Dialog with Loved Ones – March 2018

अपनों से अपनी बात… 

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

अभी उत्सव के पर्व चल रहे हैं। महाशिवरात्रि का पर्व आपने धूमधाम से सम्पन्न किया है। शिवाभिषेक के साथ-साथ आपने आत्मभिषेक भी किया। आपका जीवन ऐसे ही रस से आप्लावित होता रहे, आप नये विचारों को स्वीकार करते रहें। आने वाला नववर्ष आपके लिये मंगलमय हो।

इस बार तो मैं मध्य भारत की यात्रा पर ही रहा, छिन्दवाड़ा, अमरकंटक और आगे निखिल जन्मोत्सव पर रायपुर ये यात्रा का क्रम लगातार चल रहा है। मैं आपके पास आता हूं और आप जिस प्रेम और उत्साह के साथ मेरा स्वागत करते हो, मेरी बात सुनते हो उन क्षणों में मुझे लगता है कि – मैं संसार का सबसे सौभाग्यशाली व्यक्ति हूं जिसे इतना स्नेह और प्रेम प्राप्त होता है।

मैं आपसे बातचीत भी करता हूं, आप अपने मन के भाव बेबाकी के साथ मेरे समक्ष व्यक्त करते हैं। मुझे उन भावों को सुनकर खुशी भी प्राप्त होती है कि आपके विचार, आपकी भावभूमि इतनी उच्च है – आप अपने जीवन में अपने-अपने लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हों और उसके लिये बुद्धि के साथ, परिश्रम के साथ प्रयत्न भी कर रहे हैं।

प्रत्यना सफला सन्तु सफला सन्तु मनोरथा

आपके प्रयत्न अवश्य सफल होंगे, इसमें मुझे तो कोई सन्देह नहीं है और आप मेरे हैं, आपको भी उसमें किसी भी प्रकार का कोई सन्देह नहीं होना चाहिए।
कई लोग मुझसे कहते हैं कि वो इस संसार में बहुत बड़ा बनना चाहते हैं, वो इस संसार संग्राम में जीतना चाहते हैं, मैं इस युद्ध में जीत कर रहेंगे, तो मेरे प्रिय मित्रों, मेरे सहयोगियों आपसे मेरा एक छोटा सा प्रश्‍न है – क्या इस संसार में ईश्‍वर ने आपको युद्ध करने के लिये भेजा है या इस संसार में आनन्द से जीने के लिये भेजा है। आपको प्रेम से परिपूर्ण जीवन जीने के लिये भेजा है।

ज्यादातर लोग अपने जीवन में अपना ‘लक्ष्य’, अपना ‘गोल पोस्ट’ बार-बार बदलते रहते हैं। कभी कोई चाहत, कभी कोई लक्ष्य। अरे! ऐसे थोड़े ही ना होता है। जो लक्ष्य आपने बनाया है, उस पर कार्य करते रहो। ये जो चाहत का महासागर है, वो कभी पूरा नहीं पड़ता, कभी पूरा भरता नहीं है। इस चाहत के महासागर में चक्रवात आते रहते हैं, तूफान आते रहते हैं, ज्वार आता है, भाटा आता है लेकिन वह भीतर से गंभीर रहता है। तुम भी अपनी चाहत के महासागर पर धीरता के साथ विचार करो और इस चाहत के महासागर में बहुत प्रेम के साथ अपनी जीवन नैय्या चलाते रहो। चक्रवात भी शांत होंगे, ज्वार आया है तो भाटा भी आएगा। अमावस्या आई है तो पूर्णिमा भी आएगी ही।

यह मैं भी जानता हूं और यह तुम भी जानते हो कि तुम बहुत अच्छे व्यक्ति हो, सबसे बहुत प्यार करते हो। लेकिन तुमसे मैं एक बात पूछना चाहुंगा कि क्या तुमने अपने आपसे प्रेम किया है?

जो अपने आप से प्रेम कर सकता है वही तो दूसरों से भी प्रेम कर सकता है।
जो अपने आपको संभाल सकता है, वही दूसरों को संभाल सकता है।
जो अपनी जिम्मेदारी स्वयं ले सकता है वही तो दूसरों की भी जिम्मेदारी ले सकता है।

यह जो अपने आप से प्रेम करने का भाव है, अपने आपको संभालने का भाव है, अपने आपको धैर्य देने का भाव है, अपने आपमें निराशा में आशा का संचरण करना है। अपने कार्यों की जिम्मेदारी स्वयं लेने का भाव है। वही सबसे बड़ी साधना है। वास्तव में तपस्या इसी को कहते हैं।

इसके लिये तुम्हें कुछ पल शांत होकर अकेले बैठना पड़ेगा। शांत होकर अकेले बैठना ही तो पूजा है, साधना है। जैसे किसी कार्य को करने के लिये, किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये तुम्हारे भीतर जो तड़प उत्पन्न होती है और उस तड़प की नाव पर सवार होकर तुम जी जान से कार्य करने लग जाते हो वैसी ही तड़प ईश्‍वर के प्रति, गुरु के प्रति अपने भीतर उत्पन्न करो। वह भीतर की तड़प प्रेम की तड़प होगी, जिससे तुम आनन्द के साथ अपने कार्य कर सकोगे। लोग कहते हैं कि – ईश्‍वर की पूजा करो, गुरु की पूजा करो। मैं कहता हूं कि – ईश्‍वर से प्रेम करो, सद्गुरु से प्रेम करो और उन्हें अपने मन का सहयोगी बनाओ। वे सहयोगी बनकर सदैव तुम्हारे साथ रहेंगे। तुम उन्हें सहयोग दोगे, वह तुम्हें सहयोग देंगे। यह मित्रता का भाव सबसे बड़ी पूजा है।

सः वीर्य करवा वहै

एक दूसरे को सहयोग देते रहें, ऊर्जा का आदान-प्रदान करते रहें। तब जीवन की ऊर्जा में निरन्तर और निरन्तर वृद्धि होगी, अततः यही ऊर्जा उर्घ्वगामी होगी और तुम्हारे रोम-रोम में व्याप्त हो जाएगी। तब चेतना मंत्र – ‘ॐ ह्रीं मम प्राण देह रोम प्रतिरोम चैतन्य जाग्रह ह्रीं ॐ नमः’ सार्थक होगा।

समय का महत्व, समय चक्र का प्रभाव, संस्कार, संतानों की शिक्षा, गुुरु-शिष्य सम्बन्ध, प्रेम भाव आदि सब मेरे प्रिय विषय हैं, जिनके बारे में, मैं आपको लिखता रहता हूं, बोलता रहता हूं। इस बार भी इस सम्बन्ध में कुछ लिखा है। उसे पढ़ना, विचार अवश्य करना। मैं सार रूप में यही कहुंगा कि –

  • तुम अपने समय का निरन्तर उपयोग करना, क्या उपयोग है, ये तुम्हारा मन अच्छी तरह से जानता है। उस मन के अनुसार ही समय का उपयोग करना।
  • तुम इस संसार में निर्माणकर्त्ता हो, पालनकर्त्ता हो। किसका निर्माण, पालन कर रहे हो, यह समझना जरूरी है। तुम प्रेम, स्नेह की नींव पर अपने जीवन की इमारत का निर्माण कर रहे हो या केवल ईंट, पत्थर, आडम्बर, दिखावा आदि वस्तुओं का निर्माण या संग्रह कर रहे हो?
  • प्रेम और स्नेह का निर्माण करोगे तो ये दोनों तत्व सदैव और सदैव वृद्धि की ओर अग्रसर होते रहेंगे, बाकी सब तो नाशवान हैं।
  • पालन क्या कर रहे हो? अपने स्वधर्म और स्वभाव का पालन कर रहे हो या कुछ भौतिक वस्तुओं, कुछ सम्बन्धों को पाल रहे हो। सारे सम्बन्ध, सारी वस्तुएं नाशवान हैं। केवल स्वधर्म और स्वभाव ही सदैव जीवित रहते हैं। उन्हीं का पालन करना है।

यह स्वधर्म, स्वभाव बड़ा ही तरल है और ठोस है, पारद के समान है। देश-विदेश कहीं जाओगे तुम्हारा स्वधर्म, तुम्हारा स्वभाव सदैव तुम्हारे साथ रहेगा। इसकी पालना करते रहना। मेरा तो यही कहना है –

मैं मनाता रोज अपना जन्म दिन जन्म दिन
हर पल मरता, हर पल नवीन होता मेरा मन
यादों के झंवर से अपने आपको निकालता
कभी डूबता, कभी तैरता, कभी संभलता
कभी कभी समझाता, पर कभी कभी समझता
कभी रोता, कभी मुस्कराता, फिर विचारता
यादें मेरी अपनी यादें, इतनी कठोर क्यूं होती हैं
मना करते-करते फिर मन में क्यूं आ जाती हैं
माना हर एक को सब कुछ नहीं मिलता
पर हर एक को कुछ तो है मिल ही जाता
जो मिल गया उसे सजा लिया, सीने में
जो खो गया, वो सजा दे गया सीने में,
पल-पल जीने में मजा है, कहता हूं अपने लिये
दिल तू धड़कता रह सुनहरे सपनों के लिये
है मेरे पास मेरा मन, मेरी तन्हाई
है मेरे पास मेरी वजह, बजाता रहूं अपनी शहनाई
रोकर हंसता हूं, हंसकर रोता हूं
रोज अपने मन में गीत अपने बजाता हूं
ऐसे ही जीता हूं हरपल, चलता रहूं, चलता रहूं
जो मिला उसका आभार
जो नहीं मिला वह भी अंगीकार
नित्य चलता हूँ मैं, प्रतिपल जलता हूँ मैं
रोशन करने हैं अभी मुझे घर कई
इसलिए रोज जन्म लेता हूँ मैं
सपनो की टीसें भी हैं
और यादों की हूकें भी हैं
रोज तपता हूँ, कुंदन में ढल गया हूँ मैं
अनगिनत ख्वाहिशों को पूरा करना मुझे
इसलिए रोज जन्म लेता हूँ मैं

 

तुम तो पकड़ कर बैठ जाते हो, छोड़ना सीखो, मुक्त होना सीखो, संसार चक्र में कुछ छूट जाएंगे, कुछ रह जाएंगे, बस तुम अपने भीतर के प्रेम भाव का आह्वान करते रहो। अपने भीतर के अमृत कुण्ड का मंथन करते रहो। अमृत भी तो तुम्हें अपने भीतर से ही प्राप्त होगा।

अमृत… अमृत… अमृत… रस से भरकर जीवन जीओ।

नन्दकिशोर श्रीमाली

पुनश्‍चः बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं प्रत्येक माता-पिता से मेरा आग्रह हपर बहुत अधिक दबाव नहीं डालें। आपका बच्चा अपने पूरे परिश्रम से बहुत अच्छा कर रहा है, वह मन लगाकर पढ़ रहा है। उसके लिये उसकी परीक्षा को भार नहीं बनाएं।

Dialog with Loved Ones …

 

Dear Loved one,

Divine Blessings,

The festivities are continuing on. You celebrated Mahashivraatri joyfully. You accomplished Aatmabhishek (Anointment of Self), along with Shivaabhishek.  May your life be always full of this divine bliss, may you continue to imbibe new-novel thoughts. May the imminent new year be full of bliss.

I continued to travel in central India, through  Chhindwara, Amarkantak and imminent Nikhil Janmotsava at Raipur.  The tremendous love and enthusiasm I receive while visiting you, makes me feel that  – I am the most fortunate person in this world, receiving such remarkable love and affection.

During our personal interactions, you unhesitatingly express your innermost emotions to me.  Listening to such noble and sublime thoughts gladden my heart. You have setup high goals in your life, and are exerting very hard, with due intelligence to accomplish them.

 

Pratyanaa Safalaa Santu Safalaa Santu Manorathaa

 

I have no doubt that you will certainly succeed in your efforts. You are mine, there should not be any doubt in your mind about this fact.

Many people tell me that they want to scale great heights in this world, they wish to win these worldly battles, and desire to do their utmost to win. My dear friends, I have a simple query. Has the Almighty God sent you in this world to win the wars, or has He sent you  to live joyfully. He has sent you to this world to lead a joyful life resplendent with love.

Most of the  people keep altering their “aims”, their “goal-posts” in their lives. Their wishes and desires keep changing. This is utter nonsense. Continue to work on the goals that you have set. You can never completely tread this sea of wishes and desires.  Cyclones, Storms and tides keep attacking the ocean, but it always stay calm within. You should also patiently analyze your desires within this deep ocean, and continue to cross it in the boat of love. These cyclones and storms will certainly abate one day. If tonight is moon-less night, then the full-moon night will also definitely arrive one day.

I am certain and you also know that you are basically a very good person. You are full of love towards everyone. However, I have a question – Have you ever loved yourself?

Only the one who can love himself, can also love others.

Only the one who can support himself, can sustain others.

Only the one who is responsible for himself, can take responsibility for others.

 

This sublime feeling of loving yourself, of handling yourself bestows the noble qualities of patience and hope during the dark despairs. This makes you take responsibility for your actions. This is the greatest spiritual Sadhana. This, in reality, is the essence of penance.

To achieve this, you will have to sit quietly at a lonely spot alone for a few moments. Prayer-Sadhana is nothing else but sitting quietly on your own. When you decide to achieve a particular task, or to attain an aim, your inner desire and deep motivation awakens, and you start working towards your target with full trials and efforts. You should generate a similar sense of inner-desire and motivation towards the God and Guru.  Love will feed this inner motivation, and you will be able to work joyfully.  People direct you to pray to Almighty God and Guru. I advise you to love Almighty God and Guru, and make Them a partner of your mind. They will eternally stay with you as the divine collaborator. You support Them and They will support you in return. This friendship is the greatest form of worship.

 

SaH Veerya Karvaa Vahei

 

Continue to support each other, and share divine energy. This vital life energy will continuously increase, will dynamically rise upwards and will eventually imbibe within each cell of your physical body. This will lend true meaning to the Chetna Mantra –  “Om Hreem Mam Praana Deha Roma Pratiroma Cheitanya Jaagrah Hreem Om NamaH

 

I always write and speak on some of my favourite topics –  importance of time, effect of time cycle, noble values,  education of children, Guru-disciple relationship, divine love etc. Today also, I have enumerated some points on  these topics below. These are worth reading and thinking about. To summarize –

  • Continue to use your time efficiently.  Your mind already knows how to make best use of your time. Utilize time according to your mind.
  • You are the creator and nurturer in this world. It is vitally important to analyze what you are creating and nurturing. Are you building your life on the foundations of love-affection, or is it being forged just on rocky bricks of phony pretensions and show-offs.
  • If you develop love-affection, these elements will continually enhance, everything else is mortal.
  • What are you nurturing? Your religion-nature or physical objects-relations. All physical objects and relations are mortal. Only religion and nature are immortal. You should nurture only these elements.

These twin elements of religion-nature are very fluid. They can be solidified, like mercury. Wherever you go, the religion-nature will accompany you.  Continue to nurture these traits. 

 

I celebrate my birthday on every day

My mind dies and is born anew every instant

 

Rescues my self from the cesspool of memories

Sometime sinks, floats, but never steadies

 

Sometime teaches, or learns

Cries, smiles, and then questions

 

Memories, my rememberings, why so anguished

Why do you appear even when banished

 

Everyone does not get everything

But everyone does get something

 

Decorates the heart, whatever begot

Ails the heart, what was lost

 

Joyfully living moment by moment gleams

The heart beats chasing the  golden dreams

 

I have my mind, my own desolate

My own reasons, to pipe by flute

 

Laugh after cry, cry after jape

Daily sing my sings in my own mind map

 

I like to live such, at each moment,  keep walking, keep going.

 

Thank what I got by tryst

Glad with what I missed

 

I walk continually, burn each second

 

I aim to illuminate many homes so

I take birth every now

 

The pangs of dreams

And strings of memories

 

I burn daily, to be pure gold gilt

Need to fulfill infinite wishes lilt

 

So I am born daily.

 

Stop sitting with clenched fists, and start learning to be free. Learn liberation. You will lose some and miss some in this world. Continue to rake in love within your own self. Keep churning your inner nectar. You will get nectar from within.  Elixir … Elixir … Elixir … Live life full of joyful juice.

 

Nand Kishore Shrimali

PS: Children’s examinations are going on. I request every parent to refrain from putting  too much pressure on the children. Your child is doing excellently with his hard work, and he is studying with full mind. Do not make examination a burden for him.

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