सुना, अनुभव किया उन सब से स्मृति बनती है लेकिन जब स्मृति के साथ आशा जुड़ जाती है तो वह प्रत्येक मनुष्य को भविष्य के साथ जोड़ देती है।

 

यदि आशा नहीं है तो मनुष्य की श्‍वास तो चलेगी लेकिन जीवन वहीं रुक जाएगा, जहां आशा नहीं है वहां निराशा है और निराशा मनुष्य को जीते-जी मार देती है। 

 

नारद! सोचो प्रत्येक मनुष्य कर्म क्यों करता है? प्रत्येक मनुष्य आशा से ही कर्म करता है, आशा से प्रदीप्त होकर स्मृति मंत्रों का स्मरण कराती है। आशा के आधार पर ही संतान, धन-धान्य सब की इच्छा उत्पन्न होती है। आशा के आधार पर ही मनुष्य में यह लोक अर्थात् इहलोक और परलोक प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न होती है। आशा के आधार पर ही सभी जीवों में जो उनके पास है उससे और अधिक प्राप्त करने की कामना जाग्रत होती है। सब कुछ आशा के आधार पर ही तो चल रहा है। इसलिये आशा आधारभूत है लेकिन आशा की भी एक सीमा है। जहां आशा की गति रुक गई वहां बहुत कुछ रुक जाता है लेकिन सब कुछ समाप्त नहीं होता है।

 

ॠषि ने कहा कि इसीलिये आशा से भी बड़ा प्राण है

 

प्राण – प्रत्येक मनुष्य में आशा किस लिये होती है? प्राण के लिये अर्थात् जीवन चक्र के लिये। प्राण मूल ‘नाभितत्व’ है। जिस प्रकार एक चक्र के मूल में ‘केन्द्र बिन्दु’ होता है और उसके चारों और आरे लगे होते हैं।

 

इस प्राण मूल चक्र के आरे शिक्षा, वाणी, मन, संकल्प, चित्त (भाव), ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, जल, तेज, आकाश, स्मृति और आशा है। सब इस मूल चक्र के भाव हैं, इसमें से एक या दो टूट सकते हैं, एक दूसरे में मिल सकते हैं लेेकिन सबका उद्देश्य मूल तत्व को सुरक्षित रखना है सब ज्ञान-विज्ञान, मन-संकल्प प्राण के लिये ही तो है।

 

यह शरीर, मन, बुद्धि थक सकता है लेकिन प्राण कभी थकता नहीं है। शरीर, अन्न-जल-बल हीनता से कमजोर हो सकता है लेकिन प्राण कभी कमजोर नहीं होता। मन में आशा-स्मृति ऊपर नीचे हो सकते हैं लेकिन प्राण सदैव स्थिर रहता है।
यह प्राण ही आधार है, इस प्राण से परे कुछ नहीं है। सब कुछ प्राण रूपी केन्द्र बिन्दु को समर्पित है। प्राण ही पिता है, प्राण ही माता है, प्राण ही भ्राता है, प्राण ही आचार्य है, प्राण ही गुरु है, प्राण ही परब्रह्म है।

 

यह प्राण तत्व ही ‘तत्वमसि’ है…
यह प्राण तत्व ही ‘तत्वमसि’ है…
यह प्राण तत्व ही ‘तत्वमसि’ है। 

 

सब तत्वों का आधार प्राण है, जहां प्राण है वहां सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड स्थित है। नारद ने पूछा कि – तो प्राण तत्व की साधना, इच्छा प्राप्ति कैसे करूं? इस प्राण तत्व ‘तत्वमसि’ को मैं कैसे प्राप्त करूं?

 

ॠषि ने कहा कि इसे प्राप्त नहीं करना है, यह तो तुम्हारे भीतर स्थापित है इसके ऊपर जन्म-जन्म के दोष का अंधकार छाया हुआ है, इस पर स्मृति, आशा, मोह, शत्रुता, बल, घमण्ड, अभिमान का अधंकार छाया हुआ है। यह ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण होते हुए भी जब इस पर कर्मगत दोष आ जाते हैं तो तुम स्वयं अपने प्राण तत्व, ‘तत्वमसि’ को न देख पाते हो, न समझ पाते हो और न अनुभव कर पाते हो। केवल शरीर की क्रियाओं द्वारा, शरीर तक ही अपने आपको सीमित कर लेते हो। याद रखो, इसी शरीर में ही प्राण तत्व स्थापित है। इस शरीर में ही बल, ज्ञान-विज्ञान स्थापित है, तो उस प्राण तत्व को बार-बार समझो। तब तुम अपने आप में शांत, हो सकोगे और तुम्हें परमानन्द की प्राप्ति हो सकेगी। तुम्हारा परम तत्व ‘तत्वमसि’ है। हर क्षण अपने आपको जानना-समझना ही ‘तत्वमसि’ भाव है।

 

याद रखो, यह श्‍लोक –

 

ॐ ह्री मम् प्राण देह रोम-प्रतिरोम चैतन्य जाग्रय ह्रीं ॐ नमः॥ 

 

अर्थात् हर क्षण अपने रोम-प्रतिरोम को चैतन्य जाग्रत करो, फिर अपनी देह को जाग्रत करो और अपने प्राण तत्व को जाग्रत करो तब संसार की सारी कामनाएं, इच्छाएं तुम्हारे अधीन हो जाएंगी। जब तुम्हारे प्राणों का स्पन्दन तुम्हें सुनाई देगा तो तुम्हें परब्रह्म ईश्‍वर की ध्वनि सुनाई देगी। वह ध्वनि सीधी प्राण तक पहुंचती है और जब उसी प्राण तत्व से तुम्हें निर्देश प्राप्त होते हैं तो जीवन की सारी किरणें – शिक्षा, वाणी, मन, संकल्प, चित्त (भाव), ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, जल, तेज, आकाश, स्मृति और आशा श्रेष्ठ बन जाती है।

 

सूर्य को देखो एक सूर्य है और उसमें से हजार-हजार किरणें निकल रही हैं। सब किरणें, सब दिशाओं को आलोकित कर रही हैंै। इसी प्रकार प्राण सूर्य है और इसकी बढ़ती, घटती किरणें – शिक्षा, वाणी, मन, संकल्प, चित्त (भाव), ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, जल, तेज, आकाश, स्मृति और आशा है। तुम्हें अपने जीवन में इन सबको किरणों के रूप में प्राप्त करना है तो प्राण तत्व अर्थात् ‘तत्वमसि भाव’ को प्राप्त करो।

 

मैं हूं… मैं हूं… मैं तत्व हूं… इस शरीर में मूल तत्व है – प्राण तत्व। उस प्राणतत्व  के कारण यह शरीर, मन, बुद्धि, भाव, विचार सब चल रहा है। उस ‘तत्वम्+असि’ भाव को निरन्तर चैतन्य करना है, वह मूल तत्व प्राण रूपी सूर्य को, यज्ञ पुरुष को निरन्तर आहुति देते हुए जाग्रत रखना है। उस ज्योति को सदैव-सदैव प्रज्वलित रखना है, इसके लिये कर्म विचार, मन-बुद्धि, अन्न-जल से निरन्तर और निरन्तर आहुति देनी है। 

 

अहम् तत्वमसि… अहम् प्राण तत्व असि, अहम् सर्वदेवाय असि… अहम् आदित्याय असि, अहम् सर्व तत्वम् असि, अहम् भाव तत्वम्असि संकल्प करो, मुझे अपने प्राण तत्व को जाग्रत करना है।          

 

– गुरुदेव नन्दकिशोर जी श्रीमाली 

Tatvamasi : Tatvam + Asi

Unabated Nikhil Light Path

The Journey from Body to the Soul Element

The Journey from Ignorance to the Seamless Knowledge

The Journey from Anguish to the Absolute Joy

The Journey from Darkness to the Bursting Light


The Journey from disease-sorrow-grief to Health-Happiness-Joy

The Journey of body, soul, cell, atom and consciousness

Don’t Weary, Don’t Stop,

Don’t Fear, Don’t Cry,

Don’t Worry, Don’t Agonize,

Don’t Wince, Don’t Dispute

This is the journey from the Body to the Soul

The Process of Mahabodhi Tatvamasi Knowledge…


 

Devarshi Narada Vishnu-devotee was a Paramgyani, his mind didn’t attain peace even after obtaining all the knowledge, and so he went to his Guru Sanatkumar and requested – “O Master! My heart is troubled, why? Is my knowledge incomplete? Why is my mind not content? Why is my mind not focusing toward the target? O God! Please grant me knowledge so that I achieve the “Sat”. So that I comprehend my “Tatvamasi” and obtain full knowledge of own soul and self.

Gurudev said – First you give me the details of your education and Dikshas. Then I shall grant you the foundation basis of Total-Knowledge, the “Tatvamasi Gyan”.

Narada replied – I have studies all the Vedas –  Rig-Veda, Yajur-Veda, Sama-Veda, Atharva-Veda, History, Mythology, Surgical Sciences, Astrological Science, Mathematical Science, Legal Science, Economics Science, Grammar Sciences, Scriptures, Philosophy, Spirituality, Ethics, Spirit Science , Physics, Chemistry & Life Sciences, Astronomy and  Fine Arts and have attained expertise in all of them. I have gained literal learnings, but have not yet understood the spiritual essence, and so my mind is not at peace. I have heard that –

“Tarati Shokam Aatmavit, Tarati Shokam Tatvamasi”

One who comprehends the soul, he realizes the self and he rises above the sea of sorrow. I am stricken in spite of gaining so much knowledge. I have to rise above it.

Sanatkumar advised – Dear Narada! Whatever you have learnt till now, is “Education (Science, Literal) Knowledge“. This is just the first step, this is the initiation of knowledge, but do not stop only at the “Educational Knowledge”. Whatever subjects you have learnt, education is the only mode to understand them. All the living beings in the world- flora-fauna, animals-birds, land-water, space etc. learn only through education.

Ultimate Knowledge cannot be obtained through education. Education is a method to develop skills, and I shall explain the further dimensions through a series of steps, and you are free to tread on whatever path you choose and understand.

All of the scriptures i.e. Vedas, Puranas, Physics, Chemistry, Arts, Mathematics, Science, Law, are all part of education. Then Narada questioned what is superior to “Education (Science, Literal) Knowledge”? Sanatkumar answered- “The Speech” is superior to Education. “Speech” is greater than “Educational (Sciences)”.

Speech – We understand sciences through speech, Speech aids us in gaining knowledge about Earth, Space, Air, Water, Fire, Man, Animal, Bird, Forest, Flora-fauna. Speech is the medium to know about virtue-sin, truth-untruth, affection-abhorrence. We would not have been able to comprehend belief-disbelief, truth-untruth, moral-immoral in the absence of Speech. So Speech is greater than the knowledge of Sciences. Speech is the medium to transfer knowledge to others. Naradaji then questioned, “What is superior to Speech?

Mind (Knowing) – One may experience both Learnings and Speech only through the mind. A person thinks over in his mind, whether to chant mantras or to perform tasks? All wishes are generated in the mind, and then he achieves them desiring their fulfilment, so this mind is akin to the soul, mind is the entire universe, the speech utters words only after stimulation from the mind, so the mind is much superior. However, this mind also has limited dimensions, then what is superior to mind?

Determination (Willing) – The determination is superior to the mind, when a thought originates in the mind, then the person repeatedly ponders about its resolution. It provides inspiration after thoughtful contemplation, this motivates the speech to utter words and sciences. Word is the basic unit of the entire universe. All the mantras disperse into the Word. A collection set of words is called as Mantra.

Determination is the basis of everything from mind to the education (science, literal). The resolution is the basic soul of all this, every object in this universe spread across the earth-sky-clouds-air, are working through determination. This determination causes rainfall, the determination within rainfall grows the crops, the determination within crops drives the soul, the determination within soul drives mantras, the mantras drive the actions, and the determination of these actions operates this entire universe. Determination, and only determination exists in each atom and cell in this universe.

One who prays considering Determination as God, he attains pain-free perfection; however the determination is also limited.  But you should not stop here, becauseSentiment is superior to Determination.

Sentiment (Perception Sense – Feeling) – When a particular topic is activated, then we get sentiments and emotions in our mind. This also intensifies the determination, and activates mind, speech, word, mantras and actions. Sentiment is the basic foundation, this is the root soul of any living being. Therefore it is said that even if a person studies all the written scriptures, but is devoid of feelings, then the entire knowledge becomes waste.  Conversely everyone listens seriously to a person having strong sentiments but less-knowledge about a specific topic.

Taani Ha Vaa Etaani Chittekayenaani  Chittatmaani Chitte

Pratisthitaani Tasmaadhdhyapi Bahuvidchitto Bhavati Naayemasti

Tayevenamaahurdayan Ved Yadva Ayam VidhvaannetthamchittaH Syaadityath

Yadhyalpavichchittvanbhavati Tasma Evot Shushrukshante |

Chittam HmeveshameKayanan Chittmaatma Chittam Pratishtha Chittmupaassveti ||

One who performs all actions based on sentiments, he achieves full perfection and siddhi till the limits of the sentiments. Narada then questioned if anything else is superior to sentiment?

Meditation (Concentration) – Every person may experience multiple sensations, but the focus remains only on one. The continued imposition of sentiment on a single sensation is meditation. Meditation is the basic foundation of Sadhana. Concentration is the basis of meditation.  We can enhance our sentiments, our energies, only through meditation. Everything in this creation – Earth, Space, Water, Mountains, Humans all are absorbed in their meditation. The few people in world who achieve success, achieve it through meditation.

We can achieve divinity and greatness through meditation but it also has its own limitations, because Science is superior to meditation.

Science – Science means Complete Knowledge – Intense deep knowledge. Delving deeper, comprehending all perspectives, understanding everything from beginning to end. Every person can have both good and bad sensations. Focusing on a single sensation from that collection is termed as meditation. Meditation can make a person either insignificant or divine. However when he offers his self into the deep meditation, merges into the divine, then he absorbs the basic unit, the basic element. This science element grants him knowledge about all Vedas, Sciences, Air-Space, Moral-Immoral, Truth-Untruth. The person understands all facts through this deeper intensive meditation. Then the person’s psyche obtains perfection siddhi in both science and knowledge. However Science also has a limit, Narada said that Science seemed to be the most superior, what is superior to science?

The Rishi answered – Strength is Superior to Science.

Power (Strength) – Science is a psychological element, but the strength activates all physical, mental spiritual elements.  A strong person can scare hundred scientists, however when a science-knowledgeable person acquires force and strength, and gets up to do something, then a transformational, revolutionary event occurs.

When a physically strong master of Science enters into the service of Guru, and immerses into the Guru Service through speech, mind, determination, sentiment, meditation; then he becomes a beloved of the Guru.

A Sadhak should have education, science knowledge, speech, mind, determination, sentiment, meditation, science, everything , to enter into Guru-Service. Then only he receives offerings from the Guru. Then Guru activates his inner elements. He himself becomes embodiment of the elemental knowledge.  Becomes a spiritual scientist.

This is a very intrinsic process, when the Guru transforms his disciple from an ordinary mortal into both the observer and the doer. Such a disciple becomes a spiritual scientist.

All planets and heavenly bodies move in their constellations through force.  All galaxies are positioned at their locations through the forceful order of Providence. However, this force also has certain limitations, it is important to understand the origin of this strength.  The strength originates from food and water. So food and water are considered essential to gain strength. All beings in this world consume food and water, but vitality is required to properly utilize food and water. Vitality means Light, Energy, Intensity. This Vitality causes rainfall in this creation, the crops also grow due to this verve, and a person gets capacity to absorb food and water only through vitality. The bright light of the Sun is an expression of its vitality. Therefore –

Om BhurbhuvaH SwaH Tatsaviturvarenyam |

Bhargodevasya Dhimahi Dhiyo Yo NaH Prachodayaat ||

O! God Surya, grant us Vitality.

This vitality highlights our body, mind & intellect; but this vitality also has its own boundaries. Then Narada questioned – what is superior to vitality? Sanatkumar answered that Space is superior to vitality.

Space – This space which is limitless, open, barrier-free and keeper of all galaxies, this space is the “ParBrahma”. Many galaxies are clustered here.  The Netherworlds to Sky, from ocean to clouds, from Sun to Yama, this space is perfect everywhere, and everything is dynamic within it. All the planets, constellations, stars are located within it. This space is eternal, and is a manifestation of the eternal Providence. You have to accomplish Siddhi of this space, but this space is also constrained.

Naarad said – How can space be limited? This is borderless fully extended. Everything is contained in this. How can anything be superior to this space, zero. Sanatkumar answered – Dear Naarad! The “Memory” is superior to the space.

Memory – Memory is the greatest element, the words come and go in the sky, but the memory is one such element, where the words stay stationary. The basis of “Memory” is “Recollection Capacity”. Consider if fifty people are sitting together at a place and if they do not have memory, then they will not be able to know each other, will not be able to understand each other and will not be able to hear each other in spite of sitting closely together. However, as soon as they get memory power, the recollection power, all of them will be able to hear each other, know each other and understand each other. A person recognizes his children, parents, friends, brothers, kindred, enemies, even animals through only this recollection power. This recollection power is driving this world. We can store events of hundreds of thousands years ago in our memory. We can also store the imaginations of future in our memory.

Science-Knowledge, Food-Water, Space, Speech, Meditation, Sentiments, Determination, Mind etc. are all subjects of the memory. Imagine what happens if anyone loses his memory even for a moment. So, dear Narada! You should pray and worship Memory power to obtain perfection.

Sanatkumar then said that however this memory also has its specific bounds. Narada got surprised again that what could be superior to memory? Everything revolves around the memory. Imagination, Truth, Senses, all are expressions of visual memory. Guru, Brahma, Parmatama, God, Providence, Pilgrimages; all are sensations from our memory, so we are repeatedly instructed to perform their worship and Sadhana.

Sanatkumar answered – Dear Naarad! Hope is superior to Memory.

Anticipation (Hope) – The Memory-Recollection power can relate only to the past. The memory is composed of what is seen, heard and experienced, but when hope is connected with the memory; then it links the human being with the future.

In the absence of hope, a person will breathe, but the life will stop at that point; the absence of hope creates despair and this hopelessness doesn’t let a man live life.

Narada! Think why does every person perform actions? Every person performs actions due to hope, the memory illuminated with hope reminds of mantras. Hope generates wishes for children, wealth and prosperity. The hope drives a person to spiritual upliftment. The hope generates desires within all beings to wish for more of what they have. Everything is operating on the basis of hope. So hope is the basic unit but hope also has a limit. A lot stops when the hope stops, but everything does not get finished.

The Rishi said that therefore life is superior to hope.

Life – Why does every human have a hope? To live i.e. for the life-cycle of the soul. The life is the root “Naabhitatva”. It is similar to a circular Chakra having a “Central Point” and saw-blades on all sides.

The saw-blades of this root life-cycle are Education, Speech, Mind, Determination, Sentiment (emotion), Meditation, Science, Strength, Food, Water, Vitality, Space, Memory and Hope. All are expressions of the basic cycle, one or two of these can get broken, they can merge between each other, but the basic purpose of all is to protect the basic element, all science-knowledge, mind-determination are for the life only.

This body, mind or intellect can get exhausted, but the life never gets tired. The physical body may become weak in the absence of food, water or strength; but the life never weakens. The memory-hope may gain/lose focus in the mind, but the life always stays focused.

This life is the foundation, there is nothing beyond this life. Everything is dedicated to the focal point of the life.  Life is the father, Life is the mother, Life is the brother, Life is the teacher, Life is the Guru, Life is the ultimate reality.

This life element is the “Tatvamasi”…

This life element is the “Tatvamasi”…

This life element is the “Tatvamasi”…

Life is the basis of all elements, where there is life, the whole universe is located there. Narada asked – Then how do I perform Sadhana of Praan-Tatva, the life element? How do I achieve my desire? How do I assimilate this Life element “Tatvamasi”?

The Rishi replied – You do not obtain this, it is already established within you, and it is concealed in the darkness sins of multiple births, it is wrapped in the darkness of memory, hope, attachment, enmity, , strength, pride and arrogance. It is full of science-knowledge, but the layers of sinful actions of do not let you see, understand or experience your own basic life element “Tatvamasi”. You confine yourself only to the physical actions of your body. Always remember that the life element is established in this body itself. The strength, science-knowledge is all contained in this body, then you should repeatedly know and understand this life element. Then you will find peace within yourself, and will achieve the ultimate realization. Your ultimate reality is “Tatvamasi”. Sensing, knowing and understanding self at each moment is the “Tatvamasi” expression.

Remember, the following Shloka –

Om Hreem Mam Prana Deh Rom-Pratirom Cheitanya Jaagraye Hreem Om NamaH ||

Meaning activate and awaken each cell and atom of your body at every waking moment, then energize your body and stimulate your Praan Tatva, Life element. Then all the wishes and desires of the world will become your slaves. When you hear the vibrations of your soul, you will also hear the Paarbhahma Iswar spirit of the God. Those vibrations travel directly to your life, and when you receive instructions from the life element, then all the rays of light – Education, Speech, Mind, Determination, Sentiment (Expression), Meditation, Science, Strength, Food, Water, Vitality, Space, Memory and Hope become perfect.

Look at the sun. There is only one sun, and thousands of rays are emanating from it. All rays are illuminating all directions.  Similarly, the life is the Sun and its rising-falling rays are – Education, Speech, Mind, Determination, Sentiment (Expression), Meditation, Science, Strength, Food, Water, Vitality, Space, Memory and Hope. You have to obtain all of these rays in your life, so achieve Life-element i.e. “Tatvamasi Bhaav”.

I am … I am  … I am the element… This body has the basic element – Life Element. This Life Element is driving this body, mind, intellect, emotions and thoughts. We have to continuously activate this “Tatvam + Asi” consciousness, the root element Sun like Life, the Yagya Purush, has to be continuously kept conscious through the sacrificial oblations. Keep this light flame burning forever and ever, by continuously offering oblations in the form of action-thoughts, mind-intellect, food-water.

Aham Tatvamasi… Aham Praan Tatva masi, Aham Sarv Devaaye Asi… Aham Aadityaye Asi, Aham Sarv Tatvam Asi, Aham Bhaav Tatvamasi, I have to activate my Life Element.

-Gurudev Nand Kishore ji  Shrimali

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