Dialog with Loved Ones – April 2017

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

अभी महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर मुझे महाकाल की नगरी उज्जैन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह मेरे जीवन का परम सौभाग्य है कि मुझे बार-बार उज्जैन जाने का अवसर मिलता है। मैं अपने विश्‍वास के आधार पर श्रद्धा के पुंज महाकाल के पास पहुंच जाता हूं। जीवन का प्रथम और अन्तिम सत्य, जीवन का पूर्ण सत्य महाकाल ही है, शिव ही है…

 

भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्‍वास रूपिणौ।
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।

 

शिव श्रद्धा का मूल भाव है, स्थायी भाव है जो सदैव और सदैव अटल है और प्रकृति, शक्ति, विश्‍वास रूप में शिव से श्रद्धा से मिलन करती है। यही शिव का स्वरूप है। शिव परम इष्ट है, पारमेष्ठि है, हमारे जीवन में निरन्तर और निरन्तर भावों का एक प्रवाह है जिसे विश्‍वास कह सकते है और जब यह विश्‍वास श्रद्धा से मिल जाता है तो यह पूर्ण हो जाता है, पूर्णमदं पूर्णमिदंः हो जाता है। तब हमें पहली बार यह आत्मज्ञान होता है कि हम पूर्ण से उत्पन्न हुए है और पूर्णता में ही हमारा मिलन होगा।

 

पूर्णता के इस भाव के लिये शक्ति चाहिए, यह शक्ति बड़ी ही प्रबल विस्फोटकारी, चमत्कारी वस्तु है। इसे कुछ शब्दों में व्याख्या करना मुश्किल है मेरा विचार है कि शक्ति का मूल भाव, शक्ति की उत्पत्ति और शक्ति का प्रवाह किसी एक शब्द में कहा जा सकता है तो वह शब्द है, ‘विश्‍वास।’ जहां विश्‍वास है, वहां शक्ति अपने आप जाग्रत हो जाती है। इस विश्‍वास के लिये क्या करें? किस पर विश्‍वास करें? किस पर अविश्‍वास करें? इस प्रश्‍न पर आप बहुत उलझ जाते है और अपने सरल जीवन को मुश्किल बना देते है। किसी दूसरे पर विश्‍वास करना, घर परिवार पर विश्‍वास करना, जाति, समाज, देश पर विश्‍वास करना, बहुत बड़ी-बड़ी बातें है। सबसे मूल बात है – अपने आप पर विश्‍वास करना। जब आप अपने आप पर विश्‍वास करना प्रारम्भ करते है तो आपके ही भीतर एक प्रेम भाव उमड़ पड़ता है और तब अपने ही ध्यान में मग्न हो जाते है। अपने ही आन्तरिक संसार में मग्न हो जाते है और इस विश्‍वास को बार-बार प्रबल तो अपने विचारों के द्वारा, भावों के द्वारा बनाना ही पड़ेगा। इसके अलावा तुम्हारे पास कोई दूसरा मार्ग भी नहीं है। विश्‍वास तो बहते हुए जल की भांति है यदि एक बार भी इसकी धार दूसरी दिशा में बह गई तो वह उस दिशा में ही बह जाती है। इसलिये विश्‍वास को बार-बार प्रबल धार के रूप में गति में रखना पड़ता है। शक्ति प्राप्ति का सीधा-सीधा अर्थ यही है कि अपने विश्‍वास को संजोकर रखों।

 

एक बात मैं आपको कह दूं, जिस प्रकार शिव है, उसी प्रकार आपकी श्रद्धा भी अटल है। यह श्रद्धा कभी हिलती नहीं है। अविचल है, आपकी श्रद्धा किसी देव में हो सकती है, किसी स्थान में हो सकती है, किसी व्यक्ति में हो सकती है। लेकिन श्रद्धा होती अवश्य है। इसके लिये प्रबल हिम्मत के साथ, शक्ति के साथ कार्य करना पड़ेगा और वह है – विश्‍वास। इस बहते भाव को नियन्त्रित करना पड़ेगा। श्रद्धा स्थायी है और इस श्रद्धा को तुम्हें विश्‍वास का भाव निरन्तर देना है। श्रद्धा एक यज्ञ कुण्ड है, जिसमें विश्‍वास की आहुति निरन्तर और निरन्तर देनी है जिससे जीवन की ज्योति निरन्तर और निरन्तर प्रबल और ऊर्ध्वगामी हो सके।

 

अब तुम बताओं कि – विश्‍वास के अलावा तुम्हारे पास और क्या चारा है, उपाय है? यदि तुम बार-बार अविश्‍वास ही करते रहोगे तो इस संसार में चल नहीं सकोगे। यह संसार अविश्‍वास का सागर नहीं है, इस जीवन सागर में विश्‍वास रूपी नैया से तुम चल सकते हो। तुम्हारी जीवन नैया चल सकती है। रोज तुम्हें इस संसार में नये विश्‍वास के साथ उठ खड़ा होना पड़ेगा, थोड़ा मुश्किल है लेकिन जीवन को पूर्ण ऊर्जा के साथ जीने के लिये विश्‍वास के अलावा कोई दूसरा मार्ग भी तो नहीं है।

 

तुम परेशान क्यों हो? तुम अपने अविश्‍वास के कारण परेशान हो। कभी कभार एक दुःखद घटना हो जाती है, कभी-कभी एक धोखा हो जाता है, कभी तुम्हारे साथ छल हो जाता है और वह तुम्हें अविश्‍वास दे देता है। अब तुम उस अविश्‍वास को अपने हाथों में संजोयें हुए अपनी जीवन यात्रा आनन्द से चलाना चाहते हो तो कैसे चल सकती है? हर रोज नया विश्‍वास करना पड़ेगा, क्योंकि विश्‍वास ही तुम्हें उस मार्ग पर ले जायेगा जिसे शांति का मार्ग कहा गया है। जब तुम अपने विश्‍वास के साथ घनिष्ट भाव जोड़ देते हो तो वह शांति प्रदान करता है और जब अविश्‍वास के साथ घनिष्ट भाव जोड़ देते हो तो वह अशांति के मार्ग पर ले जाता है।

 

तुम्हारे भीतर इतना तनाव क्यों है? क्योंकि तुम्हें अब तक अविश्‍वास की कला ही सिखाई गई है। विश्‍वास की कला किसी ने सिखाई नहीं, जो भी आया अविश्‍वास के दो चार कांटें तुम्हारे हाथ में देकर चला गया और यह जीवन लहूलुहान हो गया। शायद इसीलिये तुम्हारे जीवन में एक तनाव है, थकान है और उस तनाव को झेलते-झेलते बड़े ही थक गये हो। एक मशीन की भांति जीवन बना लिया है। रोज सुबह उठना, नाश्ता करना, अखबार पढ़ना, जल्दी-जल्दी भोजन करना, नौकरी-व्यापार पर जाना, वही दोस्त, वही राजनीति की बातें, वही आपस का मन-मुटाव और थक हार कर घर आ जाना। भोजन करके टी.वी. पर चक-चक, अनावश्यक बहस देखना और फिर सोने का प्रयत्न करना। नींद आती नहीं, तनाव बना रहता है और फिर निढाल होकर सो जाते हो। फिर दूसरे दिन यही रूटीन। यह सब इसलिये है कि अविश्‍वास तुम्हारे भीतर प्रवेश कर गया है। ऐसा तो ईश्‍वर ने जीवन नहीं दिया है। हम बच्चे की तरह उत्साहित क्यों नहीं हो सकते? बच्चों की तरह प्रसन्नचित्त क्यों नहीं हो सकते। छोटी-छोटी बात में हंस क्यों नहीं सकते है क्योंकि हम सक्रिय नहीं है… शिष्य नहीं है… एक छात्र नहीं है…। हजार बातें है – कुछ गाओं, कुछ बजाओं, नृत्य करो, योग करो, नई भाषा सीखों, लेख-कथा लिखो, भाषण लिखो, खाना पकाओं, चित्रकारी करो, कोई नई टैक्नीक सीखों, कुछ आध्यात्मिक सीखों, फोटोग्राफी सीखो, कोई सांस्कृतिक गतिविधि करो, भ्रमण करो, बाग-बगीचें में जाओं, कभी दूसरे शहर में जाओं। हजारों ऐसी क्रियाएं है जो तुम कर सकते हो। बस सक्रिय होकर सीखने का भाव अपने भीतर उत्पन्न करते रहो। इसके लिये अविश्‍वास और मानसिक आलस को हटाना ही पड़ेगा। बड़े-बड़े काम तुम्हारी जिन्दगी में खुशी देंगे या नहीं यह तो निश्‍चित नहीं है लेकिन ऐसे छोटे-छोटे हजारों काम तुम्हारे जीवन में नित्य खुशी प्रदान कर सकते है। नया सीखने पर नया उत्साह अवश्य आयेगा। तुम्हारी ही शक्ति जाग्रत होगी। सबसे बड़ी बात है कि तुम अपने आपसे प्रेम करने लगोगे।

 

तुम गुरु के साथ इसीलिये जुड़े हो, तुम अपने बंधनों से मुक्ति प्राप्त करना चाहते हो और इसके लिये गुरु से बड़ा ही प्रेम भरा बंधन जोड़ना पड़ेगा। विश्‍वास के साथ जोड़ना पड़ेगा और विश्‍वास तुम्हारे भीतर है। गुरु तो मुक्ति का द्वार है, तुम मुक्त होना चाहते हो, उन्मुक्त होना चाहते हो तो अपने दोनों हाथ उठा कर इस सृष्टि का, इस संसार का, शिव का स्वागत करो। अपने दोनों हाथ उठाओं और उस सद्गुरु को, उस ईश्‍वर को प्रणाम करो जिसने तुम्हें यह संसार दिया है, यह जन्म दिया है। धन्य है वह ईश्‍वर, धन्य है वह गुरु और धन्य हो तुम जो अपने आपको उत्साह से परिपूर्ण करते हो।

 

आओं निखिल जन्मोत्सव को पूरे उत्साह के साथ मनाएं, हमारी श्रद्धा के आधार सद्गुरु के श्रीचरणों में अपने विश्‍वास के भाव अर्पण करें और अपने आप को समर्पित कर दे। समर्पण में सुख है, समर्पण में मुक्ति है।

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with Loved ones…

Dear loved one,

Divine Blessings,

 

I got an opportunity to visit Ujjain, the city of Mahakaal on the auspicious occasion of  Mahashivratri. It is my good fortune that I get multiple opportunities to visit Ujjain. My faith drives me to reach out to the Mahakaal, the pinnacle of trust. The first and the final truth of life, the supreme truth of life is the Mahakaal, the Lord Shiva …

 

Bhavaanishankarou Vande Shraddhaa Vishwaasa Rupinou |

Vande Bodhamayam Nityam Gurum Shankararupinam |

 

Shiva is the founding expression of faith, the permanent feeling which is always constant. The mother nature merges with Shiva with faith in the form of power and belief. This is the form of Lord Shiva. Shiva is the highest deity, the ultimate, He is the continual continuous flow of expressions in our life which can be termed as trust. It attains totality when this trust merges with the faith, and we reach the state of Poornamidam PoornamidaH. Then we realize for the first time, that we have originated from the Totality, and that we will merge with the Totality in the end.

The strength of Power is required to achieve this perfection, this power is a very explosive, miraculous entity. It is difficult to explain it in few limited words. I feel that if we were to choose one single word to describe the basic foundation, origin and the flow of this power, then that word is “Trust”. The power awakens itself, wherever trust is present. What do we do to achieve this trust? Whom should we trust? Whom should we stop trusting in? You get highly confused with these questions, and this brings difficulties within your simple life. Believing in others, believing in your family, belief in your caste, society, country etc.; all of these are very spectacular beliefs. The most basic topic is – believing in your own self. When you start believing in yourself, a love feeling for the self originates within you and you get immersed into your own thoughts. You enter your own inner world, and you will have to strengthen this belief with your own thoughts and emotions. There is no other way. The trust is similar to a flowing stream of water, a minor change in direction gets it to flow in that particular direction. Therefore the trust has to be constantly kept in a motion through a strong torrent. The basic process to realize power is to maintain your own trust and belief.

Let me tell you something, your faith is as firm as Lord Shiva. This faith is unshakeable. Your faith might be in a particular divine deity, or it could be in a particular place or person. It is firm, unwavering and unassailable. The faith is definitely present. You need to work with a strong courage and power, with definite trust. This flowing feeling will need to be controlled. The faith is constant permanent and you need to feed trust into this faith. Faith is like a sacrificial Yagya fire, which continuously requires multiple offerings of trust, to continually strengthen and uplift the light of life.

Now you tell me, what other option do you have in place of the belief. You will not be able to lead the life if you continue to disbelieve repeatedly. This world is not an ocean of distrust, you can sail this sea of life only in the boat of trust. It is possible to lead your life. You need to get up daily with a new feeling of trust, it is a little bit difficult, but then you do not have any other method to lead your life with full energy and power.

Why are you upset? You are upset because of your disbelief. Sometimes a tragedy happens, sometimes you get cheated, sometimes someone deceives you, and all this gives you distrust. Now, how is it possible to bring joy into your life if you continue to carefully carry the distrust-disbelief in your hands. You need to develop a new set of trust daily, because only trust-belief can lead you on the path of supreme peace. Becoming intimate with trust grants you peace while adding intimacy to distrust gives you unrest.

Why is there so much stress inside you? Because you have been taught only the art of distrust till now. Nobody has taught you the skill of trust, everyone has given you only thorns of disbelief till now, and this has shaken your life. Probably this has brought multiple tensions and fatigue into your life, and you have gotten tired of handling these tensions and worries. You life has become a machine. You get up daily in the morning, eat breakfast, read newspaper, have food, goto your job-business, meet the same friends, discuss about same politics, face same tensions-worries and return home fully tired. After dinner, watch the same meaningless unnecessary debate on tv and then try to get into sleep. You are not able sleep easily due to tensions in the mind, and then tiredness leads you to slumber. The same routine gets repeated next day. The cause of all this is the entry of distrust into your mind. God did not grant you life to live like this. Why cannot we be excited like a child? Why cannot we be happy like a child? We cannot laugh at small trifles since we are not active … not a disciple … not a student …. There are thousands of things to do – sing some song, play some music, dance a little, do yoga, learn a new language, write an article, write a speech, cook food, make paintings, learn a new technique, take some spiritual lessons, learn photography, do some cultural activity, visit some-place, go to a garden, visit another city. There are thousands of such activities that you can do. Just be proactive and keep learning. You will have to remove the disbelief and mental laziness to achieve this. It is not certain that big tasks will provide happiness into your life, but such small and tiny thousands of tasks can definitely bring a constant happiness into your life. New enthusiasm will come with new learnings. Your inner power will become active. The biggest gain is that you will start loving yourself.

You are connected to the Guru to obtain salvation from your bonds and you will ought to set-up a big loving bond with your Guru. You will need to do this with full trust, which is within your own self. Guru is the gate of salvation, if you want to be liberated, if you want to be free, then welcome this creation, this universe, this Shiva with both hands. Raise your both hands and salute the SadGuru, the Almighty who gave you this life. He granted you this birth. Blessed is the God, blessed is the Guru master and blessed are you who fill your self with excitement and enthusiasm.

Come, let us celebrate the Nikhil Janmotsava with full enthusiasm, offer our full faith and trust into the holy feet of SadGuru, and dedicate-surrender ourselves. Surrender causes happiness, surrender leads to liberation.

 

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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