Dialog with Loved ones – April 2018

अपनों से अपनी बात…

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

एक सुन्दर यात्री कथा है, गांव-गांव में बतायी जाती है। किसी गांव के बाहर एक यात्री, यात्रा के लिए निकला था। गांव से बाहर एक रास्ता जाता था जो जंगलों से गुजरता हुआ, कहीं दूर… बहुत दूर निकलता था। कहां, यह ग्राम वासियों को भी मालूम नहीं था। यात्री भी पहली बार निकला था, कुछ अचकचाया और घबराया हुआ था। थोड़ी दूर तो चल चुका था, पर उस पथ पर और आगे जाए या नहीं, इसी सोच-विचार में उलझा हुआ था। उसने देखा कि उसके बहुत आगे भी कोई यात्री चल रहा है और पीछे मुड़कर देखा तो पीछे भी एक-दो यात्री चलते दिखाई दिए। इतना तो स्पष्ट था कि रास्ता कहीं न कहीं ले जा रहा था, पर कहां? यह ज्ञात नहीं था अभी उसे।

 

पथिक ने सोचा कि पीछे वाले यात्री को तो शायद ज्ञात नहीं होगा कि – मार्ग कहां ले जाता है? पर आगे वाले यात्री को तो पता होना चाहिए – वह तो इस मार्ग पर चल रहा है और उसका अनुसरण करके मेरा रास्ता भी कुछ कट जाएगा।

 

इसी उधेड़बुन में यात्री उलझा हुआ था कि उसे खेतों में निकलकर पगडन्डी से एक वृद्ध आदमी आता दिखाई दिया। यात्री ने उसे देखते ही पूछा कि – ‘भाई! यह रास्ता किधर जाता है?’

 

वृद्ध ने मासूमियत से जवाब दिया,‘‘यह रास्ता यही रहता है। वह कही नहीं आता जाता है। हां, इस पर से लोग आते जाते हैं।’’

 

जवाब गूढ़ था, पर यात्री झुंझला गया। उसे पहेलियों में बात नहीं करनी थी। वह तो बस इतना जानना चाहता था कि वह रास्ता किधर जाता है? क्या उसपर चलकर वह अपने गन्तव्य तक पहुंचेगा या नहीं? इसलिए उसने पलट-प्रश्‍न किया, ‘‘इस रास्ते पर चलकर लोग अपने गन्तव्यों को जा रहे हैं, तो अवश्य रास्ता कहीं तो जाता होगा। या, तो आप बताना नहीं चाहते हैं, या फिर आपको ज्ञात नहीं है।’’

 

वृद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया,‘‘अभी तुमने बोला कि कई लोग इस मार्ग पर जा रहे हैं और फिर अपने-अपने गन्तव्य लक्ष्य की ओर इसी रास्ते से पहुंच रहे हैं।’’

 

अब यदि रास्ता भी चलता तो वह चलता-चलता इन यात्रियों के साथ विलीन हो जाता, जैसे यात्री विलिन हो गये रास्ता यहीं का यहीं स्थाई है।

 

नये यात्री को बात समझ में आ गई, वृद्ध ने बात बड़ी सटीक की है कि यात्री आते जाते है, मार्ग वहीं रहता है, मुझे इस पर विचार करना है कि क्या मैं इस मार्ग पर चलकर अपने गन्तव्य लक्ष्य को प्राप्त कर लूंगा?
सोचते-सोचते वहीं रूक गया, थोड़ा पहचान तो गया था कि यह कोई साधारण किस्म के वृद्ध नहीं हैं, कोई ज्ञानी व्यक्ति है।

 

यात्री बोला मैं थक गया हूं, क्या कुछ घंटे यहां विश्राम कर सकता हूं, वृद्ध ने कहा जरूर थोड़ी दूरी पर मेरी कुटिया हैं चलो विश्राम करो।
शाम होने पर वृद्ध व्यक्ति ने भोजन बनाया, दाल और रोटी और यात्री से कहा खाओ। फिर उन्होंने यात्री से कहा कि विश्राम करो। यात्री उत्सुक था। उसे जानना था कि क्या वह रास्ता उसे उसके गन्तव्य तक पहुंचाएगा कि नहीं और उसके अर्न्तमन में यह विश्‍वास था कि उस प्रश्‍न का उत्तर उसे वृद्ध ही दे पाएंगे।

 

एक बार उसने फिर जिद्द की और वृद्ध से पूछा, ‘कृपया बता दीजिए कि मैं इस रास्ते से अपने गन्तव्य तक पहुंचुगा या नहीं?’
वृद्ध ने उत्तर नहीं दिया, वरन् प्रश्‍न किया,‘पहले तुम यह बताओ कि तुम्हारा गन्तव्य क्या है? इसे तुम्हारे लिए किसने तय किया है? यदि तुम यह यात्रा किसी और के कहने पर कर रहे हो, तब तुम अपने गन्तव्य तक कभी नहीं पहुंचोगे। ये रास्ता, या अन्य कोई रास्ता तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक नहीं ले जा पायेगा।’’ यदि तुमने स्वयं चुना है तो बात बन सकती है।

 

तुम बार-बार गन्तव्य की बात कर रहे हो, शायद तुम जानना चाहते हो कि क्या तुम्हारा लक्ष्य पूरा होगा? गौर से एक बात समझो, ये जो तुम यात्रा के लिए निकले हो, यही जीवन की सच्चाई है – हर कदम जो तुम बेझिझक आगे बढ़ते हो, यही जीवन का सच है। लक्ष्य तो एक लुभावना तारा है। यदि तुम अपने कार्य से प्रेम करते हो तो तुम्हारी यात्रा पूर्ण हो जाएगी।

 

यात्री ने पूछा – मार्ग में बड़े-बड़े विचित्र लोग मिलते है, उनके साथ कैसा व्यवहार करूं?

 

– जो भाव तेरे मन में आता है उसी अनुसार व्यवहार कर, पर कटु मत बनना, तुम्हारा मन सदैव तुमसे सच बोलेगा, बुद्धि तो भ्रमित करेगी, अवसर अनुसार चालाकी बरतना सिखायेगी।
यात्री ने पूछा – मार्ग में बाधाएं आएं तो मैं क्या करूं?
– कार्य से प्रेम है तो बाधाएं, छोटे-छोटे अवरोध लगेंगे फिर तुम्हें बाधाएं बड़ी लगे तो लौट आना, जब वापस कार्य के प्रति प्रेम उत्पन्न हो तो फिर यात्रा करना।

 

यात्री – यात्रा में किस-किस पर विश्‍वास करूं?
– अपने आप पर विश्‍वास कर, जब तेरे अन्दर अविश्‍वास आयेगा तो समझ लेना दूसरा अविश्‍वासी है।
– मेरा लक्ष्य पूरा हो जाये तो क्या मैं और नये लक्ष्य बनाऊं?
– प्रत्येक यात्रा धन प्राप्ति, कार्य सिद्धि और शान्ति के लिए होती है, यदि तुम्हें तीनों मिल जाये तो फिर जान लो कि आत्म शान्ति ही तुम्हारा परम लक्ष्य है।

 

यात्री ने वृद्ध को प्रणाम किया और जाने लगा, वृद्ध ने कहा – एक बात याद रखना, यात्रा कार्य में मन लगे, और भीतर-भीतर से उत्साह आता रहे तब तक ही यात्रा करना, उसके आगे की यात्रा तृष्णा है, मृग मरीचिका है उसका कोई पार नहीं है।

 

एक पथिक को अनजाने में गुरु मिल गया, उस गुरु ने चार बातों में
जीवन के सारे सूत्र समझा दिये।

 

तुम्हारी इस जीवन यात्रा, अकेला चलो रे के भाव पर चलना चाहते हो, यह तो बड़ा मुश्किल है, सहयोग लेना भी पड़ेगा, सहयोग देना भी पड़ेगा, विश्‍वास देना भी पड़ेगा और विश्‍वास मिल भी सकता है। इसी को संसारी भाषा में जिम्मेदारी कर्तव्य कहा गया है इस संसार में अविरल चलते हुए तुम्हें ही अपने भीतर के तीसरे नेत्र को जाग्रत करना पड़ेगा तुम अपनी आन्तरिक शक्ति से यह सब जान सकते हो पहचान सकते हो, इसे ही चक्र जागरण कहा गया है जिससे अपने-पराये का ज्ञान हो, जरूरी नहीं कि जो निकट है वह अपना है और जो दूर है वह पराया हैं।

 

तीन सूत्र तुमने सीखे हैं जिम्मेदारियां, कर्त्तव्य और एडजस्टमेन्ट और इन तीन नावों पर उछल-कूद कर तुम अपनी यात्रा कर रहे हो। एडजस्टमेन्ट याद रखो रबड़ की तरह होता है, जितना तुम स्वयं को खींचते हो, एडजस्ट करने के लिए, उतना अधिक तुम्हारा मन, तुम्हारी आत्मा भी खिंचती है। धीरे-धीरे कर्त्तव्य तो निभ जाते हैं, जिम्मेदारियां भी पूरी हो जाती हैं, पर मन की ग्रंथियां तो सूख जाती हैं। उनमें पतझड़ आ जाता है और यही कारण है कि तुम्हारा स्वभाव खो जाता है।

 

याद करो बचपन में तुम खेलते कूदते हो, तुम्हें अच्छी नींद आती थी, तुम बहुत हंसते भी थे, अब छोटी-छोटी बातों पर तुम खुश नहीं होते हो।

 

शायद तुम्हें लगता है, अब परिपक्व हो गये। मुझे लगता है परिपक्व नहीं ज्यादा ही समझदार हो गये। हर बातचीत को हर कार्य को तोलने-मोलने लगे हो, गुणा भाग करने लगे हो, शायद इसी से यह तुम्हारा स्वाभाविक स्वभाव शुष्क बन गया है।

 

याद है वृद्ध ने क्या कहा था, शान्ति ही परम लक्ष्य है…
तुम्हारी यात्रा का लक्ष्य भी शान्ति है…
ज्ञान और शान्ति एक रूप ही है…
जहां ज्ञान है वहां शान्ति है और जहां शान्ति है वहां ज्ञान है।

 

तुम बुद्धिमान की शरण में नहीं ज्ञान की शरण में जाओ, गुरु को तुमने ज्ञान का स्वरूप माना है और याद रखना जहां ज्ञान आता है वहां अवस्था आयु ठहर जाती है वहां केवल मन का आनन्द पुष्प खिलता है मन से निर्भर अमृत प्रवाह होने लगता है।

 

तुम्हारा समर्पण आनन्द कहीं ओर से प्राप्ति करने हेतु है ही नहीं, तुम्हारा समर्पण तो अपने भीतर से अमृत उद्भव के लिये है।
तुम्हारी पूजा साधना तपस्या सब उसी के लिये है, जो गुरु प्रदान करें उस प्रेम पात्र को अपने हृदय में उतार दो, गुरु जो आवश्यक समझेगें, उस शक्तिपात को निसंकोच पूरे मान से अपने मन में ग्रहण कर लें।
गुरु तुम्हारे लिये ही है, तुम गुरु के लिये हो।
बाकी सब तो…

 

नन्दकिशोर श्रीमाली
निखिल जन्मोत्सव पर्व 21 अप्रैल को आ रहा है, यह तुम्हारा ही जन्म पर्व है, गुरु की सत्ता तुमसे भिन्न नहीं है। पूरे प्रेम के साथ गुरु ध्यान, साधना सम्पन्न करना अपनी जीवन यात्रा हेतु संकल्प अवश्य लेना। संकल्प तुम्हारी शक्ति बनकर तुम्हें सदैव शुभ यात्रा मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करेंगे…

Dialog with Loved Ones…

Dear Loved one,

Divine Blessings,

I will start by narrating an adorable traveler tale, popular around the rural areas. One traveler had started for a journey from his village. A path from the village led to a distant, very distant … location though thick forests. None of the villagers knew its destination. This was the first time for the traveler. He started to walk, a little hesitant and scared. He had traveled a certain distance, but was not sure whether to proceed further on the path. He observed that many travelers were travelling on the same path ahead of him, and he also noticed that couple of travelers were following him behind on this path. It was obvious that the path was going somewhere, but where actually? He did not know this yet.

The traveler thought that the travelers following him might probably not know about the final destination of this path. However, the ones proceeding ahead, should certainly know – They have been travelling on this path for much more time, and I should be able to benefit from their experience.

While unraveling these entangled muddled thoughts in his mind, the traveler noticed an old man approaching him from a village trail. The traveler instantly questioned him – “Brother! Where does this path go to? ”

The elderly person replied innocently, “This path stays stationary. It does not go anywhere. However, people do use this path to travel.”

This was an enigmatic response, but it enraged the traveler. He  did not want to talk in riddles. He just wanted to know where that path go to? Will he be able to reach his destination by treading this path? So he counter-questioned – “Many people  are reaching their destination by travelling on this path, so it should certainly go somewhere. Either you do not want to tell me, or you yourself do not know. ”

The elderly person replied, “You just stated that many people are going on this path and are reaching  towards their destination through this path.”

Now if the path had also traveled with them, then the path would have also vanished from the sight, like these other travelers. However, this path has been stationary right here, at the same place all this time.

Now the new traveler understood the specific point made by the elderly person.  The travelers move over the path, however the path remains stationary. Now, I have to consider if I will be able to reach my destination by treading this path.

Suddenly he stopped his train of thoughts. He had now probably realized that the elderly person seemed to be  a  highly wise man, not a common country imbecile.

The traveler asked –  I’ve gotten tired. Is there any place nearby to rest for a few hours? The elderly replied that his cottage was situated a little distance away, and that the traveler could rest there.

In the evening, the old man cooked dinner and invited the traveler to share the meal. Then he advised the traveler to rest. The travel was eagerly excited and wanted to ascertain if the path would him to his destination. He had now realized that only the elderly person will be able to solve this quandary for him.

He insisted again and made a repeated request to the elderly person, “Please  tell me whether I will reach my destination through this path or not?’

The elderly did not give a direct answer. Rather he questioned, “First,  tell me what is your destination? Who has decided this destination for you? If you are doing this journey on guidance of someone else, then you will never be able to reach your destination. Neither this nor any other path will be able to take you to your destination. You will succeed only if you alone has chosen the destination by yourself.”

You are repeatedly talking about the destination, maybe you want to know whether you will be able to attain your goals. Try to understand carefully, this journey which have set out for, is the real truth of life – Every step that you take, is the basic truth of life. Goal is just a tempting inspiration. You will be able to complete your journey, if you love your work.

The traveler next asked – One meets many different types of strangers on the way. How should I deal with them?

  • Act according to the instincts which you get in your mind. However do not display bitter behavior. Your inner mind will always tell you the truth. Your intellect will  confuse you and it will prompt you to take advantages of the situations.

The traveler further asked – What should I do when I encounter obstacles on the way?

  • If you love your work, then obstacles will not trouble you at all. Step back if the obstacles seem overwhelming. Restart your journey, when you again develop love towards your work.

Traveler – Whom to trust during this journey?

  • Believe in yourself. Whenever you feel disbelief, realize that the second person is not worth trusting.

Traveler – Should I setup new goals, if my current goals get completed?

  • The purpose of every journey is to acquire wealth, accomplish tasks and attain peace. When you realize all three, then you should understand that Divine peace is your  ultimate goal.

The traveler thanked the elderly and proceeded to leave. The elderly person reminded him – Continue to travel only till you enjoy completing your work, and get passionate excitement from within yourself. The journey beyond that point is a mere craving for temptations, it does not have any end.

The traveler had unwittingly found a Guru, and that Guru had explained all rules of life to him in four simple points.

It will be very difficult if you wish to walk through this journey of life all alone by yourself. You will have to cooperate with others, and in-turn get cooperation from others. You will have to learn to trust others, apart from earning their trust. This is generally termed as the duty-responsibility in the worldly language. You will have to awaken the third eye from within your own self, while travelling uninterrupted in this life. You can comprehend and intuit from your own inner power, this process is the one generally called as Chakra-activation. It enables you to recognize the difference between your own and others. One who is located near you doesn’t necessarily have to be close to you, and similarly, the one who is located remotely from you doesn’t necessarily have to be distant from you.

You have learnt three formula of life – responsibilities, duties and adjustments; and you have been leading your life by balancing this trinity. Adjustment is elastic like rubber, as you pull yourself to adjust, your mind and soul also pushes away.  The duties get performed gradually, and the responsibilities also get completed eventually. However, these processes dry up the glands of the mind. Their activity diminishes and this causes you to stray away from your true nature.

Try to remember, how during your childhood days, you used to play, sleep soundly and laughed loudly. Now these small things don’t make you happy.

Maybe you feel that you have reached a mature stage now. I do not think so. You have rather become more intelligent.  You have started to deeply analyze everything, every conversation, every experience. Probably, this has made your nature more colder.

Remember what the elderly person had said, Peace is the ultimate goal …

The goal of your life journey is also to attain peace …

Knowledge and peace are similar to each other …

Where there is knowledge, there is peace and where there is peace, there is knowledge.

You should not seek the guidance of the intellect, rather you should try to go under the shade of wisdom-knowledge.  Guru is the personification of that knowledge-wisdom. The presence of knowledge slows down the physical ageing. It leads to blooming of the eternal lotus of joy within the mind, it sprouts the spring of divine elixir within the mind.

The joy of dedication cannot be obtained from anywhere else, you can obtain it only from the divine nectar within your own self.

All of your Sadhanas, your penance are meant to achieve the same goal, to lovingly imbibe whatever Guru grants you. Guru will grant whatever your need, you should respectfully assimilate the Shaktipaat from Guru into your own mind.

Guru is for you, you are for the Guru.

Everything else …

 

Nand Kishore  Shrimali

Nikhil Janmotsav (Birthday) festival is on 21st April. It is your own birthday, you are not distinct from Gurudev. You should meditate and perform Sadhana with full divine love. Determine the course of your life. This power of determination will motivate you to always walk on correct chaste path in this journey of life …

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