Dialog with loved ones – July 2018

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

तुम मेरे हो और जो तुम हो वह मैं हूं, मैं तुम्हारा ही प्रतिरूप हूं, तुम मेरे ही प्रतिरूप हो, प्रेम से भरे हुए सरस प्रवाहमान व्यक्तित्व हो। तुम्हारा प्रत्येक रक्त कण तो प्रेम की बूंद से बना है और इस प्रेममय जीवन का आस्वादन करने हेतु ही तुम्हारी सारी क्रिया है। यही तुम्हारे मन का भाव है। तुम्हारा मन तो अमृत कलश है, जहां से केवल और केवल अमृत ही प्रवाहित होता है।

 

पर मुझे तुम्हारे चेहरे का मुरझाया पन बहुत पीड़ा देता है। तुम हंसते भी हो तो भी ऐसा लगता है कि – आंखों के कोनों में अश्रु छिपे हुए हैं, बस फूट कर बाहर आना ही चाहते हैं। किस बात का बोझा है, किस बात की थकान है और यह थकान मन की गहराईयों में कैसे पहुंच गई है? मन पर वेदनाओं के इतने गहरे निशान क्यों पड़ गये है?

 

तुम तो प्रेम से पूर्ण हो, प्रेम ही तुम्हारे जीवन का निष्कर्ष होना चाहिए और प्रत्येक क्षण मधुमय बनना चाहिए, अपने मन का ही स्वाद लेना तुम कैसे भूल गये हो? क्या कोई अवसाद है? और यह अवसाद है, शायद अधूरी इच्छाओं का, अधूरी कामनाओं का तो, वह इतने गहरे कैसे तुम्हारे भीतर पहुंच गया है, जिसने तुम्हारे मन को ही जर्जर करना शुरू कर दिया है।

 

यह हो सकता है कि – जिन्दगी में तुम्हें वह नहीं मिला जो तुम्हें मिलना चाहिए था। हो सकता है, परिवार का प्यार कम मिला हो, हो सकता है धन की कमी हो, हो सकता है कार्य समय पर पूरे नहीं हुए हों, हो  सकता है कि तुम्हें कई बार पराजय का सामना करना पड़ा हो पर ऐसा तो होता ही है, हर चाहत समय पर पूरी नहीं होती, इसीलिये तो इसका नाम चाहत है। चाहत कहां से उपजी है, तुम्हारे मन से उपजी है। तो उस मन को उपजाऊ बनाना पड़ेगा, उसी मन में स्वयं अपने आप पर प्रेम की वर्षा करनी ही पड़ेगी। सावन की भांति मन में स्वयं पर बरसना ही पड़ेगा। तब जाकर मन की सूखी भूमि पर पुनः नवीन सृजन होगा।

 

यह अवसाद, आन्तरिक पीड़ा जो मन में है गहरी पैठ गई हैं वे तो सबको हैं। हर कोई अपने मन में एक बोझ उठाये घूम रहा है लेकिन मैं तुमसे पूछता हूं कि तुम यह बोझ उठाये क्यों घूम रहे हो? तुम अलग हो, तुम गुरु के शिष्य हो, तुम्हारे पास गुरु हैं। तुम अपने आपको स्वीकार करो, तुम अपने आपको सम्मान दो और तुम अपने आप से प्र्रेम करना प्रारम्भ करते हुए अपना पूरा प्रेम अपने आप पर बरसा दो। खिला दो अपनी जिन्दगी, अपने मन के पुष्प को और स्वयं को खिलने का मौका दो।

 

क्यों अपने मन को मारते हो और उस बेचारे को जो अमृत से भरा हुआ है, जो तुम्हें मुस्कुराहट देता है, क्रियाशक्ति देता है उसे इतना परेशान और चिन्तित क्यों बनाते हो?

 

यह जो मन्दिरों में ढोल-नगाड़े, झांझर, घंटी बजाते तुम लोगों की भीड़ देखते हो। वह वास्तव में कोई समर्पित लोगों की भीड़ नहीं है, ईश्‍वर भक्तों की भी भीड़ नहीं है, वास्तव में यह तो निराश लोगों का समूह है जो जोर-जोर से झांझर बजा रहे हैं, कीर्तन कर रहे हैं, उनसे पूछोगे तो मालूम पड़ेगा उनके मन की भी एक ही चाह है कि – मन की गुत्थी सुलझ जाये, मन की पीर कम हो जाए, दुःख के बादल छंट जाएं, आशा की किरणें निकलें और खुशियों की फुहार बरसे।

 

शायद तुम्हें अपने प्रत्येक कार्य के लिये किसी को साक्षी, किसी को साथी बनाने की आदत पड़ गई है। हर कार्य किसी को साक्षी रख कर ही करते हो। पूजा करते हो तो भगवान को साक्षी रखकर, देवताओं को साक्षी रखकर, जल को साक्षी रखकर संकल्प करते हो। तुम अकेले रहना नहीं चाहते। अकेले में तुम्हें बड़ा ही डर लगता है। बताओ आज तक तुमने बिना किसी को साक्षी बनाये अपना कौन सा कार्य किया है। कौन सा निर्णय स्वयं अपनी जिम्मेदारी पर तुमने लिया है? मुझे तुम्हारे अवसाद के बारे में थोड़ी जानकारी है क्योंकि मैं तुम्हारे मन के भीतर प्रवेश करने का प्रयास करता हूं और किसी न किसी तरीके से घुस ही जाता हूं।

 

तुम्हें संवाद करना है। अपने मन के द्वारा। क्या तुम्हें प्रवचनकर्त्ता, उपदेशक, मोटिवेशनर व्यक्ति की आवश्यकता है, तुम्हें चाहिये मन का संवाद, क्योंकि चोट बड़ी ही गहरी मन के भीतर लगी हुई है। शरीर नहीं मन अवसाद से घिरा हुआ है। उस अवसाद को हटाने के लिये गुरु की ही आवश्यकता है। यह कार्य केवल गुरु ही कर सकते हैं। गुरु से ही संवाद होता है।

 

और यह संवाद चाहे मौन हो अथवा मुखर, जीवन्त गुरु से ही संभव हो सकता है। संवाद संसार में केवल और केवल गुरु से होता है। बाकी सब से बातचीत होती है, कहना-सुनना होता है, सलाह-मशविरा होता है। गुरु अपने शिष्य को न कोई सलाह देते हैं, न कोई आदेश, वे केवल एक संवाद करते हैं, अवसाद भरे पीड़ित मन से। तुम्हारे मन से। तुम्हारे नेत्रों के माध्यम से तुम्हें स्पर्श कर, तुम्हारी ओर देखकर।

 

गुरु तुम्हारे मन में गहरे उतरकर उन छोटी-छोटी पीड़ाओं को पकड़ते हैं जो अपनी जड़ें फैलाकर बहुत गहरी-गहरी हो गई हैं और तुम्हारा आनन्द भरा व्यक्तित्व, प्यारा-प्यारा मन जख्मी हो गया है। गुरु ही उसका मूल समझते हैं और यह याद रखना गुरु तुम्हारे अवसाद को हटाने की क्रिया, तुम्हारे दुःखों को हटाने की क्रिया तुम्हारे द्वारा ही सम्पन्न कराते हैं। वे तुम्हें उस उर्ध्वगामी पथ पर ले जाते हैं जहां तुम अपने मन को स्वयं देखकर, स्वयं उसे सहलाकर, स्वयं उसे समझाकर उस पर उगे हुए, बने हुए नकारात्म्क विचारों, भावों को तोड़ने में समर्थ हो जाते हो।

 

गुरु तो उपनिषद् हैं। उपनिषद् अर्थात् पास बैठना। यही सबसे बड़ी क्रिया है जो तुम अपने जीवन में कर रहे हो। स्वयं जीवन्त जाग्रत होकर, साकार जीवन्त जाग्रत व्यक्तित्व गुरु के पास बैठ रहे हो।

 

मत सिमटो, मत रुको, कौन सी भ्रांतियां हैं और कैसे अवरोध? सब तुम्हारे मन की उपज है। मुझसे मिलो मैंने तुम्हारा भार लिया है। तुम्हारे मन को जीवन्त वही करेगा जो स्वयं जीवन्त है। मुस्कुराहटें बांटने के लिए मुस्कुराहटें होनी चाहिए।

 

गुरु पूर्णिमा, उपनिषद् पर्व है। पास बैठने का पर्व है। मौन और मुखर संवाद का पर्व है। आओ मेरे पास बैठो तुम और मैं संवाद करते हैं और इस जीवन में आनन्द वर्षा के द्वारा नव जीवन, नव यौवन, से भरे भावों का संचार करते हैं। कोशिश कर, मेरे पास आ जाना…

 

तुम गुरु से संवाद करो और संवाद के लिये तुम गुरु से मिलो… संभव हो तो हर महीने मिलो… गुरु की एक मौन दृष्टि ही तुम्हारे मन के अनेकों अवसादों को समाप्त कर सकती है।

 

मैं तुम्हारा, तुम गुरु के…
नन्द किशोर श्रीमाली
Dialog with Loved Ones ….

Dear Loved One

Divine Blessings,

 

You are mine and whatever you are, is simply me. Both of us are reflections of each other. You are a dynamic noble personality brimming with love. Each drop of your blood is formed of love, and every action of yours is done only to taste this divine love. This, in fact, is the basic essence of your inner mind. Your mind is a divine nectar urn, churning out divine elixir each second.

But, this sad expression on your face gives me immense pain. Even your laughter conceals drops of tears in the corners of your eyes. These eyes seem so prone to cry out any moment. What is burdening you? Where did this fatigue come from? How did this lethargy reach the inner recesses of your mind? What are these deep painful marks on your mind?

You are full of love,  your life should be a grand expression of love. Each moment of your life should be as sweet as honey. How did you forget to imbibe this divine taste of mind? Where did this depression come from? How did this melancholy misery of incomplete desires-wishes reach the inner bounds of your mind? Do you know that it has now started to destroy your own mind.

It is possible that – your expectations from life remained unfulfilled. You may have received little love from your family, or you might have faced a paucity of money. It is possible that you were unable to complete some tasks within expected time or you could have suffered setback at some stages. But these are the vagaries of time. All wishes do not get fulfilled, and that’s why they are called “wishes”. Where did these wishes emanate from? Your own mind, isn’t it. So, this mind should be made more fertile, you yourself need to spray love within your own mind. The mind needs these monsoon showers of love. Only then, will new creations and thoughts grow from this dry barren mind.

Everyone faces this depression and misery, within the cavernous depths of heart. Everyone carries this melancholy burden of  despair. I ask you, why? You are different from everyone else. You are disciples of the Guru, you have a Guru. Accept yourself, respect yourself and start loving yourself. Shower yourself with all of your love. Blossom your life. Let your life and your mind bloom freely.

Why do you kill your own mind? Why do you feed worries and tensions onto your own mind, the mind which provides you with laughter and the energy. The mind which is brimming with divine nectar.

You must have seen crowds of people playing  drums cymbals and bells in temples. These are not multitudes of devotees-believers. They are in fact, just a throng of depressed-disheartened chanting loudly and singing hymns.  If you were to ask them, they have only a single desire – finding a solution to mental tensions, reduction of worries, removal of sadness, and a craving for rays of hope and shower of joy.

Perhaps you have developed a habit of partnering with someone for each and every one of your tasks. You have a witness for all your actions. You keep God as a witness during your prayers. You resolve keeping water as a witness. You just do not wish to be alone. Loneliness scares you. Tell me – what work have you accomplished without keeping a witness? Which decision have you taken on your own? I know a little about your depression, because I always find a way to enter your inner mind.

You need to communicate. With your own mind. Do you really require a sermon, a preacher or a motivational guide for this? A dialogue with your own mind is sorely needed, since the mind is very badly hurt inside. The depression has struck your mind, instead of your body. You need a Guru to terminate this depression. Only Guru can accomplish this. Guru initiates this communication.

And this dialog, whether silent or vocal, can only be made possible by a living spirited Guru. Real dialog is possible only with the Guru. We can only converse with,  talk to, or listen-to other people. Guru does not preach any sermon or command any order to His disciple. He just communicates through a dialog, with your depression struck mind. With your own mind. By peering through your eyes, and by touching you.

The Guru enters into the deep recesses of your mind and catches those small deeply entrenched pains. The pains which have badly hurt your joyful loving personality. The Guru understands the root causes of these pains. Always remember that the Guru accomplishes this task of curing your depression and misery through you. He takes you to the upward path, where yourself gain the capability to view, comprehend and destroy these negative thoughts-feelings.

Guru is the Upanishad. Upanishad means sitting beside. This is the most significant action within your life. Only the one who is livened-spirited can enliven your mind. A smile is needed to share a laughter.

Guru Poornima is the festival of the Upanishad. It is a divine occasion to sit beside. It is the event of  silent and vocal dialogue. Come, sit beside me, and let the dialog flow. Let us bring in a new start, usher a new life with this divine shower of joy.  Do try, to come and meet me …

You should communicate with the Guru and you ought to meet Guru for the dialog to start…. Meet me every month, if possible. A silent gaze from your Guru can itself terminate multiple miseries of your mind.

I am yours, you are of Guru …

Nand Kishore Shrimali

 

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