Interpretation of Guru – Shisya

 

गुर-शिष्य सम्बन्ध भाव – अनुभूति

 

निश्‍चिंत, निर्द्वन्द, निर्भय

 

गुरु ही मेरी आस्था
गुरु ही मेरा भरोसा

 

जब आपके मन में यह भावना आ जाती है कि मैं जैसा भी हूं अपने आपको आपके सुपूर्द करता हूं। मैं अपने आपको पूर्ण रूप से समर्पित कर रहा हूं। यह स्थिति आस्था की स्थिति है, यही स्थिति गुरु तत्व, गुरु ज्ञान को प्राप्त करने की स्थिति है।

 

एक सुन्दर सी कथा आती है, एक राजा को ज्ञान प्राप्ति का बड़ा ही शौक था। नई-नई विद्याएं सीखने की उसकी इच्छा थी। एक बार उसके मन में वेदों की पूर्ण जानकारी प्राप्त करने की इच्छा जाग्रत हुई। उसने अपने मंत्रियों को अपनी इस इच्छा के बारे में बताया  और इस कार्य हेतु उनसे उसके लिए व्यवस्था करने को कहा, मंत्रियों ने विचार-विर्मश करके दूसरे राज्य से वेदों के प्रकाण्ड पंडित एक आचार्य को बुलाया और उन्हें कहा कि आप हमारे राजा को नित्य-प्रति वेद, शास्त्रों का ज्ञान कराईये।
राजा भी नित्य प्रति आचार्य जी से वेदों का ज्ञान प्राप्त करता रहा। आचार्य जी राजा को एक-एक कर वेद श्‍लोक पढ़ाते जा रहे थे, अभ्यास करा रहे थे। उसकी मीमांसा भी समझा रहे थे। आचार्य बड़ी मेहनत कर रहे थे लेकिन राजा को वह शिक्षा पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो रही थी। एक दिन राजा ने बैठे-बैठे विचार किया कि – मैं इतनी मेहनत कर रहा हूं और आचार्य जी भी, जो इतने ज्ञानी, जानकार, योग्य, तपस्वी व्यक्ति हैं और लगातार मेहनत कर रहे हैं, तो फिर मुझे ज्ञान क्यों प्राप्त नहीं हो रहा है? ऐसी अवस्था कुछ दिनों तक चलती रही, आखिर एक दिन उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने आचार्य जी से ही प्रश्‍न किया।

 

हे गुरुवर! क्षमा करें, मैं कई महीनों से आपसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूं पर मुझे इसका कोई लाभ नहीं हो रहा है? ऐसा क्यों है?

 

आचार्य ने शांत स्वर में कहा कि – इसका कारण बहुत सीधा है।

 

राजन ने कहा कि – यदि कारण इतना सीधा है तो मुझे विस्तार से बताईये, मैं पूरा मन लगा रहा हूं लेकिन मुझे शिक्षा और ज्ञान क्यों प्राप्त नहीं हो रहा है?
आचार्य ने कहा कि – राजन् बात बहुत छोटी है और उसके मूल में बात यह है कि आप अपने आपको ‘बड़ा’ समझते हैं और जाने अनजाने में अहंकार से भरे हुए हैं। आप पद और प्रतिष्ठा में बड़े हैं, इस पूरे राज्य के राजा हैं लेकिन ज्ञान प्राप्त करते समय एक बात को आप भूल गये कि – आपका और मेरा सम्बन्ध गुरु और शिष्य का सम्बन्ध है। ज्ञान प्राप्ति के लिये यह सम्बन्ध आवश्यक है।
गुरु होने के नाते मेरा स्थान आप से उच्च होना चाहिए और आप मेरे आसन से नीचे आसन लगाकर बैठें लेकिन अभी तक यह हो रहा है कि आप ऊंचे आसन पर बैठ रहे हैं, अहंकार के आसन पर बैठे हैं इसलिये आपको न तो कोई शिक्षा प्राप्त हो रही है और न ही ज्ञान प्राप्त हो रहा है।

 

जिस दिन आप नम्र और अहंकार से रहित होकर मुझे ऊंचे आसन पर स्थापित करेंगे और आप विनम्र होकर मुझसे नीचे बैठकर शिक्षा ग्रहण करेंगे तो संसार में ऐसा कोई कारण नहीं है कि आपको ज्ञान प्राप्त न हो।
गुरु ने कहा कि – राजन् एक बात और याद रखना ज्ञान प्राप्ति के लिये गुरु की योग्यता पर केवल विश्‍वास करने से ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। जिस दिन गुरु के प्रति शिष्य के मन में आस्था एवं भरोसा जाग्रत हो जाता है उस दिन पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है। अब तक आपको मेरे ऊपर केवल विश्‍वास था, अब आप इस विश्‍वास को आगे बढ़ाकर आस्था के संसार में प्रवेश करें। आस्था ही सम्पूर्ण ज्ञान का, सम्पूर्ण आत्मज्ञान का आधार है।

  

गुरु शिष्य सम्बन्ध – 

 

गुरु शिष्य सम्बन्ध के बारे में हजारों-लाखों ग्रंथों का सारभूत तथ्य यही है कि गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है और ज्ञान, आत्मज्ञान के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में आत्म ज्ञानी गुरु की आवश्यकता रहती है। इसलिये गुरु को धारण किया जाता है।
यदि गुरु जीवन में इतने आवश्यक हैं तो कुछ प्रश्‍न उठने स्वभाविक हैं –
 

  • क्या प्रत्येक व्यक्ति का गुरु अलग-अलग होता है?
  • क्या प्रत्येक ज्ञानी व्यक्ति गुरु हो सकता है?
  • क्या गुरु का विद्यावान होना आवश्यक है?
  • साधक अपने गुरु पर कितना विश्‍वास करें?
  • साधक अपने गुरु से कितनी आशा रखें, कितनी अपेक्षा रखें?
  • क्या गुरु के प्रति मन में प्रीत-प्रेम का भाव हो?
  • क्या वह अपने गुरु में पूर्ण आस्था रखें?

 

यहां पर दो प्रश्‍न मुख्य रूप से आयें हैं पहला प्रश्‍न है – ‘विश्‍वास’ और दूसरा प्रश्‍न है – ‘आस्था’। क्या गुरु के प्रति विश्‍वास होना चाहिए अथवा आस्था?
सामान्य रूप से विश्‍वास और आस्था एक जैसे दिखाई देते हैं लेकिन वास्तव में इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।

  

विश्‍वास क्या है?

 

विश्‍वास आपके मन का एक भाव है। जिसके माध्यम से आप संसार के कई प्राणियों से अपने रिश्ते-नाते निभाते हैं। आपके अपने घर-परिवार, भाई-बहन, दोस्त-रिश्तेदार, मित्रों, सहयोगियों से विश्‍वास के आधार पर सम्बन्ध चलते रहते हैं। इसलिये कहा गया है कि इस जगत में आपसी सम्बन्धों का आधार विश्‍वास है। इसलिये जब आप कहते हैं कि मैं अमुक-अमुक पर विश्‍वास करता हूं तो इसके साथ-साथ यह भी इच्छा रखते हैं कि जो आपका विचार है, आपकी सोच है, सामने वाला भी उसी के अनुसार कार्य करेगा।
विश्‍वास का बंधन बड़ा ही कच्चा बंधन होता है क्योंकि विश्‍वास को आपने अपनी मनोवृत्ति, भावनाओं के अनुसार बनाया  है। 
विश्‍वास एवं आस्था-भरोसे को हम चर्चा का विषय बनाएं इससे पूर्व हमें इनके भीतर के भावों को समझ लेना चाहिए। विश्‍वास को हम एक ऐसी व्यवस्था मान सकते हैं जिसमें उसके दोनों पक्ष विश्‍वास करने वाला एवं जिसके प्रति विश्‍वास किया जाता है अतः विश्‍वस्त, इन दोनों के बीच सम्बन्ध अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है अतः दोनों की कुछ अपेक्षाएं हैं एवं दोनों की कुछ जिम्मेदारियां एवं दायित्व हैं, जब ऐसी अवस्था में एक पक्ष अपनी जिम्मेदारी या दाायित्व से भटक जाता है तो दूसरे पक्ष का विश्‍वास टूट जाता है। जबकि आस्था के बारे में हमें यह समझ लेना चाहिए कि हमारी आस्था होती है कि हम अमुक कार्य, पूजा, उपवास, साधना करेंगे तो हमारा कार्य पूर्ण होगा लेकिन सामने से दूसरा पक्षकार स्वयंमेव उपस्थित नहीं होता है और न ही यह वादा करता है कि हमें उक्त कार्यों में चाहा गया फल मिलेगा ही यदि हमें चाहा गया फल मिल जाता है तो हमारी आस्था और ज्यादा दृढ़ हो जाती है यदि नहीं मिले तो हम अपने उपास्य, आराध्य से लड़ते-झगड़ते नहीं हैं अपितु अपने प्रयासों को जांचते है, साधते है और पहले से ज्यादा सजगता के साथ एक और प्रयास करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि विश्‍वास में दूसरे की गलती निकालते हुए हम अपने को बचाते हैं तो आस्था (भरोसे) में अपनी गलती ढू़ंढने का प्रयास करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।
अब प्रश्‍न उठता है कि क्या गुरु और शिष्य का सम्बन्ध विश्‍वास पर आधारित होना चाहिए या आस्था पर। शिष्य हर समय गुरु पर विश्‍वास करें और गुरु भी शिष्य पर विश्‍वास करें।
मेरा विचार है कि गुरु शिष्य के सम्बन्ध को विश्‍वास के तराजू पर नहीं तौला जा सकता है। यदि आप गुरु को अपने विश्‍वास की विषय-वस्तु मानते हैं तो समझ लीजिये आपने गुरु को अपने विचारों की एक सीमा में कैद कर लिया है। विश्‍वास एक बंधन का नाम है, जहां आपको स्वयं के विचारों के अनुसार थोड़ी तसल्ली मिल जाती है, थोड़ा दिलासा मिल जाता है लेकिन इस स्थिति में कभी-कभी एक विचित्र स्थिति भी हो जाती है। यदि आपके विश्‍वास के अनुसार कार्य नहीं हुआ तो आप का विश्‍वास ही हिल जाता है और धीरे-धीरे टूट जाता है।
तो विश्‍वास से ऊपर क्या स्थिति है जो गुरु-शिष्य सम्बन्धों को बनाती है। यह स्थिति है आस्था-भरोसा। आस्था का शाब्दिक अर्थ है –
  • मन का वह भाव जिसमें आशा भी हो, विश्‍वास भी हो।
  • मन का वह भाव जिसमें आपकी संतुष्टि हो।
  • मन का वह भाव जिसमें असंभव से असंभव बात की पूर्ति की भी संभावना हो। 
आस्था आपके भीतर का एक विशेष गुण है और यह आस्था किसी दृश्य, वस्तु, स्थान पर निर्भर नहीं करती है। जब आप कहते हैं कि अमुक व्यक्ति पर, अमुक स्थान पर, अमुक मूर्ति में मेरी आस्था है, मैं भरोसा करता हूं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि आप यह स्पष्ट कह रहे हैं कि – मुझे कोई लाभ प्राप्त हो या न हो, मेरी आप पर आस्था है।
विश्‍वास मन का भाव है और आस्था मन से परे उच्चतम भावनाओं का स्वरूप है। जिसके लिये मन को विवश नहीं होना पड़ता है। मनुष्य का मन आस्था के अधीन रह सकता है। जहां आस्था है उसी के अनुसार मन को कार्य करना पड़ेगा।
आस्था का तात्पर्य है, आपने स्वयं को किसी भी प्रकार की पसंद, नापसंद से अपने आपको ऊपर उठा दिया है। आस्था का मूल भाव है –
‘अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में। है जीत तुम्हारे हाथों में और हार तुम्हारे हाथों में।’ 
अर्थात् मैंने अपने आपको जीत-हार से ऊपर उठा लिया है। कोई भी स्थिति आये मुझे अन्तर नहीं पड़ता है क्योंकि आप पर मेरी आस्था है।
आस्था के लिये क्या आवश्यक है – आस्था के लिये सबसे पहले अपने स्वयं के अस्तित्व को, स्वयं के व्यक्तित्व को, स्वयं के ‘मैं’ को स्वयं के ‘अहं’ को भूलना पड़ता है। 

  

आपका व्यक्तित्व क्या है?

 

आप एक व्यक्ति हैं, आप अपने आपको ‘मैं’ कहते हैं। वह एक संयोग से बना है। आपने अपने जीवन में किन-किन मुश्किलों का सामना किया, किन-किन कठिनाईयों को पार किया, किन-किन स्थितियों को जीया? इन सबसे आपका व्यक्तित्व निरन्तर विकास की ओर अग्रसर हो रहा है। यह जीवन आप पर जिस प्रकार से आघात करता है, उसी के अनुसार आपका व्यक्तित्व बदलता रहता है। उसी के अनुसार आप कठोर बनते रहते हैं, क्रोधी बनते हैं, अहंकारी बनते हैं अथवा विनम्र बनते हैं, धनी बनते हैं अथवा निष्ठुर बनते हैं। कई प्रकार की ठोकरें जो आपने जीवन में खाई हैं उनके अनुसार आपकी विचार-धारा निरन्तर बदलती जाती है और उसी विचार धारा के अनुसार आपका व्यक्तित्व भी बदलता जाता है।

 

इसलिये जो आपका व्यक्तित्व बना है उसमें आपने पूरे जीवन में जो क्रियाएं की हैं वे ही आपके व्यक्तित्व में दिखती हैं। यह व्यक्तित्व आपका बाह्य स्वरूप है लेकिन इसके भीतर एक ओर व्यक्तित्व है। इस व्यक्तित्व में उतरने से आप गुरु को समझ सकते हैं, जान सकते हैं। अपने बाह्य व्यक्तित्व से गुरु को जानने, समझने का प्रयास करना एक मूर्खता है। आपको हजारों चोटें मिलीं तो आपने उसी के अनुसार संसार में गुरु के बारे में समझना प्रारम्भ कर दिया। यह एक बहुत बड़ी भूल है।

 

गुरु को केवल और केवल आन्तरिक व्यक्तित्व से ही समझा जा सकता है।

 

आपके बाह्य व्यक्तित्व में विश्‍वास-अविश्‍वास का मंडल फैला हुआ है।आपका बाह्य व्यक्तित्व जो देखता है, समझता है उसी के अनुसार संसार में तौल-माप प्रारम्भ कर देता है। इसीलिये गुरु को जानने, समझने में भूल हो जाती है।
आपके आन्तरिक व्यक्तित्व में विश्‍वास, अविश्‍वास से परे, एक विशेष तत्व है और वह तत्व है – ‘आस्था’।
इस आस्था के लिये अपने स्वयं के अस्तित्व, अपने अहंकार को तोड़ना पड़ता है, भूलना पड़ता है। अपने ‘मैं’ को खण्ड-खण्ड करना पड़ता है। कुछ पलों के लिये अपने आपको मिटाना पड़ता है। तब आस्था और भरोसे का अमृत कलश खुलता है, फूटता है। 

 

यदि आप गुरु की वास्तविक अनुभूति, उपस्थिति चाहते हैं तो अपने आपको अर्थात् अपने बाह्य व्यक्तित्व को भूलाकर समर्पण की क्रिया करनी पड़ेगी। जहां समर्पण है, वहीं पूरा भरोसा है, समर्पण प्रेम का उच्चतम सोपान है। समर्पण अच्छा-बुरा कुछ नहीं देखता, समर्पण में तो व्यक्ति सबसे पहले अपने आपको भूला देता है। इसलिये समर्पण को आस्था का प्रवेश द्वार कहा गया है। 
आप पूजा-प्रार्थना, साधना, ध्यान, जप-तप, सब करते हैं और जब आप यह कहते हैं कि मेरा विश्‍वास है इसलिये मैं करता हूं तो वास्तव में पूजा, प्रार्थना, साधना नहीं कर रहे हैं। क्योंकि विश्‍वास की सीढ़ियों में कुछ लेन-देने की भावना रहती है। आपको यह आशा होती है कि मैं यह क्रिया कर रहा हूं इससे मुझे कुछ प्राप्त होगा और जब वह स्थिति प्राप्त नहीं होती है तब आपका विश्‍वास धीरे-धीरे संदेह में बदलने लगता है और यही संदेह धीरे-धीरे अविश्‍वास में बदल सकता है।

 

लेकिन जिस दिन आपने पूजा, प्रार्थना, ध्यान, साधना पूरी आस्था के साथ सम्पन्न करनी प्रारम्भ कर दी उस दिन आप पूरे आन्तरिक प्रेम के साथ गुरु को समर्पित हो जाते हो। तब आप स्वयं अपने आपको गुरु को, ईश्‍वर को सौंप देते हो। जब आपके मन में यह भावना आ जाती है कि मैं जैसा भी हूं अपने आपको आपके सुपूर्द करता हूं। मैं अपने आपको पूर्ण रूप से समर्पित कर रहा हूं। यह स्थिति आस्था की स्थिति है, यही स्थिति गुरु तत्व, गुरु ज्ञान को प्राप्त करने की स्थिति है। 

 

आपके व्यक्तित्व में और आपके जीवन में सार रूप से क्या है? कटु सत्य यह है कि – आपका जीवन केवल और केवल अनुभवों का एक भण्डार है। जैसे-जैसे इस जीवन में आपके अनुभव हुए हैं, उसी प्रकार से आपकी बुद्धि का, आपकी चेतना का, आपकी सोच का विकास हुआ है। अब ऐसी स्थिति में कुछ नया कैसे सिखाया जा सकता है? आप बार-बार अनुभवों से ही सीखना चाहते हो, भूतकाल की बातों से ही, अनुभव से ही, अपनी सोच से ही सीखना चाहते हो तो कुछ भी सीख नहीं सकते हो। तब शिष्य बन नहीं सकते। शिष्य बनने के लिये अपनी पुरानी सोच को, अपनी पुरानी चोटों को, सांसारिक अनुभवों को भूलाकर, हटाकर अलग प्रकार से चिन्तन करना पड़ेगा। 
इस चिन्तन का नाम ही आस्था है। विश्‍वास जगत में आपसी व्यवहार का नाम है और आस्था उस विश्‍वास से परे आन्तरिक जगत, आन्तरिक भाव के उद्घाटन का नाम है। 

  

आवश्यकता है गुरु को भीतर स्थापित करने की – 

 

जब आप भरोसे की बात करते हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है, आप गुरु को अपने भीतर प्रवेश करा दें। इस प्रवेश के लिये आपको अपने आपको पूरी तरह से खोल देना पड़ेगा। तभी गुरु तत्व, गुरु भाव आपके भीतर भेद कर प्रवेश कर सकते हैं और तब ही ऊर्जा रूप में गुरु आपके भीतर स्थापित हो सकते हैं। इस स्थिति में कुछ भी हो सकता है क्योंकि आपने अपने मानस में बड़ी-बड़ी दीवारें स्थापित कर रखी हैं, इस जगत में कई बार ऐसा भी हुआ है कि आपकी आशाओं और उम्मीदों के अनुसार कार्य नहीं हुआ, बार-बार आपको चोटें भी लगी हैं इसीलिये आप डर से भर गये हैं इसीलिये अपने मन के भीतर किसी को प्रवेश करने ही नहीं देते हैं। अपने मन के भीतर गुरु को स्थापित करने से भी डरते हैं।
लेकिन जब यह स्थिति बन जाये कि आपकी भावनाएं और अधिक संवेदनशील हो जाएं और आप विश्‍वास से ऊपर उठ जाएं तो आपके भीतर समर्पण का भाव आ सकता है इसीलिये आस्था के लिये पूर्ण समर्पण आवश्यक है और जिस दिन आप यह कहते हैं कि मैं गुरु पर पूर्ण भरोसा रखता हूं तो इसका सीधा अर्थ है, आपने अपने मन के भीतर की, डर की, सारी दीवारें तोड़ दी हैं आपने अपने-आपको पूर्ण रूप से गुरु को सौंप दिया है। 
जब आपने अपने आपको सौंप दिया है तो क्या होगा? गुरु आपकी इच्छाओं, आशाओं के अनुसार कार्य नहीं करेंगे। गुरु अपनी शक्ति के अनुसार, अपनी ऊर्जा के अनुसार आपके भीतर कार्य करेंगे। आस्था में गुरु की इच्छा शक्ति आपके रोम-रोम में प्रवाहित होने लगेगी।

  

आस्था और आपकी ऊर्जा – 

 

गुरु और शिष्य का सम्बन्ध एक ऊर्जावान सम्बन्ध है। आपका अनुभव एक सामान्य धरातल पर स्थित है। अब इसे उच्चतम धरातल पर ले जाना है। जैसे ऊपर चढ़ने के लिये ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है उसी प्रकार अपने मानस को ऊंचे धरातल पर ले जाने के लिये एक विशेष तीव्र ऊर्जा शक्ति की आवश्यकता होती है। इस ऊर्जा शक्ति को इस व्यक्तित्व को गुरु कहा गया है।
गुरु आपके व्यक्तित्व के उस आन्तरिक भाव को स्पर्श करते हैं जहां अब तक कोई स्पर्श नहीं कर सका है और यह स्पर्श कब संभव है जब आप विश्‍वास के भाव से ऊपर उठकर आस्था के भाव में प्रवेश कर जाते हैं। इसके लिये बहुत बड़ी छलांग लगानी पड़ती है, बहुत बड़ी कोशिश करनी पड़ती है और यह छलांग आपके अब तक के अनुभव के आधार पर नहीं लग सकती है। अब तक के अनुभव के आधार पर तो केवल और केवल विश्‍वास आ सकता है। विश्‍वास के ऊपर अपने आन्तरिक व्यक्तित्व से एक बड़ी छलांग लगानी पड़ती है। एक नया पवित्रतम् सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। अपनी ऊर्जा को पूरी तरह से झौंक देना पड़ता है। यह इसलिये आवश्यक है कि यदि आपको अपने आनन्दमय कोष में उतरना है, आनन्द के गहरे सागर में अपने आपको उतारना है तो ताकत के साथ एक बड़ी छलांग लगानी है और यह बड़ी छलांग एक गहरी आस्था से ही संभव है। 

  

गुरु में ही आस्था-भरोसा क्यों?

 

गुरु में आस्था होने की दो स्थितियां हैं – पहली स्थिति में गुरु की उपस्थिति में गुरु के निकट होने पर आपमें बदलाव आने लगता है। आप अपने आपको कुछ क्षणों के लिये खो ही देते हैं। आप भावमय, आनन्दमय कोष में चले जाते हैं। आप अपने भीतर उतर जाते हैं।
दूसरी स्थिति में और भी अधिक विशेष प्रकार की स्थिति का निर्माण होता है। इस आस्था में आप अपने आपमें बेपरवाह हो जाते हैं, निश्‍चिन्त हो जाते हैं इस विचार को ही छोड़ देते हैं कि आपके साथ क्या होगा? जब इस प्रकार का विचार आये तो इसका सीधा अर्थ है आपने अपने आपको गुरु के प्रति भाव रूप में समर्पित कर दिया है। आपका शरीर कार्य कर रहा है, आप आपकी नौकरी, व्यापार कर रहे हैं, अपने संसार में चल रहे हैं, घर-परिवार पाल रहे हैं लेकिन इन सब के उपरान्त आप बेपरवाह हैं, निश्‍चिन्त हैं।
शरीर की गति बाह्य तौर पर वैसी की वैसी ही रहेगी लेकिन मन की गति बदल जायेगी। समर्पण से ही आपके भीतर एक रूपान्तरण की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। प्रथम स्थिति में गुरु एक विशेष चेहरा, शरीर होता है, हाव-भाव होता है, वचन होता है लेकिन जैसे-जैसे आप समर्पण के माध्यम से आस्था के आनन्द सागर में आगे बढ़ते हैं वैसे-वैसे गुरु की मानसिक उपस्थिति को आधार बना लेते हैं। तब ही लम्बे समय तक आप गुरु के साथ पूर्ण रूप से एकाकार होकर अपने आपको रूपान्तरित कर देते हैं।
इसीलिये गुरु विश्‍वास का उपकरण नहीं, गुरु जानकारी का साधन नहीं, गुरु बौद्धिक ज्ञान का स्वरूप नहीं अपितु एक गहरे भरोसे का अमृत कलश है। जिसके लिये आपको एक जोरदार छलांग लगानी है। तब आप सारे बंधनों को तोड़कर इस संसार में जीते हुए भी अपने आपको नवीन जन्म दे सकते हैं, नवीन ऊर्जा से परिपूर्ण कर सकते हैं।

 

बस अपने मन की गहराइयों से गुरु से अपना नाता जोड़ लें, गुुरु आपका विश्‍वास नहीं, विश्‍वास से ऊपर आस्था भरोसे का भाव है।

 

आपका ही गुरु, आपकी ही आस्था, आपका ही भरोसा, आपका ही आनन्द, सब कुछ आपका… बस! आप एकाकार हो जाएं…।
Guru-disciple Relationship  
Emotion – Cognizance  
Confident… Indisputable… Courageous…

 

Guru is my faith,
 
And Guru is my trust.

 

When the feeling arises in your mind that whatever I am, I offer myself to you. I dedicate myself completely. This situation is the position of faith, this is the state to obtain Guru-Tatva and Guru-knowledge.

 

There is a beautiful legend, a certain king was fond of obtaining great enlightenment. He had a constant desire to learn new disciplines. Once his mind was filled with a desire to  obtain complete knowledge of the Vedas. He told about this wish to his ministers, and ordered them to arrange accordingly. The ministers discussed and invited a learned scholar of Vedas from a neighboring kingdom and requested him to regularly impart knowledge to the king about the Vedas and other related scriptures.
 
The king also continued to obtain knowledge of the eternal Vedas from the acharyaji. The acharyaji instructed the king about the scripture verses, one by one, the king practiced them and understood the deeper details. The acharyaji was putting painstaking efforts, but the king was not getting complete education. One day, the king reflected – I am working so hard and the acharyaji, who is so wise, knowledgeable, qualified, ascetic person is also putting in thorough conscientious  efforts, and yet I am not getting complete knowledge? This situation continued for  a few days, and finally running out of patience one day, he put this question to the acharyaji.
 
O Guruvar! Pardon me, I am learning from you for many months, but I am not getting benefit? Why is that?
 
The acharya replied in a quiet tone – the reason is very simple.
 
The king requested – if  the reason is so straightforward, then please explain to me in detail, I am concentrating my entire mind, but I am not getting education and knowledge?
 
The acharya advised – Rajan, this is a very minor fact, and the root cause is that you consider yourself “big” and are full of arrogance knowingly-unknowingly. You are great  in stature and prestige, you are the king of this whole state, but you forgot an important fact while getting knowledge that – our relationship is one of Guru and disciple. This relationship is very significant and essential to obtain knowledge.
 
My position is higher than yours since I am your Guru, and your seat should be lower than mine; but till now you are seated on the high seat on the dais, sitting on the seat of the ego, so you are unable to obtain either knowledge or learning.
 
The day you become humble and get devoid of ego; and place me on a higher pedestal and study politely while seated in a lower position, you will certainly acquire knowledge, nothing will stop you from the path of learning.
 
The Guru continued – Rajan, always  remember that one doesn’t master knowledge just by trusting in the capability of the Guru.  When the pupil’s mind gets filled with faith and belief; only then he obtains total knowledge. You had a certain trust in me until now, you should now extend this trust to enter the sphere of faith and belief.  Faith is the basis of all wisdom, of the entire self-knowledge.

 
 
Guru-disciple relationship –
 
Thousands and thousands of texts mention one essential fact about the Guru-disciple relationship that one cannot obtain knowledge without a Guru, and every seeker seeking knowledge and wisdom requires an enlightened  Guru. So one becomes a disciple of a Guru.

If Guru is so important in the life, then some questions naturally arise –
 

  1. Does everyone have a separate Guru?
  2. Can every wise person be a Guru?
  3. Is it necessary for a Guru to have knowledge?
  4. How much trust should a sadhak have on his Guru?
  5. How much expectation and anticipation should  a sadhak desire from his Guru?
  6. Should one have live expression towards his Guru?
  7. Should he have complete  faith in his Guru?

 
 
There are two main questions here – first is “Trust” and the second question is “Faith”. Should one have Trust or Faith towards his Guru?
 
Generally, Trust and Faith appear alike but the fact is that there is a big difference between the two.

 
 
What is Trust?
 
Trust is a feeling within your mind through which you deal with multiple relationships with different individuals. Your relationships with your  home-family, siblings, friends, relatives, friends, colleagues are all based on trust. Therefore it is said that all mutual relationships in the world are based on trust. So when you state that I trust so-so, then  you have an inner desire that so-so will also act as per your wish and your thought.
 
The bond of trust is very weak because you have cast this bond as per your own attitude and feelings.
 
Before we discuss in detail about trust and faith-reliance,  we should study their inner expressions. We can consider trust as an arrangement in which both parties, the one trusting and the other to be trusted,  have a mutual interdependent relationship, and so both have few expectation as well as some  responsibilities and duties. In such cases when one party deviates from its responsibility, then it breaks the trust of the other party. On the other hand, about the faith, we should understand that we believe that our wishes will surely get fulfilled; if we perform a certain prayer, worship, fasting or meditation, inspite of the fact that the other party has not presented itself  or promised to do so. This faith becomes stronger if our desires get fulfilled, otherwise we scrutinize our efforts, polish them and try again with renewed vigor and alertness instead of fighting or quarreling with our deity or God. The essence is that we save ourselves by blaming others in Trust whereas we endeavor to progress by improving ourselves in Faith.
 
Now the question is that whether the  Guru-disciple relationship, should  be based on trust or  faith. Should the disciple place unconstrained trust on Guru, and the Guru should also similarly have infinite trust on the disciple.
 
In my view, you cannot weigh the Guru-disciple relationship on the scales of trust. If you consider Guru as an object of trust, then realize that you have limited Him within the bounds of your thoughts. Trust is an emotional bind,  where you get a little bit of mental  satisfaction  as per your belief,  you get content for a little while. However, sometimes a odd situation may develop. If your expectations do not get fulfilled, then your trust wavers and starts diminishing bit by bit.
 
So what is the foundation above the trust, which strengthens the Guru-disciple relationship. This attribute is Faith-Conviction. The literal meaning of faith is –
 

  • A belief  of mind which contains hope and confidence.
  • A belief of mind which satisfies you.
  • A belief  of mind which expects  accomplishing of  impossible looking tasks

 
Faith is a  special quality of your inner mind and it does not depend on any visual scene,  object, or place. When you state that you have faith on a certain person, on a particular place, on a particular deity, then you are simply saying that – irrespective of whether I get any benefits or not, I have full faith on you.
 
The trust is a feeling  of outer mind and faith is a manifestation of the inner emotions.  We do not need to force our mind to do this. A person’s mind can exist as a subject to faith. The mind has to perform  according to the  belief and faith.
 
Faith implies that, you have raised yourself above all types or likes or dislikes. The essence of faith is –
 
“Now I have offered all of my life unto your your hands.
 
Now the victory is upto you, and so is the defeat.”
 
i.e. I am no longer bothered about winning or losing. I am not worried about any result since I have full faith on you.

What is required for faith – One needs to first forego the existence of self,  the personality of self, the “self” itself and own ego of  “I” to build up the faith.
  
What is your personality?
 
You are a particular  individual, you call yourself as “I”. This word  is made up of a combination. What difficulties have  you faced in your life, what challenges did you overcome, under what conditions did you live? All of these have contributed towards continuous development of your personality. The shocks and obstacles which you face in life, shape up your personality. It causes you to become a hard task-master, become angry, become arrogant or a humble person, become rich or become inflexible. The shocks and jolts which you receive in life, alters your thought-stream and this in turn molds up the alterations in your personality.
 
So your personality is a reflection of, whatever actions you have performed in your life, they manifest in your personality. This is the outer  appearance of your personality, but there is an inner personality as well. You can comprehend and realize  the Guru by diving into it. It is utter stupidity to try to understand and  fathom your Guru though the external personality.  You have received  thousands of shocks, and you tried to comprehend Guru according to those blows and setbacks. This is a big mistake.
  
The Guru can and can only be comprehended through the  inner personality.
 
Your external personality is covered with an environment of trusts and distrusts. Your outer personality decides, weighs measures according to whatever it  perceives, sees and understands  in the world. This causes misunderstandings  in understanding and comprehending the Gurudev.
 
Your inner personality has a significant attribute beyond trust-distrust, and that  particular element is – the ‘Faith‘.
 
One has to eliminate, to forget the own existence, the ego, to get to this Faith.  The ego  has to be broken in thousand pieces. One needs to destroy the self for some moments. Only then,  the pitcher containing the nectar of faith and confidence opens up.
 
If you wish for the real presence, the actual manifestation of the Guru, then you will have to initiate the dedication process, forgetting about the self and outer personality. The dedication leads to the faith.  This commitment does not differentiate between good or bad, it first causes the person to forget about the self. So dedication has been called as the entrance door to the faith.
 
You perform prayer-worship, meditation,sadhna, or chanting-spirituality, and when you state that you do so out of trust, then you are not actually performing this prayer-worship, sadhna or meditation. Because the steps of trust are always filled with some expectations of give-and-take. You hope that I will get something by performing this activity, and when your expectations do not materialize, then  your trust starts converting into doubt and that doubt slowly turns into distrust and disbelief.
 
But the day you start doing prayer-worship, meditation,sadhna, or chanting-spirituality with full faith, then you dedicate yourself to Guru with complete inner love. Then you offer yourself to your God, your Guru. Then a feeling enters  your mind that Whatever I am, I offer myself unto you. I dedicate myself completely unto you. This situation is the position of faith, this is the position to achieve Guru-knowledge, and the  Guru-tatva elements. mentor elements,  and master the knowledge to achieve the status.
 
What is the essence of your personality and your life? The hard truth is that  – your life is just only a repository of experiences. The accumulation of  new experiences in this  life have shaped and developed that evolution of your intelligence, your consciousness,  and your thought-process. Now how can anything new be taught in such a situation? If you wish to learn only from repeated experiences, from the events of  the past, from the experiences, from your thoughts, then you cannot learn anything. You cannot become a disciple. You will have to think afresh, by forgetting and eliminating you old thoughts, old shocks and jolts, old mundane experiences; to become a disciple.
 
This thought and meditation is called faith. Trust is interaction within the external society and faith is the initiation of a new sense internally, deep inside the inner space.
 
It is essential to setup Guru into the inner space –
 
When you talk of faith, it simply means you have to open yourself to let Guru come in. You will need to open yourself completely for this. Only then can Guru-element and Guru-sense enter you, and Guru can be setup as energy within you.
 
Anything can happen in this situation because you have surrounded your psyche within large walls, you have not received results as per your hopes and expectations multiple times,  you have received injuries from  shocks and blows, and this has filled you with fear,  and therefore you do not let anyone enter your mind. You are afraid to even setup Guru within your mind.
 
But when the situation becomes more favorable, and your feelings become more sensitive, and you move beyond trust, then the sense of dedication may arise within you, and therefore Full dedication is a pre-requisite for Faith and the day when you realize that I have full confidence on Gurudev then that means that you have broken away all the walls of fear and distrust within your mind, and that you have offered yourself completely to Gurudev.
 
What happens after you offer yourself? Guru will not act as per your wishes and hopes.  Guru will act within you as per His power and His energy. Faith will cause the will-power of Guru to flow through each vein and nerve.
  
Faith and your energy –
 
The relationship between Guru and disciple is an energetic connection. Your experience is based on a normal surface. Now it needs to be elevated to the highest ground. As more energy is required to climb up the stairs, similarly to take your psyche to a higher level, a special swift power is required. The personality of this special  energy force is termed as  the Guru.
 
The Guru touches your innermost senses of personality, which no one has been able to touch until now, and this touch is only possible when you  rise above the sense  of trust into the deep expression on faith. To achieve this, a big jump, with major efforts  is required; and you cannot make those tries on the basis of your limited experiences. You can only obtain trust through your experiences till-date. A big jump is needed from this trust through your inner personality. A new pious relationship needs to be built up. The whole quantum of  energy has to be used. So it is important that if you wish to dive into your joy, deeply dive into this vast ocean of joy, then a big jump with all your efforts is required, and such a strong jump is possible only with full faith.
 
Why have Faith-Confidence only in the Guru?
 
There are two states of developing faith in Guru – In the first state you start changing in the presence of Guru, while close with  Guru.  You lose yourself for a few moments. You get into the blissful realms of joy. You dive within yourself.
 
The second state involves development of deeper scenarios. You become nonchalant, you become carefree, you completely abandon the idea of thinking about the results. When such thoughts start occurring, then it means that you have emotionally dedicated yourself to the Gurudev. Your body is physically working, you are doing your job or your business, progressing in this society, looking after the family, but inspite of all this, you are detached, you are content.
 
The body will remain same externally, but the pace of mind with alter. The dedication initiates an inner transformation within you. In the first case, you visualize Guru as a particular face, a particular body, with the expression of various emotions, sense and thoughts; but as you progress deeper into the joys of faith through dedication, you start considering the mental presence of Guru as the basic foundation. Then you completely merge yourself with the Guru for a longer duration to transform yourself.
 
So the Guru is not an instrument of mere  trust, He is not a mere source of information, He is not a mere expression of intellectual knowledge; rather He is a nector urn of deep faith. You need to make a strong jump for this. Then you can acquire a new birth, breaking free from all the ties and get filled with new novel energy.
 
You only need to merge your mental depths with Gurudev, Guru is not merely trust, He is the expression of Faith and Confidence.
 
Your own Guru, your own faith, your own belief, your own joy, everything is yours … just! You need to merge ….

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