Dialog with Loved Ones – March 2017

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

बसन्त पंचमी आई और आप लोगों ने सरस्वती पूजन कर इस उत्सव को सम्पन्न किया। युवावस्था के प्रतीक ‘रति-अनंग’ उत्सव को सम्पन्न किया और अब महाशिवरात्रि, होली और नवरात्रि मनाने के लिये आतुर हो रहे हो, आपके इस उत्साह पर मुझे गर्व है।

 

एक साधक ने मुझसे पूछा कि – गुरुदेव आप मुझे देखकर इतना मुस्कुराते क्यों हो? मेरे अन्दर ऐसा क्या है जो आप देखकर मुस्कुराते रहते हैं? मैंने कहा कि क्या तुम्हें खुद यह मालूम नहीं कि तुम्हारे अन्दर क्या है? मैं तो तुम्हें अच्छी तरह से देख रहा हूं, तुम्हारे अन्दर के भोलेपन को देख रहा हूं, तुम्हारे भीतर के मासूम भाव को देख रहा हूं, तुम्हारी सद्भावनाओं को देख रहा हूं, इसीलिये मैं तुम्हें देखकर मुस्कुराता हूं और यह चाहता हूं कि तुम भी अपने आपको अच्छी तरह से देखकर खुश होओ। अपना स्वभाव, अपना हावभाव, अपनी बुद्धि, अपना विचार, देख-देखकर – सोच-सोचकर खुश होओ। जब तुम अपने आपको देखकर खुश होने लगोगे, अपने आप में तृप्त होने लगोगे तो तुम्हें पहली बार ज्ञात होगा कि खुशियों का अनमोल खजाना तो तुम्हारे भीतर ही भरा पड़ा है। सबकुछ अन्तर्मन में व्याप्त है। बस तुम एक छोटा सा काम करो, पहले तुम खाली.. बस! खाली… हो जाओ। जो कुछ तुमने भीतर संचित कर रखा है, उसे निकाल दो।

 

तुमने क्या संचय किया है? तथाकथित जानकारी, जिसे तुम कभी ज्ञान कहते हो, कभी अनुभव कहते हो और उसके ऊपर तुमने गम्भीरता का ढक्कन लगा दिया है। गम्भीरता से भरे हुए इस आत्म / मन में तुम्हें खुशी तो दिखाई ही नहीं दे रही है। अब इस भरे बर्तन में, मैं जो नया विचार / ज्ञान डालना चाहता हूं कैसे डालूं? पहले तो मुझे तुम्हारी इस नकली गम्भीरता को, तुम्हारे इस अनुभव को, तुम्हारी इस जानकारी को खाली करना पड़ेगा। यह बात तो अवश्य है कि – तुम भीतर से खाली नहीं हो। बड़े ही भरे-भरे हुए हो इसलिये तुम अपने अन्दर कुछ नया आने ही नहीं देते हो। तुम चिन्ताओं से भरे हुए हो, द्वंद्वों से भरे हुए हो, क्रोध से भरे हुए हो, पूर्वाग्रह से भरे हुए हो, असन्तुष्ट भाव से भरे हो। अब सबसे पहले एक काम करो, अपने इस मन के कुण्ड को खाली करो। जब तुम मन को खाली करोगे, तभी तो जीवन में कुछ नया आ सकेगा।

 

शायद तुम रुदन करना चाहते हो, शायद तुम खिलखिलाना चाहते हो, तो ये दोनों काम अवश्य करो। अपने भीतर इन भावनाओं को दबाकर मत रखो। गुरु के सामने न नकली मुस्कुराहट रखो, न अनावश्यक गम्भीरता रखो। जैसा तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है, उसे ही आने दो। जो तुम्हारे पास आह्लाद है, खुशी है उसे खुलकर व्यक्त करो। पीड़ा है तो खुलकर व्यक्त करो। उत्सव है तो खुलकर मनाओ। वसन्त पंचमी है, शिवरात्रि है, होली है, नवरात्रि है तो इन्हें खुलकर मनाओ। मेरी बात ध्यान से समझना, अपने-आपको रोको मत। यदि तुमने रोक दिया तो, तुम्हारे मन का घड़ा तुम्हारी गंभीरता से जल्दी-जल्दी भर जायेगा और हो सकता है कि अपने ही आन्तरिक तनाव के कारण फूट भी जाये, तब तुम्हें और भी अधिक पीड़ा होगी। इसीलिये समय-समय पर इस मन के कलश को खाली करते रहो। आह्लाद को आने दो और पीड़ा को जाने दो। वैसे दोनों ही अस्थायी हैं। हजारों प्रकार के आह्लाद भी आते हैं, पीड़ाएं भी आती हैं लेकिन उन्हें बहने दो और अपने आपको नये के लिये तैयार करते रहो।

 

तुम एक काम गलत करते हो… तुम मशीन की तरह घड़ी देखकर, काल देखकर काम करते हो… तुम्हारा सोना, उठना, चलना, बैठना सब घड़ी के अधीन हो गया है। सब कुछ जल्दी-जल्दी करना चाहते हो। बार-बार यही सोचते हो कि समय कम है, सबकुछ जल्दी-जल्दी निपट जाए तो तुम कालचक्र के अधीन हो। इस अधीनता से जल्दी से मुक्त होना आवश्यक है। गुरु तुम्हारे लिये महाकाल स्वरूप हैं। काल से ऊपर महाकाल हैं, यही तो शिव भाव है। जहां कोई शीघ्रता नहीं लेकिन साथ में निश्‍चिन्तता और सतत् गतिशीलता है। तुम काल के अधीन रहना चाहते हो या महाकाल के अधीन। तुम अपने आस-पास देखो सब तरह के लोग हैं, सब अपने समय चक्र में चल रहे हैं। यह तुम्हारा काल चक्र बड़ा ही महत्वपूर्ण है। किसी की जल्दी शादी हो जाती है तो किसी की लेट, किसी के एक बच्चा होता है, किसी के दो। कोई बीस-बाईस साल में पढ़ाई पूरी कर लेता है तो कोई सताइस साल में पढ़कर ही अपना काम प्राप्त कर लेता है। किसी को सफलता तीस साल में मिलती है और वह साठ साल में मर जाता है। किसी को सफलता पचास साल में मिलती है और वह नब्बे साल तक जीवित रहता है। हर व्यक्ति का एक काल चक्र होता है। कभी तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे सहयोगी, साथी, तुमसे छोटे, आगे बढ़ गये हैं, कभी तुम्हें लगेगा कि कई तुमसे बहुत पीछे रह गये हैं। न कोई आगे है, न कोई पीछे है सब अपने समय चक्र से चल रहे हैं। थामो अपने आपको और अपने आत्म स्वरूप को जानो। आपके सारे कार्य आपके सुख के लिये, आपकी प्रसन्नता के लिये ही तो होने चाहिए। इसलिये तो जब शिव अभिषेक करो तो अपना आत्म अभिषेक भी करो। जब तुम ‘ॐ नमः शिवाय’ बोलो तो अपने बेजान शरीर, शव के लिये भी शक्ति का आह्वान करते हुए इसमें शिव भाव जाग्रत करने के लिये अपने लिये भी ‘ॐ नमः शिवाय’ बोलो। तुम्हारा भी ‘ॐ’ (त्रिगुणात्मक विकास) होना चाहिए, तुम्हारे शरीर में भी ‘शिवा’ अर्थात् शक्ति होनी चाहिए। तभी तो तुम जीवन्त हो सकोगे। खाली करते रहो अपने आपको, प्रवाहवान बनाओ अपने जीव भाव को।

 

इस बार नवरात्रि में तुम एक काम अवश्य करना, शांत भाव से बैठकर अपने घर में, अपने कार्य स्थल पर ‘नवार्ण मंत्र’ का जप अवश्य करना। हो सके तो सुबह और शाम दोनों समय नवरात्रि में यह साधना करना। एक-एक अक्षर धीरे-धीरे, अलग-अलग ‘ऐं ह्रीं क्लीं चा मु ण् डा यै वि च्चे’ अपने भीतर से बोलना। प्रत्येक अक्षर की ध्वनि तुम्हारे होठों से नहीं, तुम्हारे भीतर से आनी चाहिए। धीरे-धीरे इसकी गति बढ़ाना, तीव्रता बढ़ाना और नवमीं आते-आते गति अपने आप तीव्र हो जायेगी। होठ चाहें कुछ ना बोलें, तुम्हारे रोम-रोम से ‘ऐं ह्रीं क्लीं चा मु ण् डा यै वि च्चै’ गुंजरित होने लगेगा। तुम्हारे भीतर से यह शक्ति ध्वनि गुंजरित होगी। तब तुम्हारे शरीर का तापमान भी बढ़ेगा, रक्त प्रवाह भी तीव्र होगा और तुम्हारे भीतर ही एक असीम ऊर्जा का जागरण होगा, जो वास्तव में तुम्हारी स्वयं की है।

 

तुम्हारे भीतर ऊर्जा का असीम भण्डार, शक्ति का असीम भण्डार छुपा हुआ है और तुम्हें इसे अनुभव करना है, पहिचानना है, इसे जानना है। शक्ति तुम्हारे इसी मिट्टी के शरीर में पहले से स्थापित हैं। तुम इसे अपनी ही आत्म अग्नि से प्रज्वलित करो। इसके ऊपर आई हुई राख को, अपने ही प्रयत्नों से हटाओ। तब तुम्हारा वास्तविक स्वरूप प्रकट होगा। तब तुम खाली होने की क्रिया करोगे और फिर उस खालीपन में, शून्य में, आह्लाद प्रवेश करेगा, खुशी प्रवेश करेगी। शांति और संतोष प्रवेश करेगा। इसे ही प्रज्ञा कहा गया है, चेतना कहा गया है। इस मानस साधना के पथ पर तुम चलो और अपने हृदय को, अपने मन को खोल दो, नित नये भाव, नये विचार आने दो…

 

सद्गुरुदेव निखिल का कल्याणकारी आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है।

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with Loved Ones …
Dear loved one
Divine Blessings,

 

Basant Panchami arrived and all of you celebrated this festival by worshipping Saraswati. You accomplished the “Rati Anang” festival of the youth, and now you are getting ready to celebrate the Mahashivaratri, Holi and Navaratri. I am very proud of this enthusiasm.

 

A Sadhak questioned me – Gurudev, why do you smile so much while looking at me? What is inside me which prompts your smile? I replied that you yourself do not know what you have within yourself? I can see deep inside you, I look at the innocence within you, gaze at the purity within your being, along with your goodwill and virtuous intentions; hence I smile upon seeing you and I also wish you to become happy after seeing within yourself. You should get joy at the thoughts of your nature, your gesture, your intellect, your thoughts and your view-perspectives. When you start becoming happy while seeing yourself, when you start becoming satisfied with yourself, then you will realize for the first time about the presence of the precious treasure of happiness stored within you. Everything is within your inner mind. You ought to perform only one task, you should get empty, become empty… Remove whatever you have stored within yourself.

 

What have you saved? The so-called information, which you sometimes term as knowledge or experience; covered with a lid of seriousness. You are not able to find happiness in this inner-self full of seriousness. Now, how do I pour in the new ideas / knowledge within this full pot, which I wish to.  First, I shall have to remove this fake seriousness, the set of your  experiences and information. It is definitely certain that – you are not empty from within. You are filled with so many multiple items, that you do not let anything new to come within yourself. You are filled with anxieties, tensions, dilemmas, anger, prejudices and discontentment. Do one thing first, empty the pond of your mind. Something new in life will be able to germinate only after you empty your mind.

 

Maybe you want to cry, or maybe you want to laugh, do whatever you wish to do. Do not suppress or control these feelings. Do not show either fake smiles or unnecessary seriousness to your Guru. Let your real natural form emerge. Freely express, whatever happiness you have. Similarly openly express the sadness within you. Celebrate the festival openly. Basant Panchami, Shivratri, Holi, Navaratri, celebrate them fully. Try to understand my words carefully, do not let anything inhibit you. If you try to stop yourself, then the pot of seriousness within your mind will fill up quickly and it might burst due to the internal tensions. This will cause you severe pain. Therefore, keep on empting this pot regularly. Let the happiness come and let the sadness leave. Both of them are temporary. Thousand kinds of happiness and pain arrives and leaves, let them flow, and  prepare yourself for something new.

 

You behave incorrectly … You work like a machine looking at the clock, looking at the time … each activity of your life sleep, work, movement etc. is fully controlled by the clock. You wish to do everything quickly. You often feel that the time is short, everything should get done rapidly, your are under full control of the time-cycle. It is important to quickly get free from this subordination. Guru is the Maha-kaal Almighty form for you. Maha-kaal (Almighty) rules above the kaal (time), this is the essence of the Shiva. This is where speed is immaterial, but a deep sense of resilience and constant mobility is ever-present. Do you wish to live within control of kaal (time) or Maha-kaal (Almighty). Look around you, you see all kinds of people, all are living in their own time cycle. This time-cycle is very significant. Someone gets married early, others enter into marriage late. Some have one child, while others have two. Someone completes his education at the age of 20-22, while other is able to start his job only after completing his studies at the age of 27. Someone achieves success at the age of thirty, and he dies at the age of sixty.  Some other person achieves success at the age of fifty and he lives till the age of ninety. Every person has his or her own time-cycle. Sometimes you may feel that your colleagues, partners, juniors, have gone ahead, and sometimes you will feel that you have left many people behind. No one is ahead and no one is behind, everyone is proceeding as per their own time-cycle. Stop yourself and understand your own self. All of your tasks should be completed only for your own pleasure, for your own happiness. Therefore consecrate yourself too, while performing Shiva-abhishek. When you chant “Om NamaH Shivaaye”, then chant “Om NamaH Shivaaye” to impart life, energy and Shiva-element within your own dead, lifeless body. You should also develop around “OM” (the three dimensions), your body should also be filled with Shiva-Shakti. Only then will you be  able to live. Keep emptying yourself regularly, let your life-form flow.

 

You should perform one task this time during Navratri, you must certainly chant “Navaarn Mantra” while sitting calmly in your house, at work. You should perform this Sadhana during Navraatri, both during morning and evening. Chant each letter slowly, separately, from within yourself “Eing Hreeng Kleeng Chaa Mu N Daa Yei Vi Cchei”. Each letter should emerge not from your lips but rather from within you. Gradually increase its pace, enhance the  intensity and this speed will automatically intensify by the Navami (Ninth day). The lips may not emit any sound, but the divine Mantra “Eing Hreeng Kleeng Chaa Mu N Daa Yei Vi Cchei” will vibrate from each cell of your body. This Shakti vibration will emanate from within you. Then the temperature of your body will also increase, the blood flow will also get intensed and an immense energy will awaken within you, which is actually your own.

 

There is an infinite store of energy inside you, an infinite source of power is hidden within you; and you have to experience it, comprehend it and understand it. This Shakti energy is already imbibed within your own body. You should ignite it with the flame of your own self. Remove the ashes covering it, with your own efforts. Then your real nature will emerge. Peace and contentment will enter within you. This has been termed as the intelligence, the consciousness. Walk on this mental path, and open your heart, your mind, let the new feelings, new thoughts enter your self daily …

 

The beneficial blessings of Sadgurudev Nikhil is always with you.

 

Cordially yours
Nand Kishore Shrimali
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