Dialog with Loved ones – August 2017

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

यह मास गुरु पूजन, साधना और शिव साधना का श्रावण मास है, अमृत मास है, रसेश्‍वर पर्व है। आपने नये संकल्प लिये, नये कार्यों की योजनाएं बनायीं। निश्‍चित रूप से आपके कार्य सफल होंगे, यह मेरा विश्‍वास है, यही मेरा आशीर्वाद है।

 

आज मैं एक विशेष बात अपने मन की कहना चाहता हूं। आप लोग जब मुझसे मिलते हो और शिविर में भी जब मैं आपके चेहरों को देखता हूं तो आपके चेहरों पर एक उदासी, एक थकान का भाव दिखाई देता है। कहीं न कहीं मन में प्रफुल्लता का भाव कम है। कोई न कोई पीड़ा अवश्य है और वह चेहरे पर झलक जाती है। आप चाहें लाख मुस्कुरा लें लेकिन अन्तर मनः में कोई पीड़ा है, अवसाद है तो वह चेहरे पर उभर ही आता है।

 

हमारे मन में यह प्रश्‍न अवश्य आएगा कि हम अपने जीवन में आनन्दित, प्रफुल्लित और ऊर्जा से भरे हुए किस प्रकार रहें। हम अपने जीवन की दिशा क्या निर्धारित करें? हमारे लक्ष्य क्या हों? और हम उन लक्ष्यों की पूर्ति कैसे करें? इस प्रश्‍न पर मैंने मंथन किया है कि आखिर मनुष्य की प्रकृति, मनुष्य के विचार और मनुष्य के भावों में किस प्रकार का सम्बन्ध होना चाहिए। जिससे उसकी प्रकृति, उसके विचार और उसके भावों में एक सामंजस्य हो। स्वयं की प्रकृति के अनुसार विचार और भाव हों तो हम अपने आपको पूर्णतः स्वतंत्र समझ सकते हैं और हमारी कार्यक्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि हो सकती है।

 

तीन प्रमुख बातें हैं –  जिम्मेदारी, कर्त्तव्य और अधिकार।

 

हम जो भी कार्य कर रहे हैं, उसे किस प्रकार से सम्पन्न करते हैं यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। यदि हम अपने ऊपर पूर्णतया जिम्मेदारी ले लेते हैं तो अपने आपको एक बोझ के नीचे दबा देते हैं। उस कार्य के प्रति और उसके फल के प्रति अपने आपको जिम्मेदार मानने लगते हैं और जब हम इतने बोझ से, जिम्मेदारी से कार्य करते हैं तो हमारी फल प्राप्ति की इच्छा भी बहुत अधिक हो जाती है और हम उस कार्य के फल के प्रति अपना अधिकार, अपनी धौंस जमाने लगते हैं। यह मेरा है, यह मैंने किया है, इसे मैंने बनाया है, ये सब भाव अधिकार के सूचक हैं।

 

दुःख का कारण ही मूल रूप से अपने आपको हर बात के लिये जिम्मेदार समझना है, अच्छा हो जाए तो आपकी जिम्मेदारी, विपरीत हो जाए तो भी आपकी जिम्मेदारी। यह अति जिम्मेदारी का भाव हमें जीते जी मार देता है। आप सोचते हैं कि आज मैं हूं तो यह सब हो रहा है, यह सब मेरी जिम्मेदारी है। मैं नहीं रहूंगा तो यह घर, यह समाज कैसे चलेगा। बस यहीं हम थोड़ी सी चूक कर देते हैं।

 

जिम्मेदारी से बचना नहीं है लेकिन जिम्मेदारी को कर्त्तव्य रूप में सम्पन्न करना है। जब कोई कार्य कर्त्तव्य पूर्वक सम्पन्न किया जाता है तो उसका निर्णय क्या होगा? फल क्या मिलेगा? हम उसके वशीभूत नहीं रहते। जो कर्म हमें करना है, उस कर्म को हम कर्त्तव्य समझकर करते रहते हैं तो हम बोझ मुक्त रहते हैं। गीता में एक सुन्दर श्‍लोक आया है, जिसमें कृष्ण अर्जुन को कहते हैं –

 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छे्रयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥ 

 

हे अर्जुन तू किंकर्त्तव्यविमूढ़ मत बन, तू एक ओर अपने आपको इस युद्ध के लिये जिम्मेदार भी मानता है और दूसरी ओर इसी जिम्मेदारी से अधिकार भी प्राप्त करना चाहता है, विजय भी प्राप्त करना चाहता है। तू इस पूरे संग्राम की जिम्मेदारी ले रहा है और उस जिम्मेदारी से तेरे मन में यह बात घुस गई है कि यदि मैं हार गया तो क्या होगा? और यदि मैं जीत गया तो क्या होगा? क्या इतना रक्त बहाकर मैं विजय का आनन्द प्राप्त कर पाऊंगा? हे अर्जुन वास्तव में तू हार से डर रहा है। अपने आपको जिम्मेदार मान रहा है, इसलिये किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गया है। ध्यान दीजिये कि कृष्ण ने यह नहीं कहा कि – इस सब का जिम्मेदार कौन है? कृष्ण ने यह भी नहीं कहा कि – तुम समर्थ यौद्धा हो और पाण्डव पक्ष को जीत दिलाने की जिम्मेदारी तुम्हारी ही है। कृष्ण ने बड़े ही सरल शब्दों में कहा कि तुम किंकर्त्तव्यमूढ़ मत बनो, तुम अपना कर्त्तव्य करते रहो। किंकर्त्तव्य का अर्थ है – मैं अपना कर्त्तव्य क्यों करूं? ऐसा ही किंकर्त्तव्यविमूढ़ता का भाव आपके मन में भी आ जाता है और शायद सारे दुःखों की, अप्रसन्नता की जड़ यही है।

 

जितनी जिम्मेदारी से तुम काम करोगे तुम्हारी अधिकार लालसा उतनी ही बढ़ती जायेगी। तुम केवल अपने आपको जिम्मेदार मानकर कार्य मत करो। तुम कर्त्तव्य समझकर कार्य करो। जहां कर्त्तव्य हैं वहां किसी भी प्रकार का, कोई बोझ नहीं है। समाज के प्रति, अपनी संतान के प्रति, अपने परिवार के प्रति, हमारा कर्त्तव्य है। हमें कर्त्तव्यपूर्वक क्या करना है, इसका निर्णय हमें स्वयं लेना है। यदि सब बातों की जिम्मेदारी हमने ही ले ली तो हम अपना कार्य उचित रूप से सम्पन्न ही नहीं कर पाएंगे।

 

तुम केवल कर्त्तव्य की ओर ध्यान दो। सोचो ईश्‍वर आराधना, गुरु सेवा, गुरु कार्य, जिम्मेदारी है अथवा कर्त्तव्य है। यदि तुम इसे कर्त्तव्य समझते हो तो बड़े आनन्दपूर्वक इसे सम्पन्न करते रहो। निर्णय लेने से पहले सौ बार सोच-विचाकर निर्णय करो लेकिन निर्णय लेने के बाद अपने निर्णय से विचलित मत होओ। जीवन के इस रास्ते पर चलना तुम्हारा कर्त्तव्य है। जिम्मेदारी तो बहुत बड़ा बोझ है। इस बोझ से मुक्ति के लिये जीवन के प्रत्येक दिन को कर्त्तव्यपूर्वक जीओ। जो अपने-अपने कार्य हैं उनको कर्तव्यपूर्वक करते रहो। एक प्रश्‍न सदैव अपने आपसे करते रहो कि क्या आज का कार्य मैंने कर्त्तव्य समझ कर किया है? क्या उसमें अपनी पूरी ताकत लगा दी है? कर्त्तव्य करते-करते व्यक्ति कभी थकता नहीं है। अनावश्यक जिम्मेदारी और उस जिम्मेदारी के साथ फल की असीम लालसा और अधिकार प्राप्ति की भावना के कारण व्यक्ति थक जाता है।

 

आप अपनी दैनिक पूजा भी कर्त्तव्य समझ कर करना।

 

आप नवरात्रि में शक्ति साधना भी अपना कर्त्तव्य समझकर करना, दीपावली की लक्ष्मी साधना भी अपना कर्त्तव्य समझकर करना। जो तुम्हारा कर्त्तव्य है, जिसके लिये तुम्हारे मन में स्वीकृति है वह कार्य पूरी तरह से करना।

 

ईश्‍वर का सिद्धान्त बड़ा सरल है, कृष्ण कहते हैं –

 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…
योगस्थ कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय…

 

यह जीवन पल-पल कर्त्तव्यों से भरा है, यह जीवन जिम्मेदारी का बोझा नहीं है। तुम अपने आपको हर असफलता के लिये जिम्मेदार मत मानो। अपना कर्त्तव्य करते रहो। गुरु और ईश्‍वर, शक्ति और शिव, राम और कृष्ण तथा तुम्हारा इष्ट, सब तुम्हारे साथ हैं, वे भी कर्त्तव्य की ही प्ररेणा देते हैं।

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली

Dialog with Loved Ones….

Dear Loved One,

Divine Blessings,

This is the Shraavan month of Guru Poojan, Sadhana and Shiv Sadhana. This is the month of the divine elixir, the golden nectar. You ought to take new resolutions, and plan for new determinations. I bless you, and I am sure that you will certainly obtain success in all your endeavors.

I wish to focus today on a special topic. I sense a certain kind of gloom and tiredness on your face, when I see your faces during the Sadhana camps, or during our meetings. Your mind lacks enthusiasm. Your face reveals the pain within your mind. Your smile may disguise it, but your inner mind does have a certain degree of pain and suffering.

All of us need to understand the method to live a delightful life full of energy, enthusiasm and zeal. What is the best way to plan our life? What should be our goals? And how to we achieve those goals? I have tried to understand the relationship among the nature, thoughts and emotions of a person.  There should be a continuous resonance between his nature, thoughts and feelings. We can live a liberated life if our thoughts and feelings are synchronized with our nature.  This can certainly lead to an unprecedented increase in the efficiency of our work.

The three focal areas are – Responsibility, Duty and Right-Ownership

The way in which we tackle any kind of work is very important. We place ourselves under a huge pressure, if we take complete responsibility for our tasks. We start to feel completely responsible for the tasks and its results. This sense of responsibility increases our desire for the results of our actions and it enhances our feeling of ownership. These senses-feelings of –  this is mine, I have accomplished this, I have developed this; are various indicators of our ownership.

This feeling of responsibility towards everything is the primary cause of our sorrow. It will be great if we completely turn over this sense of responsibility. This sense of high responsibility almost kills us. You start to feel that – All this is occurring  due to myself, this all is my responsibility, this family and society cannot survive without me  etc. This is our basic mistake.

We should not escape away from our responsibilities, rather we should consider our responsibilities as our duties. We do not worry about the results when we perform anything with a sense of duty. We do not enslave ourselves to its results. We reduce our burden if we perform all our tasks with dutiful sense. Lord Krishna advises Arjuna in a beautiful Shloka in Geeta –

KaaryanyadoshopahataswabhaavaH Prachchhaami Tvaam DharmasammudhachetaaH |

YachchheyaH Syaachikshintam brahi Tanme ShishyasteSham Shaadhi Maam Tvaam Prapannama ||

Meaning

O Arjun, you should remove your confusion. On one hand, you consider yourself as being responsible for this war while on the other hand you also wish to earn this right to victory through responsibility. You desire to take responsibility for this entire war. This responsibility has instilled a fear of failure or success within you. Will I obtain any joy after killing so many? O Arjun, you are getting afraid of the failure. This responsibility is the sole cause of your confusion.

You should try to comprehend that Lord Krishna did not state – Who is responsible for all this? He also did not state – You are a capable warrior, and you bear the greatest responsibility to win victory for the Pandavas. Lord Krishna explained very clearly that – Remove all your confusions and continue to perform your duties. This confusion causes you to question – Why to perform this duty? Similar confusions also creep into your mind and this is the leading cause of all your sorrows and gloom.

The deeper you feel responsible for your actions, the higher will be your sense of ownership. You should not bear sole responsibility for your tasks. You should perform tasks with a dedicated sense of duty. The duty removes the heavy burden of responsibility. We owe a duty towards our society, our children and our family. We ourselves need to decide about our duties. We will not be able to successfully perform our tasks if we start bearing responsibilities for all our actions.

Focus only on your duties. Think whether prayers, service-to-Guru, Guru-Sewa is your responsibility or your duty? You can joyfully accomplish it if you think of it as your duty. Think thoroughly before making a decision, but do not become astray once you have made a decision. It is your duty to follow this path of your life. The responsibility comes with a very heavy burden.  Lead each day of your life with a sense of duty to escape this burden. Keep on performing all your tasks with a dutiful sense. Keep questioning yourself, if you have performed all tasks of today with a dutiful sense. Have you put all your efforts to accomplish these tasks? A person never tires of fulfilling his duties. Unnecessary burden of responsibility and extreme desire to obtain desired results, along with deep ownership can completely tire out anyone.

Perform your daily prayer also with a sense of duty.

You should consider it as your duty to perform the Shakti Sadhana during Navraatri and Lakshmi Sadhana during Deepawali. Anything which your mind considers as a duty, should be completely and successfully performed.

God has a very simple principle. Lord Krishna states that –

 

Karmanyevaadhikaaraste Maa Faleshu Kadaachana ….

Yogastha Kuru Karmaani Sangan Tyavatvaa Dhanannjaya …

 

Each step of this life is full of duties. This life is not a burden of responsibilities. Do not consider yourself responsible for each failure. Continue to perform your duties. Guru and God, Shakti and Shiva, Rama and Krishna, your beloved deity, all are with you at all times. They keep encouraging you to perform your duties.

 

Cordially yours….

Nand Kishore Shrimali

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