Dialog with Loved ones – Feb 2019

अपनों से अपनी बात…

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

नववर्ष की पूर्व संध्या पर आप दिल्ली आरोग्यधाम में आये, आप मेरे पास आये, मैं आपके पास आया और पूर्ण आनन्द के साथ शिव सहस्रार चक्र महोत्सव सम्पन्न किया। मेरा सन्देश आपको यही था कि –

 

उत्तिष्ठत जाग्रय प्राप्य वरान्न्बिोधत।

 

हे शिष्य! तुम उठो, जागो और ज्ञान के साथ क्रिया में संलग्न हो जाओं। निश्‍चित रूप से आपने अपने साथ, मेरे साथ कुछ संकल्प लिये। आपने अपने कार्यों को नवीन चिन्तन के साथ करने का संकल्प लिया। अपनी पिछली गलतियों को भुलाने का प्रयास किया और आगे की ओर देखकर बढ़ने का संकल्प लिया।

 

दस-पन्द्रह दिन बीतते-बीतते आपके संकल्प कुछ कमजोर हो जाते है, क्यों ऐसा हो जाता है?

 

संकल्प तो दृढ़, अटल और निश्‍चित होना चाहिए। संकल्प के साथ एक जोश का भाव होता है। संकल्प मन के द्वारा किया गया निश्‍चय होता है। फिर क्यों आपका संकल्प कमजोर हो रहा है? आप कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं है, आप तो साधक है, गुरु के शिष्य है, निखिल शक्ति से जुड़े है। फिर ये मन डगमग क्यों हो रहा है?

 

यह संकल्प तीन शक्तियों का समूह है – इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति।

 

आपके मन में भरपूर इच्छाएं है, कामनाएं है, आपमें ज्ञान प्राप्ति की एक अद्भुत ललक है और आप क्रियाशील भी है।

 

फिर संकल्प शक्ति कमजोर कैसे पड़ सकती है? संकल्प शक्ति तभी कमजोर होती है जब हम अपना वास्तविक स्वभाव भूला देते है। स्वभाव अर्थात् धर्म; आपका धर्म, आपका स्वभाव तो शिव की तरह भोला-भाला, निर्दोष, निश्छल, निष्पाप है। यह शिव आपसे भिन्न नहीं है। यह शिव बिल्कुल आपके जैसे ही हैं विशुद्ध, निश्छल, निर्मल, भोले है।

 

अपने उसी स्वभाव के अनुसार, अपने उसी धर्म के अनुसार आपको कार्य करना है। संकल्प तो आप जोर-शोर से ले लेते है पर कार्य सिद्ध नहीं होते क्योंकि आपके मन में एक महाभारत चल रही है। उस महाभारत में आपको जीतना है। बहुत सीधा-सादा, सरल सिद्धान्त है, जब आप अपने आन्तरिक मन में विजय प्राप्त कर लेंगे तो बाहरी दुनिया पर अवश्य जीत प्राप्त कर लेंगे। मन के महाभारत में विजय प्राप्त करनी है तो मन के महाभारत का दिशा निर्देशक, अपने जगत गुरु श्रीकृष्ण, अपने आराध्य सद्गुरु को बनाना है।

 

तुम यह बात जान लो कि – यह संकल्प शक्ति, चित्त शांति में ही दृढ़ होती है। अब भीतर ही भीतर युद्ध चल रहा है तो तुम्हारी संकल्प शक्ति तो कमजोर हो ही जायेगी। मन का स्वभाव है कि – वह कभी एक ओर झुकता है तो कभी दूसरी ओर। यह मन कभी-कभी घोर निराशा में चला जाता है तो कभी-कभी घोर उत्साह में चला जाता है। बहुत हिलता-डुलता है।

 

संयत भाव से, शांत भाव से, धीर भाव से, पौरुष भाव से, निश्‍चय भाव से, समर्पण भाव से अपने आपको कार्य में लगाना है। पूर्ण श्रद्धा के साथ अपने आपको कार्य में लगाना है क्योंकि बिना श्रद्धा के किया गया कोई कार्य कर्म नहीं, अकर्म हो जाता है और अकर्म का फल कैसे प्राप्त होगा?

 

तुम चाहते हो कि – तुम्हारा कार्य सफल हो तो अपने पूर्ण पराक्रम के साथ, पूर्ण श्रद्धा के साथ इस कर्म पथ पर बढ़े चलो। शौर्य के भाव के साथ बढ़े चलो।

 

दिखा पराक्रम यह जग तेरे आगे नतमस्तक हो जाएगा
धीर-धर तू कर्म किए जा तेरा वक्त भी आएगा…
किया परिहास सभा ने रघुवर की प्रत्यंचा चढ़ाने पर
तोड़ दिया शिव धनुष राम ने अपना समय आने पर
खो ना मनोबल बढ़ता चल शौर्य तेरा दिख जाएगा
धीर-धर तू कर्म किए जा तेरा वक्त भी आएगा…
करते रघुवर सागर से विनती पथ की थी अभिलाषा
त्राहि-त्राहि हो उठा सिंधु जब जागी पौरूष की भाषा
दिखा सामर्थ्य तेरा मार्ग सुसज्जित हो जाएगा
धीर-धर तू कर्म किए जा तेरा वक्त भी आएगा…
हुए शून्य अभिमान में जो थे स्वर्ण नगर वासी
खिल पड़ा मान उनका जो थे गुरु के अभिलाषी
तुम भी चलो सन्मार्ग पर, तुम्हारा जीवन भी संवर जाएगा
धीर-धर तू कर्म किए जा तेरा वक्त भी आएगा…
प्रसन्नो भव, वरदो भवः
दैवीय शक्तियां, ईश्‍वरीय शक्तियां, गुरु शक्तियां तुम्हें वरदान प्रदान करें और उन दैवीय शक्तियों से तुम सदैव प्रसन्न रहो और जीवन्त रहकर आगे बढ़ो। बस एक बात का ध्यान रखना, तुम्हारा जैसा स्वभाव है भोला-भाला, सरल-निश्छल उसे बनाये रखना।

 

मन की प्रसन्नता सबसे बड़ा वरदान है और यह वरदान तुम्हें निरन्तर और निरन्तर साधना और तप के द्वारा प्राप्त हो रहा है। गुरु तो तुम्हारा एक सहयोगी है, एक मित्र है। तुम एक बालक बनकर क्रिया करते रहना। तुम्हारे भीतर अजस्र शक्ति का भण्डार है, प्रवाह है उस प्रवाह को खोल दो। तुम्हारे बढ़ते कदमों को कोई रोक नहीं पायेगा। दुःख दुविधा सब पीछे छूट जायेंगे, अपने आपको आगे बढ़ाने के लिये प्रसन्न भाव से प्रतिबद्ध हो जाओं।

 

अपने संकल्पों को बार-बार दोहराओं…
मुश्किलें जरूर है, पर ठहरा नहीं हूं मैं
मंजिल से जरा कह दों, अभी पहुंचा नहीं हूं मैं
नन्द किशोर श्रीमाली

Dialog with Loved Ones…

Dear Loved one,

Blessings,

You came to Delhi Arogyadham on the eve of the new year, you came to me, we met each other and  successfully accomplished the Shiv Sahastraar Chakra Mahotsava with divine joy.

My message to you was –

 

Utthshthat Jaagraya Praapaya Varaannibodhata |

 

O Disciple! Arise, Awake and Accomplish with wisdom. You had definitely made some resolutions with yourself and myself. You took a pledge to perform your actions with a new perspective. You attempted to forget your past mistakes and resolved to move forward.

However, your pledges weaken within ten-fifteen days.  why does this happen?

Resolutions should be firm, stable and definite. We resolve passionately. Then why do these resolutions wear down? You are not an ordinary mortal, you are a Sadhak, disciple,  you are spiritually connected with the divine power of Nikhil. Then what could be the reason for this wavering mind?

This power of resolution is a set of three discrete powers – Will-power, Action-power and Knowledge-power.

Your mind has infinite desires and wishes, you have a strong passion to imbibe knowledge and you are full of action.

Then why does this Resolution-power weaken? The power of resolution weakens up when we forget our true nature. The word nature literally means faith, it symbolizes your faith and nature, which is as pure, innocent, naive and guileless as Lord Shiva. This form of Shiva is no different than your own form. This Shiva is just like you – pure, innocent, naïve and virtuous.

You have to move forward in accordance with this faith, your own basic nature.  You make resolutions passionately with much fan-fare, but are unable to complete them because on an inner Mahabharat battle within your own mind. You have to win this battle of Mahabharata. It is actually a very simple straightforward principle. You will achieve victory in the physical world, when you win over the inner mind. You ought to obtain guidance from your provident SadGuru, from your own Jagat-Guru Shree Krishna,  to obtain comprehensive victory in this inner Mahabharata battle of inner mind.

You should remember that – The inner will-power feeds this resolution. This  inner mental battle will certainly weaken your resolution. The mind continually changes its directions within a fraction of second. It can easily alternate between deep  depths of depressions and high excitement levels. It is never stable.

You should apply yourself to your tasks with full conscience, calmness, patience, determination, will-power, dedication and devotion. You should dedicate yourself with full trust and faith. Lack of reverence degrades a task into indolence; and how can indolence bear any fruit?

You should tread forward on this dynamic path of actions with full courage and faith, to achieve success. Continue to move ahead with full valor.

 

Show Valor, let this world bow to you

Persist patiently,  your time, too shall come…

The assembly mocked the stringing by Raghuvar

Ram broke the bow at the apt moment

Corrode not your fortitude, your valor will the world witness

Persist patiently, your time, too shall come ….

Raghuvar beseeched the sea to tread through

Sindhu shrieked upon fathoming the valor

New trails will open up, with your forte

Persist patiently, your time, too shall come ….

The haughty residents of the golden city hath a mighty fall

Whilest blessings rained  on the virtuous disciples

You too, tread the righteous, Thrive you will,  surely 

Persist patiently, your time, too shall come ….

Prasanno Bhav, Varado BhavaH

(Be Happy, Be Successful)

 

Let the Almighty divine Guru bless you with boons to remain happy, joyous and progress forward in life. Just remember one piece of advice – Do not let anything erode your innocent simple nature.

The greatest boon in the universe is “Peace of Mind”, and this boon is continually pushing you through the golden path of Sadhanas and Meditation. Guru is your partner, He is your best friend. Just continue to do your deeds like a child. You have vast swathes of potential within your own self, open its doors. Nobody has the power to stop your progressing steps. Leave behind all these sorrows and dilemmas. Joyfully commit yourself to progress ahead.

 

Repeat your resolutions repeatedly …

 

Problems do plague, but bound me they not

Tell the goals, I shall meet them eventually, in a while

 

 

Nand Kishore Shrimali

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