Dialog with Loved ones – December 2017

 

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

और मां चली गई…

 

16 अक्टूबर अपराह्न का समय मैं मां के पास खड़ा उन्हें गीता के 15 वें अध्याय के श्‍लोक सुना रहा था।

 

निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥

 

कृष्ण कह रहे हैं जिनका मान और मोह निवृत्त हो गया है, जो अध्यात्म में स्थित हैं, जो सुख-दुःख नामक द्वंद्वों से विमुक्त हो गये हैं ऐसे ज्ञानीजन उस अव्यय पद को प्राप्त होते हैं।

 

आगे मैंने कहा कि हे मां! तुम अव्यय पद को प्राप्त हो गई हो और उस परमात्म लोक की यात्रा के लिये महाप्रयाण कर रही हो, जो परमधाम है।

 

न तद् भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः।
यद्गत्वा न निर्वर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
मैं श्‍लोक पढ़ रहा था, आवाज थरथरा रही थी लेकिन ऐसे लगा माता ध्यान से उन श्‍लोकों को सुन रही है। मैंने अपना हाथ माता श्री के हाथ में दे रखा था। मेरे हाथों में कुछ हलचल हुई मेरे हाथों पर एक दबाव सा आया। एकदम चौंक कर गीता से आंख हटाकर मां के चेहरे की तरफ देखा, कुछ क्षणों के लिये मां ने आंखें खोलीं। मेरी आंखों में देखते हुए माताजी ने आंखों ही आंखों से इशारा किया और निःशब्द की भाषा में कहा कि – मैं जा रही हूं। मौन शब्द थे, आंखों में गहरा भाव था। एक असीम शांति, उन दो क्षणों के अन्तराल में ही मां ने बहुत कुछ कह दिया और उन्होंने धीरे से आंखें बंद कर लीं और धीरे-धीरे उनके हाथों की पकड़ ढीली हो गई। देह से प्राण अपने परम धाम सिद्धाश्रम चले गये। चेहरे पर एक असीम शांति, एक ओज, एक ऐसा भाव जिसके लिये शब्द बहुत बौने हो जाते हैं। शब्दों से उन क्षणों की व्याख्या ही नहीं की जा सकती।

 

यह क्या हुआ? अभी एक क्षण पहले तो मां ने मेरी ओर देखा था और एक ही क्षण में नेत्र बंद कर लिये। यह कैसे हो गया। सुबह तो डॉक्टर कह रहे थे कि अब सब कुछ ठीक हो रहा है। वास्तव में मां उस यात्रा के लिये अपने आपको तैयार कर रही थी जिसका लक्ष्य सिद्धाश्रम है। वैसे भी हम रो कैसे सकते हैं, जब बुलावा सिद्धाश्रम से आ रहा हो। वहां की पुकार को कौन अनसुना कर सकता है?

 

कई बार माताजी कहती थीं कि – जब मैं जाना चाहूंगी, तब मैं चली जाऊंगी। तुम्हारे ये चिकित्सक मुझे रोक नहीं सकते हैं। यह भी उन्होंने कहा कि मुझे किसी भी देवलोक, विष्णुलोक की चाह नहीं है, मुझे तो सिद्धाश्रम ही जाना है और जब मुझे सद्गुरुदेव का बुलावा आ जायेगा तो मैं एक क्षण में इस लोक को छोड़ दूंगी।

 

मुझे याद आ रहा है, 3 जुलाई 1998 के क्षण जब सद्गुरुदेव ने सिद्धाश्रम के लिये महाप्रयाण कर दिया था। उन्होंने कुछ ही दिन पहले अपने एक प्रवचन में कहा था कि इस संसार में मेरा जितना कार्य है, मैंने पूर्ण कर लिया है। अब मैं अपने गुरु सच्चिदानन्द जी से मिलने सिद्धाश्रम जा रहा हूंं, यदि तुम लोगों को कुछ जरूरत है तो भगवती तो तुम्हारे पास है।

 

माता ने भी 19 वर्ष प्रतीक्षा की, हर क्षण देव ध्यान, गुरु ध्यान ही उनके मानस में रहता था। 19-20 वर्ष के इस अन्तराल में उन्होंने जगत के सारे कार्य सम्पन्न किये। सिद्धाश्रम साधक परिवार की प्रणेता बनकर सद्गुरु के कार्यों को सम्पन्न किया। सद्गुरु के साथ तो उन्होंने देश-विदेश भ्रमण किया ही था, उनके सिद्धाश्रम गमन के पश्‍चात् हमारे साथ भी पूरे भारत वर्ष में भ्रमण किया और अपने एक-एक शिष्य की आंख से आंसू पौंछे। हर बार कहती थी कि – तुम क्यों चिन्ता करते हो? गुरुदेव हमारे बीच में ही हैं।

 

ऐसी दृढ़ निश्‍चयी महिला, अपनी शारीरिक शक्ति से भी सौ गुना अधिक अपनी मानसिक शक्ति से निरन्तर और निरन्तर कार्यरत थीं। लेकिन सिद्धाश्रम से सद्गुरुदेव की कहीं गहरी पुकार थी कि हे भगवती! अब तुम अपनी देह को इतना कष्ट मत दो, अपने आपको विश्राम दो और यहां मेरे पास बैठ कर शिष्यों के मानस में स्थापित हो जाओ।

 

पिछले 20 वर्षों में उन्होंने अपने घर से किसी योगी, यति, संन्यासी, साधक को अपने द्वार से खाली नहीं जाने दिया। जो भी आया उसकी पूरे मन से सेवा की और उसे आशीर्वाद, शुभकामना और किसी न किसी रूप से धन, वस्त्र, इत्यादि दिये। कई साधक मां के पास कई महीनों रह जाते थे। मैंने एक दिन पूछा कि – मां तुम सबका इतना ध्यान क्यों रखती हो। अपना ध्यान क्यों नहीं रखती। तो मां ने कहा कि – क्या मालूम सद्गुरु नारायण ने ही इन्हें किसी न किसी कारण से मेरे पास भेजा है। जो इतनी चाह लेकर मेरे पास आया है। उसे मैं कैसे खाली हाथ भेज सकती हूं।

 

मां ने एक बार कहा था कि – इस बार दीपावली पर तुम मुझे देख नहीं सकोगे। हम सब रोने लगे तो मां ने कहा कि – तुम मुझे दैहिक रूप में नहीं देख सकोगे तो क्या हुआ? मैं तो विदेह होकर पल-प्रति पल तुम्हें देख सकूंगी। जो मेरे कार्य हैं, वे गुरु कार्य हैं। वे और भी अधिक श्रेष्ठ रूप में तुम्हारे माध्यम से सम्पादित होंगे। तुम्हारे भीतर मेरी शक्ति पल-पल जाग्रत रहेगी।

 

मां को श्रद्धांजली दूं या कुछ शब्द बोलूं, मां तो यहीं हैं हर पल अनुभूति में है, चेतना में हैं और जो हर पल साथ है वह कभी विलग नहीं हो सकती। उनका निर्देश तो पल-पल हमारे लिये दिशा प्रदान करने वाला प्रकाश स्तम्भ है।

 

जहां नारायण हैं, वहां भगवती हैं, जहां विष्ण्ाु हैं, वहां श्री हैं, जहां शिव हैं, वहां शक्ति हैं। वे सब हमारे साथ हैं।

 

संसार के सारे कार्य हम सम्पन्न करेंगे। पूरे जोश के साथ… हे मां! तुम हमें पल-पल साहस प्रदान करते रहना। इस धरती के, सिद्धाश्रम के कर्त्तव्य पथ पर हम निरन्तर गतिशील रहें और जो सिद्धान्त आपने और सद्गुरुदेव ने स्थापित किये हैं, उन्हीं सिद्धान्तों पर हम शिष्यों साधकों के साथ चलते रहें, चलते रहें…

 

नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with Loved Ones …

Dear Loved One,

Divine Blessings,

And Mother departed …

I was reciting the verses from the 15th Chapter of Geeta to Mother on the afternoon of 16th October.

Nirmaanamoha Jitasangadoshaa Adhyaatmanityaa VinivrttkaamaaH |

DwandwervimuktaaH Sukhadukhasangyei GarchchantyamudhaaH Padamavyayam Tat ||

 

Lord Krishna is stating that  those wise persons who have risen above the respect and attachments,  those who have elevated to a higher plane of spirituality, those who have attained liberation from the twin dualities of pleasure and pain, only such astutes achieve the highest Supreme stage.

I continued, “Mother! You have attained the Supreme stage and are departing to travel to the Supreme abode,

Na Tad Bhaasayate Suryo Na Shanshaanko Na PaavakaH |

Yadgatvaa Na Nivrrtante Taddhaam Parmam Mam ||

I was reciting the Shloka-verse,  the voice was shaky, however it seemed that Mother was listening the verses with rapt attention. My hand clasped Mother Shree’s hand. Suddenly I felt some pressure on my hands. Stunned, my gaze moved to Mother’s face from the Geeta, and Mother opened Her eyes for a moment. Gazing into my eyes, Mother’s eyes signalled, without a word, that “I am departing.” The words were silent and the eyes had deep feelings. An infinite peace, Mother said a lot during those twin moments, slowly closed Her eyes, gradually the grip of Her hands started to loose up. The divine spirit left Her body to travel to the Supreme abode, Siddhashram.  An infinite peace expressed on Her face, intense calmness, an expression which words fail to describe. It is just not possible to detail those moments through mere words.

What happened? Mother looked at me just a moment ago, and closed Her eyes in the next. How did it happen. The doctor had assured us in the morning that Her health was improving. In reality, Mother was preparing Herself for the journey to Siddhashram. Anyway, how can we cry, when Siddhashram beckons. How can ignore the call from Siddhashram?

Mataji had often said – “I shall depart, when I desire to leave. Your doctors cannot stop me”. She also said that She did not wish to leave for Vishnu-lok (abode) or any other Dev-lok (abode). “I wish to go to Siddhashram, and will leave this planet within a moment, when SadGurudev beckons.”

I recollect the fateful moments of  July 3, 1998, when SadGurudev had departed for Siddhashram. He had said in a discourse few days earlier, that “I have completed whole of my work in this world. I am now departing to Siddhashram to meet my Guru Sachchidaanandji. Mother Bhagwati is with you if you need anything.”

Mataji waited for 19 years, and meditation on the Divine and Guru absorbed Her every moment.  She completed all activities of this world in this interval of 19-20 years. She  inspired the Siddhashram Sadhak Pariwar and completed all of Gurudev’s tasks. She had travelled across the world with SadGurudev, and now She travelled across India with us after His departure to Siddhashram and wiped the tears of each and every disciple. She used to say – “Why do you worry? Gurudev is among us all.”

She was such a strong and determined woman, she used to continuously work mentally, much more than hundred times Her physical capacity. However there was a deep beckoning from SadGurudev from Siddhashram – “Bhagwati!, Stop hurting your body. Take rest, sit with me here and express in the minds of the disciples.”

She did not let any Yogi, Yati, Ascetic or Sadhak leave empty-handed from Her door in the last 20 years. She served every guest, and granted him blessings, wishes and wealth-clothes.  Many Sadhaks used to stay with Mother for many months. Once I asked – “Mother! You care so much about the others. Why don’t you take care about yourself.” Then Mother replied – ” Who knows. SadGuru Narayan has sent them to me due to some reasons. They have come to me with such strong desires, how can I send them back empty-handed.”
Mother had once said that – “You will not be able to see me this Deepawali. ” When we started crying, She said – “Why are you worried that you will not be able to see me in this physical form? I can watch your every moment in this body-less spirit form. All of my tasks are tasks of the Guru. They will get accomplished in much better way, through you as the medium. My energy-power will continually stay activated within you at all moments.

Should I pay homage to Mother, or speak a few words; Mother is here with us, in senses and consciousness, and one who is continually with us, cannot be separated. Her directions are the light-pillars to guide all of our actions at every moment.

Where there is Narayan, Bhagwati is with Him, Wherever Vishnu is, Shree accompanies Him, Wherever Shiva is, Shakti is with Him. All of Them are with us.

We will accomplish all the tasks of the world. With full zeal and joy … O Mother! You keep giving us courage at every moment. Let us continue dynamically with full fervor forward on the duties of Siddhashram, on this earth, and continue to forge ahead on the principles setup up by You and SadGurudev, with the disciples-sadhaks ….

 

Cordially yours,

Nand Kishore Shrimali

 

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