Dialog with loved ones – July 2017

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

शिव ही शाश्‍वत हैं, शिव ही सत्य हैं, शिव ही सुन्दर हैं यह सम्पूर्ण सृष्टि शिवमय ही है।

 

भोलेनाथ!, सदाशिव देवों के देव ‘महादेव’ सृष्टि की अव्यक्त सत्ता हैं जिन्हें बुद्धि से न जाना जा सकता है, न समझा जा सकता है और न ही समझाया जा सकता है। शिव वह तत्व है जो शाश्‍वत् हैं, शिव वह सत्ता हैं जो दृष्टा की भांति सबकुछ देखते रहते हैं, उन्हीं से सृष्टि की उत्पत्ति होती है, पालन होता है, परिवर्तन होता है और उन्हीं में सृष्टि लय हो जाती है। उस भाव को केवल और केवल अनुभव किया जा सकता है।

 

आज शिव के बारे में बहुत कुछ कहना चाहता हूं लेकिन शब्द ही नहीं हैं, जहां शब्द समाप्त हो जाएं और केवल भाव ही भाव व्याप्त हो जाएं वहीं तो शिव हैं, जो तत्व हम सबमें विद्यमान है और हम सब उस परम तत्व को पल-पल अनुभव करते हैं।

 

यः शिवः सः गुरु प्रोक्तः।
यः गुरु सः शिव स्मृतः॥

 

शास्त्र कहते हैं कि शिव ही गुरु हैं और गुरु ही शिव हैं। दोनों बातें एक दूसरे में समाई हुई हैं लेकिन एक महीन अन्तर है। गुरु तो व्यक्त दृश्यमान सत्ता हैं जिन्हें हम जानना भी चाहते हैं, पहचानना भी चाहते हैं, पाना भी चाहते हैं, अनुभव भी करना चाहते हैं। ये सब क्रियाएं व्यक्त सत्ता के प्रति ही संभव हैं, इसीलिये गुरु को व्यक्त सत्ता कहा जाता है। अव्यक्त शिव का ही व्यक्त रूप सद्गुरु होते हैं।

 

गुरु रूपी शिव और शिव रूपी गुरु तो अनन्त प्रेम के स्वरूप हैं वह अनन्त हमारे भीतर ही है और वह बहुत गहरा है, अनन्त अर्थात् जिसका कोई अन्त न हो, जिसे पाताल की संज्ञा दी गई है, जिसे आकाश की संज्ञा दी गई है। इस अनन्त में उतरने से हमारी बाह्य इन्द्रियां बहुत डरती हैं, यह शरीर अनन्त प्रेम से डरता है, हमें रोकता भी है। यह शरीर हमारे मन को कभी लोक-लज्जा का भय दिखाता है, कभी कार्यों का बहाना बनाता है। शरीर तो यही चाहता है कि सारे कार्य शरीर के प्रति ही हों। वह तो मन की ओर बढ़ना ही नहीं चाहता क्योंकि अंतर्मन की यात्रा अज्ञात की यात्रा के समान है।

 

वास्तव में हम अनन्त से घबराते हैं, अनन्त आकाश, अनन्त पाताल और मन की अनन्त गहराईयों को छूना ही नहीं चाहते क्योंकि यह अत्यन्त विशाल है, गुरुमय है। लघुता से गुरुता की यात्रा ही अन्तर्मन की यात्रा है। जिसके सम्बन्ध में सद्गुरु कहा करते थे – ‘हंसा उड़हूं गगन की ओर’। शिष्य तुम हंस की तरह अनन्त आकाश की ओर प्रस्थान करो। अपने अनन्त मन के भीतर की ओर चलो, जहां तुम्हारे सारे चक्र समाहित हैं, उस शिव भाव को अनुभव करने का प्रयास तो करो। जब एक बार उस आनन्द की यात्रा पर चल पड़ोगे तो रुक नहीं पाओगे।

 

इस शरीर की तो सीमाएं हैं, इसीलिये कभी तुम रुक जाते हो, कभी चल पड़ते हो… लेकिन मन की कौनसी सीमा है? वह तो अनन्त की यात्रा है… फिर बीच में कैसे रुक सकते हो? शायद इस मन को समझाने के लिये तुम कभी मर्यादा का नाम लेते हो, कभी सामाजिक बन्धन, परिवेश का नाम लेते हो। इस स्थूल शरीर से शिव को अनुभव नहीं किया जा सकता। इस स्थूल शरीर और इन स्थूल इन्द्रियों से उस गुरुतत्व को भी अनुभव नहीं किया जा सकता। सीमा रहित अनन्त मन से ही गुरु की सत्ता, शिव की सत्ता को अनुभव किया जा सकता है। शिव सर्वोच्च सत्ताधारी हैं क्योंकि उन्हीं से सारी सत्ताओं की उत्पत्ति होती है। उन्हीं में शक्ति स्थापित होती हैं। उसी परम सत्ता के कारण शरीर, इन्द्रियां और कामनाएं, क्रियाशील हैं। वही परम सत्ता लघु रूप में प्रत्येक मनुष्य में स्थापित है।

 

मनुष्य इस परम सत्ता शिव को अनुभव नहीं कर पाता है क्योंकि उसने अपने शरीर के द्वारा अपने मन को जकड़ लिया है। शरीर हमेशा मन को परतंत्र रखना चाहता है और अधिकांशतः शरीर इस क्रिया में कामयाब हो जाता है लेकिन जो साधक हैं, शिष्य हैं वे अपने शरीर और मन के अन्तर को भेद कर मन की सत्ता को स्थापित करते हैं और मन की सत्ता ही शिव की सत्ता है, आनन्द की सत्ता है।

 

एक सरल सा प्रश्‍न है, क्या हमारे शरीर के भीतर मन स्थापित है अथवा हमारा शरीर मन की कैद में है। शरीर और मन दोनों एक दूसरे से पृथक-पृथक लगते हैं और ज्ञानी भी कहते हैं कि – शरीर और मन अलग-अलग हैं लेकिन जब दोनों को साथ रहना है तो कैसे रहें? इस शरीर की सत्ता पर, मन की सत्ता अवश्य ही भारी है। इसीलिये साधकों को, योगियों को, ॠषियों को मनस्वी कहा जाता है जो मन के साथ समझौता नहीं करते, अपितु शरीर को अपने मन के अनुसार चलाते हैं, मन के अनुसार जीते हैं। शिव भाव मन का आनन्द भाव है। उसी मन का अभिषेक शिव का अभिषेक है। यही तो तपस्या है।

 

अपने इस मन के अनुसार चलना, काफी कठिन है। इसके लिये ध्यान, धारणा, समाधि चाहिए, जबकि शरीर की सत्ता के लिये न ध्यान की आवश्यकता है, न धारणा की, न समाधि की। शरीर की क्रियाएं तो र्ईींेारींळल चलती रहती हैं। एक मशीन है कभी ठीक रहती है, कभी खराब हो जाती है। आवेश में आने पर हृदय की धड़कनें बढ़ जाती हैं, सामान्य मनुष्य तो इस शरीर की सत्ता पर मन का प्रभुत्व अर्थात् शिव-गुरु की सत्ता को स्थापित करना ही नहीं चाहता है। वह तो शरीर को ही सबकुछ समझता है इसीलिये उसका शरीर अपनी मर्जी से उसे चलाता रहता है। मन को अपने अनुरूप रखना चाहता है, शरीर केवल अपना ही ध्यान रखता है। यह शरीर तो बड़ा ही स्वार्थी है।

 

लेकिन हमारा मन बहुत ही निस्वार्थी, निरन्तर मनन करने वाला, जोड़-तोड़ से परे, रसभाव से युक्त, अनुभूति से युक्त है और वो शिव तत्व रूपी अमृत से आप्लावित है। यह मन सदैव आपको विचारशील और प्रसन्न रखना चाहता है। यह मन अनन्त आकाश और पाताल की गहराईयों के समान है जो शरीर से परे जाकर चिन्तन, मनन, विचार कर सकता है।

 

शिव तत्व से युक्त ‘मन’ नीलकण्ठ के समान है, सदाशिव हैं… जो संतप्त होते हुए भी शरीर को दुःख, वेदना से बाहर निकालने के लिये सदैव आशा युक्त रहते हैं। साधक-शिष्य सदैव आशा से भरे हुए भावों के साथ रहता है क्योंकि वह अमृत भाव से युक्त होता है। अमृत का वह आस्वादन करता रहता है और अमृत से सदैव-सदैव आशा ही प्रवाहित होती है। इसीलिये जो मनस्वी व्यक्ति होते हैं, उनके द्वारा ही साहित्य, कला, विज्ञान, आविष्कार और नित-नये सिद्धान्त प्रतिपादित किये जाते हैं। गुरु उसी शिव रूपी अमृत भाव के स्वरूप हैं जो मानस-पुत्रों, शिष्यों को अमृत क्रिया द्वारा आशीर्वाद प्रदान करते रहते हैं। स्वयं आशा से परिपूर्ण रहते हुए अपने शिष्यों को भी आशा का अमृत पान कराते रहते हैं…

 

सदैव अमृत भाव से युक्त रहो…

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली

Dialog with Loved Ones …

Dear Loved One,

Divine Blessings,

Shiva is the Reality, Shiva is the Truth, Shiva is the Beauty, this entire universe is Shivamaya.

Bholenath! Sadashiva God of the Gods “Mahadev” is the ineffable executive of this universe. It is beyond the ability of our intellect to understand Him, comprehend Him or describe Him. Shiva is the element, which is the Ultimate Reality, Shiva is the regulator who witnesses everything in the universe. This entire creation arises from Him, nurtures through Him, alters through Him, and finally this creation merges within Him. One can only experience this expression.

Today I wish to tell you a lot about Shiva, but the literal words have a limited capacity to describe. Shiva is the one where the words reach their limits, and can be expressed only through emotions and feelings. The Shiva  element is present inside each one of us, and we experience and feel this ultimate element at each moment.

YaH ShivaH SaH Guru ProktaH |

YaH Guru SaH Shiva SmritaH ||

The scriptures state that Shiva is the Guru and Guru is the Shiva. Both are imbibed within each other but there is a slight distinction. Guru is the definable omnipotent executive, whom we wish to understand, recognize, meet and experience. All these processes are possible only through a describable executive, therefore Guru is termed as the definable executive.  Sadguru is the determinable form of ineffable Shiva.

The Guru form of  Shiva and Shiva form of Guru symbolize infinite love. This infinity is present within our own self. This infinity is very deep. Infinity i.e. limitless, has been termed as the space or as the abyss. Our physical senses fear treading into this infinity, our body is afraid of limitless love, and tries to stop us from entering into it.  This body tries to inhibit us by either displaying a fear of shame, or by putting work pressure. The body desires us to focus all of our actions towards it. It does not want us to tread towards the inner-mind, because the journey to inner-mind is completely unknown to it.

In reality, we ourselves are afraid of the infinity. We do not wish to scale the infinite heights of the space, or the fathomless depth of the abyss, or the deep recesses of our mind. This infinity is limitless massive, it is Gurumaya. The journey of inner-mind is from miniature to massive. Sadguru used to refer this as – “Swan flying towards the sky”. The disciple should transition towards the infinite sky like a swan. Proceed deep into your limitless inner-mind, towards all of your Chakras. Try to at least feel that Shiva expression. You will not be able to stop yourself once you start on this path of eternal joy.

This body has its own limits, which cause you to pause, stop and then move forward… However can you think of any limit of your inner-mind. This is the journey into the infinity… How can you pause for a break? You  use multiple excuses of model behavior, or of societal bandages to confuse this mind. You cannot experience Shiva through this external body frame. You cannot even feel that Guru-element through this body and its external senses. You can comprehend the infinite range of Guru and Shiva only through the limitless infinite inner-mind. Shiva is the ultimate executive, because all powers flow through Him. The Shakti energy-power resides within Him. The body, senses and the wishes get activated through Him. This ultimate power resides in a miniature form in each individual.

An individual is unable to experience this Ultimate power of Shiva because his body has tightly wrapped up his mind. The body generally wishes to tie the mind in bondages, and generally it is successful in this endeavor. However, the Sadhaks, the true disciples pierce into the distinction between mind and body. They are able to free up the mind from the clutches of the body and establish control of this inner mind. This control of the mind is the real control of Shiva, the eternal joy.

Let me ask you a simple question, does our body controls our mind or does our mind controls our body? A fine distinction is visible between the body and the mind, and even the wise state that – body and mind are separate entities. However, what is the best method for both exist together. The body should be controlled by the mind. Therefore, the Sadhaks, Yogis and Sages-Ascetics are called “Manasavi” since they do not compromise with the mind. They let their body be controlled through their inner mind. They live through their inner-mind. The sense of Shiva is an expression of divine joy. The abhishek of this mind is equivalent to the abhishek of Shiva. This is the essence of penance.

It is very difficult to survive and live under the control of the inner-mind. It requires deep practices of Dhyaan (Contemplation), Dhaarana (Focus) and Samadhi (Meditation). The body does not need these pre-requisites of  Dhyaan, Dhaarana and Samadhi. The body functions within an automatic mechanism.  It is like a machine, sometimes it works properly and sometimes it needs to be repaired. The heart-beats increase as soon as one gets excited and tensed. A general person does not want his body to be controlled through his inner-mind. He does not wish to be governed through the Shiva-Guru. He considers his body to be everything, and therefore, his body drives him as per its wish. The body controls the mind. This body is highly selfish. It cares only about itself.

But our inner-mind is highly selfless. It continuously contemplates, is ever-full of joyful ecstasy and is devoid of calculations-stratagem. It is completely imbibed with the Nectar-elixir of Shiva element. This inner-mind always strives to make you joyful, happy and contemplative. This mind is similar to the infinite heights of space and the fathomless depths of the abyss.  It can contemplate, ruminate and ponder beyond the capacities of the body.

The inner-mind imbibed with Shiva-element is like Neelkanth, it is the Sadashiva … the perfect one, ever optimist to eradicate pains and sufferings. The nectar-elixir within the Sadhak-disciple makes him ever-optimist and hopeful. He continues to taste the divine nectar, and the hope ever-emanates from the nectar. Hence the “Manasavi” personalities drive the entire set of  literature, arts, science, inventions and novel philosophies. Guru is the elixir form of the Shiva who continuously blesses the Manas-children and disciples through the divine nectar. Persistently continues as the strongest pillar of optimism, and bestows this optimism-nectar to His disciples.

May you always be filled with the nectar-elixir joy

Cordially yours…

Nand Kishore Shrimali

Share
error: Content is protected !!