Dialog with Loved Ones – January 2017

अपनों से अपनी बात…

 

प्रिय आत्मन्,

 

आशीर्वाद,

 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

 

कालचक्र में एक और नया वर्ष प्रारम्भ हो रहा है। समय चक्र तो विभक्त नहीं होता लेकिन हमने अपनी सुविधा के अनुसार इसे खण्ड-खण्ड में विभक्त कर रखा है। जिससे हम नवीनता को ग्रहण करें और पुरातन को हटा दें। उपरोक्त मंत्र में मूल प्रार्थना यही है कि हम अपने जीवन में सुगन्धित हों, पुष्टिवर्द्धक हों, बन्धनों से मुक्त हों, अमृततत्व से युक्त हों। मानसिक रूप से, शारीरिक रूप से सुगन्धित हों उसमें नवीन-नवीन श्रेष्ठ विचारों का प्रवाह का प्राप्त हो। शरीर में आरोग्यता हो, जिससे देह सुगन्धित हो और हर क्षण मुक्त भाव का अनुभव करते रहें, मुक्त भाव से जीते रहें और हमारे भीतर अमृत का प्रवाह नित्य निरन्तर बना रहे।

 

हर कोई कहता है कि जीवन जीना एक कला है और हर कोई आपको जीवन जीने की कला सिखाना चाहता है, इस विषय पर हजारों उपदेशात्मक किताबें लिखी गयी हैं लेकिन क्या वास्तव में जीवन जीना कला है? क्या इसमें निपुणता, पारंगतता, गहन अभ्यास से प्राप्त की जा सकती है? मेरे विचार से तो नहीं क्योंकि हर पल नवीन होता है और हर पल नई कला को हम सीख नहीं सकते हैं। एक ही उपाय है कि जीवन में जो कुछ आ रहा है उसे हम स्वीकार करें और पूरे मन के साथ स्वीकार करें। हर व्यक्ति के हाथ की रेखाएं अलग होती हैं, हर व्यक्ति ईश्‍वर की अनोखी रचना है और हर व्यक्ति को अपना जीवन स्वयं ही जीना पड़ता है। इसके लिये कला सीखने की बजाय, अपने जीवन में कुछ सिद्धान्त अवश्य बनाएं और अपने आपको संकल्पबद्ध करें कि मैं अपने इन सिद्धान्तों पर चलने का पूरा-पूरा प्रयास करूंगा।

 

देश, स्थान, काल, परिस्थिति के अनुसार हमें अपने जीवन को, व्यवहार को, कार्य को, सम्बन्धों को बदलना भी पड़ता है। हर बात, हर जगह लागू नहीं की जा सकती है लेकिन इतना तो अवश्य कर सकते हैं कि हम अपने जीवन में जो मूलभूत सिद्धान्त स्वयं ने बनाये हैं उनका स्वयं ही पालन करें। बाह्य दबाव को रोकते हुए, सामाजिक मर्यादा को समझते हुए हम अपने मानसिक सिद्धान्तों के अनुसार चलेंगे तो मेरे विचार से निश्‍चित रूप से यह जीवन सुगन्धित और पुष्टिवर्द्धक अमृत का झरना बन सकता है।

 

भगवान, ईश्‍वर, परमात्मा, देवता, सद्गुरु क्या हैं? ये सब तुम्हारे भीतर की आवाज हैं। बाहर का कोलाहल शोर घना हो सकता है, पर आत्मा का चिदानंद निःशब्द, निरन्तर और निरन्तर आपको आवाज देता रहता है, आपको जगाता रहता है, आपको समझाता रहता है और आपको प्रेरणा भी देता है, शौर्य और शक्ति भी देता है, सांत्वना भी देता है, विश्‍वास भी देता है, शांति भी देता है इसलिये अन्तरात्मा की आवाज सबसे प्रमुख है। जिसने इस आवाज को सुनना सीख लिया, जान लिया और उस पर क्रिया प्रारम्भ कर दी वह जीवन जीने की कला अच्छी तरह से जान जाता है, समझ जाता है। क्योंकि भीतर तो अमृत ही अमृत है।

 

जो सिद्धान्त तुमने सोचे हैं और जिन पर तुम चल रहे हो वे ही सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि उन सिद्धान्तों का निर्माण तुमने स्वयं ब्रह्मा बनकर किया, अपने सिद्धान्तों की पालना विष्णु बनकर तुम स्वयं कर रहे हो और अपनी बुद्धि, विवेक और अन्तरात्मा के अनुसार शिव बनकर परिवर्तन भी तुम ही ला रहे हो। इसलिये तुम स्वयंभू ईश्‍वर की विराट् सता का सूक्ष्म स्वरूप ही हो।

 

यह परिवर्तन की क्रिया तत्काल प्रारम्भ होती है। जब तुम यह कहते हो कि मैं प्रयत्न कर रहा हूं तो इसका मतलब है कि परिवर्तन के लिये मानसिक रूप से तुम पूरी तरह से तैयार नहीं हो। मन में नकारात्मक और यथास्थिति वाला भाव है।

 

इस नकारात्मक भाव में तत्काल परिवर्तन करना ही सबसे बड़ी साहस की क्रिया है। इसके लिये किसी दूसरे का इंतजार मत करो, तत्काल परिवर्तन प्रारम्भ कर दो। ये जो ईश्‍वर से प्रेम है, गुरु से प्रेम है, साधना है, ध्यान है, तप है ये क्रियाएं भी तत्काल प्रारम्भ होती हैं, तुम ये काम धीरे-धीरे नहीं कर सकते और धीरे-धीरे न साधना कर सकते हो, न प्रेम का अभ्यास होता है। ये परिवर्तन तो एकदम मन में हो जाता है और परिवर्तन का स्वरूप ही नवीनता है। अपने भीतर के इस परिवर्तन को मत रोको।

 

मन का मूल भाव तो मुक्त रहना ही है और तुमने उस मूल भाव को दबाकर उसे बंधन से युक्त कर दिया है, हो सकता है तुम्हारे ऊपर जिम्मेदारियों का बोझ ज्यादा हो लेकिन इस मन को बोझ से ग्रसित मत करो। तुमने अपने मन के भावों को दबा दिया है और इसीलिये नाखुश रहते हो। वास्तव में तुम्हारा मन तो नर्तन करना चाहता है। तुम्हारा मन तो अमृत कुण्ड है। वह तो चुपचाप शान्त भी रहना चाहता है, क्योंकि वह अमृतमय है। जिसे किसी की आवश्यकता नहीं है। वह मुक्त भाव है। उस पर और अधिक पूर्वाग्रही भावों को आने मत दो। पुरातन और नूतन का संघर्ष नहीं है। नवीनता तो खिलना चाहती है वह पल्ल्वित होना चाहती है तो उसे रोको मत उसे स्वाभाविक रूप से बहने दो। जीवन मूल्य तो सदैव नूतन हैं। अपने उन जीवन मूल्यों और अपने उन स्वयं के सिद्धान्तों पर तुम चलते रहो।

 

एक और बात कहूंगा कि इस संसार में सब लोगों को तुम विवश नहीं कर सकते कि वे तुम्हें हर समय पसन्द करें। सभी लोग हर समय तुमसे प्रेम करें। सभी लोग हर समय तुम्हें समझें, हर समय तुम्हारी बातों को स्वीकार करें, हर समय तुम्हारे प्रति मधुर रहें और विशेष बात यह है कि तुम उन सब लोगों को नियन्त्रित भी नहीं कर सकते हो। यह बात बड़ी भयावह लगती है कि सबकुछ हमारे अनुकूल नहीं चल रहा है लेकिन शांत भाव से इस नवीन जीवन उत्सव में सोचो कि क्या ये सब चीजें आपके लिये महत्वपूर्ण हैं?

 

क्या आपको सबकी सहमति, सबकी स्वीकृति, सबकी मधुरता हर समय चाहिये?

 

खुशी की बात है कि जब तुमने अपने आपको स्वीकार कर लिया है और अपने सिद्धान्तों पर चल रहे हो। यही बात तो सबसे अच्छी है। इसे एक छोटी सी बात में इस प्रकार समझ सकते है – ‘मैंने अपने आपको स्वीकार कर लिया है, इसी में नित्य नवीनता है।’ तो उस अनावश्यकता के बोझ को कम करते रहो, पुरानापन उतारकर फेंकते रहो। यह सब भूतकाल है, बस अपने आपको स्वीकार करो, अपने सिद्धान्तों पर चलते रहो।

 

अच्छे लोगों की एक खूबी यह भी होती है कि उन्हें याद नहीं रखना पड़ता, वे अपने आप याद रह जाते हैं। मुझे भी अपने कार्यकत्ताओं के नाम याद नहीं रखने पड़ते, उनकी गुरुसेवा के द्वारा मुझे उनके नाम अपने आप याद हो जाते हैं।

 

आप सभी कार्यकर्त्ताओं को, शिष्यों को नववर्ष की शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद…

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialogue with Loved Ones…

Dear Loved One,

Divine Blessings,

Om Trayambakam Yajaamahe Sugandhim Pushtivardhanam |

Urvaarukamiva Bandhnaanmrityormukhsiya Maamrataat ||

 

Another new year dawns within the eternal time cycle. The Time always flows in a continuous fashion but we have divided it into multiple blocks to suit our convenience. To enable us to ingest the novelty and discard the old ancient. The root prayer in the above Mantra wishes for fragrance in our lives, increased strength-vigour, freedom from bondages and embedding with the Holy Amrit Nectar. Fragrance should flow through our mental and physical states, full of a continuous flow of new, noble thoughts. The body should be free from diseases, emanting a spiritual fragrance, and we should constantly feel a circle of liberation around us, living with full freedom with a continuous inflow of holy Amrit nectar within us.

Everyone states that there is a specific art to lead a life and everyone wants to teach you the art of living. Thousands of motivational books have been written on this topic, but is the living of life, really an art? Can we deepen our skills and mastery through intense exercises. I myself do not think so, because every moment is a new moment, and you cannot learn a new art every moment. There is only one way – To gladly accept whatever the life is offering us and accept it with full mind. Everyone has a different set of lines on their palms, everyone is a unique creation of God and everyone has to lead his life, only by self. Instead of learning a new art, imbibe a few principles within your life, and take a firm resolve to follow these principles will full effort.

We need to change our life, behaviour, work and relations depending on the country, place, time and circumstances. Everything cannot be implemented in the same way everywhere, but you can at least follow the fundamental principles setup by you yourself. If we proceed through our internal mental principles ignoring the external pressures while understanding the societal morales, then I believe that this life will definitely turn into a sweet fragrant vigorous fountain of holy Amrit nectar.

God, Almighty, Divinity, Providence, SadGuru – who all are these? These all are your inner voices. The external noise can be overwhelming but the gentle spirit of your soul continuously keeps inviting you. It continuously  stimulates you, wakes you up, teaches you, motivates you, provides bravery and strength, condoles you, provides confidence, and even grants peace; therefore the sound of the inner soul is the primary major voice. Anyone who learns to hear this voice, comprehend it, and start working according to it, he masters the art of living, will understand it completely. Because the inner space is filled up to brim with holy Amrit nectar.

Whatever principles you have thought and are following are the best, because you yourself have crafted these principles in the role of the Brahma, you are cradling them as the Vishnu yourself and you yourself are bringing in the changes through your own intelligence, discretion and conscience as the Shiva. Therefore you are a tiny microcosm of the great cosmos.

This process of change begins immediately. When you say that you are trying, then it means that you are not yet fully ready mentally to usher in the changes. It shows that mind is full of negative and status-quo desire.

Suddenly changing this negative emotion requires a great deal of courage. Do not wait for anyone else before making this change, initiate the change immediately. This love to God, love to Guru, Sadhana, meditation, penance, all of these processes start rapidly. You cannot do these slowly. You cannot perform Sadhana slowly or practice love slowly. These changes occurs suddenly within the mind and the transformation itself is the novelty. Do not inhibit this inner change within you.

The basic nature of the mind is to remain liberated, and you have tied this basic emotion into multiple bondages. It is possible that you have a large degree of responsibilities but do not let this burden impact your inner mind. You have suppressed the true emotions of your own inner mind and, therefore you stay unhappy. In reality, your mind wishes to dance away. Your mind is full of holy Amrit nectar. It wants to remain calm and peaceful because it is full of nectar. It does not need anyone. It is completely free. Do not let prejudiced emotions damage it. This is not a conflict between the ancient and the modern. The creation wishes to blossom, it desires to flower, do not stop it, let it flow naturally. The life is always creational. Continue to lead on your life values and your own life principles.

Another advice I shall like to state is that you cannot force all the people in this world to like you all the time. You desire that everyone should love you all the time. You wish that everyone should understand you all the time, and should accept your advice all the time. You want everyone to have sweet relations with you all the time. Especially you cannot control all those people. The thought that everything is not working according to our expectations is very scary, but think calmly in this novel life event, are all these things really important for you?

Do you require everyone’s acceptance, everyone’s agreement, everyone sweetness at all the times?

The joyous fact is that you yourself have accepted yourself and you are following your own principles. This is the most noble thought. You can also try to understand it in another simple way – “I have accepted myself, this is continuous creation“. Reduce the burden of redundancy, throw away the ancient garments. This is all past tense, just accept yourself and continue to follow your principles.

A common trait of good people is that one does need to remember them, they get memorized automatically. I do not need to memorize the names of my volunteers, their names automatically get etched on my mind through their Guru service.

 

Best Wishes and Divine Blessings to all of you volunteers and disciples for the New Year …

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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