Daan

महर्षि नारद उद्बोधित
 
‘दान’
जिसे समझना आवश्यक है

राजा धर्मवर्मा ने ‘दान तत्व’ को जानने की इच्छा से बहुत वर्षों तक तपस्या की, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर एक आकाशवाणी हुई –

 

द्विहेतु षड्धिष्ठानाम षडंगम च द्विपाक्युक्।
चतुष्प्रकारं त्रिविधिम त्रिनाशम दान्मुच्याते॥

 

अर्थात् – दान के दो हेतु(कारण), छः अधिष्ठान, छः अंग, दो प्रकार के परिणाम (फल), चार प्रकार, तीन भेद और तीन विनाश साधन हैं।

 

यह एकमात्र श्‍लोक कहकर आकाशवाणी मौन हो गयी और राजा धर्मवर्मा के बार-बार पूछने पर भी आकाशवाणी ने उसका अर्थ (विस्तार) नहीं बताया।

 

इस श्‍लोक का अर्थ जानने के लिये राजा धर्मवर्मा ने ढिंढ़ोरा पिटवाकर घोषणा कर दी कि जो भी इस श्‍लोक की व्याख्या कर देगा, उसे सात लाख गायों, स्वर्ण मुद्राएं तथा सात गांव दिये जायेंगे। कई ब्राह्मणों ने इसके लिए प्रयास किए पर कोई भी श्‍लोक की ठीक-ठीक व्याख्या नहीं कर पाया।

 

यह घोषणा नारद जी ने भी सुनी, जो उस समय आश्रम बनाने के लिए भूमि की तलाश कर रहे थे और आश्रम केवल अपने द्वारा अर्जित भूमि पर ही बनाना चाहते थे। नारद जी ने भूमि अर्जित करने का मन बनाया और वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर राजा धर्मवर्मा के दरबार में उपरोक्त श्‍लोक की व्याख्या करने पहुंचे।

 

राजा धर्मवर्मा ने नारद जी से बड़ी विनम्रता से पूछा कि – दान के कौन से दो हेतु, कैसे भेद और फल होते हैं? कृपया श्‍लोक का अर्थ बताएं।

 

नारद जी ने श्‍लोक की व्याख्या करते हुए कहा कि –

 

दान के दो हेतु हैं –

 

दान का थोड़ा होना या बहुत होना अभ्युदय का कारण नहीं होता, अपितु ‘श्रद्धा’ और ‘शक्ति’ ही दान की वृद्धि और क्षय का कारण होती है। यदि कोई बिना श्रद्धा के अपना सर्वस्व दे दे अथवा अपना जीवन ही न्यौछावर कर दे तो भी वह उसका फल नहीं पाता, इसलिए दान केवल और केवल श्रद्धा के साथ देना चाहिए।

 

श्रद्धा से ही ‘धर्म’ का साधन किया जाता है, धन की बहुत बड़ी राशि से नहीं। देहधारियों के लिए श्रद्धा तीन प्रकार की होती है – ‘सात्विक, राजसी और तामसी।’ सात्विक श्रद्धा वाले पुरुष देवताओं की पूजा करते हैं, राजसी श्रद्धा वाले पुरुष यक्ष और राक्षसों की पूजा करते हैं और तामसी श्रद्धा वाले पुरुष दैत्य, पिशाचों की पूजा करते हैं ।

 

शक्ति के बारे में कहा गया है कि – जो कुटुंब के भरण पोषण से अधिक हो वही धन दान देने योग्य है वही मधु के समान है और पुण्य करने वाला है और इसके विपरीत करने पर वह विष के समान होता है। अपने आत्मीयजन को दुःख देकर किसी सुखी और समर्थ पुरुष को दान करने वाला मधु की जगह विष का ही पान कर रहा है। वह धर्म के अनुरूप नहीं, विपरीत ही चलता है।

 

जो वस्तु बड़ी तुच्छ हो अथवा सर्व साधारण के लिए उपलब्ध हो वह ‘सामान्य वस्तु’ कहलाती है। कहीं से मांग कर लायी हुई वस्तु को ‘याचित’ कहते हैं। धरोहर का ही दूसरा नाम ‘न्यास’ है । बंधक रखी हुई वस्तु को ‘आधि’ कहते हैं। दी हुई वस्तु ‘दान’ के नाम से पुकारी जाती है। दान में मिली हुई वस्तु को ‘दान धन’ कहते हैं।

 

जो धन किसी को धरोहर रखा हो और जिसके यहां रखा हो वह यदि उस धरोहर को किसी और को दे दे तो उसे ‘अन्वाहित’ कहते हैं। जिस को किसी के विश्‍वास पर उसके यहां छोड़ दिया हो उस धन को ‘निक्षिप्त’ कहते हैं। वंशजों के होते हुए भी अपना सब कुछ दान करने को ‘सान्याय सर्वस्व दान’ कहते हैं।

 

विद्वान पुरुष को उपरोक्त नव वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए वरना वह बड़े पाप का भागी होता है।

 

छः अधिष्ठान –

 

दान के छः अधिष्ठान – धर्म, अर्थ, काम, लज्जा, हर्ष और भय हैं। सदा ही किसी प्रयोजन की इच्छा न रखकर केवल धर्म बुद्धि से सुपात्र व्यक्तियों को जो दान दिया जाता है उसे ‘धर्म दान’ कहते हैं।

 

मन में कोई प्रयोजन रखकर ही प्रसंगवश जो कुछ दिया जाता है, उसे ‘अर्थ दान’ कहते हैं । वह इस लोक में ही फल देने वाला होता है।

 

स्त्रीगमन, सुरापान, शिकार और जुए के प्रसंग में अनधिकारी मनुष्यों को प्रयत्नपूर्वक जो कुछ दिया जाता है, वह ‘काम दान’ कहलाता है।

 

सभा में याचकों के मांगने पर लज्जावश जो कुछ दिया जाता है वह ‘लज्जा दान’ माना गया है।

 

कोई प्रिय काम होता हुआ देखकर या प्रिय समाचार सुन कर हर्षोल्लास से जो कुछ दान दिया जाता है, उसे धर्म विचारक ‘हर्ष दान’ कहते हैं।

 

निंदा, अनर्थ और हिंसा का निवारण करने के लिए अनुपकारी व्यक्तियों को विवश होकर जो कुछ दिया जाता है, उसे ‘भय दान’ कहते हैं ।

 

अब दान के छः अंगो का वर्णन सुनिए –

 

दाता, प्रतिग्रहीता, शुद्धि, धर्म युक्त देय वस्तु, देश और काल – ये दान के छः अंग माने गए हैं ।

 

दाता निरोगी, धर्मात्मा, देने की इच्छा रखने वाला, व्यसन रहित, पवित्र तथा सदा अनिन्दनीय कर्म से आजीविका चलाने वाला होना चाहिए। इन छः गुणों वाले ‘दाता’ की ही प्रशंसा होती है।

 

सरलता से रहित, श्रद्धाहीन, दुष्टात्मा, दुर्व्यसनी, झूठी प्रतिज्ञा करने वाला तथा बहुत सोने वाला दाता ‘तमोगुणी और अधम’ माना गया है। जिसके कुल, विद्या और आचार तीनों उज्ज्वल हो, जीवन निर्वाह की वृत्ति भी ‘शुद्ध और सात्विक हो’, वह ब्राह्मण दान का उत्तम पात्र (प्रतिग्रह का सर्वोत्तम अधिकारी) कहा जाता है।

 

याचकों को देखकर सदा प्रसन्न मुख हो, उनके प्रति हार्दिक प्रेम का होना, उनका सत्कार करना तथा उनमें दोष दृष्टि न रखना, ये सब सद्गुण दान में ‘शुद्धि कारक’ माने गए हैं।

 

जो धन किसी दूसरे को सताकर न लाया गया हो अर्थात् जो स्वयं के परिश्रम द्वारा लाया गया हो, अति कुंठा उठाये बिना अपने प्रयत्न से उपार्जित किया गया हो, वह थोड़ा हो या अधिक, वही देने योग्य बताया गया है।

 

किसी के साथ कोई धार्मिक उद्देश्य लेकर जो वस्तु दी जाती है उसे ‘धर्मयुक्त दान’ कहते हैं। यदि देय वस्तु उपरोक्त गुणों से शून्य हो तो उसके दान से कोई फल नहीं होता।

 

जिस देश अथवा काल में जो-जो पदार्थ दुर्लभ हों, उस पदार्थ का दान करने योग्य हो, वही ‘देश और काल’ श्रेष्ठ हैं; दूसरा नहीं। इस प्रकार दान के छः अंग बताये गए हैं।

 

अब दान के दो फलों का वर्णन सुनो –

 

महात्माओं ने दान के दो परिणाम (फल) बतलाये हैं। उनमें से एक तो ‘परलोक’ के लिए होता है और एक ‘इहलोक’ के लिए। श्रेष्ठ पुरुषों को जो कुछ भी दिया जाता है, उसका परलोक में उपभोग होता है और असत पुरुषों को जो कुछ भी दिया जाता है, वह दान यहीं भोगा जाता है । दान के ये दो परिणाम बतलाए गयें हैं।

 

अब दान के चार प्रकारों का श्रवण करो –

 

ध्रुव, त्रिक, काम्य (निमित्त या नैमित्य) और नैमित्तिक – इस क्रम से द्विजों ने वैदिक दान मार्ग के चार प्रकार बतलाये हैं। कुआँ बनवाना, बगीचे लगवाना तथा पोखर खुदवाना आदि कार्यों में, जो उपयोग में आते हैं, धन लगाना ‘ध्रुव’ कहा गया है। प्रतिदिन जो कुछ दिया जाता है, उस नित्य दान को ‘त्रिक’ कहते हैं। संतान, विजय, ऐश्‍वर्य, स्त्री, और बल आदि के निमित्त तथा इच्छापूर्ति के लिए जो दान किया जाता है, वह ‘काम्य’ (नैमित्त या नैमित्य)कहलाता है।

 

नैमित्तिक दान’ तीन प्रकार का बतलाया गया है। वह होम से रहित होता है। जो ग्रहण और संक्रांति आदि काल की अपेक्षा से दान किया जाता है, वह ‘कालाक्षेप नैमित्तिक दान’ है। श्राद्ध आदि क्रियाओं की अपेक्षा से जो दान किया जाता है, वह ‘क्रियाक्षेप नैमित्तिक दान’ है तथा संस्कार और विद्या अध्ययन आदि गुणों की अपेक्षा रखकर जो दान दिया जाता है, वह ‘गुणाक्षेप नैमित्तिक दान’ है। इस प्रकार दान के चार प्रकार बताये गए हैं।

 

नारद ने राजा से कहा,अब दान के भेदों का वर्णन सुनो

 

दान के ‘तीन भेदों’ का प्रतिपादन किया गया है। आठ वस्तुओं के दान उत्तम माने गए हैं। विधि के अनुसार किये गए चार दान उत्तम माने गए हैं और शेष कनिष्ठ माने गए हैं। यही दान की त्रिविधिता है जिसे विद्वान लोग जानते हैं। गृह, मंदिर या महल, विद्या, भूमि, गौ, कूप, प्राण और स्वर्ण इन वस्तुओं का दान अन्य वस्तुओं की अपेक्षा ‘उत्तम दान’ माना गया है। अन्न, बगीचा, वस्त्र तथा अश्‍व आदि वाहन – इन मध्यम श्रेणी के द्रव्यों के दान को ‘मध्यम दान’ कहते हैं। जूता, छाता, बर्तन, दही, मधु, आसन, दीपक, काष्ठ और पत्थर आदि वस्तुओं के दान को श्रेष्ठ पुरुषों ने ‘कनिष्ठ दान’ बताया है। ये दान के तीन भेद बताये गए हैं।

 

दान नाश के तीन हेतु –

 

जिसे देकर पीछे पश्‍चाताप किया जाए, जो अपात्र को दिया जाए और जो बिना श्रद्धा के अर्पण किया जाए – वह दान नष्ट हो जाता है। ‘पश्‍चाताप, अपात्रता और अश्रद्धा’ – ये तीनों दान के नाशक हैं ।

 

यदि दान देकर पश्‍चाताप हो तो वह ‘असुर दान’ है, जो निष्फल माना गया है। अश्रद्धा से जो दिया जाता है वह ‘राक्षस दान’ कहलाता है। वह भी व्यर्थ होता है। ब्राह्मण को डांट फटकारकर और कटुवचन सुनाकर जो दान दिया जाता है अथवा दान देकर ब्राह्मण को कोसा जाता है वह ‘पिशाच दान’ कहलाता है और उसे भी व्यर्थ समझना चाहिए। यह तीनों भाव दान के नाशक हैं ।

 

राजन! इस प्रकार सात पदों में बंधे हुए दान के उत्तम महात्म्य को मैंने तुम्हें सुनाया है

 

राजा धर्मवर्मा बोले – आज मेरा जन्म सफल हुआ। आज मुझे अपनी तपस्या का फल मिल गया। विद्या पढ़कर भी यदि मनुष्य दुराचारी हो गया तो उसका सम्पूर्ण जीवन व्यर्थ है। बहुत क्लेश उठाकर जो पत्नी प्राप्त की गयी हो, वह यदि कटु वादिनी निकली तो वह भी व्यर्थ है। कष्ट उठाकर जो कुआं बनवाया गया उसका पानी यदि खारा निकला तो वह भी निरर्थक है तथा अनेक प्रकार के क्लेश सहन करने के पश्‍चात् जो मनुष्य जन्म मिला, वह यदि धर्माचरण के बिना बिताया गया तो उसे भी व्यर्थ ही समझाना चाहिए। इसी प्रकार मेरी तपस्या भी व्यर्थ चली गयी थी उसे आज आपने सफल बना दिया। आपको बारम्बार नमस्कार है।

 

इस प्रकार वंदना करते हुए राजा धर्मवर्मा ने नारदजी को घोषित उपहारों के साथ अन्यान्य अलंकार भी भेंट किये, जिससे नारद जी ने अपना आश्रम बनवाने का संकल्प पूरा किया, और वह आश्रम राज्य के भविष्य रूपी बालकों के ज्ञानचक्षु खोलने का अन्यतम संस्थान साबित हुआ।

Purannic Extract

Enlightenment by Maharishi Narad

 

Daan (Charity)

Mandatory to understand its intricacies


 

King Dharmaverma did penance for multiple years with a desire to understand the intricate elements of the “Charity”. The Heavens were pleased with his austerity and proclaimed –

Dwihetu Shaddhishthaanaam Shadangam Cha Dwipaakyuk |

Chatushprakaaram Trividhim Trinaasham Daanmuchayaate ||

 

i.e. There are two reasons, six qualities, six components, two results-virtues, four types, three kinds and three destructions of the donations.

 

The Heavens became silent after uttering this single Shloka, and did not respond to multiple entreaties of King Dharmaverma for the explanations.

In order to understand the meaning of this verse, King Dharmaverma proclaimed throughout his kingdom a prize of seven lakh cows, gold coins and seven villages to the interpreter of this verse. Many Brahmins tried but could not properly interpret this verse.

Sage Naradji also heard this proclamation, he was searching for land to build an ashram at that time. He wished to build the ashram only on self-acquired land. Naradji decided to earn the land, and reached King Dharmaverma’s court dressed as an old Brahmin to explain the above-mentioned verse.

King Dharmaverma politely questioned Narada that – What are the two reasons, kinds and results of the donation? Kindly explain the meaning of the Shloka-verse.

 

Naradji explained the verses as follows –

 

Two reasons for Donations

Less or more quantity of donation is not a measure of greatness of donation, rather “Reverence” and “Power” decide the increment or decrement of charity. In absence of any Reverence-feelings, if someone donates his entire possessions, his own life itself, even then he does not get its results, therefore the charitable donation should always be made with full reverence and faith.

Only the degree of “Reverence” leads to “Dharma” religion, not a large amount of wealth. The mortals possess three types of “reverence” – Saatvik, Raajsi and Taamsi. The Saatvik worshippers pray to the Gods; the Raajsi worshippers pray to the Yakshas and Demons; while the Taamsi worshippers pray to the vampires and ghosts.

It has been said about power that – Whatever is more (excessive) than the required quantity for nourishment of the family, only that wealth is worth donating, and is as virtuous as honey; while anything on the contrary is like a poison. Making charitable-donation to a happy and capable person while introducing sorrow-sadness to his own family-soulmate, is akin to consuming poison instead of honey. It does not conform to religious “Dharma”, rather it is just the opposite.

Any item which is very trivial or is commonly available is termed as an “Samanya Vastu“. An item borrowed from someone is called “Yaachit“. A synonym of surety is “Nyaas“. An item pawned as a security is called “Aadhi“. Anything received in donation is called “Daan“. Any item received through donation is called “Daan Dhan“.

If one donates out money which was kept in safekeeping on behalf of someone else, then it is termed as “Anvaahit“. Money left with someone on trust is termed as “Nikshipt“. Donating all the possessions, in-spite of presence of  descendants, is termed as “Saanyaaya Sarvasawa Daan“.

A wise man should not never donate any of the above nine types of items, as this constitutes a major sin.

 

Six Qualities –

There are six qualities of charitable-donations – religious (Dharma), wealth (Artha), desire-temptation (Kaam), embarrassment (Lajja), joy (Harsh) and fear (Bhaya). The donation gifted to the eligible persons, in holy pious spirit without any expectation or desire in return, is termed as “Dharma Daan“.

Anything gifted in a particular context with a specific purpose-desire is termed as “Artha Daan”. It bestows fruits in this life itself.

Anything gifted to ineligible persons, in the context of womanizing, drinking, hunting or gambling, with some efforts, is termed as “Kaam Daan“.

Whatever is gifted out of embarrassment due to request-appeals made in a gathering, is termed as “Lajja Daan“.

Anything gifted out of joy due to accomplishment of a favourable task or hearing of a favourable news is considered as “Harsha Daan“.

Anything gifted to unsuitable persons out of fear of disgrace, slander or violence is termed as “Bhaya Daan“.

 

Now listen to the description of the six component-parts of the donation –

 

Donor (Daata), Receiver (Pratigraheeta), Purity (Shuddhi), Suitable Donation as per religious norms (Vastu), Place (Desh) and Time (Kaal) – are the six components of the donation-charity.

 

The donor should be healthy, religious, willing to donate, free from any addiction, holy, one who earns without any improper means. A “donor” with such six qualities is always admired.

 

A donor without any simplicity, devoid of faith, sinner, addict, promise-breaker, and long sleeper is termed as a “Tamoguni and Adham“. One who has a bright family, education and ethics, who leads life in a “Pure and Saatvik” manner, only such a Brahmin is termed as the most eligible receiver.

Attributes like pleasant, smiling countenance, a warm heart full of love, respect to the receivers, ignoring their deficiencies, all of these virtues bring Purity into the charity-donation.

The money which has not been earned by harassing anyone, i.e., money earned through the hard work of self, through own endeavours without any frustrations, whether it is little or more, is considered as the most appropriate object.

Any object that is gifted to someone with a religious purpose is called ‘Dharmayukt Daan“. If the donating-object is devoid of the above attributes, then one earns no fruits-virtues through donation.

The rare items for a place or time, which are suitable for donation, only that “Desh and Kaal” is appropriate. Thus the six parts of the charity-donation have been described.

 

Now listen to the description of two fruits-virtues of charity –

 

The saints have described two results-virtues of charitable-donations. One is for the “Parlok” (next life) and other is for “Ihalok” (current life). The fruits of whatever is gifted to excellent suitable-receiver are consumed in the next life, and of whatever is gifted to unsuitable-receivers are consumed in the current life. These are the two results-virtues of the donations.

 

Now listen to four types of charity-donations –

The four types of Veidik charity-donations explained sequentially by the learned wise are – Dhruv, Trik, Kaamya (Nimitt or Neimitya) and Neimittik.

Spending money on the utilities like constructing a well, laying a garden or digging a water-tank is called as “Dhruv“. The charity given out on a daily basis is called as “Trik“. The charity given out with a purpose of fulfilling desires of children, victory, luxury, spouse or strength-power is called as “Kaamya (Nimitt or Neimitya)“. The “Neimittik” donation is of three types. It is independent of homa-sacrifice. The donation made to gain from the time specific events like Grahan-eclipse or Sankranti is called as “Kalakshep Neimittik Donation”. The donation made for the Shraadh homage to the ancestors is called as “Kriyakshep Neimittik Donation”, while the donation made with a desire of gaining virtues like moral-values or education is called as “Gunaakshep Neimittik Donation“. Thus four types of charities have been described.

 

Narada said to the king – Now listen to the description of the various kinds of charity –

Three distinct kinds” of donation have been postulated. Donation of eight items is considered to be the best. The rules describe four donations as the major ones, and the remaining have been considered as minor. This is the charity-donation-trilogy, as known to the wise. The donation of House, Temple or Palace, Education, Land, Cow, Well, Life and Gold has been considered as the “Excellent Donations” compared to other items. Similarly, donation of Food, Garden, Clothing and vehicles like Horse are considered as the “Medium Donations“. The donation of Shoe, Umbrella, Utensils, Curd, Honey, Asana, Lamp, Wood and Stone etc. have been considered as “Junior Donations”. Thus these three distinctions of charity-donation have been described.

 

The three modes of charity-donation destruction –

If one repents after making donation, if the donation is made to an unsuitable person or if the donation is offered without reverence – that charity is destroyed. These three destroy charity – “Repentance, Unsuitability and Irreverence

If one repents after making charity-donation, then it is termed as “Asura Daan“, which neutralizes the donation-virtue. Donation made without reverence is termed as “Rakshas Daan“, which is also meaningless. The donation made by rebuking or abusing a Brahmin is termed as “Pishaacha Daan“, and this should also be considered as meaningless. These three things destroy the virtues of donations.

 

Rajan! Thus I have explained the great foundation-basis of charity-donations wrapped within seven parts to you.

 

Raja Dharmaverma answered – Today I have succeeded in my birth. I have received the reward of my penance today. If a person loses his moral character even after receiving high level of education, then his entire life is meaningless. A wife gained by enduring great trouble is worthless if she turns out to be shrew. A well dug with great efforts-exertions is useless if its water turns out to be salty. Similarly a human life obtained after multiple travails is meaningless if it is spend immorally. My penance-austerity would have gone in vain. You have made it successful. I pay homage to you.

In this way, Raja Dharmaverma offered many other valuable-ornaments along with the gifts already declared to Naradaji. Thus Sage Narad completed his resolve to make his own ashram, and the ashram turned out to be a glorious institute to expand the education-knowledge of the students of the state.

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