Dialog with Loved ones – April 2019

अपनों से अपनी बात…

 

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

आप सब मेरे शिष्य हो, मैं आपको आत्मन कहकर संबोधित करता हूं क्योंकि एक दूसरे में हमारी आत्मा बसती है और यह सिर्फ दो मित्रों के बीच होता है। यह मित्र सम्बन्ध संसार का सबसे महान् प्रेम भरा आनन्द प्रदायक सम्बन्ध है। जिसकी कोई तुलना नहीं हो सकती है। ना सिर्फ हमें मुश्किल परिस्थितियों में बल अपने मित्रों से मिलता है, बल्कि मित्र की हमारे जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है, जो कालचक्र के प्रभाव से कभी मंद नहीं पड़ती। अपितु इसमें तो रस और गहरा-गहरा होता जाता है, अगर आपके पास वास्तव में मित्र रूपी धन है?

 

हां यह प्रश्‍न गहरा है और आज तुम सभी को सोचना है कि क्या तुम्हारे पास ऐसे पांच-दस लोग है जिन्हें तुम अपनी बात कह कर सुकून प्राप्त करते हो, जिनके साथ अपना दुःख-दर्द और खुशी शेयर कर सकते हो?

 

वर्तमान समय सोशल मीडिया का समय है जिसमें हमारी जान पहचान तो अनेकों, हजारों लोगों से होती है,  लेकिन वास्तविकता में दोस्त कम होते हैं? देखा जाए तो तुम्हारा सर्कल बड़ा होता जा रहा है और जान पहचान बढ़ती जा रही है लेकिन मित्र कम होते जा रहे हैं, ऐसा क्यों?

 

ऐसे में सोचने की जरूरत है कौन होता है आपका वास्तविक मित्र? मित्र वह जिसके साथ बैठकर हम अपने मन का द्वार पूरी तरह खोल देते हैं। न कोई दुराव, न कोई छिपाव, न पद का भेद और न सम्पत्ति का भेद। मित्र के संबंध में  शास्त्र कहते हैं –

 

मित्रं प्रीतिरसायनं नयनयोरानन्दनं चेतसः
पात्रं यत् सुखदुः खयोः सहभवेन् मित्रेण तद्दुर्लभम्।

 

नेत्रों को रस और चित्त को आनन्द देने वाले, अपने मित्र के सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझने वाले मित्र दुर्लभ होते जा रहे हैं।

 

जब से हम बड़े होते हैं, मित्रों के इर्द-गिर्द ही हमें खुशियों की प्राप्ति होती है। बचपन में हम अपने मित्रों के साथ खेलते हैं और बड़े होने पर नौकरी, व्यापार में और लोग भी मिलते है, जो हमारे नए मित्र बनते हैं। घर-परिवार में बच्चे भी बड़े होकर मित्र हो जाते हैं। पति-पत्नी आपस में मित्र ही तो हैं।

 

माना तो यह जाता है कि बचपन की दोस्ती सबसे अधिक प्रगाढ़ होती है, लेकिन सच्चाई यह है कि मित्र जिन्दगी के किसी भी मुकाम में मिल जाते है और जब मिल जाएं तो उनके साथ खुलकर अपने मन को शेयर करो। उनकी बात को सुनो, उन्हें सहयोग देने के लिये तत्पर रहो।

 

क्या सोपान हैं मित्रता के? कैसे कसा जाए मित्रता को कसौटी पर? क्या हर बार मित्रता की परीक्षा लेनी पड़ेगी? ऐसा तो संभव ही नहीं है।

 

‘मित्र बनाने की एक ही तरीका है कि जिसको मित्र बनाना है, उसके आप मित्र बन जाएं।’

 

मित्र वही है, जो हमें हमारे दोष बताने में भी नहीं झिझके। मित्र वही है जो हमारा समर्थन हर परिस्थिति में करता है लेकिन गलत स्थिति में वह हमसे प्रश्‍न भी करेगा। हमें आयना दिखाने में भी किसी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं करेगा। लेकिन जब मित्र ऐसा करता है, उस समय हमें अच्छा नहीं लगता है

 

मेरा ज़मीर बहुत है मुझे सज़ा के लिए
तू दोस्त है तो नसीहत तो ना दे सदा के लिए॥

जिसके पास मित्रता रूपी धन है, उसे इस जगत में किसी प्रकार की चिन्ता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि हर समय उसके मित्र उसे रक्षा, उसे बल प्रदान करने के लिये तत्पर रहते हैं।

 

तुम आज सोचो कि – तुम्हारे पास क्या यह संसार का सबसे बड़ा मित्रता रूपी धन है। काम तो सभी को करना है, सभी अपने प्रयत्नों से जीवन में कुछ न कुछ प्राप्त करते हैं? लेकिन जिसके पास में सच्चे मित्र नहीं होते हैं, वह व्यक्ति खुश नहीं रह पाएगा क्योंकि इस संसार में जहां पर सारे रिश्ते स्वार्थवश होते हैं, वहां सिर्फ मित्रता ही ऐसा रिश्ता है जिसमें कोई लेन-देन नहीं होता, यहां पर सिर्फ देना ही देना होता है और जब आपके जीवन में योग्य मित्र आ जाएं, जिनसे आपका मन मिल जाए तो आप उस ‘मित्र धन’ को बहुत संभाल कर रखना।

 

दोस्ती आम है लेकिन ऐ दोस्त
दोस्त मिलता है बड़ी मुश्किल से

इस जीवन में वास्तविक पूंजी मित्र ही है। कभी अपने मित्र पर अधिकार जमाने की कोशिश मत करना। जहां अधिकार होता है वहां प्रेम कम हो जाता है और जहां अधिकार का भाव नहीं है वहां विश्‍वास पनपता है। वह विश्‍वास और अधिक दृढ़ होता रहता है। एक मित्रता ही आपको मन से मुक्त करती है। सच तो यह है कि जैसे हमारे दोस्त होते हैं, वैसे हम खुद बन जाते हैं।

 

दोस्ती प्यार का एक समर्पित एहसास है जिससे अपने जीवन के बारे में हम कुछ भी साझा कर सकते हैं और हमेशा एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं और अगर ऐसा दोस्त कभी आपसे रूठ जाए उससे बेझिझक कहे –

 

आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं

स्वयं सोच कर देखो तुम्हारी जिन्दगी में अब तक हजारों लोग आए और हजारों लोग चले गये। कईयों के नाम भी तुम्हें याद नहीं होंगे लेकिन तुम्हें अपने मित्र का नाम, उसका चेहरा, उसकी बातें सदैव याद रहती है। जो तुम्हारे मित्र है, उस मित्र भाव की रक्षा करने के लिये बस तुम एक काम करो उनसे मिलो, फोन करो, अपना हालचाल बताओ और उनका हालचाल पूछ लो। मित्रता एक ऐसा पौधा है, जिसे बार-बार सींचना ही पड़ता है और उसे सींचने के लिये समय की आवश्यकता है, भाव की आवश्यकता है।

 

याद रखना मित्रता ही धन है, मित्रता ही सम्पत्ति है, मित्रता ही समृद्धि है, मित्रता ही बल है। मित्र बनाईये और मित्र बन जाएं।

 

हमारी दोस्ती सदा-सदा बलवती होती रहे… बहुत दिनों से मिलने नहीं आए हो आप अपने मित्र से…

 

तुम मुझे मिलने आ जाना….
नन्द किशोर श्रीमाली

 

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