Love and Devotion

प्रेम और समर्पण
मनुष्य मन का सर्वोत्तम भाव
खिल जाता है अस्तित्व
निखर जाता है व्यक्तित्व

 

    • प्रेम एक अद्भुत भाव है। देव से लेकर मानव तक सब पर इसका प्रभाव होता है।
    • प्रेम परम सुख प्राप्त करने का एक सचोट उपाय है।
    • प्रेम से ईश्‍वर मानव बनता है और मानव ईश्‍वर।
    • जब प्रेम अमृत के कुछ बिंदु मानव के हृदय में प्रकट होते हैं तब उसके जीवन में रासायनिक परिवर्तन हो जाता है। प्रेम देह को प्रफुल्लित, मन को उत्साहित और आत्मा को आनंदित कर देता है।
    • प्रेम से तन, मन और जीवन भरा-भरा रहता है।
    • भीषण संसार में किसी के प्रेम भरे दिल को पाना जीवन का सबसे बड़ा लाभ है। सुन्दर व्यवहार और मानव का नेक आचरण मन की निर्मलता से ही संभव होता है।
    • प्रेम, विनम्रता और अहिंसा से किसी का भी दिल जीत सकता है।
    • जब मनुष्य के दिमाग में ज्ञान और बुद्धि ठूंस-ठूंस कर भर जाती है तब उसका अस्तित्व धुंधला होता हुआ देखने को मिलता है। लेकिन जब उसके दिल में प्रेम का भाव भरता है तब उसका अस्तित्व खिल उठता है।
    • दुनिया में सबसे ज्यादा कीमती चीज प्रेम है। प्रेम जीवन को उदात्त और महान बनाता है। प्रेम में सुख और दुःख का भेद नहीं रहता है।

जेहि के हिये प्रेम रंग जामा ता तेहि मुख नींद विसरामा

  • प्रेम में केवल आत्मा की अभिन्नता और समर्पण का आनंद होता है।
  • प्रेम में अनंतता है और ज्यादा से ज्यादा संतृप्त होने की भावना है। सच्चा प्रेम वही है जो दिन प्रतिदिन बढ़ता रहे।

 

प्रेमी अपने प्रेम के सिवा और कुछ देता नहीं है और प्रेम के सिवा किसी में से कुछ लेता नहीं है। प्रेम किसी को ताबेदार करता नहीं है और किसी का ताबेदार बनता नहीं है। क्योंकि प्रेम-प्रेम से ही सम्पूर्ण है। सिर्फ खुद कृतार्थ होने से ज्यादा प्रेमी को और कोई कामना नहीं होती है। प्रेम मनुष्य या जीव का मूलभूत गुण है।

 

प्रेम एक ऐसा शब्द है जो बोलते सब हैं लेकिन उसे जानते कुछ ही हैं। प्रेम भाव दिव्य है। जो नर से नारायण तक जाने के लिए समर्थ है। लेकिन उस भाव से हम भीगे न होने के कारण उसकी दिव्यता को अनुभव नहीं कर सकते हैं। प्रेम जैसे आलौकिक भाव को हमने अपनी वासनाओं से रच कर इतना विकृत कर दिया है की प्रेम शब्द का असली अर्थ विलुप्त होकर घृणा का पात्र बन गया है।

 

प्रेम एक ऐसा समर्पण है कि जिसमें कोई अपेक्षा भरी हो तो वह अशुद्ध हो जाता है और ऐसे प्रेम का उपहार परमात्मा स्वीकार नहीं करता है। जीवात्मा जब ऐसा इच्छा रहित प्रेम, सहज समर्पण परमात्मा को कर लेता है तब उसके दिल में पहली बार आनंद की एक ऐसी लहर उठती है जिसका वर्णन करना असम्भव है। ऐसे प्रेम से व्यक्ति का सम्पूर्ण रूपांतरण हो जाता है।

 

समर्पण और प्रेम यह दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। प्रेम के बिना समर्पण नहीं हो सकता और समर्पण के बिना प्रेम। याद रखें समर्पण एक निर्बल की शरणागति नहीं है। जगत में प्रेम के जैसा कोई बलशाली भाव नहीं है फिर भी प्रेम समर्पण की तरफ जाता है। खुद के इष्ट, पात्र के सामने झुक जाते हैं। जिस प्रेम में अहंकार का अस्तित्व होता है वह प्रेम कदापि झुक नहीं सकता या समर्पित नहीं हो सकता। ज्ञान में अहंकार के लिए थोड़ा स्थान रहता है जिससे अहंकार उत्पन्न होता है। अहंकार प्रश्‍न करता है जबकि प्रेम समर्पित होकर खुद एक प्रश्‍न की तरह बन जाता है।

 

प्रेम एक सेतु है जिस पर सवार होकर व्यक्ति समष्टि तक पहुंच जाता है क्योंकि प्रेम एक बहाव है। बहना प्रेम का स्वभाव है और समर्पण प्रेम की पूर्व शर्त है। परमात्मा प्रेम के सिवा और कोई भाषा जानता नहीं है। जहां पर भाषा का कोई शब्द पहुंचने में समर्थ नहीं है वहां प्रेम बिना मुश्किल के पहुंच जाता है। इसलिए गोकुल की अहीर कन्याओं ने जो देखा वह ज्ञानियों के ज्ञान में और ऋषियों के ध्यान में भी नहीं मिला। प्रेम का एक शब्द वर्षों के ज्ञान से भी ज्यादा प्रकाशित है।

 

जब किसी व्यक्ति के प्रति अकारण भाव होता है या आकस्मिक प्रेम होता है तब मनुष्य के अन्दर की हर एक चीज खिल उठती है। जैसे वसंत ऋतु का आगमन हो जाता है। उसकी वाणी, वर्तन, भाव, प्रतिभाव सबमें परिवर्तन हो जाता है। निर्मल, समर्पित और वासना से रहित प्रेम से मानव के तन, मन और वाणी में संयम पैदा होता है। परमात्मा का आविष्कार होता है।

 

जिसने जीवन में प्रेम रूपी निर्मल अमृत का अंजलि भर पान नहीं किया वह परमात्मा से बहुत दूर रह जाता है। यह समजाते हुए भक्त कवि कबीर ने कहा है कि –

 

ढाई अक्षर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय।

 

जिन्होंने ढाई अक्षर के इस छोटे से शब्द को जाना है, देखा है उन्होंने जरूर ही विराट रूपी परमात्मा को देखा है।

 

प्रेम का सौन्दर्य से घनिष्ठतम सम्बन्ध है । प्रेममयी आंखें सर्वत्र सौन्दर्य का प्रसार देखने लगती हैं। जिस ‘आलम्बन’ के आधार पर प्रेम प्रस्फुटित, विकसित तथा परिपुष्ट होता है, वह अभिनव सौन्दर्य-सुषमा से जग-मग हो उठता है।

 

सौन्दर्य का मुख्य गुण है – आकर्षण। यह आकर्षण शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार का होता है। प्रेम जीवन की पूर्णता की अनुभूति है, अतः वह अपने में सर्वांगपूर्णता की प्रतिष्ठा करता है।

 

प्रेमियों का अनुभव है कि परिपक्व, सुस्वादु, रस भरे और स्निग्ध-सुदृढ़, प्रेम-सम्बन्ध का मूलाधार तभी स्थापित होता है, जब बाह्यावरण को भेदकर हृदय को देखने लग जाय।

 

जहां गंभीर प्रेम स्थापित हो जाता है, वहां बाह्य सौन्दर्य नगण्य हो जाता है।

 

अपने जीवन में सदैव प्रेम भरे भाव से युक्त हों, यह जीवन प्रेम के लिये ईश्‍वर ने उपहार दिया है। इसे प्रेम अमृत से सिंचन करें।

 

Love and Dedication

The most noble feeling within human mind

Blooms up the Existence

Sparkles the Personality

 

Jehi Ke Hiye Prem Rang Jaamaa Taa Tehi Mukh Neend Visaraamaa

 

* Love is a wonderful feeling. It influences everyone from Gods to humans.

* It is a sure-shot method to obtain Divine supreme bliss.

* Love turns God into human, and human into God.

* The entry of few drops of love nectar into human heart causes chemical changes within the life. Love swells the body, cheers the mind and fills the soul with joy.

* Love energises the body, mind and the life itself.

* The greatest gain in life is to receive a heart full of love in this gruelling world. Good conduct and noble behaviour is possible only through purity of mind.

* You can win over anyone’s heart through love, humility and non-violence.

* Stuffing up the information and intellect in human mind blurs its existence. A feeling of love in the heart blooms up his existence.

* Love is the most precious entity in the world. Love brings loftiness and nobleness into the life. Love removes the difference between happiness and sorrow.

* Love just consists of merger of soul and joy of dedication.

* Love is infinite and is ever-unsaturated. The true love grows each and every day.

 

A lover does not give or take anything other than love. Love does not cause or create any dependency. This is so because the love is a complete entity within itself. The lover does not desire anything other than self gratification. Love is the fundamental attribute of a living being, human or animal.

Love is a word which everyone speaks about, but very few understand deeply. Love is a divine emotion. It can transform from humane to divine. However we cannot experience this divine feeling, due to our aloofness from the actual sense of love. We have distorted the actual divine feeling of love so much, that people think of love as an object to hate.

Love is a commitment which gets debased due to high expectations, and such type of love is not acceptable to Providence. When a soul offers a desire-less love full of complete dedication to God, then a wave of joy arises in his heart. It is not possible to explain such joy. Such love transforms the person completely.

Dedication and love are synonymous to each other. Dedication is not possible without love and love is not possible in absence of dedication. Note that the surrender is not a refuge of the weak. There is nothing stronger than a sense of love in this world, and yet the love itself bends towards dedication. The God Himself, bows to the worshipper. A love full of ego can neither bend towards others, nor is capable of dedication. The knowledge-wisdom retains a small space for the ego. The ego questions the self, whereas the love full of dedication turns into a question itself.

Love is a bridge that takes the person to the target-goal since, love is a drift. Flow is the basic nature of love, and dedication is its pre-requisite. The Providence does not know any language other than that of love. It is easier for love to reach those places where the words of language fail. The ignorant girls of Gokul were able to see through love, what the wisdom of wise and meditation of sages could not fathom. A word of love is more powerful than years of published knowledge.

An unexplained or casual love for a person blooms everything within. It resembles the arrival of spring. It transforms his speech, conduct, gesture and response. The serene, devoted morale love inculcates discipline within the physical body, mind and speech. It leads to the growth of divinity.

A person who has never tasted even a spoonful of pure pious love, is miles away from the Almighty. The poet Kabir has explained this fact thus –

Dhaai Akshar Prem Ke Padhe So Pandit Hoe |

Only one who has understood the simple word of love, only he has witnessed the divine Almighty.

Love has very close relationship to beauty. The love-gazed eyes start seeing beauty everywhere. This merger which sprouts, grows and nurtures love, spreads blooms and beauty everywhere.

The core feature of beauty is – the charm. This attraction can be both physical and mental. Love is a feeling of fullness of life, so it grows the totality within the self.

The lovers experience that the mature, tasteful, juicy, rationale, strong-relationship gets established only when one starts seeing within the heart, instead of the outer core-shell.

Setup of serious love reduces the scope of external beauty.

Let your life be always filled with the expressions of love, this life is a gift from the Almighty to love. Water it with the elixir of love.

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