Dialog with loved ones – December 2018

अपनों से अपनी बात…

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

अभी हम सब ने प्रकाश महोत्सव दीपावली पर्व अपने-अपने स्थानों पर विधि-विधान सहित सम्पन्न किया, आप सभी ने मुझे शुभकामनाएं भेजी, अपने घर-परिवार, मित्रों को शुभकामनाएं भेजी। उनकी शुभकामनाएं प्राप्त की। एक नवीन उत्साह प्राप्त हुआ। यह पर्व ही लक्ष्य सिद्धि का उत्सव है। पराक्रम पर्व है। कर्म के प्रति संकल्प का पर्व है, स्नेह पर्व है। जिस संकल्प के साथ आपने लक्ष्य सिद्धि की कामना की है, उसी संकल्प के साथ निरन्तर कर्मशील रहना, अपने इस कर्म के दीप को सदैव संभाल कर रखना। इसकी रक्षा करना, कर्म आहुति निरन्तर देते रहना।

 

असतो मा सदगमय… तमसो मा ज्योतिर्गमय…

मृत्योर्मा अमृतम् गमयम्…

हम अपने जीवन में सदैव और सदैव अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ते रहे। हमें अपने जीवन में निरन्तर और निरन्तर अमृत प्राप्ति का भाव प्राप्त हो, हम तृप्त हो, शांत हो, कर्मशील हो। हमारे भीतर आत्मप्रकाश सदैव आलोकित रहे।

 

दीपावली का पर्व पूर्ण हो गया है लेकिन मैं आपसे एक वचन चाहता हूं, आप अपने हृदय में ज्ञान की ज्योति सदैव जलाय रखना, आप का यह उत्सव निरन्तर चलते रहना चाहिये। आप अपने मित्रों, स्वजनों, परिवार के सदस्यों, गुरु भाई-बहन से और अधिक मिलते रहे। इस पर्व पर आपके चेहरे पर आनन्द और मुस्कान का भाव है, वह निरन्तर बना रहे।

 

अप्पो दीप भवः’ अपने भीतर का दीपक जलाकर रखना, जीवन तो एक निरन्तर गतिशील उत्सव है। यह प्रकाश, यह रस पूरे वर्ष इसी प्रकार से चलता रहे।

 

मैं जानता हूं कि आपको अपने मन में कई बार अकेले पन अनुभव होता है। आप संसार में ओर किसी से नहीं डरते, अपने अकेलेपन से कई बार घबरा जाते है। क्यों चिन्तित होते हो? तुम गुरु के पास हो, ज्ञान रूप में गुरु तुम्हारे साथ हर समय तुम्हारे हृदय मन्दिर में स्थापित है।

 

मुझे प्रसन्नता है कि तुम निरन्तर और निरन्तर कर्मशील हो और जब ज्ञान और कर्म दोनों तुम्हारे पास है, साथ है तो तुम अकेले कैसे हो गये? बिल्कुल नहीं। सदैव और सदैव अपने ज्ञान और कर्म पर आस्था बनाये रखना। इसी आस्था को और अधिक गहरा, और अधिक बलवती करते रहना।

 

सौभाग्य है, इस जीवन में तुम्हें घर-परिवार, मित्र, नाते, रिश्तेदार, गुरु मिले है। तुम अपनी पूरी मेहनत से कर्म कर रहे हो। प्रकृति की हर वस्तु निराली है और तुम उसे देख रहे हो, सुन रहे हो।

 

ॠग्वेद का महावचन है –

 

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ् गैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥

हमारे कान अच्छा सुनें, हमारे नेत्र अच्छा देखें, हम अपनी आंखों से मंगलमय घटित होते देखें, निरोग इन्द्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम से ब्रह्मा द्वारा सौ वर्ष की आयु प्राप्त हो। हमारी सभी इन्द्रियां स्वस्थ और क्रियाशील रहे।

 

तुम्हारी भावना श्रेष्ठ है, तुम्हारे विचार श्रेष्ठ है, तुम्हारे कार्य श्रेष्ठ है, तुम सही मार्ग पर अपने मन के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हो। इस यात्रा में, इस जीवन में निरन्तर चरैवेति… चरैवेति… चलते हुए कई बार खण्डित भी होओंगे। मन थोड़ा लहूलुहान भी होगा। उन मन के घावों पर मरहम पट्टी तुम अपने गुरु रूपी ज्ञान के आत्मदीप से, अपनी प्रबल शक्ति से, अपने कर्म से करते रहना। अपने आपको वज्र के समान बनाना है पर उस वज्र में अपने कोमल मन को, अपनी कोमल भावनाओं को, जगत को आनन्द और प्रेम से देखने की भावना को सदैव और सदैव सुरक्षित रखना।

 

मैं जानता हूं कि – कई बार जीवन में तुम थक जाते हो तो एक विश्राम चाहिये। व्यक्ति घर- परिवार से थक जाता है, कभी अपने कार्य से थक जाता है, कभी अपनी आजीविका से और कभी अपने कर्म का समय पर फल नहीं मिलने से थक जाता है। तुम सोचते हो कि – क्या यही जीवन चक्र है? क्या मैं इस चक्र में ऐसे ही निरन्तर चलता रहूंगा? मैं जानता हूं तुम्हारी इस थकान के बारे में।

 

गुरु ही वह विश्रान्ति का भाव है, शांति का भाव है, शीतलता का भाव है। तुम विश्राम करना भी सीखों। तुम अपने मन को थोड़ा विश्राम दो, अपने मन को शीतलता का अमृत भाव दो। आनन्द की प्राप्ति, आनन्द का उद्भव तुम्हारे मन के भीतर है। उस मन के गहरे तल में गुरु का प्रकाश, गुरुरूपी अमृत घट स्थापित है।

 

तुम मेरे पास एक विश्रान्ति के लिये आते हो, शीतलता के लिये आते हो। हम एक दूसरे से मिलकर आह्लाद, खुशी और शीतलता प्राप्त करते है। यही पुनः युवा होने की क्रिया है। हृदय से, मन से सदैव और सदैव युवा भाव में ही रहना है। जीवन में कड़वाहट मिलती है, तो उस कड़वाहट को कर्म के साथ, ज्ञान के साथ अपनी चेतना के द्वारा समाप्त करना। यह मेरा कर्तव्य है कि मैं तुम्हें अमृतगमय, अमृत की मिठास प्रदान करने का जीवन मंत्र, जीवनी शक्ति प्रदान करता रहूं।

 

बस तुम एक काम करना, तुम अपने मन पर किसी ओर का प्रभाव आने मत देना, कोई और तुम्हारे मन को जकड़ न ले। तुम अपने मन को बहुत सुरक्षित रखना। तुम अपने भीतर, अपना ही प्रभाव प्रकाशित करो। तुम्हारा स्वयं का एक आभापुंज हो, एक दैदीप्यमान व्यक्तित्व हो जिसमें जोश और ओज हो और उसके साथ एक शांति भी हो।

 

हमारा आपसी सम्बन्ध बड़ा ही अनूठा है। एक दूसरे का हाथ थामा है और निश्‍चित रूप से तुम्हारी शक्ति ऊर्घ्वगति की ओर गतिशील है।

 

यह शिवत्व भाव, यह शक्ति भाव तुम्हारे भीतर ही है। अग्नि तुम्हारे भीतर है, वह अग्नि कई बार तुम्हें झुलसा देती है, पर यह अग्नि तुम्हारे लिये आवश्यक है। तुम्हारा शिवत्व चैतन्य हो, तुम्हारा शिव चक्र चैतन्य रहे। तुम्हारी शक्ति इस संसार में श्रेष्ठ कार्य के लिये, अपने घर-परिवार के कल्याण के लिये क्रियाशील रहे। तुम मुझे साल में अपने-अपने स्थानों पर बुलाते हो, मैं तो साल में तुम्हें आरोग्यधाम, गुरुधाम एक बार बुलाता हूं। इस बार 29-30 दिसम्बर को आरोग्य धाम अवश्य आना। तुम्हारा शिव चक्र, तुम्हारा शक्ति चक्र चैतन्य हो, तुम अपने आप में पूर्ण आनन्दित और भावों से भरा अनुभव करो। तुम्हारे भीतर का अकेलापन दूर हो, तुम्हारी मन की सूखती रस धार पुनः प्रेममयी शिव गंगा बन जाये। मन में सदैव ज्ञान की गंगा, चेतना की गंगा बहती रहे…

 

आशीर्वाद सदैव खुश रहो…
नन्द किशोर श्रीमाली

Dialogue with loved ones

 

Dear disciple,

 

Blessings!

 

Recently, we have celebrated Diwali –  the festival of lights. I am happy to note that unlike others my disciples have celebrated Diwali spiritually by performing Sadhanas. When the festival time comes we send festival greetings to our outstation friends and family members. With much warmth and happiness, I acknowledge your greetings. The mutual exchange of happy vibes and greetings energize us. That inspires us to stay focused on our work.

 

Few of us know the deeper meaning of Diwali. That’s why we feel earning Goddess Lakshmi’s blessings will ensure an uninterrupted flow of wealth in our life. The fact is wealth is an outcome of our actions. When we advance to greater heights in our careers, wealth follows us. However, wealth alone will not ensure happiness in our life. It has to be aligned with our quest to the attainment of truth and knowledge, which has been the aspiration of our ancestors and gets immortalised in these words:

 

God! Keep me not in the unreality (of the bondage of the phenomenal world), but lead me towards the reality (of the eternal self)

God!  Keep me not in the darkness  (of ignorance), but lead me towards the light (of spiritual knowledge)

God! Keep me not in the (fear of) death (due to the bondage of the mortal world), but lead me towards the immortality (gained by the knowledge of the immortal self beyond

 

The objective of our life is to move from the darkness to the light. Ignorance is the darkness of our life. As we immerse ourselves in the wisdom of the Guru’s words we are able to shun ignorance.

 

Diwali symbolises our quest for the virtues, such as knowledge, truth, purity, and, love. Though the festival is over we can keep the spirit alive in our actions. Keep renewing the bonds of affection with your friends, family, brothers especially Guru brothers.  I sincerely wish the happiness which illuminates your face on this festival should last year-round.

 

Why do you look for happiness externally? It resides in your hearts. Sometimes sadness will overwhelm you. These are the times when you should meet the Guru and perform the sadhanas. Sadhanas are the means through which the sunshine of the divine joy will touch your hearts and the darkness lying within your soul will evaporate.  I bless you all with everlasting happiness!

 

I understand that loneliness envelops your heart at times. I am privy to your pain. When that pain  starts engulfing your heart it saddens you. In all such dark moments, you should think about the Guru.

 

I am ALWAYS with you in your hearts as the light of knowledge. The knowledge is not limited to the study of scriptures and religious texts. Instead, it is realising the ultimate truth that you are an embodiment of the divine.

 

I am happy to see that you have accorded the topmost priority to work in your life. You are constantly learning and applying those learnings to your personal and professional life. However, in the moments of despair, you should take refuge in the warmth and the light of the Guru’s knowledge in your hearts. All your ignorance will dispel when you start counting the blessings of your life. The topmost are your friends, family and the Guru. The next is a healthy body and a healthy mind, which will  help you attain greater heights in your life. There is a caveat though:

 

You have to be on the side of truth and auspiciousness and constantly the prayer enshrined in the Rig Veda.

 

May we hear with our ears what is auspicious

May we see with our eyes what is auspicious and adorable

May we be prayerful (in life) with steadiness in our bodies (and minds)

May we offer our lifespan allotted by the Devas (for the service of God).

 

 

I know you are pure in your thoughts and actions. You are truthful in your heart and have embarked on a journey of love and hope. However, the path is not so easy as it sounds. There will be times when you will feel that your values are no longer relevant in today’s world.

 

In such moments of despair think of meeting with your Guru. Always remember the whole world wants to cut you down to size, whereas the Guru will always inspire you. However, there will be times when meeting personally with the Guru will not be feasible. Yet, you can dwell on the teachings of your Guru. Introspect on the thoughts of the Guru.  The teachings of the Guru are like a fire. They will demolish all sorts of negativity and you can discern the profoundness of your life’s values – the greatness of your path and the difficulties that come with it.

 

My disciples are warriors of light. They have chosen the path of knowledge and only a  braveheart can choose a difficult path.

 

Obviously, treading on a difficult road ahead will tire you. You will be tempted to quit. Quitting is never a solution. The antidote to fatigue is energy and it comes from the Guru.

 

When you are fatigued you should plan to see the Guru. In those few moments when the Guru and the disciple sit across each other something magical transpires. The energy of the Guru permeates the entire being of the disciple and he is at peace. That feeling of peace only a Guru can provide. And, to a Guru, the disciple is his biggest strength, his wealth. Meeting with the disciples energise the Guru as well. In fact, the Guru and the disciple live in each other’s heart and when they meet they are complete.

 

Such is the life that there will be happy and sad moments. You should forego bitter memories. Instead, work on your happiness. Stick around with people who inspire you. Set your priorities right. Rather than brooding over unhappy events, you should divert your energy to work.

 

Your goals will start translating into reality. There is one life.  And, you should seek more out of it. No one is worth your time and attention if they do not reciprocate your kindness. Rather than wallowing over them you should look ahead. You are a magnificent human being. The gods are with you. The Guru is with you. Set destinations for yourself. Achieve them. Then, move on to the next ones.

 

And, when you are tired or when you start questioning the ‘why’s’ of your journey then the only person who has answers to your queries is the Guru. See him. Ask him. Absorb his wisdom. Apply his knowledge. Suddenly, your cobwebs of delusion will disappear. You have TRANSFORMED yourself by the grace of your Guru.

 

I sincerely urge you to safeguard the beauty of your soul. You are pristine. In you shines the divine light. There will be many who will try to influence you. Resist them. Remain the way you are. There is no need to change yourself to fit into other’s expectations. You should remain true to yourself. Always remember, “Those who mind don’t matter and those who matter don’t mind.”

 

We are in a unique relationship which is difficult for the materialistic world to comprehend. I am committed to helping you unleash the energy lying dormant inside you. The moment that Kundalini energy – Shakti element begins its upward travel you will start feeling restless. The enormity of that energy will startle you. You need to channelise it by awakening the Shiva element within you.  Direct it at work and you are way ahead of your competitors. This energy is the fountain of youth. It will remove your mental and physical fatigue.

 

As the year winds up, I invite all of you to Arogyadham in Delhi. Throughout the year, you keep inviting me to your place for the Shivirs. The year-end Shivir is mine. I am inviting you to participate in the Shiv Saharsraar Mahadeeksha at Arogyadham on 29th and 30th December. I look forward to seeing you there. Are you coming?

 

My blessings are always with you.

 

May you awaken the dormant energy lying within you

May you attain infinite happiness and equipoise

 

Stay happy always

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