Dialog with Loved ones – September 2018

अपनों से अपनी बात…

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

अरे भाई! आनन्द आ गया, रोम-रोम प्रसन्न हो गया हरिद्वार गुरु पूर्णिमा में आपका उत्साह, जोश और प्रेम देखकर। आप लोग इतने अधिक जोश से भरे हुए हो, इतना अधिक उत्साह है और मेरे प्रति इतना अधिक प्रेम है ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं था। तुम्हारे चेहरों का नूर देखकर, मुझ में भी नूर आ गया है।

 

लाली मेरे शिष्य की जित देखू तित लाल
लाली देखन मैं गई और मैं भी हो गयी लाल
तुम सब एकजुट होकर हरिद्वार में काम कर रहे थे, हंस रहे थे, नाच रहे थे। 48 घण्टे अनवरत नाचते-गाते साधना भी कर रहे थे, जयकार भी कर रहे थे और प्रसन्न भी हो रहे थे। अब मुझे लग रहा है कि – ॐ सह नाववतु… हम गुरु और शिष्य एक साथ मिलकर श्रेष्ठ यात्रा पर संलग्न हैं। मा विद्विषावहै…  कोई शक्ति तुम्हारे और मेरे बीच में विद्वेष नहीं डाल सकती।

 

आनन्द से लबालब, प्रेम से सराबोर, उत्साह से भरे तुम शिष्यों को देखकर आकाश के देवताओं, योगियों को भी निश्‍चित रूप से आश्‍चर्य हो रहा होगा। तुम्हारे पितरेश्‍वर भी तुम्हें देख-देख कर आशीर्वाद की वर्षा कर रहे होंगे कि मेरे कुल में ऐसी संतानें उत्पन्न हुईं जो गुरु के साथ पूर्ण एकाकर हो गई हैं।

 

पहली बार मुझे विश्‍वास हुआ है कि – तुमने मेरे साथ चलने का निश्‍चय कर लिया है। इससे पहले मैं तुम्हारे भावों में निश्‍चय-अनिश्‍चय, कभी बैचेनी तो कभी निराशा, कभी शंका तो कभी दृढ़ता देखता था। पर अब मुझे आपके चेहरों पर केवल और केवल आशा और उत्साह भरा निश्‍चय दिखाई दे रहा है।

 

मैं तो हर समय तुम्हें पुकार रहा था, बार-बार आवाज दे रहा था। तुम ही मेरा हाथ छुड़ा-छुड़ा कर भाग जाते थे। पर इस बार हम सब ऐसी मजबूती से जुड़े हैं। एक-दूसरे का हाथ थामा है कि – अब संसार की कोई शक्ति गुरु और शिष्य को अलग-अलग नहीं कर सकती है। तुम्हारा और मेरा पंथ, जीवन मार्ग निखिल पंथ ही है और इस पर हम चलते ही रहेंगे, जीवन के इस पार भी और उस पार भी। सम्बन्ध बनाना है तो एक जन्म का क्यों बनाएं, जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध बनाएं।

 

इस बार तुमने अपना वास्तविक स्वभाव बताया है, वास्तव में तुम प्रेम, उत्साह और आनन्द से भरे हुए एक पूर्ण व्यक्तित्व हो। तुमने अपने स्वभाव को पहली बार अपने मन से देखा है, अपने मन से पहली बार जीया है।

 

यह प्रेम का भाव है, केवल एक विश्‍वास का भाव नहीं है। आपसी भरोसे का भाव है।

 

प्रेम बसे जो दिल में, फैले तो सारा जहां इसमें है।
लेकर बन्दे से खुदा तक की हर डोर इसके बस में है॥
यह प्रेम भौतिक नहीं आध्यात्मिक है और जब हम प्रेम से भरे होते हैं तो तन-मन सब आनन्दित हो जाते हैं। यह कामनामय संसार बड़ा ही प्यारा लगने लगता है। अपनी श्रद्धा, अपना समर्पण, अपना विश्‍वास, अपने ख्वाब, अपना चैन, अपनी नींद सब कुछ दे देना ही तो प्रेम है। अपना सबकुछ खोकर गुरु का शिष्य का हो जाना इसमें जो दिव्य आनन्द है वह अवर्णनीय है, अकथनीय है।

 

भरा है अमृत का प्याला, प्रेम का प्याला बस तुम एक काम करना इसे सुरक्षित रखने का प्रयास करना। तुम्हारे हाथों में ही, तुम्हारे मन में ही यह प्रेम, अमृत का घट है। बहुत मेहनत कर मैंने तुम्हें सजाया है, संवारा है, इसे भरा है, अपने मन के भावों से। ज्ञान तो तुममें पहले से ही भरपूर था, पूर्व जन्मों में भी तुम निश्‍चित रूप से गुरु से जुड़े हुए थे, इसीलिये तो इस बार भी पूरी तरह से जुड़ पाए हो।

 

जो भी तुम्हारे मन में विचार आए, उन विचारों को लिखना, समझना और पढ़ना। फिर तुम्हीं प्रयास कर उनके हल ढूंढ़ना। तुम्हें उत्तर भी मिल जाएंगे, समाधान भी मिल जाएंगे और कहीं गाड़ी अटक गई तो याद रखना गुरु तुम्हारे पीछे खड़े हैं।

 

जितनी होगी तड़फ तुम्हारे दिल की, सदा उतनी ही उसके दिल तक जायेगी॥

 

अजीब तड़फ है तुम्हारी, बहुत कुछ पाना चाहते हो, बहुत कुछ मिल रहा है और बहुत बड़े-बड़े लक्ष्य भी तुमने बनाए हैं। उन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए तुम चलो, पर बहुत तेजी से भागना मत, अपने आपको थका मत देना। अपने मन और प्राण की ऊर्जा को सदैव और सदैव जाग्रत रखना, तुम्हे अपनी प्राप्ति का आनन्द भी अनुभव करना है। कार्य करने में आनन्द आयेगा तो कार्य अवश्य सफल होंगे।

 

तुम भी गुरु के पास आते हो तो गुरु के सान्निध्य में तीव्र ऊष्मा का अनुभव करते हो। तुम्हारा चेहरा लाल हो जाता है, उस पर एक चमक सी आ जाती है। गुरु के पास तुम सर्दी, गर्मी, बरसात सब भूल जाते हो। यह मैंने हरिद्वार में प्रत्यक्ष तुम्हारे भीतर देखा है। मैं केवल तुम्हारे चेहरे नहीं पढ़ता हूं, तुम्हारे मन की किताब को भी पढ़ता हूं।

 

पर मेरा एक आग्रह है – काल क्रम में तुम्हें मुझसे दूर भी जाना पड़ता है तब भी तुम इसी जोश, इसी उत्साह, इसी लालिमा, इसी प्रेम के साथ अपने आपको भरे रखना। अपना प्रेम अमृत का प्याला संभाल कर रखना। मैं तो तुम्हारा मित्र हूं, सखा हूं, सहयोगी हूं, बंधु हूं। ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ तो फिर तुम कभी-कभी अपने आपको अकेला क्यों अनुभव करते हो? क्यों उदास हो जाते हो? बेफिक्र रहो, बेफिक्र रहना तुम्हारा वास्तविक स्वभाव है।

 

एक ऊर्जा का भाव सब जगह संचारित हुआ है, जहां-जहां तुमने अपने परिवार के साथ, अपने सहयोगियों के साथ गुरु पूर्णिमा का सामूहिक पूजन यज्ञ, तप, जप सम्पन्न किया है। तुम कभी भी अकेले नहीं हो, एक गुरुत्व अनुभूति हर समय तुम्हारे साथ है। हमारे तार आपस में मन की तरंगों से जुड़े हुए हैं। इन तंरगों को प्रवाहित होने के लिये किसी और माध्यम की या किसी और सहारे की आवश्यकता ही नहीं है।

 

हम गुरु और शिष्य दोनों का खुद को भूलकर एक हो जाना ही प्रेम है। जहां द्वैत की हल्की सी लकीर भी न रहे।

 

अजब प्रेम नगर अजब जादू हो गया।
मैं था जो पहले मैं, बस तू ही तू हो गया॥
अब कब मिलोगे?, अगली गुरु पूर्णिमा पर या उससे पहले… जब भी इच्छा हो आ जाना…।
नन्द किशोर श्रीमाली

Dialogue with loved ones

Dear disciple,

Blessings!

It was an awesome experience at Haridwar! The Guru Poornima Shivir was sheer joy. The explosion of your love and energy has overwhelmed me. Not even in my wildest dreams I had thought that my disciples would shower me with that amount of love. Believe me, your love and affection has inspired and energised me for the whole year.

In the words of Kabir

Wherever I see, I witness your phenomenal love
And your love has touched me, coloured me and transformed me.

In Haridwar I felt the cohesive strength of our organisation. Throughout those 48 hours when you participated in the Shivir, you and I had merged on a transcendental plane. You were submerged in divine bliss. In that state of ecstacy I saw you work, pray, perform Sadhanas and chant Guru’s name.

I am convinced that the Upanishad’s saying has translated in our life. Together me and you (the Guru and the disciple) are traversing towards unraveling brilliance in our lives and no force can disrupt us in our journey. We have merged. You are in me and I resonate in your hearts.

Thank you! It is such a humbling, inspiring and fulfilling thought.

I am sure even the gods in the heaven, the divine Rishis have been overjoyed to see our spiritual union. Your ancestors would be proud of you after seeing your love and devotion for your Guru. An offspring devoted to the Guru can rescue the entire clan (read the departed souls by bringing them closer to the salvation).

After Haridwar Shivir, I am convinced that now you will walk with me with firm steps and conviction. The traces of doubts that were visible initially have disappeared. Earlier, your steps were shaky and our association depended on the swing of events in your life. But, now you have changed. You have resolute faith in me and you are filled with hope. And with determination you are walking with me.

Earlier, you were a bit unsure. Our bond was fragile and like a reluctant school kid you would leave me and go back to your world. Standing at the fence, I would watch you leave with tears in my eyes and a choked voice. You would ignore my call and walk away.

That was yesterday. Today the scenario has changed. You have held me with passion and force. We are no longer two separate entities. Our union is complete – the Guru and the disciple have merged with each other. Now, nothing can separate us. Together, we will create new milestones on our Nikhil journey and our relationship transcends lifetimes.

During Haridwar Shivir, I got to know your true nature. The facades that you have carefully built around yourself disintegrated and your inner nature unraveled itself. Intrinsically, you exude joy, enthusiasm and happiness. The purity of love shines through your soul. That drives you. That inspires you.

The spiritual love between us is a source of unadulterated joy. At Haridwar Shivir, I experienced the culmination of our love. You relinquished all that you hold close to your heart for me and showered me with devotion, trust and affection. I am fortunate to have you as my disciple.

As a Guru I am committed to protect your joy. Your inner being should shine with the divine light. I have spent sleepless nights to imbue your heart with the divine happiness. That happiness has radiated through you during the Haridwar Shivir. It permeated your thoroughly.

I am sure you were connected with me even in your past life. And, that’s the reason our connection was instant in this lifetime.

My task is to make you self sufficient. Whenever you feel stuck, you should write down the problem statement. The chances are that you will discover the solution on your own. There might be times when a solution will elude you. In those hours I am there to rescue you. Trust me!

Your achievements are determined by zeal. It is the passion and the restlessness for success. Staying rest+less is mandatory for success. It means you will have fewer periods of ‘rest’ until you achieve your goal.

It is a marker of your passion. When you succeed, so do I. I want you achieve all the milestones that you’ve set for yourself. I want you to work harder but I don’t want you to work faster. Stay motivated. Work constantly. Rest less. But do rest because you should not burn out.

I am there to inspire you. I am there to imbue you with my energy. Whenever you feel tired come to me. I will ENERGISE you.  At Haridwar, I felt that energy. Your radiant face is a testament to your love, affection and energy. The force of love makes it possible to overcome seasonal inconveniences. I saw that at the Haridwar shivir.  

You may have to move on with life. We might not be able to meet as frequently as we would love to. That doesn’t mean you will let that joy and exuberance peter away. You have to carefully guard it because it is your cherished possession. It will drive you towards success.

I am your friend, philosopher and guide. I am your parent, teacher and mentor. And you are my treasure. I just want you to be stress free. I want you to sink your anxieties. For that you need to regularly perform sadhanas. Meet with your Guru bhais and perform communal sadhana.

We have merged, we are one. No force on the universe can separate us. That’s love. That’s culmination. That’s climax because we dumped our individual identities and forged a new one.

You are in me now. Every second. And I reverberate in you.

When do we meet next? Next Guru Poornima? Whenever you wish to see me, come over. I am there for you?

Yours sincerely,

Nand Kishore Shrimali

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