Guru Divine Flow of Energy

गुरु की ऊर्जा प्रवाह
यंत्र और प्राण प्रतिष्ठा

 

यह तो सभी जानते हैं कि संसार के सारे पदार्थ पांच मूल तत्वों जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश से बने हुए हैं। इसी प्रकार यंत्र का निर्माण भी पंचतत्वों से किया जाता है। सामान्य व्यक्ति के मन में यह प्रश्‍न आता है कि यंत्र के ऊपर कुछ रेखागणित की जटिल आकृतियां बनाई जाती हैं। कुछ लकीरें खीचीं जाती हैं। कुछ त्रिभुज, कुछ चतुर्भुज, कुछ वृत इत्यादि बनाएं जाते हैं। इनका वास्तविक महत्व क्या है? इसे बहुत कम लोग जानते हैं। इस प्रकार से तो कोई भी गणितज्ञ, कलाकार या विद्यार्थी किसी भी धातु पर कोई आकृति का निर्माण कर देगा तो क्या वह आकृति यंत्र बन जायेगी।

 

यंत्र का शाब्दिक अर्थ है – मशीन, जिससे कोई क्रिया सम्पन्न की जाती है। लेकिन मशीन कौन नियन्त्रित करता है, यह जानना समझना भी आवश्यक है। कितनी ही अच्छी मशीन अथवा यंत्र क्यों न हो यदि उसे चलाने वाला ही समझदार नहीं है, योग्य नहीं है तो वह मशीन उपयोगी नहीं हो सकती है। इस प्रकार से तो यंत्र का अंकन कोई भी कर सकता है तब ये यंत्र केवल धातु के टुकड़े हैं, क्योंकि उन पर कुछ लकीरें ही तो खींची हुई होती हैं।

 

जब तक यंत्र पर अंकित की गई रेखाओं, त्रिभुज, चतुर्भुज, वृत्त पर विशेष क्रिया नहीं की जाती है तब तक यह यंत्र सामान्य धातु का टुकड़ा ही है। जब इस यंत्र पर विशिष्ट क्रिया, प्राण प्रतिष्ठा की जाती है तो वह धातु की आकृति केवल आकृति न होकर सजीव हो जाती है। उस शक्ति का प्रतिरूप हो जाती है, जिसकी आकृति उस यंत्र पर अंकित होती है। ध्यान दें कि काली यंत्र, लक्ष्मी यंत्र, बगलामुखी यंत्र, श्रीयंत्र, गणपति यंत्र, शिव यंत्र, भैरव यंत्र सब की आकृति, गणित अलग-अलग प्रकार की होती है। जब समर्थ गुरु इन यंत्रों की प्राण प्रतिष्ठा करते हैं तो इन रेखाओं, बिन्दुओं और धातु के खण्ड को चैतन्य कर देते हैं और उसे सम्बन्धित देवता का प्रतिरूप बना देते हैं। आप शिव के हजार स्वरूपों के सामने साधना नहीं कर पाते हैं, शिव का वास्तविक स्वरूप शिव यंत्र से ही प्राप्त होता है। उस यंत्र में ही शिवत्व भाव विद्यमान है। क्योंकि उस शिव यंत्र पर गुरु ने अपनी शक्ति द्वारा अपने मंत्रों द्वारा अपनी विशिष्ट क्रिया द्वारा प्राण तत्व को संचारित किया होता है तब वह यंत्र शिव रूप, काली रूप, महाविद्या रूप, श्रीयंत्र और लक्ष्मी रूप बन पाता है।

 

गुरु द्वारा प्राण प्रतिष्ठा क्रिया करना और उसके उपरान्त शिष्य द्वारा उस विशिष्ट यंत्र का उचित स्थापन कर गुरु पूजन कर उस यंत्र के सम्मुख मंत्र जप करना और वह भी उपयुक्त माला लेकर मंत्र जप करना ही साधना कहलाता है। 

 

विशेष रूप से यह बात सदैव याद रखें कि आप केवल यंत्र पर मौली, कुंकुम, अक्षत, धूप, दीप अर्पण नहीं कर रहे हैं आप साक्षात् उस देवी-देवता को ये तत्व अर्पण कर रहे है। प्राण प्रतिष्ठा की क्रिया द्वारा ही यह सजीव तत्व जाग्रत होता है।

 

मूल बात याद रखें कि संसार की सारी मशीनें-उपकरण किसी न किसी प्रकार की ऊर्जा देने पर ही चलते हैं। स्वयं अपनी इच्छा से कोई भी यंत्र, मशीन चल नहीं सकती है। इसी प्रकार जब यंत्र को गुरु अपनी शक्ति देते हैं तभी यंत्र चैतन्य होता है और कार्यकारी रहता है।

 

सदैव अपने यहां सद्गुरु द्वारा प्राण प्रतिष्ठित यंत्र ही स्थापित करें और उन यंत्रों के सम्मुख ही अपनी साधना करें। याद रखें कि साधना में आपका बहुत अधिक बल लगता है। अपने बल और ऊर्जा को व्यर्थ न बहाएं। इसी प्रकार एक-एक यंत्र को प्राण प्रतिष्ठित करने में गुरु को अपनी शक्ति बल और देवत्व का वह भाव यंत्र में स्थापित करना होता है इसलिये गुरु की भावना और अपनी शक्ति का सही संयोग कराएं।
Guru

Divine Flow of Energy

Yantra and Praana-Pratishthaa (Enlivenment)

 

Everyone know that all materials in the world are composed of five basic elements – water, fire, air, earth and sky. Similarly, the Yantras are also constructed with five elements. The general public is curious about the complex geometrical shapes on the Yantra. Some lines, triangles, quadrilaterals and circles are drawn on it. What is their real significance? Only very few people know about its importance. Will any shape drawn by any mathematician, artist or student on a metal will make it a Yantra.

The literal meaning of the word Yantra is – machine, which is used to perform a specific action. But it is also important to understand about the operator-controller of the machine. Any good machine or Yantra is completely useless if its operator is unwise or incapable. Similarly anyone can draw shapes on a Yantra. However, then these Yantras are nothing more than some pieces of metal with some lines drawn on them.

A Yantra is a simple piece of metal until a special process is performed on the drawn lines, triangles, squares and circles. The specific process of Praana-Pratishthaa imparts life to these metallic shapes. It becomes a living reflection of the divine energy, whose shape is drawn on that Yantra. You should note that the shapes are different on each Yantra – Kali Yantra, Lakshmi Yantra, Baglamukhi Yantra, Shree Yantra, Ganpati Yantra, Shiva Yantra or Bheirav Yantra. The lines, dots and metallic shapes become activated and attain the divine reflection of the Gods-Goddesses, after Praana-Pratishthaa by capable Guru. You cannot perform Sadhana in front of thousands of Shiva forms, we can obtain the real form of Lord Shiva only through Shiva Yantra. The divine essence of Lord Shiva is present in that Shiva Yantra, because Guru has consecrated and sanctified that Shiva Yantra through special mantras and specific processes. Thus the specific Yantra attains the form of Lord Shiva, Mother Kali, Mother Mahavidhya, Shree Yantra or Mother Lakshmi.

Sadhana starts with the Praana-Pratishthaa of Yantra by Gurudev, followed by proper setting-up of that special Yantra, Guru-poojan, and appropriate Mantra chanting in front of that Yantra with a specific mala-rosary.

You should always remember that you are not just offering Mouli, Kumkum, Akshat, Dhoop, Deep on the Yantra, rather you are offering it directly to that divine God-Goddess. This enlivening occurs after the Praana-Pratishthaa process.

You should remember that all machines-tools operate only after receiving a specific energy. Any Yantra or machine cannot run on its own in absence of energy. Similarly the Yantra gets activated and becomes operational after receiving the divine energy from Gurudev.

You should always setup the Yantras which are Praana-Pratishthit by Gurudev, and you should perform Sadhana in front of such Yantras. You know that Sadhanas require a tremendous force and energy from you. Do not waste your strength or energy. Similarly Guru has to imbibe His own Divine energy in Praana-Pratishthit of each Yantra, so you should use the correct combination of your power and Guru’s energy.

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