Dialog with Loved Ones – Nov 2018

 

अपनों से अपनी बात…

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

अभी मैंने एक कहानी सुनी, एक कॉफी शॉप का मालिक अपने काम में दिनभर व्यस्त था, शाम होते-होते उसका सिर दुखने लगा। घड़ी के कांटे चल रहे थे और उसका सिरदर्द बढ़ता ही जा रहा था, दर्द जब असहनीय हो गया तो उसने अपने सहायक को कहा कि थोड़ी देर दुकान संभाल, मैं बाहर जाकर आता हूं।

 

वह गली के किनारे पर स्थित दवाई की एक दुकान पर गया, सोचा कि सिर दर्द की एक गोली ले लेता हूं, सिर दर्द ठीक हो जाएगा। दवाई की दुकान के मालिक से उसकी जान-पहचान थी। दुकान मालिक दुकान पर नहीं था तो उसके सहायक से पूछा कि – वसन्त बाबू कहां हैं?

 

सहायक ने कहा कि – आज वसन्त बाबू का सिर बहुत दुख रहा था और उन्होंने कहा कि – मैं पास वाली कॉफी शॉप से गरमागरम कॉफी पीकर आता हूं, उससे मेरा सिर दर्द ठीक हो जाएगा।

 

समझे, आप कमोबेश यही स्थिति हम सबकी है। हम बाहर की ओर खोजते हैं और वह वस्तु हमारे भीतर ही है। दवा की दुकान वाला अपने दर्द के निवारण के लिये कॉफी पीने जाता है और कॉफी की दुकान वाला अपने दर्द निवारण के लिये दवा की दुकान पर जाता है।

 

वास्तव में खुशी कहां है? वह हमारे हृदय के भीतर ही बैठी है।

 

खुशी, शांति क्या हैं? ये हमारे चित्त, मानस की अवस्थाएं हैं। अपने आपको बैलेन्स में रखना ही खुशी है और यह बैलेन्स उस समय बिगड़ता है जब आप यह सोच-सोच कर दुःखी हो जाते हैं कि – मैं जो चाह रहा हूं वह मुझे नहीं मिल रहा है। पहले आपके पास जो है, उसकी तो कद्र करो और जो नहीं मिला है, उसके लिये प्रयास करो बस आपका मन बड़ा ही खुश हो जाएगा। आप सदैव प्रसन्न रहने लग जाएंगे। अप्राप्ति के भाव को इतना अधिक महत्वपूर्ण मत बनाओ। प्राप्त को सुरक्षित रखो, प्राप्त में वृद्धि करते रहो तो अप्राप्त भी आपके पास अवश्य आ जाएगा। उसकी चिन्ता मत करो।

 

दिल्ली वाला सोचता है कि – मनाली के पहाड़ों की यात्रा करूंगा तो मैं खुश हो जाऊंगा और मनाली वाला सोचता है कि – आह! दिल्ली में कितनी गहमा-गहमी है, हर समय हलचल रहती है वहां जाऊंगा तो मैं खुश हो जाऊंगा। यह खुश होना केवल और केवल आपकी प्रकृति पर, आपकी प्रवृत्ति पर, आपकी सोच पर निर्भर करता है।

 

हम सारी शक्तियां प्राप्त कर सकते हैं लेकिन जब हम अपनी ही आंखों पर हाथ रख देते हैं और कहते हैं कि बहुत घना अंधेरा है और उस अंधेरे की पीड़ा में रोते-तड़पते हैं, चिन्तित होते हैं। शक्ति हमारे भीतर ही है। बस हमें, अपनी आंखों पर से अपने ही हाथों का पर्दा हटाना है। स्वयं का पर्दा अपने ही प्रयासों से हटाना मुश्किल काम नहीं है। हम अपने आपको अंधेरे में रखने का आदि क्यों बनाएं?

 

आप हर समय जिससे भी मिलते हो एक औपचारिक भाव से पूछते हो कि – क्या हालचाल हैं? कैसे हो? और सामने वाला भी आपसे कहता है कि – क्या हालचाल हैं? आप भी कहते हो कि सब ठीक है। वह भी कहता है कि – सब ठीक है। इन औपचारिक शब्दों का संसार में सबसे ज्यादा प्रचलन है।

 

हाल का अर्थ है – वर्तमान स्थिति-भाव-प्रसन्नता-दुःख-दर्द-पीड़ा और चाल का अर्थ है – शरीर का स्वास्थ्य, मन का स्वास्थ्य।

 

दूसरों से पूछते हो तो मेरा कहा मानकर यही बात आप अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति, ब्रह्माण्ड के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति ‘अपने आप’ से अवश्य पूछना और बड़ी ही मुस्कुराहट के साथ पूछना, अपना नाम लेकर अपने को ही पूछना क्या हालचाल हैं? मेरे मित्र! क्या हालचाल है? उससे बिल्कुल साफ-साफ कहना। तुम्हारा मन रूपी मित्र भी तुम्हें मुस्कुराते हुए अपने हालचाल अवश्य बता देगा और जब तुम दोनों आपस में एक-दूसरे के साथ उेाषेीींरलश्रश हो जाओगे तब बड़ा ही शानदार वार्तालाप होगा। आपका सब दुःख, दर्द, पीड़ा आदि काफूर हो जाएंगे। आपमें अपने आप उत्साह आ जाएगा। अपनी कमियों को हटाने का मार्ग भी मिल जाएगा। अपनी भूलों को आप नजर अन्दाज भी करने में समर्थ हो जाएंगे और आपके मन पर पड़ा हुआ एक बड़ा बोझ उतर जाएगा। यह बोझ मन पर रोज चढ़ता है इसलिये रोज उतारना भी जरूरी है। अपने आपको रोज ॠेेव चेीपळपस और ॠेेव छळसहीं अवश्य कहें।

 

आप कितने ही बड़े मकान में रहें, फ्लैट में रहें, डुप्लेक्स में रहें, एक मंजिला, दो मंजिला घर में रहें या पेंट हाउस और मेन्शन में, वो तो साधन मात्र हैं, दीवारों से बने हुए मकान हैं, वास्तव में हम जहां रहते हैं जो हमारा घर है वह हमारा मन है और वही हमारा स्थायी पता है। जब तक हम इस संसार में रहेंगे यह मन हमारे साथ रहेगा। घर को तो आप छोड़ सकते हो, कहीं यात्रा पर जा सकते हो। स्थायी निवास मन तो सदैव आपके साथ रहेगा और इस मन में बहुत स्थान है, अनन्त स्थान है। लम्बाई-चौड़ाई की कोई सीमा नहीं है, विशाल है, अति विशाल है।

 

आप अपने पत्थर के मकान को कितना भी साफ-सुथरा कर दो, कितनी ही चीजें एकत्र कर लो, कितना ही सजा-संवार लो जिन्दगी तो तभी अच्छी होगी, जब हम अपने मन को सजा-संवार लेंगे।

 

मन में बहुत ही अव्यवस्थाएं फैली हुई हैं। मन के एक कोने में ‘खेद’ का ढेर लगा हुआ है, मन की अलमारी में ‘अपेक्षाएं-उपेक्षाएं’ ठूंस-ठूंस कर भरी हुई हैं, मन के कारपेट के नीचे हमने पुराने ‘रहस्य’ दबा रखें है, ‘चिन्ताएं’ मन रूपी घर में यहां-वहां बिखरी पड़ी हैं, ‘दूसरों से तुलना’ हमारे सामने मन की टेबल पर पड़ी हुई हैं। ‘हीनभावनाएं’ रह-रह कर मन में रखी पुरानी शीशियों से लीक हो रही हैं और बदबूदार ‘असंतोष’ को हमने एक बॉक्स में रखा हुआ है जो अपनी दुर्गन्ध पूरे मन में फैला रहा है।

 

अरे भाई! तुम्हारा यह मन ही तुम्हारा वास्तविक घर है, स्थायी निवास है और वहां खेद, अपेक्षा, उपेक्षा, चिन्ता, तुलना, हीनता, असंतोष की सफाई करने के लिये किसी और को बुला भी नहीं सकते हो। वहां तो स्वयं तुम्हें ही सब कुछ स्वच्छ करना है। जिससे न तुम्हारे सिर में पीड़ा रहे और न शरीर में। तुम्हें पूर्ण खुशी प्राप्त हो यह पूरा क्रिया-कलाप तुम्हें ही करना है और स्वयं के लिये ही करना है।

 

तुम्हारे इस मन की यात्रा में मैं तुम्हारे साथ हूं। तुम्हें अपने ही शरीर का शिव चक्र जाग्रत करना है और शिव चक्र का अर्थ है – निस्पृह भाव से क्रिया, शिवोऽहम् भाव से क्रिया… अपनी ही शक्तियों का अपने शरीर के चक्रों, बिन्दुओं से संस्पर्शित करना, अपने ही आत्मभाव को जाग्रत करना। मैं रख रहा हूं तुम्हारे सिर पर मेरा हाथ…।

 

आओ मैं तुम्हारे साथ हूं….।
नन्द किशोर श्रीमाली

Dialog with loved ones

Dear disciple,

Blessings!

I heard a story once about a man who ran a coffee shop. One day he had a bad headache. By the evening he decided to get a pain reliever from a nearby pharmacy. The pharmacist was not at the store. So he asked his assistant, “Where has Vasant Babu gone?” His assistant replied that he had gone to the nearby coffee store (the same man’s coffee shop) to buy himself a coffee for his headache.

The story carries a deeper meaning. In life, we all have our share of headaches. And we look for their solution externally. This leads us to the thinking that grass is greener on the other side. That disturbs our peace, which is a state of mind. You need to maintain your equipoise. It gets ruffled when you think you are not able to do what you desire.

Instead of being harsh on yourself, try to value your accomplishments and be dedicated to your dreams. By doing so you will maintain the equilibrium between contentment and aspiration. Because if it is not, your life will go in a standstill, or you will be more nervous and impatient than ever before. Have you ever wondered why Delhilites enjoy the peaceful landscape of Manali while the Manali locals enjoy the glamorous Delhi malls. Ultimately, happiness eludes both. Why? Because happiness is dependent on YOU. It is to be felt not to be searched. Yet, we like to suffer. Maybe because in this competitive age, we feel that struggle can lead to happiness even if it is redundant. Often we close our eyes to complain about the darkness; open them and see the beauty around yourself.

When we meet each other we ask, ‘How do you do?” More often than not we answer, I am good. How about you?”

The standard reply about our well being has become more of a reflex than of actually telling each other about our adventurous journey of life. On a deeper level the question relates to our current state of the mind. Are we happy or joyful? Happiness is a state of mind and it is necessary for maintaining physical wellbeing. So each time you have to answer this standard question do take a moment to reflect about your inner state. Only then you will be at peace with yourself.

Whilst you must have asked others this question many times, direct it to yourself now. Look at your reflection in the mirror and smile genuinely. Then call out your name softly and ask yourself, “How are you feeling my friend?” And, speak your heart out without any reservations or camouflage.

As you do this exercise you will start touching your inner being – your soul. You are unhappy because you live in denial. You disregard your feelings and if you accept them reluctantly you have an excuse to validate them. Instead, accept your emotions wholeheartedly. They are genuine. Acknowledging your feelings is the first step in soothing your pain. When you get in sync with your inner being, your emotional turmoil and pain will start to resolve. Gradually, you will feel energetic and adopt a kinder attitude towards yourself.

In these competitive times we undergo a lot of emotional disturbances everyday. A meaningful conversation with yourself will put you in sync with your emotional state. It is not that your grief will disappear but you will also have the energy to overcome them.

As we clean our house daily, we need to tackle our emotions too. Whether you live in a one bedroom flat, a duplex, or a mansion it is just a house, you live there physically. Your permanent abode is your thoughts. They disturb your peace. More often than not when we experience pain, conflict and turmoil we decide to go on a vacation. However, a vacation is incomplete without a mental vacation. It is impossible to run away from your thoughts. Therefore, we need to learn to make peace with them.

Your house is an extension of your personality. Most of us aspire to buy a bigger house. The aspiration is good but a bigger house does not guarantee happiness. It is found internally. Start working on your feelings. Acknowledge the vast gamut of emotions that lie in there – grief, unmet expectations, dissatisfaction, jealousy and anger. You have to tackle each emotion separately and resolve it. Until you do that your happiness will be hollow. It will be tied to achievements and you will be chasing moving goal posts. It is good to make your life large. Yet, success should not come at an expense of happiness. Money buys goods. It doesn’t buy happiness. When you will get in touch with your feelings happiness will no longer elude.

I am with you on this journey. Getting in touch with your mind and the heart to activate your Shiva Chakra – the Sahasrara. Eventually, you will rise above the conflict of emotions and develop an equilibrium which is not dependent on people or achievements. Always remember, if you are disturbed by what others say to you you are letting others control you.

I want you to view yourself from your lens. You are Shiva. What others think of you is their problem. Get in touch with your energies. It is high time you explore yourself. Start this interesting journey. The life will unfold its true colours.

Come, I am with you….|

Nand Kishore Shrimali

 

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