Dialog with Loved ones – May 2017

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

आज मैं गुरु-शिष्य सम्बन्ध के बारे में आपसे सीधी बात करना चाहूंगा। अपने मन की बात कहना चाहूंगा। मैं ये शब्द वहां पहुंचाना चाहता हूं जहां तुम्हारा हृदय है, मन है। कान से सुना हुआ तो तुम भूल जाओगे लेकिन यदि कोई बात मन में गहरी बैठ गई तो तुम उसे भूला नहीं सकोगे, वह बात बार-बार तुम्हारे सामने लौट कर आयेगी। क्योंकि मन की गति ऐसी ही वर्तुलाकार होती है कि वह बात घूम-घूम कर फिर आती है।

 

अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि गुरु और शिष्य का सम्बन्ध कैसा सम्बन्ध है। इसे किस प्रकार से परिभाषित करें जिससे सब लोग समझ सकें। मैं कहता हूं कि तुम्हें किसी को समझाने की क्या आवश्यकता है। तुम्हें तो अपने आप में समझना है। जिस दिन तुम खुद इस सम्बन्ध को समझ जाओगे उस दिन से दुनिया को समझाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

 

इस संसार में हर व्यक्ति के जीवन में सम्बन्ध तीन तरह के होते हैं – जरूरत के, विश्‍वास के और मित्रता के। इनके अलावा एक और भी सम्बन्ध है जिसे प्रेम का सम्बन्ध कहा गया है।

 

जब तुम किसी के लिये कुछ क्षणों का, कुछ मिनटों का इंतजार करते हो तो वह तुम्हारी जरूरत है। तुम अपने काम की पूर्ति चाहते हो और जब कुछ घण्टों के लिये किसी का इंतजार करते हो तो वह तुम्हारा विश्‍वास कहा जाता है। तुम इंतजार करते हो कि तुम्हें वह अवश्य मिलेगा लेकिन जब तुम किसी का हफ्तों इंतजार करते हो, जब तुम्हें जरूरत भी अनुभव होती है, विश्‍वास भी अनुभव होता है और इंतजार करते रहते हो कि दो पल बात होगी, वह सम्बन्ध मित्रता कहलाता है। इससे भी आगे बढ़कर जब तुम किसी का इंतजार करते हो, चाहे कितना ही लम्बा इन्तजार हो फिर भी तुम उसकी अनुभूति हर क्षण मन ही मन अनुभव करते हुए प्रसन्न होते रहते हो तो वह सम्बन्ध प्रेम का सम्बन्ध कहलाता है। इसे ही तो सच्चा प्रेम कहा गया है। यही भक्ति है, यही मन का सर्वश्रेष्ठ भाव है। इस भाव के आते ही बाकी सारे भाव गौण हो जाते हैं।

 

एक बहुत सरल बात है कि तुम्हारा व्यक्तित्व दो तरह का है – एक बाह्य व्यक्तित्व और एक आन्तरिक व्यक्तित्व। बाहर का व्यक्तित्व तो हर कोई, दूसरा देख सकता है लेकिन तुम्हारे भीतर का जो व्यक्तित्व है उसे केवल और केवल तुम स्वयं ही देख सकते हो। वहां तो कोई और झांक भी नहीं सकता है। यदि तुम बाहर के व्यक्तित्व की रक्षा करते रहोगे, उसे ही सजाते, संवारते रहोगे, दूसरों के सामने अपने आपको कृत्रिम भाव से पेश करते रहोगे तो वह बाहर का व्यक्तित्व तुम्हारे ऊपर हावी हो सकता है। तुम सोचोगे कि तुम्हारे बाहर का व्यक्तित्व तुम्हारी पहचान बन गया है और वह पहचान तुम्हारे ऊपर हावी हो गई है। उसकी रक्षा करते-करते तो तुम थक जाओगे। अपने मन से हंस भी नहीं सकोगे और बाहर की हंसी तो खोखली हंसी ही कही जा सकती है ना! तो फिर इतना खोखलापन मत रखो कि तुम्हें अपने मन की भी समझ नहीं आये और तुम अपने मन को भी जान नहीं सको।

 

देखो, तुम दूसरे से अपने आपको छुपा सकते हो, दूसरे के सामने कभी-कभी असत्य भी बोल सकते हो, दूसरे के सामने कुछ नाटक भी कर सकते हो और शायद नाटक करते-करते इस संसार में तुम्हें अभिनय की आदत पड़ गई है। ऐसा तुम कर रहे थे और करते जा रहे हो। कितनी देर तक और करोगे?

 

तुम अपने मन से, हृदय से बचकर तो कहीं जा नहीं सकते हो, तुम जहां जाओगे वहां तुम्हारा मन और हृदय तो साथ-साथ चलेगा ही। चाहे तुम ठण्डी बर्फ की वादियों में बैठ जाओ या फिर समुद्र में गोता लगा लो, किसी मन्दिर में बैठ जाओ या एकांत में बैठकर विपश्यना भी कर लो तो भी मन से तो भाग नहीं सकोगे।

 

तो फिर यह बहुत अच्छा रहेगा कि तुम अपने उस अन्तर मन की, हृदय की आवाज को सुनो। वो जो कह रहा है, उसे सुनो। तुम्हारे जीवन का, यही सबसे सही समय है – जब तुम अपने मन को सुनने में समर्थ हो सकते हो। इसके लिये किसी देश, काल, मुहूर्त का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये तुम दिन-रात दौड़भाग करते रहते हो, अब इस दौड़भाग को अन्दर की तरफ भी तो मोड़ो। उस कार्य को भी तो करो, जिस कार्य को करने से तुम्हारी आत्मा प्रसन्न होती है।

 

गुरु और शिष्य का सम्बन्ध भी तुम्हें तुम्हारे मन से जोड़ने की ही तो क्रिया है। तुम एक शिष्य हो और प्रत्यक्ष गुरु को, जीवन्त गुरु को धारण किये हुए हो। एक पेड़ की तरह ही तुम्हारा भी जीवन है। एक पेड़ अपने पत्तों पर, डालियों पर, ज्यादा भरोसा करता है अथवा अपनी जड़ों पर ज्यादा भरोसा करता है? एक पक्षी अपने पंखों पर ज्यादा भरोसा करता है या हवा पर ज्यादा भरोसा करता है। वह हवा के प्रभाव से नहीं उड़ता, अपने पंखों की ताकत पर ही उड़ता है। एक पेड़ अपनी जड़ों की ताकत पर ही खड़ा रहता है, बड़ा होता है। पतझड़ आने पर भी परवाह नहीं करता, उसे मालूम रहता है कि मेरी जड़ें मजबूत हैं। फिर हरा-भरा हो जाऊंगा।

 

एक शिष्य भी बाहरी बाधाओं से इतना अधिक डिगमिगाता नहीं है। अपनी आन्तरिक शक्ति, अपनी गुरुत्व शक्ति पर ज्यादा भरोसा करता है। वह गुरु से प्रेम करता है, इसलिये उसे मालूम है कि दो-चार, दस बाधाएं आ भी गईं तो कोई बात नहीं। मैं भीतर से मजबूत हूं और मेरे गुरु मेरी आधार शक्ति हैं। मेरी जड़ हैं। वे मुझे आन्तरिक शक्ति प्रदान करते रहते हैं।

 

यही गुरु और शिष्य सम्बन्धों की अद्भुत बात है कि दोनों एक दूसरे पर आश्रित होते हैं, एक दूसरे पर भरोसा रखते हैं, एक दूसरे से प्रेम करते हैं और जहां प्रेम होता है वहां शुष्क भाव नहीं आ सकता है। इसलिये गुरु को रस प्रदाता कहा गया है, रसेश्‍वर कहा गया है। उस महादेव की भांति वे निरन्तर और निरन्तर सिंचन ही करते रहते हैं।

 

इस अमृत भाव के साथ, पूर्णता के भाव के साथ अपनी मजबूती के साथ, आगे बढ़ते रहो और हर बार अपने मन के भीतर भी देखते रहो। यदि तुम्हारा मन प्रसन्न है तो शरीर अपने आप आरोग्य से युक्त हो जायेगा, उसमें ओज आ जायेगा, लालिमा आ जायेगी। गर्व और गरिमा आ जायेगी। इसके लिये कार्य तो एक ही करना है कि तुम अपने मन के अनुसार कार्य करने के लिये समय निकालो। भक्ति, संगीत, तपस्या ये सब तुम्हारे मन को प्रसन्न करने की क्रियाएं हैं। तुम सदैव याद रखो कि इस मन से बचकर जा नहीं सकते, तो अपने इस मन के अनुसार कुछ ऐसा काम करो, जिससे आन्तरिक प्रसन्नता हो।

 

अभी मैं झारखण्ड छिन्नमस्ता शक्तिपीठ रजरप्पा गया था। बहुत ही आनन्द आया। उस भूमि के कण-कण में शक्ति तत्व का अनुभव हो रहा था। सिद्ध शक्तिपीठ, शक्तिपीठ, तीर्थ स्थान में यही तो विशेषता होती है कि वहां हजारों-हजारों वर्षों से भक्तों द्वारा ईश्‍वर के प्रति, शक्ति के प्रति, प्रकृति के प्रति जो भावांजलि दी जाती है उस भाव के शब्दों से, मंत्रों से वह स्थान हर समय चैतन्य रहता है।

 

मैं तुम्हें भगवान राम की नगरी अयोध्या, गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बुला रहा हूं। अपने मन की सुनकर तुम अवश्य चले आओगे।

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with Loved Ones
Dear loved one,
Divine Blessings,

 

Today I would like to talk to you directly about the Guru-disciple relationship. Let me explain what is on my mind. I want to direct these words to your heart and the mind. You will forget if you hear just with your ears, but you will not be able to forget if something pierces your mind deeply. The same topic will keep recurring in your mind. Because the circular pace of mind forces you to think about the topic repeatedly.

 

Often people query me about the features of relationship between the Guru and the disciple. How to define this relationship in simple, easy to understand words, so that everyone comprehends it. I retort – Why do you need to make anyone comprehend it. You just need to understand it yourself. The day you comprehend the intricacies of this relationship yourself, you will not need to explain it to rest of the world.

 

Every person has three types of relationships in this world – based on requirement, based on trust and based on friendship. Apart from these, there is one additional type of relationship, which is based on love.

 

When you wait for someone for a few moments, or a few minutes, you do so due to your own needs and requirements. When you wish to get your tasks completed, and you wait for someone for few hours, you do so due to your trust and belief. When you wait for someone with a certain belief that he will turn up, when you wait for someone for weeks, with a real need and trust, when you wait to talk for a couple of moments, then we can say that the relationship is based on the friendship. Going deeper, when you wait for someone, keep waiting for a long time, and remain happy reminiscing  his presence within your mind, then such a relationship can be said to be based on love. This, in fact, is the definition of the true love. This is the devotion, the supreme feeling from the mind. Arrival of this feeling  diminishes all other emotions.

 

A simple fact is that your personality is of two types – an outer personality and an inner personality. Everyone can view the external personality, but only you and you yourself can see the inner self. None else can peep in there. If you continue to protect the external  personality, decorate and tune it, present it to others with an artificial layer, then that external personality will dominate you. You will start considering this external personality as your identity and this outer personality will eclipse you. Eventually you will get tired protecting this external personality. A heartfelt laughter will be out of the question, and how long can you paste an empty smile on your face. So, do not fake so much that you stop understanding and knowing your own mind.

 

See, you can hide yourself from others, you can sometimes tell lies to others, you can fake a drama in front of others and maybe, this acting has become a common habit. You were doing this and you are doing this even now. How long will this continue?

 

You can not escape away from your own mind and your heart. Your mind and heart will accompany you wherever you travel to. You will not be able to escape from your mind even if you sit in cold icy caves or dive deep into the sea. You cannot escape even if you sit in a temple or perform solitude Vipassana Sadhana.

 

So, it makes a lot of sense if you start to listen to your own inner sound, of your own heart. Try to listen to whatever it is speaking. This is the best, the most opportune moment of your life – when you attain capability to listen to your own mind. There is no need to wait for any place, time, auspicious muhuratha for this. You keep running in the rat-race to fulfil your own needs, now change the direction of this endeavour towards your own inner mind. Do try to perform that task as well, which pleases your own soul.

 

The relationship of Guru and the disciple is a process to link you to your own mind. You are a disciple and you have considered a real, dynamic alive personality as your Guru. Your life is similar to a tree. Whom does a tree trust more – Its leaves and branches, or its deep drawn roots? What does a bird trust more – its own wings, or the flow of air? It does not fly through the influence of air, it flies only on the strength of its wings. A tree stands on the strength of its own roots, and continues to grow bigger in size. It does not worry at the arrival of the autumn, it knows about the strength of its roots. It knows that it will turn green with leaves, again, when the passage of time.

 

A disciple also does not get distracted from the external obstacles. He relies on his own inner power and the strength of the Guru-tatva element. He loves his Guru, so he does not worry even if two-four or even ten obstacles arise. He realizes that he is pretty strong from within and that Guru is the basic-foundation of his powers. Guru is his roots. He continues to provide him inner strength.

 

The wonderful fact about Guru – Disciple relationship is that both depend upon each other, both trust each other and love each other. A dry cold feeling cannot enter into an environment of deep love. Thus Guru has been considered as the Rasa (feeling) nourisher, the Rasheshwar. He continues to ever-nourish like Mahadeva.

 

Continue to move forward with this elixir spirit, with your strength, with complete perfection; and continue to penetrate deeper within your mind. If your mind gets pleased, then the body will automatically grow healthy and will glow with a radiance. The pride and dignity will usher in. You have to do only one task – to take out time to work according to your mind. The various activities to please your mind are devotion, music and penance. You should always remember that you cannot escape away from this mind. Do something according to your mind, which will grant you inner happiness.

 

Recently I visited Jharkhand Chinnamasta Shaktipeeth Rajarappa. It was a joyful experience. The core speciality of Siddha Shaktipeeth, Shaktipeeth and pilgrim-holy venues is that they radiate the constant positive consciousness latent within the devotional offerings to the Divine Providence, to Shakti, to deities, to nature by the devotees for thousands of years.

 

I am inviting you to Lord Ram’s city Ayodhya on the divine occasion of  Guru Poornima. You will definitely arrive, upon listening to your own mind.

 

Cordially yours
Nand Kishore Shrimali
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