Lord SadaShiva and his Army

भगवान सदाशिव
और
उनके गण
भगवान शिव पशुपति, त्र्यम्बक, पुष्टिवर्धन, नीलकण्ठ, चन्द्रशेखर है। भगवान शिव के गण यक्ष, गन्धर्व, योगिनियां, नायिकाएं, किन्नर-किन्नरी, नाग, भूत, प्रेत, पिशाच, वैताल, डाकिनी, शाकिनी और भैरव है।

 

भगवान शिव के गणों की उपासना स्थानीय देव स्तर और तांत्रिक साधनाओं में विशेष रूप से सम्पन्न की जाती है। शिव के गणों की साधना तो पूर्णतः तांत्रिक साधना ही है जो साधक को तत्काल अभय रक्षा प्रदान कर उसे सिद्धियां वरदान स्वरूप प्रदान करती है।

 


तन पर वस्त्र नहीं, दिशाएं ही जिनके वस्त्र हैं, कमर पर बाघाम्बर या हाथी की खाल और सांप लपेट लेते हैं, नहीं तो बर्फीले पहाड़ों पर दिगम्बर ही घूमते हैं, चिता की भस्म ही जिनका अंगराग है, गले में मुण्डों की माला, केशराशि को जटाजूट बनाए, कण्ठ में विषपान किए हुए, अंगों में सांप लपेटे हुए, जिनका क्रीड़ास्थल श्मशान है और प्रेत-पिशाच गण जिनके साथी हैं, एकान्त में उन्मत्त जैसे नृत्य करते हैं और संसार में अपने भक्तों के लिए सर्वाधिक मंगलमय ‘शिव’ हैं। यह विरोधाभास भी बड़ा रहस्यपूर्ण है कि सदाशिव जब अपने स्वरूप में लीन रहते हैं तब वे सौम्य रहते हैं और जब संसार के अनर्थों पर दृष्टि डालते हैं तो भयंकर हो जाते हैं।

 

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै ‘न’काराय नम: शिवाय।।

 

भगवान शिव का सगुण स्वरूप इतना अद्भुत, मधुर, मनोहर और मोहक है कि उनकी तेजोमयी मंगलमूर्ति को देखकर स्फटिक, शंख, कुन्द, दुग्ध, कर्पूर, चन्द्रमा आदि सभी लज्जित हो जाते हैं। समुद्र-मंथन से उत्पन्न अमृतमय पूर्णचन्द्र भी उनके मनोहर मुख की आभा से लज्जित हो उठता है। भगवान शिव के अलंकार मनोहर त्रिनयन, बालचन्द्र, जटामुकुट और उस पर दूध जैसी स्वच्छ गंगधारा मन को हठात

 

हर लेते हैं। हिमाद्रि के समान स्वच्छ व धवलवर्ण नन्दी पर जब शिव शक्तिरूपा उमा के साथ विराजमान होते हैं तब ऐसे शोभित होते हैं जैसे साक्षात धर्म के ऊपर ब्रह्मविद्या ब्रह्म के साथ विराजमान हैं।

 

शिव शब्द का अर्थ है ‘कल्याण’ और भगवान शिव ही शंकर हैं। ‘शं’ का अर्थ है ‘कल्याण’; ‘कर’ का अर्थ है – ‘करने वाला’, अर्थात् कल्याण करने वाले। कल्याण करने वाले भगवान सदाशिव को उनके साधकों ने कई नामों और उपमाओं से विभूषित किया है। पुराणों और विभिन्न ग्रंथों में भगवान सदाशिव अनेक नामों और उपमाओं से विभूषित हैं।

 

शिव नाम – ईशान, अघोर, तत्पुरुष, वामदेव और सद्योजात

 

पुराणों में भगवान शिव के अनेक नाम प्राप्त होते हैं। भगवान शिव के नामों का इतिहास उनकी अनेक क्रीड़ाओं, रूप, गुण, धाम, वाहन, आयुध आदि पर आधारित हैं। इनमें से पांच नाम विशेष रूप से प्रयुक्त होते हैं – ईशान, अघोर, तत्पुरुष, वामदेव और सद्योजात। समस्त जगत के स्वामी होने के कारण शिव ‘ईशान’ तथा निन्दित कर्म करने वालों को शुद्ध करने के कारण ‘अघोर’ कहलाते हैं। अपनी आत्मा में स्थिति-लाभ करने से वे ‘तत्पुरुष’ और विकारों को नष्ट करने के कारण ‘वामदेव’ तथा बालकों के सदृश्य परम स्वच्छ और निर्विकार होने के कारण ‘सद्योजात’ कहलाते हैं।

 

सोम-सूर्य-अग्नि रूपी तीन नेत्र होने से वे त्र्यम्बकेश्‍वर कहलाते हैं। ब्रह्मा से लेकर जंगम एवं स्थावरपर्यन्त सभी जीव, पशु माने गए हैं, अत: उनको अज्ञान से बचाने के कारण वे ‘पशुपति’ कहलाते हैं।

 

देवों के देव होने के कारण उनकी ‘महादेव’ नाम से निरन्तर उपासना होती रही है। ‘सहस्राक्ष’ नाम उनकी प्रभुता का द्योतक है। वे सभी विद्याओं एवं भूतों के ईश्‍वर हैं, अत: ‘महेश्‍वर’ कहलाते हैं।

 

प्रणव स्वरूप चन्द्रशेखर शिव को ‘पुष्टिवर्धन’ भी कहा जाता है। यह नाम पुष्टि, पोषण और उनकी अनुग्रह शक्ति का द्योतक है। भगवान शिव ने हरिचरणामृत रूपा गंगा को जटाजूट में बांध लिया, अत: वे ‘गंगाधर’ कहलाए।

 

कालकूट विष को अपनी योगशक्ति से आकृष्ट कर कण्ठ में धारण करके ‘नील कण्ठ’ कहलाए। उसी समय उस विष की शान्ति के लिए देवताओं के अनुरोध पर चन्द्रमा को अपने ललाट पर धारण कर लिया और ‘चन्द्रशेखर, शशिशेखर’ कहलाए।

 

उनके तीसरे नेत्र की अग्नि और कण्ठ में कालकूट विष, इन दोनों को शान्त करने के लिए शीतल तत्त्व चन्द्रमा है। कण्ठ में कालकूट विष और गले में शेषनाग को धारण करने से उनकी ‘मृत्यु पर विजय’ स्पष्ट होती है। तामस से तामस असुर, दैत्य, यक्ष, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल, डाकिनियां, शाकिनियां, किन्नर-किन्नरियां, योगनियां, सर्प, सिंह इत्यादि  जिनकी आराधना करें, वही शिव ‘परमेश्‍वर’ हैं।

 

शिवगण महत्ता –

 

परमपिता परमेश्‍वर सदाशिव भगवती पार्वती से विवाह हेतु समस्त देवी-देवताओं और अपने गणों को लेकर हिमालय के राजा के यहां गये। बारात में देवताओं के वैभव और माधुर्य को देखकर वधु पक्ष उन्हें ही वर समझने लगा तो इन्द्र ने कहा कि – हम तो शिवजी के उपासकों (शिव के गणों) के भी उपासकों में निम्नतम हैं।

 

भगवान शिव के गणों, उपासकों की महिमा ही अलग है, ये उपासक भी भगवान शिव के समान ही अलौकिक शक्तियों से परिपूर्ण हैं और प्राचीन काल से ही भगवान शिव के गणों की साधना आराधना का विधान प्रचलित है।

 

भगवान शिव के इन गणों की साधना आराधना कर मनुष्य अपनी नाना प्रकार की कामनाओं तथा भोगों को प्राप्त कर सकता है। शिव के गणों में अचंभित कर देने वाली शक्तियां विद्यमान हैं।

 

तंत्र के अधिष्ठाता भगवान शिव ही हैं। मारण, वशीकरण, स्तंभन, उच्चाटन, मोहन इत्यादि तंत्र की श्रेणी में ही आते हैं तथा मनुष्यों के हितार्थ तथा अहितार्थ दोनों कर्मों में प्रयोग किये जाते हैं। तंत्रों में व्याप्त कई प्रकार की साधनायें मनुष्य को इच्छित भोग प्रदान करने में समर्थ हैं।

 

शिव के गण

 

मनुष्यों की तरह ही भगवान सदाशिव के गण – यक्ष, नाग, किन्नर, राक्षस, नायिकाएं, पिशाच, डाकिनियां, भूत, प्रेत इत्यादि देहधारी तथा विवेकशील होते हैं। परन्तु ये सभी अपने स्वाभाविक या प्राकृतिक गुणों के अनुसार, मनुष्यों से अलग तथा भिन्न हैं तथा अपने अंदर विशेष प्रकार की भिन्न-भिन्न अलौकिक शक्तिओं को समाहित किये हुए हैं। इनके निवास स्थान भी समस्त ब्रह्माण्ड में अलग-अलग विद्यमान हैं; मनुष्य जैसे भूमि या पृथ्वी के वासी हैं, वैसे ही देवता स्वर्गलोक के, गन्धर्व, गन्धर्व लोक के, नाग, नाग लोक के जो पाताल या पृथ्वी के अंदर है, सभी से सम्बंधित अलग-अलग लोक हैं, जो पाताल, आकाश, वायु तथा पृथ्वी में स्थित हैं। ये सभी प्राणी भिन्न-भिन्न दायित्वों का निर्वाह करते हैं तथा मनुष्यों को इच्छित भोग प्रदान करते हैं। भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनियों, योगिनियों का सम्बन्ध सौन्दर्य, सम्मोहन, भोग तथा अलौकिक शक्तिओं से हैं। ये शक्तियां अचंभित कर देने वाले कृत्यों की संचालक हैं।

 

भगवान सदाशिव के इन्हीं शिवगणों में से कुछ प्रमुख शिव गणों का विवेचन –

 

निधिपति यक्ष तथा यक्षिणी –

 

यक्ष, पुरुष तथा उनकी स्त्रियों को यक्षिणियां कहते हैं। इनके सर्वोच्च स्थान पर निधिपति ‘कुबेर’ विराजित हैं तथा देवताओं की निधि के रक्षक हैं, जैन और बौद्ध धर्म में भी निधिपति कुबेर का वर्णन है। ये देहधारी होते हुए भी सूक्ष्म या प्रेत रूप मेंे जहां चाहे वहां विचरण कर सकते हैं।

 

तंत्रों के अनुसार यक्षिणियां साधक से संतुष्ट होने पर उसे रूप सौन्दर्य प्रदान कर धन-धान्य से परिपूर्ण करती हैं। तंत्र ग्रंथों में यक्षिणियों तथा यक्षों की साधना के विस्तृत विवरण प्राप्त होते हैं।

 

नायिकायें –

 

नायिकायें, यक्षिणियां तथा अप्सराओं की उप जाति में आती हैं तथा मन को मंत्रमुग्ध करने वाली अति सुन्दर स्वरूप वाली होती हैं। इनकी साधना वशीकरण तथा सुंदरता प्राप्ति हेतु की जाती हैं, नारियों को आकर्षित करने का हर उपाय इनके पास हैं। ये मुख्यतः आठ हैं, 1. जया 2. विजया 3. रतिप्रिया 4. कंचन कुंडली 5. स्वर्ण माला 6. जयवती 7. सुरंगिनी 8. विद्यावती।

 

किन्नरियां –

 

किन्नरियां, अपने अनुपम तथा मनमुग्ध कर देने वाले सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध हैं। ये मृदुभाषी तथा गायन में निपुण होती हैं। किन्नरियों में रूप परिवर्तन की अद्भुत कला विद्यमान होती है। किन्नरियों का वरदान अति शीघ्र तथा सरलता से प्राप्त हो जाता है। ये मुख्यतः षट किन्नरियों के समूह में जानी जाती हैं; 1. मनोहारिणी किन्नरी 2. शुभग किन्नरी 3. विशाल नेत्र किन्नरी 4. सुरत प्रिय किन्नरी 5. सुमुखी किन्नरी 6. दिवाकर मुखी किन्नरी। गायन तथा सौंदर्यता हेतु किन्नरी साधना विशेष लाभप्रद मानी जाती है।

 

भूत-प्रेत-पिशाच-वैताल-डाकिनी –

 

मनुष्य जाति में भूत, प्रेत, पिशाच, वैताल, डाकिनी इत्यादि, जातियों का अस्तित्व प्राचीन काल से ही है, ये सभी परा शक्तियां हैं। जिस प्रकार हवा को देखा नहीं जा सकता हैं, परन्तु हवा वास्तव में विद्यमान है, उसी प्रकार ये जातियां भी आदि काल से अस्तित्व में हैं। इन सभी को समस्त भूतों के नाथ भगवान् भूत-नाथ शिव का अनुचर माना जाता है तथा इनकी पत्नियां भ्ाूतिनी, प्रेतनी, पिशाचिनी, वैतालिनी आदि भगवान् भूतनाथ की पत्नी शिवा की अनुचरियां मानी जाती हैं। भगवान् शिव तथा भगवती शिवा के अनुचर होने के परिणामस्वरूप ये सभी दैवी, दिव्य तथा अलौकिक शक्तिओं से सम्पन्न हैं, अपने तथा अपने स्वामी शिव-शिवा के भक्तों की अभिलाषाओ को पूर्ण करने में समर्थ हैं।

 

नाग देवता –

 

सर्पों तथा नागों ने देवताओं की कठिन साधना-तपस्या की तथा विशेष पद भी प्राप्त किया। जैसे – भगवान शिव, भगवती देवी तारा, काली इत्यादि के आभूषण सर्प या नाग ही हैं, भगवान विष्णु भी सर्वदा शेष नाग की शय्या पर शयन करते हुए, सम्पूर्ण जगत का पालन पोषण करते हैं। परिणामस्वरूप सर्प जाती भी कई प्रकार की अलौकिक शक्तिओ से सम्पन्न है तथा नाना प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हेतु, इनकी पूजा की जाती है।

 

देवी मनसा, जो भगवान शिव की बेटी हैं, उन्हें भी नाग माता कहा जाता है। सर्प प्रजाति के मुख्य 12 सर्प हैं – 1. अनंत 2. कुलिक 3. वासुकि 4. शंखपाल 5. पद्म 6. महापद्म 7. तक्षक 8. कर्कोटक 9. शंखनाद 10. पातक 11. विषधान 12. शेष नाग।

 

योगिनियां –

 

योगिनियां, देवी पार्वती के संग सर्वदा रहने वाली सखियां हैं। योगिनियां साक्षात् आदि शक्ति काली की ही सहयोगी शक्तियां हैं तथा सर्वदा ही शिव अर्धांगिनी पार्वती के साथ रहती हैं। घोर नामक दैत्य से साथ युद्ध के समय, आदि शक्ति काली ने ही, समस्त योगिनियोें के रूप में अवतार लिया। ये नाना प्रकार की अलौकिक शक्तिओं से सम्पन्न हैं, वशीकरण, मारण, स्तंभन इत्यादि कर्म इन्हीं की कृपा द्वारा ही सफल हो पाते हैं। मुख्य रूप से योगिनियां आठ हैं तथा चौसठ योगिनी के नाम से जानी जाती हैं। जो अपने गुणों तथा स्वभाव से भिन्न भिन्न रूप धारण करती हैं। योगिनीयां शीघ्र प्रसन्न होती हैं, और अपने साधकों को सिद्धियां भी प्रदान करती हैं।
ये, सभी तंत्र विद्या में पारंगत तथा योग साधना में निपुण हैं तथा अपने साधकों की समस्त प्रकार के कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं। देवी पार्वती ने इन्हीं सहचरी योगिनियों की क्षुधा निवारण करने हेतु, अपने मस्तक को काट कर रक्त पान करवाया था तथा छिन्नमस्ता नाम से प्रसिद्ध हुईं, देवी पार्वती इन्हें अपनी संतानों के तरह स्नेह करती हैं तथा पालन-पोषण भी करती हैं।

 

भैरव

 

भगवान् शिव के अनन्य सेवक भैरव हैं। भैरव शब्द चार अक्षरों के मेल से बना है, भा, ऐ, र और व, भा का अर्थ प्रकाश, ऐ का अर्थ क्रिया-शक्ति और रव का अर्थ विमर्श है। इस प्रकार जो अपनी क्रिया-शक्ति से मिलकर अपने स्वभाव से सम्पूर्ण जगत को विमर्श करता है वो भैरव हैं। जो समस्त विश्‍व को अपने ही समान तथा अभिन्न समझकर अपने भक्तों को सब प्रकार केे भय से मुक्त करते हैं वे भैरव कहलाते हैं।

 

भैरव शिव के अनन्य सेवक के रूप में विख्यात हैं तथा स्वयं शिव के ही प्रतिरूप माने जाते हैं। शिव के अन्य अनुचर, जैसे भूत-प्रेत, पिशाच आदि के वे स्वामी या अधिपति हैं। इनकी उत्पत्ति भगवती की कृपा से हुई हैं, परिणाम स्वरूप ये स्वयं भी शिव तथा शक्ति के अनुसार ही शक्तिशाली तथा सामर्थ्यवान हैं तथा भय भाव स्वरूप में इनका अस्तित्व हैं।
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