Dialog with Loved Ones – February 2018

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

नववर्ष की पूर्व संध्या पर आपके साथ ब्रह्मवर्चस्व साधना समारोह, स्नेह मिलन में अत्यन्त आनन्द का अनुभव हुआ। आपका जोश देखकर मुझे कभी-कभी हैरानी होती है इतना जो जोश, इतनी उमंग, इतना उत्साह, इतनी लगन, इतनी ऊर्जा आप में संचारित हो रही है यह आम बात नहीं है, यह निश्‍चय ही साक्षात निखिल ऊर्जा है। यह तय है कि – हमारे सद्गुरु निखिल हमें निरन्तर प्रेरणा शक्ति प्रदान कर रहे हैं और उनकी शक्ति उत्साह, उमंग के रूप में प्रत्येक साधक में प्रवाहित हो रही है।

 

मौसम के अनुसार बसंत का आगमन हो रहा है, शीत झेलकर प्रकृति ने नवरूप प्रकट किया है। यही तो –
अन्त में आरम्भ है और आरम्भ में है अंत, हिय के पतझड़ में कूजता बसंत है

 

प्रकृति का यह बसंत तो घनघौर शीत के बाद आता है। हमारे मन का बसंत तो, मन के भाव से, गुुरु ध्यान से ही आ पाता है। यह मन जानता है कि – पतझड़ के बाद बसंत अवश्य आयेगा। इसलिये जब-जब जीवन में कोई पतझड़ आये, बाधाएं आये तो उस समय अपने आपको और भी अधिक ऊर्जावान बनाए रखना।

 

यह मन का जीवन्त भाव होना ही तो बासंती तत्व है। जीवन और जीवन्तता में थोड़ा अन्तर है। जीवन तो सभी जीते हैं लेकिन जीवन्त भाव से जीवन जीना केवल और केवल एक शिष्य और साधक को ही आता है। जहां जीवन्त भाव है वहां न तन मुरझा सकता है न मन मुरझा सकता है। जीवन्त भाव में तो सारी समस्याएं बहुत छोटी लगने लगती हैं। समस्याएं इस बात का संकेत करती हैं कि – हम आगे की ओर बढ़ रहे हैं, यही तो समय की विशेषता है –

 

वक्त से दिन और रात, वक्त से कल और आज
वक्त की हर शै गुलाम, वक्त का हर शै पे राज॥
हमारी पृथ्वी निरन्तर गतिशील है और भगवान सूर्य भी उत्तरायण की ओर प्रवेश कर गये हैं। रातें छोटी और दिन बड़े होने लग गये हैं। प्रकृति यह संदेश दे रही है कि – अब प्रकाश अधिक से अधिक प्राप्त होगा। जीवन का भी यही संदेश है कि – यदि हम वक्त के साथ अपने आपको थोड़ा संभालकर रखते हैं तो जिस सुख की प्रतीक्षा में हम क्रियाशील हैं वह सुख अवश्य आता है। उस सुख की आशा में दुःख के क्षणों में निश्‍चित रूप से परिश्रम ज्यादा होता है और लम्बी अन्धकारमयी रातें दुःख का स्वरूप नहीं हैं, अपितु मन में छाई हुई निराशा को हटाकर आशा की ओर जाने की उत्सुकता का प्राकृतिक स्वरूप है।

 

जैसे-जैसे प्रकृति बदलती है, उसी अनुरूप हमारा बाह्य मन भी बदलता है, पर याद रखो – हमारा आन्तरिक मन जिसे हृदयब्रह्म कहा गया है वह तो सदैव और सदैव रस से आपूरित ही रहता है। वह कभी निराश, हताश नहीं होता। यह हम ही हैं, जो उसे दुःख के संदेश भेजते हैं और अपने आन्तरिक मन को बार-बार यह कहते हैं कि – मैं दुःखी हूं, मैं दुःखी हूं तब भी आपका आन्तरिक मन, आपका हृदयब्रह्म निराश नहीं होता है, वह आपके व्यक्तित्व को सदैव आशा का भाव प्रदान करता रहता है। यही तो आन्तरिक मन की सबसे महत्वपूर्ण क्रिया है, भाव है और यही आन्तरिक मन गुरु, ईश्‍वर का निवास स्थल है जिसके बारे में कहा गया है –

 

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वंद्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।
उसी बारे में यह भी कहा गया है कि –

 

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
तो सबसे महत्वपूर्ण है कि अपने आप से जुड़ें, क्योंकि इसी मन में आशा है, उमंग है, बसंत है, गुरु हैं, ईश्‍वर हैं और जब इस गुरुमय मन में जुड़ जाते हैं तो भीतर का अमृत कलश, ब्रह्मानन्द कलश खुल जाता है।

 

जब आप अपने मन की अन्तरतम गहराइयें में उतर जाओगे, आप स्वयं अपनी पहचान कर पाओगे। दूसरों की दी हुई पहचान, दूसरों के दिये हुए लक्ष्य बड़े ही खोखले होते हैं। इन दूसरों की पहचान को, दूसरों के बताये लक्ष्य को पकड़ते-पकड़ते तुम थक जाओगे। इसीलिये गुरु का शाश्‍वत सन्देश सदैव और सदैव ‘विद्रोह’ का रहता है। यह विद्रोह मन पर बंधी हुई जंजीर को तोड़ने का होता है। गुरु समाज की मर्यादा तोड़ने को नहीं कहते हैं, झूठे आडम्बर तोड़ने को कहते हैं, जिससे तुम सत्य को जान सको, ‘शिवोहम्’ मंत्र को जान सको। ‘शिवोहम्’, शिव भाव है, जो पूर्ण है। इस यात्रा को प्रारम्भ करना है तो मन में चल रहे कई व्यर्थ के अर्न्तद्वन्द्व और अंतर्यात्राओं को समाप्त करना होगा।

 

जब ‘शिवोहम्’ भाव की यात्रा प्रारम्भ करते हैं तो बसंत भाव आता है और संताप समाप्त हो जाता है। संताप अधूरी इच्छाओं का है, कोई बात नहीं। अब, संताप से तप की ओर यात्रा करनी है। बस अपने बाह्य मन पर थोड़ी लगाम कसनी है और अपने आन्तरिक मन का अभिषेक करना है।

 

इसी माह बसंत के बाद महाशिवरात्रि पर्व है, जो सृष्टि में शिव और शक्ति के संयोग का सूचक है। जहां प्रलय के बाद सृष्टि पुनः रचित हुई। अपने मन का भी इसी प्रकार अभिषेक कीजिये। आप ही शिव हैं और आप में शक्ति पूर्ण रूप से जाग्रत होना चाहती हैं। अपने आत्माभिषेक द्वारा अपने मन की अधूरी कामनाओं की पूर्णता का भी मानस अभिषेक करें, मन को रस से आप्लावित करें।

 

हमें मन को मारने की क्रिया नहीं करनी है, इस मन को समझने की क्रिया करनी है। अपने शिव भाव, आनन्द भाव को जानना है। कहां आप आनन्दित रहते हैं? किस तरह आनन्दित रहते हैं? किस क्रिया द्वारा आनन्दित रहते हैं? उसे जानें और उसके अनुसार सोचें… आपका प्यारा-सा मन तो सदैव ही आपका भला ही सोचता है। मन का सिद्धान्त है –

 

सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तुः निरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्‍चिद् दुःख भाग भवेत्
बस मेरा इतना ही कहना है कि – तुम्हें क्रियाशील रहना है और मन के साथ क्रिया करनी है, न कि भाग-दौड़ करनी है। भाग-दौड़ करोगे तो थक जाओगे, क्रिया करोगे तो मन आनन्दित होगा। तुम्हारा हृदय ब्रह्म, तुम्हारा शिव प्रसन्न होगा। आद्या शक्ति तुम्हारे मन के शिव के साथ पूरी तरह से संलग्न हो जाएंगी और तुम अपने जीवन में सृजन की ओर अपनी प्राण शक्ति के साथ गतिशील हो जाओगे। बस एक बात और है – हिय के पतझड़ में कूजता बसन्त है। हृदय में बसंत का आगमन करने के लिये, अपने मन के कपाट खोल दो…, अपने आप में खुश रहो… आनन्दित रहो… अपना आत्माभिषेक, रसाभिषेक करते रहो…।

 

सस्नेह
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with Loved Ones …

Dear Loved One,

Divine Blessings,

We experienced great joy and tender moments  during the Brahma Varchasava Sadhana ceremonies during the New Year eve.  I sometimes marvel seeing so much enthusiasm from all of you. Such great enthusiasm, excitement, passion and energy is not an ordinary phenomenon. Definitely this is Nikhil energy. It is certain that Our SadGuru Nikhil is constantly inspiring us and His energy is transmitting into each Sadhak in the form of excitement and passion.

The Spring season is quickly approaching, the nature is displaying a new-novel form after the cold winter. That’s –

The beginning is within the ending, and the ending is within the beginning,

The spring melodies manifests after the autumn sighs

 

This lovely spring within nature arrives after the cold winter. The spring within our mind flows mentally through the Guru meditation. The mind knows that – Spring will definitely come after autumn. Therefore, whenever autumn appears in life, whenever obstacles stand in your way,  then you should  rise to the occasion and become much more  energetic.

The enlivenment of the mind is the Spring element itself. This is a small difference between life and enlivenment. Everyone leads his or her own life, but only a disciple or a Sadhak understands the skill to lead an enlivened life. Neither body nor mind gets tired within this enlivened element. All the big problems of life turn into minor irritants. The problems always indicate that – we are moving forward on the path of progress. This is the significance of time –

The time controls day and night, it transitions from yesterday to today

Every second of time is a slave, the mighty time rules over everything

 

Our earth is constantly moving and Lord Sun has also entered towards Uttarayan.  The nights have started to shrink, and the days are growing bigger. The nature seems to be telling us – Now, you will get more and more light. The same message also applies to life – If we take care of ourselves according to the vagaries of time, then we certainly achieve the happiness which we work so hard for. The duration of grief filled toil is definitely longer, in the pursuit of those hopes of happiness. The long dark nights should not be confused with sadness, rather they signify the natural excitement to transition away from the despair towards the eagerness of hope.

As the nature changes, our external mind also undergoes similar changes. However, you should remember that our inner mind, also known as Heart-Brahma, is always full of eternal nectar. It never gets frustrated or discouraged. We continually send distress messages to it, and repeatedly tell our inner mind about our sadness and desperation.  However, your inner mind, the Heart-Brahma does not get disappointed, and keeps supplying hope and optimism to your personality. This is most  important action of the inner mind. This inner mind is the abode of the Almighty God, the Guru. It has been stated that –

Brahmaanandam Paramasukhadam Kevalam Gyaanamoortim

Dwandwaateetam Gaganasadrisham Tatvamasyaadi Lakshayam |

 

It has also been described as –

Agyaana Timiraandhasya Gyaanaanjan Shalaakayaa |

Chakshurunmeelitam Yena Tasmei Shree Guruve NamaH ||

 

Therefore, it is highly important for you to join and merge with yourself,  as this mind contains hope,  excitement, spring, Guru and God Himself. When we merge with this Gurumaya inner mind, then the inner nectar of Brahmaanand Kalash, the eternal joy opens up.

You will be able to realize yourself, only when, you move deep into the inner recesses of your mind. The identity and goals given by others are hollow from within. You will get tired by running in the rat race to achieve these goals and identities specified by others. Hence Guru’s eternal message always emphasizes on “Revolt”. You should revolt to break these shackles on your mind. Guru does not teach to break the limits of the society, rather He encourages you to break the false pseudo horizons, so that you understand the truth, realize the “ShivoHam” Mantra. “ShivoHam” is the expression of Lord Shiva, which is always perfect. You should stop all unnecessary inner-conflicts and inner-obstacles of your mind, to embark upon this journey.

The onset of journey to  “ShivoHam” expression heralds the onset of spring and destroys the anger. It doesn’t matter that unfulfilled incomplete desires fuelled this anger. Now you need to transition from anger to asceticism. You only need to have a little rein on your outer mind and start to anoint your inner mind.

The MahaShivraatri festival will come after Spring in this month, which signifies the merger of  Shiva and Shakti in the universe. It is the Rebuilding of Creation after the Armageddon.  Anoint your mind, similarly. You yourself are the Shiva and Shakti wishes to imbibe with full powers, within you.  Anoint your soul to fulfill the incomplete desires of your mind, to fill your mind with divine nectar.

We do not have to take any action to force or kill the mind, we just need to understand the workings of the  mind. We need to realize our Shiva expression, our sense of joy. Where do your sense the joy? How do you experience this joy? What makes you joyful? Consider these points, and think accordingly… Your sweet mind always thinks good for you. The principle of mind is –

Sarve Bhavantu SukhinaH | Sarve SantuH NiraamayaaH

Sarve Bhadraani Pashyantu | Maa Kaschid Dukha Bhaaga Bhavet

 

I only wish to tell you that – You should stay active and act with your mind, instead of running unnecessary in rat-race. The rat-race will tire you out, however the mind will be joyful if you perform proper actions. Your Heart-Brahma, your Shiva will be pleased. The Aadhyaa Shakti will merge completely with the Shiva of your mind, and you will move forward in your life towards creation with your full life-force.

Just one more bit  – The Spring arrives after the autumn. Welcome the springs with your full heart,  Open the doors of your heart … Remain happy with yourself … Be Joyful …. Keep up your spirits … Keep anointing your soul .. Keep tasting the Divine nectar or joy…

 

Cordially yours,

Nand Kishore Shrimali

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