Dialog with Loved Ones – March 2019

अपनों से अपनी बात…

 

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

कहीं एक जगह मैंने एक कहानी पढ़ी, एक गुरु और शिष्य बगीचे में बैठे थे और वहां अपना ध्यान सम्पन्न कर रहे थे। शिष्य ने देखा कि – एक पौधे के नीचे पत्तों पर घास में एक अण्डा पड़ा है और उसमें से एक प्राणी अण्डे के खोल को तोड़ कर बाहर निकलने का प्रयास कर रहा है। सुबह से शाम हो गई, अण्डे का खोल उसके भीतर के प्राणी के प्रयास से जगह-जगह से टूट गया था और इल्ली का थोड़ा सा मुंह बाहर आया। शिष्य बड़े ध्यान से देख रहा था। उसे लगा कि उसे कुछ करना चाहिए। वह प्राणी दिन-रात प्रयास कर रहा था और खोल थोड़ा-थोड़ा कर टूट रहा था। शिष्य को बड़ी दया आ रही थी और इधर गुरु कह रहे थे कि – इधर-उधर मत देखों, तुम अपने ध्यान को एकाग्र करो।

 

आखिर शिष्य से रहा नहीं गया और उसने अण्डे के खोल को तोड़ कर इल्ली को बाहर निकाल दिया और अपने हाथ में लेकर निहारने लगा। बड़ा प्रसन्न हुआ कि – मैंने एक प्राणी पर दया कर अपने प्रयास के द्वारा बचा दिया। पर इसका नतीजा हुआ कि दो-तीन घण्टे बाद ही वह इल्ली मर गई। शिष्य को बड़ा दुःख हुआ। गुरु से पूछा – ऐसे क्या हो गया? गुरु ने कहा कि – तुमने इस अण्डे को जीवन देने की बजाय इसका जीवन ले लिया।

 

क्या यह अण्डा, इल्ली और तितली की कहानी हम सबके जीवन में घटित नहीं होती है? तुम लोग भी मेरे पास आते हो और अपने जीवन की शिकायतें बताते हो। कोई नौकरी से अप्रसन्न है तो कोई परिवार से अप्रसन्न है, कोई कलह से अप्रसन्न है, एक बात है, तुम सब अपनी वर्तमान स्थिति से अप्रसन्न हो लेकिन तुम परिस्थितियों को बदलने के लिये पूरा प्रयास नहीं कर रहे हो। अब तुम्हारी अपेक्षा है कि अन्य कोई तुम्हें बचा दे और यदि किसी ने सहारा दे दिया तो तुम्हारा आत्मबल कैसे बढ़ेगा? अब यदि उस इल्ली को संघर्ष करने से वह शिष्य नहीं बचाता तो क्या होता? वह तितली बन कर फूलों पर मंडराती। अपने जीवन में निरन्तर प्रसन्नता का नृत्य करती।

 

उसके गुरु ने कहा कि – तुम उस इल्ली की पीड़ा देख रहे थे वास्तव में वह उसकी पीड़ा नहीं थी, वह अण्डे के खोल पर अपने हाथ-पैरों से प्रहार कर रही थी और बार-बार उसके प्रहार करने से उसके पंखों में मजबूती आती और दो-तीन दिन में जब उसके पंख पूरी तरह से मजबूत हो जाते तो एक झटके में खोल को तोड़कर अपने मर्जी से विचरण कर सकती थी।

 

बस, परिस्थितियों को बदलने का नाम ही संघर्ष हैं। दुःख तकलीफ में रोते तो सब है, पर संघर्ष बहुत कम लोग करते है। ज्यादात्तर लोग अपने जीवन से समझौता किये हुए होते है और डर-डर कर जी रहे होते है और यह डर उन लोगों का है, जिन्हें आपने समाज का नाम दिया है।

 

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में। वो तिफ्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले॥

 

एक बहुत बड़ी बात यह है कि – समाज का निर्माण हमारे लिए हुआ है। हम समाज के लिये बने नहीं हैं। आप इसी सामंजस्य को बिठाते-बिठाते पूरा जीवन शिकायत करते-करते बिता देते है।

 

आपको अपने वर्तमान जीवन में कुछ कमी अवश्य महसूस होती है, बहुत अच्छी बात है, आपको एहसास तो है कि जीवन में कुछ कमी है, पर इसे बदलने का प्रयास और बदलने का साहस भी तो हमें ही करना है। कोई और आकर तुम्हारे जीवन को थोड़े ही बदलेगा। साहस तो भीतर से ही जाग्रत करना पड़ेगा, तभी ‘पूर्णमदः पूर्णमिदं’ को सार्थक कर सकते है।

 

तुम बचपन से ही अपने जीवन के लक्ष्य बना रहे हो और सोचों कि – क्या तुम वह बन गये हो जो तुमने अपने बचपन में सोचा था? अपने बचपन में चाहा था, क्या तुम उस मार्ग पर बढ़ रहे हो जहां तुम्हारी कामना है? क्या तुम अपनी प्रतिभा के साथ पूरा-पूरा न्याय कर रहे हो?

 

यदि तुम कहते हो कि – हां मैं अपने चिन्तन से सही दिशा में आगे बढ़ रहा हूं और मैं अपनी प्रतिभा से पूरा-पूरा कार्य कर रहा हूं तो जीवन से कोई शिकायत नहीं होनी चहिए।

 

जीवन की सबसे बड़ी समस्या सफलता अथवा असफलता प्राप्त होना नहीं है। जीवन में सबसे बड़ी समस्या है, अधूरे मन से किया गया, अधूरा प्रयास। अब मन तो हमारा अपना है तो फिर पूरे मन से क्यों नहीं पूरा प्रयास करे जिससे सफलता निश्‍चित रूप से प्राप्त हो।

 

मंजिल मिल ही जायेगी, भटकते ही सही, गुमराह तो वो है, जो घर से निकले ही नहीं

 

 बस दो-तीन छोटी-छोटी बातें है – सबसे पहले तो यह सोच लें कि आपको अपने जीवन में क्या चाहिए। फिर उन बातों पर ध्यान दें जो आपको प्रसन्नता दे सकती है।

 

बस कार्य करने में विलम्ब नहीं करें। अरे! मूल तनाव तो इसीलिये आता है कि किस काम को कब किया जाना चाहिए और हमने कब किया है? करना चाहिए और किया है, इसके बीच का अन्तर मिटाना ही  पड़ेगा।

 

एक असफलता मिल गई तो नई शुरुआत क्या नहीं करें? अपने अनुभव को नकारात्मक भाव से नहीं लें। उस अनुभव से आगे क्रिया करें। जिन्दगी की रोज किताब लिखनी है। जो आज निर्णय लेंगे, उसका परिणाम ही तो कल मिलेगा।

 

मैं तुम्हें निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करना चाहता हूं। तुम निर्णय लो, तुम्हारे मन में जो अनिश्‍चय है उसे हटाओं, तुम निर्णय नहीं लोगे तो दूसरों के आश्रित बन जाओगे, गुलाम बन जाओगे। तुम्हें अपने आपमें दृढ़ निर्णय लेना है और यह क्षमता तुम्हारे भीतर है। तुम इसे दबाकर बैठ गये हो। अपने बूते पर निर्णय करना है, हो सकता है कभी असफलता भी मिल जाए। तुम्हें स्वयं निर्णय लेने है। अपनी इस क्षमता का विकास करना है। आगे क्या होगा? आगे अच्छा ही होगा। क्यों नहीं अच्छा होगा, जरूर अच्छा होगा, गुरु तुम्हारे साथ है, देव तुम्हारे साथ है। संसार के 2-4-10 लोग तुम्हारे विरुद्ध हो गये तो उससे क्या फर्क पड़ता है।

 

तुम्हारे भीतर शक्ति का अजस्र भण्डार है। तुम्हारे भीतर विश्‍वास की शक्ति है उसी विश्‍वास के साथ मेरे साथ चलो… यह जीवन श्रेष्ठ है और श्रेष्ठतम होगा। तुम्हें अपना लक्ष्य अवश्य प्राप्त होगा।

 

कामयाबी के सफर में मुश्किलें तो आएंगी ही
परेशानियां दिखाकर तुमको तो डराएंगी ही
चलते रहना कि कदम रुकने ना पायें
अरे मंजिल तो मंजिल ही है एक दिन तो आएगी ही
खुद से जीतने की ही जिद है मेरी
मुझे खुद को ही हराना है
नन्द किशोर श्रीमाली

Dialog with Loved Ones…

Dear Loved one,

Divine Blessings,

 

I read a story somewhere, wherein a Guru and His disciple were sitting and meditating in a garden. The disciple noticed an egg lying on the grass beneath a plant, and a small being was trying to break out of the egg shell. This struggle continued while the dawn turned into the dusk. The egg shell got cracked at multiple places. A tiny portion of the mouth of the larvae peeped out. The disciple was watching it very carefully and he thought that he should do something. The tiny larvae had been exerting the whole day, and the shell was cracking very slowly, bit by bit. The disciple felt great pity, while his Guru continued to remind him to focus on his meditation instead of shifting gaze elsewhere.

Finally, the disciple couldn’t bear it any more and he took out the larvae by breaking out the egg shell. He took her in his hand and gazed at it fondly, and felt very happy to save a little being with his efforts. However, the larvae died after a couple of hours. The disciple became very sad and asked his Guru the reason for its death. Guru replied – You took away this larvae’s life instead of granting it one.

Does this story of the egg, larvae and the butterfly sound familiar? You all come to me and relate your problems of life to me. Someone is sad in his job, while other is unhappy in his family. Someone else may be upset with constant bickering. There is a common thread. All of you are sad with your current situation, but you are not doing enough to change the circumstances. You expect someone else to save you. However, how will your confidence increase if someone else continues to support you. What would have happened to that larvae if that disciple had not saved her from that struggle? She would have fluttered among the flowers as a beautiful butterfly. She would have continued to dance throughout her life.

His Guru explained that – You felt the agony of that larvae. It was neither suffering nor pain. She was pushing the egg shell with her limbs, and this exercise was making her wings more stronger. Her wings would have gathered full strengthwithin the next few days, and this would have enabled her to strike away the shell and come out completely in one go.

Struggle is synonymous with the  change of circumstances. Everyone cries in distress, but only very few  struggle. Most people make compromises with their lives and live under a cloud of fear. This cloud of fear originates from what you folks term as the society.

 

Only the valiant armored fall in the field of battle

The craven on knees should be somewhere else

 

A major fact is that – this entire society has been created for our own benefit. We were not created for this society. You waste your entire life in making complaints and compromises between the two.

You definitely feel something lacking in your current life. It is a very good thing that you do feel absence of something. However, only we will have to gather the courage and strength to change these circumstances. Nobody else will come to change your life. You will have to build up this courage from within your own self, only then you can fully realize the “PoornamadaH PoornaMidam”

You have been making multitudes of goals for your life from your childhood. Stop and think – Have you accomplished whatever you planned for and thought of in your childhood? Are you progressing on the path which you wished for, in your childhood. Are you doing full justice to your talent.

If your answer is that – Yes, I am progressing in the correct direction in accordance with my beliefs and am  making full use of my talents, then you should not have any complaints from your life.

The biggest problem in life is not to obtain success or failure. The biggest problem in life is the partial effort, applied with partial focus. Now our mind is our own. Why are we not able to apply it fully, to achieve full success?

 

Certainly we shall reach our mark,

In-spite of roaming hither and tither;

Truly lost are those,

Who never left their abode.

 

We need to keep only a few minor points in our mind. First of all, you should determine what you want in your life. Then you should pay attention to the things that can grant you happiness.

Do not ever delay your tasks. The basic origin of tension is the difference between expected and actual timings of your tasks. You ought to totally wipe out the difference between expectation and completion.

Why not start a new beginning if you beget failure? Do not think negatively about your experiences. Utilize your experience to progress ahead. A new chapter in the book of life is being written daily. Our decisions of today shape  our  results of tomorrow.

I want to give you the ability to make decisions. You should decide. Remove the doubts from your mind. Absence of decisions will increase your dependency on others, it will make you their slave. You should make firm decisions by yourself, and you possess full capabilities to do this. You have masked this ability. You have to make decision yourself. It is quite possible that you may encounter  a few failures. However you should make your own decisions. You should develop this capability of making decisions yourself. What lies in the future? Future will definitely be good. Why not. It will certainly be good. God is with you, Guru is with you. It will definitely be good. How does it matter if 2, 4 or 10 people in this wide world turn against you.

You have unlimited store of power within yourself. The power of faith resides within your own self.  Come with me with this full faith…. This is a superior life and will obviously become the best. You will definitely achieve your goals.

 

The toils will surely escort you on the path to success,

The travails will try their most to scare you off.

Keep walking, lose not a single step,

The goal is out there, arrive we surely shall there.

I rebel to  triumph over my own self

I seek to thwart my own self

 

 

Nand Kishore Shrimali

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