Dialog with Loved Ones – Nov 2016

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

साधना का सबसे बड़ा महापर्व, शक्ति पर्व जिसे हजारों-हजारों साधकों ने भुवनेश्‍वरी महाकाली साधना के साथ सम्पन्न किया। यह मेरे लिये गर्व की बात है कि मेरे साधक, साधना के पथ पर निरन्तर गतिशील हैं। शक्ति का यह पर्व उल्लास के साथ-साथ तप का पर्व है। तप का अर्थ है, अपने भीतर अग्नि को चैतन्य करना। अपने भीतर की शक्ति को चैतन्य करना। मेरा यह दृढ़ मत है कि शक्ति का उदय शक्ति का प्रकाश साधक के भीतर से ही प्रस्फुटित होता है। जो साधना करता है वह साधक है। इसमें स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं है। साधना पथ पर सब समान हैं। जो अपने तप में जितने अधिक कर्म की आहुति देता है, उसका जीवनयज्ञ उतना ही अधिक तीव्र उर्ध्वमुखी, प्रकाशवान, ज्योतिवान और ऊर्जा से युक्त होता जाता है।

 

एक छोटी सी कथा सुनाता हूं, माताएं अपनी बेटियों को यह कहानी अक्सर सुनाया करती हैं, कि पुराने जमाने की बात है। एक दुष्ट राक्षस ने एक राजकुमारी का अपहरण कर उसे अंधेरे किले में बंद कर दिया, जिस किले के चारों ओर तालाब में बड़े-बड़े मगरमच्छ थे। किले के द्वार पर एक भयंकर विशालकाय अजगर पहरा देता था और राजकुमारी उदास मन से बैठी-बैठी आसूं बहाती रहती और वह प्रतीक्षा करती की, कभी उसके सपनों का राजकुमार आयेगा और उसे उस बंदी गृह से छुड़ा लेगा। इस प्रकार कई वर्ष बीत गए। रोज सोचती की आज तो राजकुमार आकर उसे छुड़ा ले जायेगा। ऐसे ही कथा बढ़ाते रहते हैं।

 

ये सारी काल्पनिक कथाएं इस बात को इंगित करती हैं कि नारी बड़ी ही अबला है। वास्तव में तो नारी शक्ति का पुंज होती है। इस प्रश्‍न पर बहुत गंभीरता से विचार करो। क्या तुम आज भी ऐसी निरर्थक कहानियां सुनते हो और अपनी बच्चियों को सुनाते हो। तुम भले ही ऐसी काल्पनिक कथाएं कहते रहो नारी शक्ति इस बात को नहीं मान सकती क्योंकि वह स्वयं अपने आप में समर्थ है।
मैं तुम्हें सही बात बताता हूं, एक रात जब एक मां अपनी बच्ची को यह कहानी सुना रही थी तो बच्ची ने एक सवाल किया कि मां लेकिन वह राजकुमारी इंतजार क्यों कर रही थी कि राजकुमार आयेगा और उसे छुड़ायेगा? मैं उस राजकुमारी की जगह होती तो किसी राजकुमार का इंतजार नहीं करती। स्वयं अपने प्रयत्नों से उस राक्षस को मार देती और खुद को आजाद करा लेती। वह राजकुमारी तो बड़ी ही आलसी और मूर्ख थी। उसने खुद कोई प्रयत्न क्यों नहीं किया? कि वह राक्षस को मार दे और अपने-आपको मुक्त करा ले।

 

वास्तव में इस बच्ची की बात सही है, तुम्हें मुक्त कराने, तुम्हें स्वतंत्र कराने कोई ओर नहीं आयेगा। यह प्रयास जब तुम्हारे भीतर से ही प्रारम्भ होगा तो तुम स्वतंत्र हो सकोगे और यह शक्ति प्रत्येक स्त्री और पुरुष में समान होती है। न हमारे वेदों में भेद है, न उपनिषद् में कोई विभाजक बात है। जब तक हमें स्वयं की शक्ति का अहसास नहीं होगा, तब तक वह शक्ति उर्ध्वमुखी नहीं हो सकती है। हम बहादुर महिलाओं का उदाहरण देते हैं लेकिन स्वयं अपने घर में उस उदाहरण को कितना लागू करते हैं? यह बात विशेष विचारणीय है। शक्ति पर्व का यह आश्‍विन मास है, कार्तिक मास है, शक्ति का अर्थ ही स्त्री तत्व है। स्त्री में तो हर समय क्रांति ही भरी रहती है। वह सारे तंत्र के बंधन को तोड़ने की क्षमता रखती है। वह हर समय अपनी इस क्षमता का परिचय भी देती रहती है। स्त्री का मस्तिष्क ही बहु आयामी (र्चीश्रींळ ऊळाशपीळेपरश्र) होता है। क्यों ऐसी मानसिकता हो गई है कि स्त्री का सम्मान तो करते हैं लेकिन उसे अपने समान नहीं समझते। क्या स्त्री में आयु कम होती है, बल कम होता है, बुद्धि कम होती है? क्या दो चार किलो वजन ज्यादा उठा लेने से पुरुष ज्यादा बलशाली हो जाता है। स्त्री में वह शक्ति है कि वह संतान को जन्म दे सकती है। अपने गर्भ में रख सकती है। वास्तव में स्त्री शक्ति ही परम शक्ति है। मूल शक्ति तो स्त्री शक्ति ही है। वह संसार में समान रूप से सारे कार्य सम्पन्न कर सकती है। उसकी उन्नति ही घर-परिवार, समाज, देश और राष्ट्र की उन्नति है। अपने घर, परिवार, समाज में स्त्री-पुुरष के भेद को समाप्त करते हुए सबको उचित शिक्षा-दीक्षा का वातावरण दो। तुम्हारी उन्नति तुम्हारी पत्नी, तुम्हारे बच्चे-बच्चियों की उन्नति से जुड़ी हुई है।

 

तुम दसमहविद्याओं की साधना करते हो, भुवनेश्‍वरी, छिन्नमस्ता, काली, बगलामुखी का मंत्र जपते हो। बहुत अच्छी बात है। उस मंत्र को अपने जीवन में भी सार्थक करना है। यह बात प्रत्येक स्त्री, प्रत्येक पुरुष पर लागू होती है। तुम स्त्री हो, पुरुष हो कोई फर्क नहीं पड़ता, गुरु के समक्ष तुम केवल और केवल एक शिष्य हो। ईश्‍वर के समक्ष उसका एक अंश हो। उस अंश स्वरूप का उस शिष्यत्व स्वरूप का सम्मान करते हुए तुम्हें क्रिया से युक्त होना है। न तुमसे शक्ति विछिन्न रह सकती हैं और न तुमसे शिव विछिन्न हो सकते हैं।

 

इस स्त्री शक्ति का ही तो पर्व नवरात्रि है, दीपावली है। मनुष्य की सारी यात्रा महालक्ष्मी प्राप्त करने की यात्रा है और इसके लिये पुरुष को जो कार्य करना पड़ता है, वह पुरुषार्थ कहलाता है। उस पुरुषार्थ के पश्‍चात् ही स्त्री तत्व, शक्ति तत्व प्राप्त होता है। शिव का स्वरूप भी अर्द्धनारीश्‍वर स्वरूप है। जिसमें शक्ति और शिव समान रूप से स्थापित हैं।

 

शक्ति प्राप्ति के लिये क्या आवश्यक तत्व है? सम्मान। जो अपने आपको सम्मान दे सकता है वही श्रेष्ठ बन सकता है। उसका पुरुषार्थ ही शक्ति प्राप्ति का माध्यम बन सकता है। जो अपने आपको तुच्छ, बेकार समझता है वह निश्‍चय ही आलसी कर्महीन और भाग्यवादी बन जाता है। वह अपने पूरे जीवन, केवल और केवल समय का इंतजार करता रहता है। उसके लिये समय कभी नहीं आता है।

 

जो स्वयं के रूप-रंग, शरीर, मन, आत्मा का सम्मान करता है, चाहे वह स्त्री हो, पुरुष हो, वह अपने स्वयं के निकट हो जाता है और जो स्वयं के निकट हो सकता है, स्वयं का सम्मान करता है वही ईश्‍वर को जान सकता है, अनुभव कर सकता है, वही गुरु तत्व को पूर्ण रूप से अपने भीतर आत्मसात् कर सकता है।

 

सहृदय व्यक्ति कौन है? केवल दयालु होने से काम नहीं चलेगा, सहृदय वह है जो अपने हृदय, अपने मन, अपने विचारों, अपने भावों का सम्मान करता है। जो अपने रूप-रंग, कद-काठी, स्थान से प्रभावित नहीं होता है। वह जैसा भी है स्वयं का सम्मान करता है, वह सहृदय बनकर उन्नति के मार्ग पर निरन्तर गतिशील हो सकता है। शक्ति भी ऐसे ही शिवत्व भाव से युक्त व्यक्ति के साथ संयुक्त होती हैं।

 

जब हमारे विचार ही ढुलमुल रहेंगे तो सोचो हम किस लिये जी रहे हैं?

 

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को जीने का एक मकसद होता है अन्यथा तो जन्म लेकर मृत्यु की ओर तो सभी प्राणी चल ही रहे हैं। जिनमें मकसद है, वही तो साधक हैं और यह मकसद केवल और केवल भीतर से उत्पन्न होता है। यह मत बोलना की तुम्हें नहीं मालूम, तुम्हारे जीवन का मकसद क्या है, लक्ष्य क्या है? यह मकसद तो तुम्हारा खुद का होना चाहिए। क्योंकि तुम स्वयं ईश्‍वर का शक्तिमान अंश हो। अपना मकसद स्वयं निर्धारित कर, उस पथ पर चले चलो।

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with Loved Ones …

Dear Loved One,

Divine Blessings,

Thousands of Sadhaks accomplished Bhuvaneshwari Mahakali Sadhana during the greatest Mahaparv of Sadhana, the Shakti Parva. It is an honour for me that my Sadhaks are continuously progressing on the Sadhana path. This Parva-festival of Shakti is the festival of asceticism and joy. Asceticism means to awaken our inner fire, to activate our inner energy. I firmly believe that the power emerges only from the inner mind of the Sadhak. One who performs Sadhana is a Sadhak. There is no difference between men and women. All are equal on the Sadhana path. The more activities-actions one offers in this sacrificial-fire of asceticism-tenacity, the more intense, elevated, bright, luminous, and energetic his life becomes.

Let me narrate a small story, which mothers often tell their daughters. Once upon a time, an evil monster kidnapped a princess, and locked her in a dark castle which was guarded by fierce crocodiles in the surrounding moat. A giant dragon used to guard the main door. The princess used to cry alone all the time waiting for the prince of her dreams to come and liberate her from the prison. Many years passed away. She used to daily hope for a prince to come and liberate her. And the story continues in this form.

All of these myths indicate that the female form is very delicate and weak. In reality, the female is the powerhouse of energy. Think seriously on this topic. Do you still listen to such foolish stories, and tell them to your children. You may keep repeating these myths, but is this is acceptable to a woman because she is fully capable.

Let me relate a correct fact. When the mother was telling this story to her daughter one night, the daughter questioned why the princess was waiting for  a prince to come and liberate her? If I were in her place, I would not have waited for arrival of a prince. I would have thought a plan to kill that evil monster and free myself up. That princess was very lazy and foolish. Why did she not try herself to kill the monster and get freedom.

This baby is completely correct, nobody will come to free you, to liberate you. You will become free only when this process starts within you. This inner power is same within both men and women. Neither our Vedas nor our Upanishads talk about any division between men and women. This inner power cannot flow upwards until we realize its presence. We give many examples of brave women, but how many of us apply this example in our own home? This is a topic worth discussing. This Shakti Parva encompasses the Ashwin month and the Kartik month. The Shakti literally means the feminine element. The female is always full of revolution. She has the inner energy to break all Tantra-system bondages. She keeps demonstrating this power. The female brain is multi-dimensional. Why has our mentality degraded so much that we respect women but do not think of them as our equal. Does a woman has lesser life, or lesser strength or intelligence. Does a man becomes more powerful simply because he can lift 2-4 Kg more weight than her. Only the woman have the power to give birth to a new life. She can develop this life in her own womb. In reality, the woman power is the supreme power. The woman power is the basic energy. She can do any task in this world at an equal level. Her progress embodies the real progress of the family, society and the country. Give proper and equal education-learning environment to females in your home, community and society. Your own progress is linked to the progress of your wife and your children.

You perform the Sadhanas of ten Mahavidhyas. You chant the holy Mantras of Bhuvaneshwari, Chhinnamasta, Kali and Baglamukhi. It is very good practice. You should implement this Mantra in your life as well. This fact is relevant to each man and woman. There is no differentiation between man and woman. You are just a disciple for the Guru. You are an equal component of the divinity. You have to become full of action-tasks, honouring and respecting this divinity and discipleship. Neither Shakti nor Shiva can be separated from you.

The Navratri, and the Diwali are the festival celebrating this female energy. The main focus of all actions of man is to obtain the wealth, the MahaLakshmi. These actions performed by man are called Purusharths. One obtains the Female-element, the Shakti element only after performing those Purusharths. The divine form of Lord Shiva is also Ardhanareeshwara, which contains a balance of both Shakti and Shiva.

What is the essential element to attain Shakti-power? Respect. One achieves excellence only after giving the respect. The Purusharths is the only medium to obtain Shakti-power. Anyone denigrating himself as worthless or wretched; will certainly become lazy and fatalistic. He just keeps awaiting for the opportune time in his life. This opportune time never comes in his life.

Anyone who respects his own appearance, body, mind and soul, whatever be his or her sex, certainly comes closer to self. Only one who comes closer to self, respects self, and can realize and experience divinity. Only such a person can imbibe Guru element completely within his or her own self.

Who is a benevolent person? It is not enough to be just generous. Only one who respects his own heart, his mind, his thoughts, his feelings and his values can be called as a benevolent person. Such a person does not get affected by his appearance, face, height or stature. He respects himself for whatever he is. He can become benevolent and progress ahead. Shakti also accompanies such Shivatva emotion individuals.

When our thoughts itself are wavering, then what will we live for?

There is a definite goal in each person’s life. Everyone is proceeding to a certain death after taking birth. A Sadhak is the one having a definite goal, and this goal arises only from the inner mind. Don’t tell me that you do not know the goal of your life. This is your own goal. You yourself are a specific component of divinity. Set up your own goal yourself, and proceed ahead on the path.

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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