अपनों से अपनी बात – Dec 2015

अपनों से अपनी बात…

 

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,
रविन्द्रनाथ टैगोर की एक कविता मुझे बहुत पसंद आती है, उनकी वह कविता है –

 

तेरी आवाज़ पर कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे
यदि कोई भी ना बोले ओरे ओ रे ओ अभागे कोई भी ना बोले
यदि सभी मुख मोड़ रहे सब डरा करें
तब डरे बिना ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे
ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे
तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
यदि लौट सब चले ओरे ओ रे ओ अभागे लौट सब चले
यदि रात गहरी चलती कोई गौर ना करे
तब पथ के कांटे ओ तू लहू लोहित चरणतल चल अकेला रे
यदि दिया ना जले ओरे ओ रे ओ अभागे दिया ना जले
यदि बदरी आंधी रात में द्वार बंद सब करे
तब वज्र शिखा से तू ह्रदय पंजर जला और जल अकेला रे
ओ तू हृदय पंजर जला और जल अकेला रे
ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

 

यह भाव अकेले चलने का भाव निराशा का भाव नहीं है। इस भाव में बहुत बड़ी आशा और बहुत बड़ा विचार है। यदि कोई तुम्हारा साथ नहीं देगा तो क्या तुम निराश-हताश होकर बैठ जाओगे? यदि कोई मुसीबत आ गई, बहुत बड़ी परेशानी आ गई तो क्या तुम हार मानकर बैठ जाओगे? यदि कोई तुम्हें सहयोग नहीं देगा तो क्या तुम रुक जाओगे? अपने हृदय के भावों को, मन के भावों को जगाकर चलने वाले को ही जीवन पथ का श्रेष्ठतम् यात्री कहा गया है। चलते तो सब हैं, लेकिन जो अकेले चलने की हिम्मत रखता है और जिसके मन में यह दृढ़ भाव रहता है कि मेरा पथ कितना भी निर्गम हो, निर्जन हो, कठिन हो मुझे चलना है। अपने विचारों की, अपने भावों की रक्षा कौन करेगा? यह कार्य तुम स्वयं अकेले ही कर सकते हो। जो अकेले चलने की हिम्मत रखते हैं, जिनके मन में दृढ़ता का भाव रहता है उन्हें संगी-साथी, सहयोगी, मित्र साथ चलने वाले मिल ही जाते हैं।

 

हम तो चले थे अकेले और कारवां बढ़ता गया…

 

तुम्हारे मन के दो भाग हैं और दोनों ही साथ-साथ चलते हैं और उन दोनों के केन्द्र बिन्दु आप हैं। इन दो भावों के साथ सबकी जिन्दगी चलती है। एक भाव है – स्मृति और दूसरा भाव है – आशा।
यदि तुम अपनी स्मृति अर्थात् जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ, जो कुछ तुमने किया, जो-जो बातें तुम्हारे अड़ोस-पड़ोस, मित्र-बंधु, यार-दोस्त-दुश्मनों ने, माता-पिता, रिश्तेदारों ने जो-जो सिखाया उसे तुमने अपने हृदय के स्मृति कोष में डाल दिया, इस प्रकार तुम्हारे मन में यादों का, अनुभव का, स्मृति का बहुत बड़ा भण्डार बनता गया और वह भण्डार भरता ही चला गया।

 

अब तुम उस स्मृति के सहारे आगे बढ़ना चाहते हो? जबकि स्मृति बड़ा ही नटखट और विचित्र भाव है कभी तुम्हें रुलाती है, कभी तुम्हें हंसाती है। स्मृति में मधुरता और कटुता दोनों भाव हैं। स्मृति में पॉजेटिव और नेगेटिव दोनों भाव हैं। ये स्मृति बड़ी ही खतरनाक वस्तु है लेकिन ये दूसरों के द्वारा दी गई वस्तु है।

 

और दूसरों ने जो कुछ अपनी जिन्दगी में सीखा, देखा, अनुभव किया और जो उन्होंने अपनी जिन्दगी में किया, वह सब भार तो तुम्हारे ऊपर डाल दिया। इसीलिये कथाएं, कहानियां, वीर गाथाएं, डरावनी कहानियां सब तुम्हारी स्मृति पर और अधिक भार डालती हैं। हर एक व्यक्ति तुम्हारे सामने एक आदर्शवादी व्यक्तित्व का उदाहरण देता है और तुम्हें कहता है कि तुम्हें ऐसा बनना चाहिए, सब कोई तुम्हें गांधी-सुभाष, राजेन्द्र प्रसाद, तिलक, विवेकानन्द, योगी, महर्षि, धनी, बलवान बनने के उदाहरण देते हैं और तुम्हारे ऊपर यह प्रेशर आ जाता है कि तुम ऐसे बनो, तुम वैसे बनो।

 

अरे! भाई वो जैसे थे वह उनका व्यक्तित्व था, जो वे बने वे अपने कर्म के कारण बने लेकिन तुम कैसे बनो? इसके बारे में अपने ऊपर कोई बोझ मत डालो। लेकिन गुरु के रूप में मैं रविन्द्र संगीत की यह पंक्ति बार-बार कहता हूं कि – ‘तु अकेला चल, सब कोई मुख मोड़ दे तब भी चला चल…।’

 

इसका मतलब यह नहीं है कि संसार में सब व्यक्तियों से रिलेशन, सम्बन्ध तोड़ देना है। रिलेशन जितने ज्यादा लोगों से रख सको, उतनी अच्छी बात है लेकिन मूल बात है कि चलना तुम्हें अकेले ही है। इसलिये जिन्दगी में किसी से बहुत ज्यादा अपेक्षाएं मत रखो।

 

अपेक्षा का तात्पर्य है, हम किसी के लिये कुछ करते हैं तो बदले में उसका प्रतिफल तत्काल या कुछ समय बाद अवश्य चाहते हैं। तुम्हारे मां-बाप की, तुम्हारे रिश्तेदारों की, तुम्हारे दोस्तों की तुमसे कुछ अपेक्षा है इसीलिये उन लोगों से तुम्हारा सम्बन्ध बना है। उन सबकी अपेक्षाएं पूरी करते-करते तुम खुद अपने आपको खो दोगे।
तो फिर क्या उपाय है, क्या साधन है? जिसके आधार पर अपनी जिन्दगी में बिना डरे, बिना बुझे, घनी-अंधियारी रात में भी चलते रहो।

 

तुम ‘आशा’ के साथ चलो, तुम्हारी आशा तुम्हारा सबसे बड़ा बल है। तुम्हारी आशा, तुम्हारी सबसे बड़ी मित्र है। तुम्हारी आशा ही तुम्हारे मां-बाप हैं, पितृजन हैं। आशा ही तुम्हारा गुरु है।

 

इस जीवन चक्र में तुम जिसे चक्कर कहते हो शास्त्र उसे ‘जीवन चक्र’ कहते हैं, वे शास्त्र बार-बार तुम्हें जन्म-मरण की बातें बतातें है और इस जीवन चक्र में बचपन, जवानी, प्रौढ़ावस्था सब आते हैं लेकिन इन सबका केन्द्र बिन्दु कौन है? इन सबका केन्द्र बिन्दु तुम स्वयं हो, तुम्हारा यह प्राण तत्व है और ईश्‍वर ने तुम्हें सर्वश्रेष्ठ उपहार ‘आशा’ को दिया है। इस आशा को कभी अपने से विलग मत करना। स्मृतियों के झंझट में मत पड़ना।
स्मृतियां तुम्हारे ऊपर बहुत ज्यादा प्रेशर डालती हैं, क्योंकि तुम कुछ और होने का नाटक करने लगते हो। जो तुम हो और जो तुम होना चाहते हो उसी दिशा में तुम कार्य करो। जिस दिशा में तुम जाना चाहते हो वो दिशा सबसे श्रेष्ठ है। जो कार्य तुम करना चाहते हो, वही सबसे श्रेष्ठ है। जिस बात को तुम अपनाना चाहते हो, वही बात सबसे श्रेष्ठ है।

 

वह बात सबसे उत्तम इसलिये है क्योंकि तुमने अपने मन से उसे स्वीकार किया है। उसके साथ अपनी आशा को जोड़ दो। आशा वह अश्‍व है, जिसके आधार पर तुम सारे तूफानों से पार हो सकते हो। आशा वह त्रिशूल है जिससे तुम सारी बाधाओं का नाश कर सकते हो।

 

तुम हो और तुम्हारी आशा है, यही तो तुम्हारे प्राण तत्व को श्रेष्ठ रूप से चला सकती है।
तुम्हारी आशा का आधार तुम स्वयं हो और इस आशा तत्व को और अधिक बलवती बनाने के लिये तुमने जिस शक्ति को धारण किया है, वह शक्ति तुम्हारा गुरु है।
तुमने अपनी जिन्दगी में पचासों विद्याएं सीखीं। स्कूल में ललित कला, विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल, साहित्य, संगीत, जीव-विज्ञान, खेल-कूद, दौड़ पचासों बातें सीखीं थी। तुम विद्यार्थी बने तब तुम्हें पचासों प्रकार का ज्ञान दिया गया, यह ज्ञान क्यों दिया गया? क्योंकि तुम्हारा जीवन में सर्वांगीण विकास हो। चारों तरफ से तुम सम्पूर्णता की ओर अग्रसर होकर सम्पूर्ण व्यक्तित्व बनो, लेकिन तुमने किया क्या? खेलना-कूदना, दौड़ना भूल गये। विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल सब भूल गये और केवल एक ही बात पर ध्यान देने लगे कि मैं ‘धन विज्ञान’ में कैसे सफलता प्राप्त करूं? कैसे मुझे धन प्राप्त हो? और तुम्हें सबने यही बताया कि धन प्राप्त करते रहो, इससे तुम्हें जीवन के सब सुख मिल जाएंगे।

 

यदि ऐसा होता तो तुम्हें पहली क्लास से लक्ष्मी का विज्ञान ही सिखाते, हिसाब-किताब ही सिखाते, तौलना-मापना ही सिखाते। इतिहास, भूगोल, दर्शन शास्त्र, विज्ञान, ललित-कला, संगीत सब तुम्हें सिखाने की जरूरत क्यों पड़ी?
अरे भाई! ये सारी विद्याएं तुम्हारे लिये आवश्यक हैं, दुनिया का भूगोल समझो और अपना भी भूगोल समझो। दुनिया का इतिहास समझो और अपना भी इतिहास समझो। दुनिया का संगीत भी सुनो और अपने जीवन में भी मधुर संगीत उत्पन्न करो। छोटी-छोटी हजार बातें सिखाई गई और उन हजार गुणों में से तुम लोगों ने सदुपयोग कितनी बातों का किया? केवल दो-चार बातों का। शिक्षा का उद्देश्य तो तुमने यही समझ लिया कि शिक्षा प्राप्त कर मुझे धन-प्राप्ति करनी है। शिक्षा का अर्थ है सम्पूर्ण ज्ञान, तुम्हारे व्यक्तित्व के हजार पहलू हैं, उन हजार पहलुओं का तुम्हें ध्यान रखना है।

 

जो जागत है सो पावत है…
जो सोवत् है वो खोवत है…

 

अब भी कोई देरी नहीं हुई है, जिन्दगी में किसी भी बात के लिये कभी कोई देरी नहीं होती है और संसार की प्रत्येक यात्रा की शुरुआत पहले कदम से ही होती है। हमारी एक आशा ही हमें पहला कदम उठाने का सामर्थ्य देती है। तुम अपनी स्मृतियों के माया-जाल से निकल कर, आशा के आनन्द सागर में कूद पड़ो। ‘जागो तभी सवेरा’ यह आशा सुनहरे भविष्य की ओर ले जाएगी। इस आशा का केन्द्र बिन्दु गुरु और ईश्‍वर है जो तुम्हारी स्मृति को विस्मृत कर इसी जीवन में नया जीवन देने के लिये तुम्हारे पास आए हैं और तुम गुरु के पास आए हो।

 

सबसे बड़ा सहारा आशा ही है। प्रत्येक दिन ईश्‍वर से यही प्रार्थना करो कि – मेरी आशा बलवती हो, मैं मन-वचन से संकल्पबद्ध होऊं और संकल्प के साथ, आशा के साथ मैं अपना कार्य करता रहूं।
नववर्ष की पूर्व संध्या पर इसीलिये तो तुम्हें दिल्ली आरोग्यधाम बुला रहा हूं, तुम्हारे प्राणों में आशा का तत्व जाग्रत करना है, ज्ञान-विज्ञान तुमने बहुत पढ़ लिया, पोथी-पन्ने पढ़ते-पढ़ते तुम थक गये हो। अब मैं तुम्हें पूर्ण चैतन्य करना चाहता हूं। जब तुम्हारे प्राण ‘आशा’ के साथ चैतन्य होंगे तो यह आशा तुम्हें अपने जीवन का मार्ग अपने आप दिखा देगी।

 

अब तक जो तुमने किया है बहुत अच्छा किया है लेकिन कभी-कभी तुम थक जाते हो। मैं तुम्हें निराश, हताश देख नहीं सकता हूं। मैं चाहता हूं कि प्रत्येक निखिल शिष्य जाग्रत, चैतन्यवान एवं आशा से परिपूर्ण हो। उसे अपना जीवन जीने में प्रतिपल आनन्द आए। हर नये पल की उत्सुकता हो, मन में किसी प्रकार की आशंका नहीं हो। मैं बुला रहा हूं, तुम्हें आना ही है।

 

यह निश्‍चित जानो कि नया वर्ष, पिछले वर्ष से बहुत ही बेहतर होगा। इस पूरे वर्ष में तुमने जो कार्य किया है उसके लिये मुझे तुम्हें धन्यवाद भी तो देना है। तुम लोगों ने हर क्षण मेरा साथ दिया है और आगे भी मेरे साथ ही तुम गतिशील रहोगे।
आरोग्यधाम का निर्माण गुरुदेव का सपना था, अब यह सपना साकार रुप ले रहा है। निर्माण तीव्र गति से चल रहा है इस हेतु मुझे व्यवस्था देखने के लिये बहुत ज्यादा समय देना पड़ता है। पचासों मीटिंग चलती रहती है, इस कारण मेरा बाहर शिविर में जाना कम हो रहा है, ये व्यस्तता और भी बढ़ेगी। मुझे मजबूरन शिविर कम करने पड़ रहे हैं लेकिन मैंने निश्‍चय किया है कि प्रत्येक माह तीन दिन दिल्ली में और तीन दिन जोधपुर में शिष्यों से अवश्य मिलूंगा। आप समय निकालकर मुझसे दिल्ली-जोधपुर मिलने अवश्य आएं।

 

इसी गति से हम साथ-साथ चलते रहें, जो प्रेम का पौधा हमने लगाया है। जो तुम्हारा और मेरा प्रेम का सम्बन्ध है वह निरन्तर-निरन्तर प्रगाढ़ होता रहे। यही तो जीवन का अमृत आनन्द है।

 

सदैव खुश रहो…

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with loved ones…

Dear Loved One,

Divine Blessings,

I deeply admire a  poem by Rabindranath Tagore,  the poem is –

 

If they answer not to thy call, walk alone! Walk alone! Walk Alone! Walk Alone! If they are afraid and cower mutely facing the wall, O thou of evil luck, open thy mind and speak out alone! If they turn away, and desert you when crossing the wilderness, O thou of evil luck, trample the thorns under thy tread, and along the blood-lined track travel alone! If they do not hold up the light when the night is troubled with storm, O thou of evil luck, with the thunder flame of pain ignite thy own heart and let it burn alone!

 

This feeling of treading alone is not a sense of hopelessness. This emotion is full of abundant hope and a great perspective. If no-one supports you, then will you sit down with frustration and disappointment? If you get into any problem, if a gigantic trouble stares at you in your face, then will you assume defeat and sit down? Will you stop if you do not get support from anyone? The exceptional itinerant on this life trail is the one who awakens the expressions of his heart and mind.  Everyone moves, but the one who dares to tread alone, the one with a strong willpower to stride even if the trail is lonely, rough and  harsh. Who else will defend the ideas, and protect the thoughts? Only you can do it yourself.  One who dares to take the solitary step, the one with solid willpower, will always a accumulate company of colleagues, friends and associates in due time.

We started to tread alone, and the caravan kept on swelling…

Your mind has two components and both work together in unison; and you are the focal point for the both. Everyone moves ahead in life with these two expressions. One is – memory and the second is – hope.

If you stock your memory, i.e. store everything whatever happened to you, whatever you did, whatever your parents, relatives, neighbors, friends-enemies taught you, in the memory recesses of your heart, then this huge reservoir in your mind full of memories, experiences and recollections will keep growing and expanding.

Now you want to continue ahead along with this memory? Whereas this memory is a very mischievous and bizarre expression; it can make you cry, or it can make you laugh. Sweetness and bitterness are both parts of memory. The memory has both positive and negative lexes. This memory is a very dangerous object, but it has been given to you by others.

And whatever the others learned in their life, saw and experienced in their life, whatever they did in their life, they laid all that heavy load on your mind. Therefore the stories, fables, legends, heroic and horror stories add additional burden on your memory. Every single person gives you an example of an idealistic personality and stimulates you to become like that, everyone motivates you to become Gandhi-Subhash, Rajendra Prasad, Tilak, Vivekananda, yogi, ascetic, rich, powerful etc.  and you get into pressure to become like this or that.

Well! Dear brother whatever they were, that was their personality, whatever they became, it was due to their actions, but how will you become their copy? Do not take this burden on yourself. But as your Guru, I repeatedly state this line of Ravindra music – ‘Ye walk alone, even if everyone turns away, continue to tread even then …. ”

This does not imply that you should break all relations and associations with everyone in the world. It is good to maintain as many relations as you can, but the moot point is that you walk alone. So do not hold too much expectations from anyone in the life.

Expectation means that if we do something for someone, we expect a similar return or favor either immediately or later. Your parents, your relatives, your friends have some expectations from you, and this is the basis of their connection with you. You will lose yourself in trying to meet expectations of each one of them.

Then what is the way out, what is the method? How do we continue journeying in this life without any fear or fragility through the deep darkness?

You move ahead with “hope“, your hope is your greatest strength.  Your hope is your best friend. Your hope is your parents, is your lineages. Hope is your Guru.

In this life, what you term as the life-affairs, the scriptures call them as the “life-cycle”, those scriptures repeatedly tell you about birth-death-birth cycle, and all phases of childhood, youth, old-age progress through in this life-cycle, but what is the main focus point of all these? You yourself are this locus center, your own essence of soul and God has granted you His best gift as the “hope”. Never ever remove this hope from yourself. Do not fall into the mess of memories.

Memories place a lot of pressure on you, because you try to pretend to be someone else. Start developing in the direction of who you yourself are, and whatever you desire to become. The direction which you want to proceed ahead to, is the best direction. Whatever work you wish to do, that is the best work. Whatever you want to adopt, that is the best.

This the best, because you yourself have accepted it in your mind. Merge your hope with this. Hope is the horse on which you can cross all the storms. Hope is the trident, through which you can destroy all obstacles.

You and your hope, this is the best driver for your soul.

You yourself are the basis of your hope and the energy which you have assumed to strengthen this hope, this energy-element is your Guru.

You learnt fifty disciplines in your life. The school taught you fine arts, science, mathematics, history, geography, literature, music, biology, sports, games etc. As a student, you were imparted learnings of fifty different kinds, why was this done? So that you achieve all-round development in your life. So that you achieve perfection and groom into a well-rounded personality.  But what did you do? You forgot all about sports and games. You forgot science, maths, history, geography etc. and started to focus on only one item that how do I obtain success in “wealth sciences”.  How do I obtain more wealth? And everyone advised you to keep accumulating wealth, and you will achieve all joys of life.

If this was correct, then they would have started to teach you about Lakshmi science, only the accounting and weight-measure; in your first class itself. Why was there any need to teach you history, geography, philosophy, science, fine art, music etc.?

Dear brother! All of these disciplines are necessary for you. Understand the geography of the world, and comprehend your own geography. Understand the history of the world and comprehend your own history. Listen to the music of the world and generate sweet music in your own life.  You were taught thousands of small things, and how many did you properly utilize? Only a couple of two-three things. You assumed that the purpose of education is to learn the method to earn money. Education means complete wisdom, there are thousand aspects of your personality, you have to take care of those thousand facets.

Only one who is awake, obtains…

And the one who sleeps, loses…

Still, we are not late, there is never any delay for anything in life, and every journey in life starts with the first step. Our one hope gives us the strength to take the first step. Get out the trappings of your memory, and jump into the joyful ocean of hope. “Awaken then Dawn” this hope will lead you to the future. Guru and God is the focal point of this hope, who have come to you to grant you a new life by forgetting your memories, and you have also come to Guru.

Hope is the supreme support. Pray daily to God that – Strengthen my hope, enhance my willpower of mind, speech and resolution, so that I continue to accomplish my tasks with full determination and hope.

I am inviting you to Delhi Arogyadham on the New Year’s Eve, to evoke the element of hope in your life, you have read a lot of science-knowledge, and you have now grown tired of reading pages. Now I wish to grant you full-consciousness. When your soul gets activated together with “hope”, then this hope will guide you throughout your life on its own.

Whatever you have done till now, you have done very well, but sometimes you get tired. I cannot see disappointment and frustration in you. I desire that every Nikhil disciple should be full of Awakening, Consciousness and Hope. He should get joy at each moment in his life. He should be eager for the next moment, should not have any anticipation in his mind.  I summon you, you certainly have to come.

Be certain that the new year will surely be better than the last year. I also have to thank you for all the work which you have done during this year. You all have supported me at each moment, and you will retain this dynamism in the future.

Gurudev dreamt of Arogyadham, that dream is now becoming a reality. The construction is progressing at a rapid pace, and I have to devote lot of attention towards this. Multiple meetings continue, and this is impacting my time for Sadhana-camps, these engagements will increase. So I am forced to reduce the frequency of the Sadhana- camps, but I have decided that I will certainly meet disciples for three days in Delhi and three days in Jodhpur every month. You must take out the time to come and meet me in  Delhi-Jodhpur.

We continue together with the same pace, on the sapling of love which we planted. Our mutual relationship of love, continue to intensify. This is the joy elixir of life.

 

Always be happy …

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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