Dialog with Loved ones – October 2017

अपनों से अपनी बात…

 

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

एक बच्चा था जन्म हुआ, जन्मते ही रोया। मां-बाप को वह रोने की आवाज भी बड़ी मधुर प्रतीत हुई। थोड़ा बड़ा हुआ तो कभी माता गोद में लेती, तो कभी पिता गोद में लेते। फिर वे दोनों मिलकर प्रयास करने लगे उसे चलना सिखाने का, कभी प्यार से, कभी उलाहने  से, कभी डांट कर। मगर उसे चलना सिखाने का अनवरत प्रयास करते रहे।

 

वह बालक चलना सीखते-सीखते गिर पड़ा… उसे फिर उठाया, मां-बाप ने, थोड़ा पुचकारा, लेकिन फिर खड़ा किया। फिर चलना सिखाया और आश्‍चर्य, कि वह बालक चलना सीख गया, दौड़ना सीख गया।यहां तक की मां-बाप से भी तेज दौड़ने लगा।

 

वह बालक कौन है? वह बालक तुम हो।

 

चलना सीखने की कोशिश में कभी तुम्हारे घुटने छिले, कभी तुम्हारे सिर पर चोट लगी, तुम क्या करते – रोने लगते।

 

तुम भी बहुत रोये, तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हारे घुटनों पर, तुम्हारे सिर पर महरम पट्टी भी की लेकिन तुम्हारे चलने, खेलने और दौड़ने पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया।

 

तुम्हें चोट भी लगी, दस दिन में तुम फिर ठीक हो गये और खेलने, कूदने, दौड़ने के लिये तैयार हो गये…

 

क्योंकि खेलना, कूदना, दौड़ना तुम्हारी स्वाभाविक प्रवृत्ति थी। मां-बाप की गोद में बैठे रहना तुम्हारी स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं थी।

 

वह बालक तुम ही हो, हम सभी हैं। बड़े होने के लिये बालक तो बनना ही पड़ता है। तुम भी अपने घुटनों को देखना, सिर को देखना, कहीं न कहीं कोई न कोई चोट का निशान तो अवश्य होगा।

 

खैर! अब तुम बड़े हो गये हो। तो अब तुम्हारी वह खेलने, कूदने, दौड़ने की स्वाभाविक प्रवृत्ति कहां चली गई है? क्या तुमने उसे रोक दिया है या वह प्रवृत्ति रुक गई है।

 

तुम अब भी गिरते हो, फर्क बस इतना है कि अब गिरने पर तुम्हारा शरीर नहीं छिलता, मन छिल जाता है। शरीर पर चोट नहीं लगती, अब मन पर चोट लग जाती है और फिर तुम हताश हो जाते हो लेकिन तुम अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति चलना, दौड़ना, हंसना कैसे रोक (छोड़) सकते हो?

 

तुम रुक जाओगे तो भी समय थोड़े ही ना रुकेगा।

 

तुम्हारा मन अभी भी चलना चाहता है, यह मन की प्रवृत्ति है। वह चोट के बावजूद आगे बढ़ना चाहता है। हंसना चाहता है, खिलखिलाना चाहता है लेकिन तुम्हारे इसी मन के दूसरे कौने में हताशा-निराशा भर गई है और वो तुम्हारे सारे मन पर अधिकार जमाना चाहती हैं।

 

क्या तुम ऐसा होने दोगे? निराशा को अपने जीवन के उजाले को लीलने दोगे?

 

कौन हैं अब तुम्हारे मां-बाप जो तुम्हारे गिर जाने पर बोल रहे हैं, शाबास बेटा खड़ा हो जा कोई बात नहीं।

 

तुम्हारी चोट से उनके मन में भी चोट अवश्य आई होगी, लेकिन उन्होंने अपने मन पर काबू रखकर अपने दर्द को तुम्हारी उन्नति से जोड़ दिया। उन्होंने अपने दर्द को छुपा दिया। जिससे तुम निराश नहीं हो जाओ। पहले तुम्हारे पास मां-बाप थे, अब गुरु हैं।

 

गुरु भी तो तुम्हारे माता-पिता हैं। याद करो – ‘‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’’

 

दर्द तो गुरु को भी बहुत होता है। जब कई बार तुम गिर जाते हो, थक जाते हो, आहत हो जाते हो। फिर भी गुरु तुम्हारे दर्द को समझते हुए भी अपने-आप पर काबू करते हुए तुम्हें कहते हैं, कोई बात नहीं एक बार ओर प्रयास करो… एक बार ओर प्रयास करो…।

 

तुम्हें ओर तो कोई कहने आएगा नहीं कि कोई बात नहीं, एक प्रयास और, एक प्रयास ओर। लोग तो तुम्हें रौंदते, कूचलते आगे बढ़ जाएंगे। हर एक तो अपने-अपने कामों में, अपनी-अपनी दुनिया में, अपने-अपने ख्यालों में ओर अपने-अपने मुकामों को पाने में व्यस्त है।

 

गुरु तुम्हारे हाथ को अपने हाथ में लेकर केवल सांत्वना नहीं देते हैं। गुरु उत्साहवर्द्धन करते हैं कि अभी तुम्हें वापिस खड़े हो जाना है, चलना है, दौड़ना है।

 

वैसे तुम सब दौड़ना किसलिये चाहते हो? तुममें से कुछ लक्ष्मी प्राप्ति के लिये, कुछ धन के लिये, कुछ सम्मान के लिये और कुछ परिवार के लिये दौड़ रहे हैं। गुरु को तो तुम्हारे धन से कुछ लेना-देना नहीं। तुम्हारी नौकरी से, व्यापार से कुछ लेना-देना नहीं। फिर भी तुम्हारी उन इच्छाओं में गुरु अपने आपको जोड़ लेते हैं जिनके लिये तुम दौड़ रहे हो। तुम्ही तो दौड़ना चाहते हो, थकना नहीं चाहते हो। फिर तुम थक जाते हो और गुरु की ओर देखते हो।

 

तुम थके हुए हो फिर भी हर बार गुरु यही कहते हैं – कुछ न कुछ मार्ग अवश्य मिलेगा। तुम प्रयास करो। ऐसी हिम्मत देने वाला, ऐसे मीठे शब्द बोलने वाला गुरु के सिवा कोई ओर है क्या? कोई नहीं है… कोई नहीं है।

 

इसीलिये गुरु की उपमा देने के लिये कोई और शब्द बना ही नहीं है। गुरु ही अपने आप में सम्पूर्ण शब्द है। जिसकी कोई तुलना नहीं है।

 

गुरु ही सहारा हैं, गुुरु ही आसरा हैं। तुम कुछ लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हो लेकिन जिस दिन तुम गुरु को अपना लक्ष्य बना लोगे उस दिन गिरने से घबराओगे नहीं। कोई चोट भी लग गई तो भी वापिस उत्साह से खड़े हो जाओगे और चल पड़ोगे अपने मार्ग पर।

 

हर परिवर्तन के लिये, हर संघर्ष के लिये तुम अपने आपको तैयार रखना। परिवर्तन की हर पीड़ा से कोई न कोई सुखद उत्पत्ति होती है। हर संघर्ष से क्षमता बढ़ती है। गुरु ने पकड़ा है हाथ, साथ है हर समय – तुम्हारे भाव में, तुम्हारे मन में, तुम्हारे साथ… तुम्हारे साथ… तुम्हारे साथ..

 

नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with Loved Ones …

Dear Loved One,

Divine Blessings,

A child was born. He started to cry immediately after birth.  The voice of the crying child sounded very sweet to the parents. He grew in the laps of his mother and father. Later on,  his parents tried to teach him to learn to walk, with love, persuasion and sweet rebukes. They continued to strive to teach him to learn to walk on his own feet.

The child fell down while trying to walk. .. The parents picked him up, consoled, and encouraged him again to try to walk. They continued to teach him, and one day, he started to prattle on his own little feet. He started to walk, run, even faster than his parents.

Can you identify that child? It is you, yourself!

While learning to walk, sometimes your knees got bruised, or your head got hit.  What could you do – You cried in pain.

You cried a lot, your parents bandaged your knees or your head, but they always encouraged and motivated you to walk, run or play.

You got hurt,  and took ten days to recover. But upon recovery, you  started to run, jump and play again…

You did so, because playing, jumping, running is your natural tendency. Sitting in the lap of your parents is not your natural instinct.

You are that child, all of us can relate to that child. Childhood is part of growing up. You can recount multiple signs of these injuries on your knees, knuckles or head.

Well, you are a grown up now. Where has that natural instinct of running-jumping-playing disappeared? Have you forgotten it, or has that instinct evaporated.

You still continue to fall down, even now. The only difference is that now your mind gets hurt, instead of your body. Your body does not get chipped, but your mind certainly does.  This kind of mental hurt causes frustration, but how can you ignore your own natural instinct.

You may wish to stop, but the time never stops. It continues to tick ahead.

Your mind still desires to move ahead, it is your natural instinct. It wants to go on, in-spite of all those hurts. It wants to laugh carelessly, like a baby. However, the other part of this mind is now filled with frustration-depression. And this frustration has started to control your mind.

Will you let this happen to you? Will desperation fill your life?

Think about your parents who motivated you to get up after every fall.

They would have endured mental hurt with your every fall, but they transformed their mental pain into encouragement for your success. They hid their mental pain. They did not want you to get frustrated. Your parents are now replaced with your Guru.

Guru is also your parent. Remember – “Twameva Maataa Cha Pitaa Twameva”

The Guru also experiences the mental pain, whenever you fall down, get tired, or experience failure. The Guru understands your pain. However He controls His emotions, and motivates you to try once more … try again …

None else will encourage you to ignore the failures and try again, try yet again. The society will move forward trampling you in their path. Everyone is busy in his own activities, cocooned within his own world, busy with their own thoughts, to achieve their own dreams.

Guru holds your hand not only to console you. He motivates you to get up and try again, to run, to move ahead.

Well, why do you all desire to run? Some of you are running in the rat-race for Lakshmi, for wealth, to gain some respect or for the sake of your family.  The Guru is not concerned with your money or wealth.  He is not related to your job or your business. Even then, the Guru merges Himself in your desires and wishes, within your own rat-race. You just want to keep running, without getting tired. However, your tiredness prompts you  to turn towards Guru.

Whenever you approach Gurudev in your frustration and tiredness,  He always guides – ” There will definitely be a way out of this. Try again”. Is there anyone else in this entire world, who can motivate you so sweetly?  Is there anyone … No none else.

Therefore, there is no word in any language to define Guru. The word “Guru” is a complete word in itself.  There is no comparison.

Guru is the only shelter, He is the only refuge.  You wish to achieve some goals. However the day you start to  think of making Guru as your own goal, you will stop fearing the failure. You will get up enthusiastically after each and every failure, and rebound.

You should prepare yourself for every type of change, for every kind of struggle. The pain of changes leads to joy in the end. Each struggle enhances your capability. The Guru has clasped you in His hands,  through all kinds of struggles,  through all kinds of phases,  for ever – In your mind, your feelings, with you … with you … with you …

 

Divine blessings …

Cordially yours,

Nand Kishore Shrimali

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