Brahmavarchasva Shishyabhishek Mahadiksha

24-25 दिसम्बर 2017
ब्रह्मवर्चस्व शिष्याभिषेक महादीक्षा

 

18 वर्ष में तो एक पीढ़ी परिवर्तित हो जाती है और यह परिवर्तन सदैव नित्यता का स्वरूप होता है नवीनता का स्वरूप होता है। आज 18 वर्ष बाद पुनः वह महान् अवसर आया है जब सद्गुरु निखिल द्वारा प्रवाहित ब्रह्म ज्ञान, ब्रह्म वर्चस्व, आत्म ज्ञान, आत्म सुख, आत्म चैतन्यता, अमृत भाव, शिष्याभिषेक की महत्ती क्रिया का पुनः सिंचन गुरुदेव द्वारा आरोग्यधाम की दिव्य धरा पर सम्पन्न होगा। काल का यह वह क्षण है जब हम अपने जीवन का एक अध्याय पूर्ण कर दूसरा अध्याय स्वयं अपने हाथों से लिखने की क्रिया सम्पन्न करेंगे। गुरु ही वह महान् शक्ति है जो हमें स्वयं अपने हाथों ही अपने भाग्य लेखन का सौभाग्य प्रदान करती है। वे हमें विधी का विधान जैसे नकारात्मक भावों को हटाकर स्वयं अपना भाग्य लिखने की क्षमता प्रदान करते हैं।
यह अवसर है, ब्रह्म वर्चस्व शिष्याभिषेक, ब्रह्म वर्चस्व अमृताभिषेक।

 


एक बार सद्गुरु निखिल से एक शिष्य ने प्रश्‍न किया कि गुरुदेव मैंने अपने जीवन में बहुत सफलता प्राप्त की है लेकिन मैं सन्तुष्ट नहीं हूं इसका क्या कारण है? गुरुदेव ने पूछा -तुमने क्या सफलता प्राप्त की है। उस शिष्य ने कहा कि – मुझे अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त है, धन सौन्दर्य प्राप्त है, स्वयं का मकान है, गृहस्थ सुख है, मुझे राज्य से सम्मान प्राप्त हुआ है, अच्छी नौकरी है, मैंने बहुत यात्राएं की है, 10-20 लोग मेरे अधीन रहते हैं। फिर भी मेरा वर्चस्व नहीं है, मुझे लगता है कुछ अपूर्ण है।

 

गुरुदेव ने कहा – देखो पुत्र! यह सब तो संसार में लाखों करोड़ों लोग प्राप्त करते हैं और उन्हीं की भांति तुमने भी कुछ प्राप्त किया है लेकिन तुम्हारे जीवन में पूर्ण सुख नहीं है क्योंकि तुम एक ही दिशा में बढ़ते गये। गुरुदेव ने कहा कि – हमारे इस जीवन में 16 भौतिक बिन्दु और 16 आध्यात्मिक बिन्दु होते हैं। 

 

16 भौतिक बिन्दु हैं – 1. स्वास्थ्य, 2. पैतृक धन, 3. पूर्ण सौन्दर्य प्राप्ति, 4. पूर्ण पौरुष प्राप्ति, 5. मकान, 6. पुत्र, 7. विद्या, 8. शत्रु-निवारण, 9. विवाह, 10. पति-पत्नी सुख, 11. अकाल-मृत्यु निवारण, 12. भाग्योदय, 13. राज्य-सम्मान, 14. आय, 15. ऐश्‍वर्य, 15. मनोवांछित सफलता, 16. वर्चस्व।

 

16 आध्यात्मिक बिन्दू है – 1. मानसिक सुख, 2. सन्तुष्टि, 3. ध्यान, 4. गुरुत्व-प्राप्ति, 5. आत्म-प्रकाश, 6. उन्मुक्त अवस्था, 7. निर्विचार मन, 8. पूर्ण शिष्यत्व-समर्पण, 9. समाधि, 10. सिद्धि सफलता, 11. कुण्डलिनी जागरण, 12. सहस्रार दर्शन, 13. विराट साक्षात्कार, 14. समस्त लोक दर्शन, 15. परमहंस अवस्था, 16. सिद्धाश्रम-प्राप्ति।  

 

अब यदि तुमने एक भौतिक सफलता प्राप्त की है तो एक आध्यात्मिक सफलता भी तो होनी चाहिए। तुम्हारे पास स्वास्थ्य, धन, सौन्दर्य, भवन, संतान, विद्या है तो तुम्हारे जीवन में मानसिक सुख-सन्तुष्टि, गुरुत्व प्राप्ति, आत्म प्रकाश, उन्मुक्त भाव, निर्विचार मन भी तो होना चाहिए। 

 

तुम मनोवांछित सफलता प्राप्त करना चाहते हो तो तुममें परमहंस अवस्था का भाव भी होना चाहिए। यदि तुम अपने जीवन में वर्चस्व चाहते हो तो तुम्हारे जीवन में सिद्धाश्रम प्राप्ति का लक्ष्य भी होना चाहिए।

 

यह दिखने वाला संसार भौतिक संसार है और यहां सफलता के कुछ बिन्दु निर्धारित हो गये हैं लेकिन क्या ये ही बिन्दु प्राप्त करना पूर्णता है? या पूर्णता विराट साक्षात्कार, समाधि, परमहंस अवस्था, सन्तुष्टि है।

 

आज ये विचार करने का अवसर है, क्या आपकी दौड़ में भौतिकता और आध्यात्मिकता का सांमजस्य है अथवा एकांगी दौड़ है। हमारी यात्रा तो ‘मृत्योर्मा अमृतं गमय’ की यात्रा है। पर हमारे साथ क्या हो गया है? हम जन्म से ही मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं। अपने आप से विलग होते जा रहे हैं और समाज द्वारा स्थापित दस-पांच बातों को हमने जीवन का लक्ष्य मान लिया है।

 

यह स्पष्ट है कि इस जीवन का परम लक्ष्य वर्चस्व प्राप्त करना है लेकिन यह वर्चस्व कैसा हो? क्या हमारा अपने आप पर वर्चस्व है? क्या हम एकाग्र हो सकते हैं? क्या हम अपने सहस्रार में शिव को स्थापित कर सकते हैं? उस सहस्रार में शिव का नर्तन, दर्शन देख सकते हैं? क्या हम उस परमहंस अवस्था को पा सकते हैं, जिसमें हम सामयिक सुख-दुःख की स्थिति से विलग होकर, अपने आपको स्थितप्रज्ञ बना सकते हैं।

 

वह वर्चस्व भीतर का वर्चस्व ब्रह्म का वर्चस्व है। जहां भीतर का वर्चस्व नहीं, वहां सब कुछ अपूर्ण है। जो केवल भौतिकवाद की उपासना करते हैं वे गहन अंधकार में पहुंच जाते हैं और जो केवल अध्यात्म में रत रहते हैं, भौतिक जगत की परवाह नहीं करते वे और भी घने अंधकार में जा पहुंचते हैं। हमारे भीतर आत्मा का निवास है। वही आत्मा हमारा ब्रह्म है, वही आत्मा परम विद्वान है। अमृतों का अमृत है। प्राणों का प्राण है। चक्षुओं का चक्षु है। मनों का मन है और जब व्यक्ति अपने भाव सागर में आत्म तत्व का बोध कर लेता है, तो वह अपनी मृत्यु को समाप्त कर देता है, भय को समाप्त कर देता है। अपने भीतर अमृत्व से युक्त हो जाता है। तब वह ‘मृत्योर्मा अमृतं गमय’ की यात्रा करने लगता है।

 

ये भीतर की सत्ता बड़ी ही विराट है। जब भीतर का वर्चस्व प्राप्त होगा तो अमृत का अवगाहन होगा। जब भीतर का वर्चस्व होगा तो अपने आप उन्मुक्त अवस्था प्राप्त हो जायेगी।

 

ये अवस्था कैसे आ सकती है, जब गुरु से मिलन होता है। गुरु के बिना कुछ भी संभव नहीं है। गुरु के बिना तो जीवन एक प्रयोगशाला बन जाता है, जहां हम अपनी-अपनी बुद्धि से नये-नये एक्सपरीमेन्ट करते हैं। कभी सफलता मिलती है, कभी असफलता मिलती है और समय के कालचक्र में बंधकर हम अपनी हार मान लेते हैं।

 

गुरु ही परम सत्ता हैं

 

वह सत्ता, वह चैतन्य शक्ति, जाग्रत शक्ति जिसके सामने प्रारब्ध भी हार जाता है, समय भी घुटने टेक देता है। जिनके सान्निध्य में शिष्य स्वयं को शक्तिमान अनुभव करता, जिनके सान्निध्य में ब्रह्म का मूल भाव वर्चस्व, मानसिक सुख और सन्तुष्टि के साथ प्राप्त होता है, निर्विचार मन हो जाता है।

 

और शिष्य के लिये गुरु ही ब्रह्म का स्वरूप है। यह सत्य ही परम सत्य है, यह सत्य ही परम तत्व है। गुरु ही तो ज्ञान का अक्षय स्रोत हैं और वास्तव में गुरु का हमारे जीवन में आगमन केवल भौतिक सफलता, भौतिक वर्चस्व के लिये नहीं होता। गुरु का आगमन तो भौतिक वर्चस्व के साथ-साथ आध्यात्मिक वर्चस्व स्थापित करने के लिये ही होता है। यही तो ब्रह्मत्व से साक्षात्कार है। जब शिष्य का अपने स्व से परिचय होता है, वह शिष्य अपनी शक्ति से परिचित होता है और उसमें जीतने का भाव ही नहीं, जीतने की क्षमता भी आ जाती है।

 

क्या कह रहे हैं शंकराचार्य? शंकराचार्य कहते हैं कि – गुरु की उपमा, महिमा को परिभाषित करने हेतु दूसरा कोई समानार्थक शब्द ही नहीं है –

 

दृष्टान्तो नैव स्त्रिभुवन जठने सद्गुरोर्ज्ञान दातु।

 

अर्थात् इस भुवन में गुरु की उपमा देने के लायक कोई दृष्टान्त नहीं है। गुरु को तो पारस की उपमा नहीं दी जा सकती है, क्योंकि पारस तो लोहे को मात्र सोना ही बनाता है परन्तु सद्गुरु तो अपने शिष्य को स्वयं अपने समान ही बना देते हैं। शक्तिपात करते समय गुरु के पास जो साधना एवं सिद्धियों का समुद्र होता है, वह शिष्य में उंड़ेल देते हैं और शिष्य में ऐसी क्षमता पैदा कर देते हैं, जिससे उसमें सिद्धियों को समाहित करने की शक्ति आ जाए।

 

ब्रह्मवर्चस्व – स्व से परिचय – 

 

वास्तव में आपका परिचय क्या है? स्त्री, पुरुष, नाम, घर का पता, माता-पिता-रिश्तेदार का सम्बन्ध, व्यवसाय क्या यही आपका परिचय है? यह तो आपका शरीर का सम्बन्ध है। आपके कार्य का सम्बन्ध है। वहां किसी का भी नाम फिट किया जा सकता है। आप क्या हैं? यह प्रश्‍न – ‘‘एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति.. अहम् ब्रह्मास्मि।’’

 

आप जैसा इस संसार में कोई नहीं है। आप सबसे अलग हैं, विलग हैं। आपके भीतर जो चेतना है, जो शक्ति है, जो आत्मा है, वही तो सारे सम्बन्धों को सृजित कर रही है। सबको संभाल रही है। वही तो आपका मूल परिचय है। क्या आपने कभी उससे बात की है? क्या आपका वर्चस्व आत्मा तक पहुंचा है? गुरु आपके उस वर्चस्व तक पहुंचा सकते है जहां स्वास्थ्य से लेकर समस्त लोक दर्शन और सिद्धाश्रम की प्राप्ति होती है।

 

जीवन्त सिद्धाश्रम में पहुंचना, जीवन्त भाव से मनोवांछित सफलता के साथ विराट साक्षात्कार करना महान् कार्य है और यह गुरु के स्पर्श से संभव होता है। गुरु का एक स्पर्श, गुरु का आपके ललाट पर एक हाथ आपको उस गहरे अमृत कुण्ड में ले जाता है जहां आप पूर्णमदः पूर्णमिदं होते हुए सन्तुष्ट और परम हंस स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं।

 

गुरु की प्यास अनोखी है – 

 

सद्गुरुदेव सदैव अपने शिष्य को ढूंढ़ते रहते हैं, ताकि वे उसके जीवन को पूर्णता प्रदान कर सकें। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तर का होता है, मात्र यही एक सम्बन्ध होता है, जो स्वार्थ से परे आत्मा का सम्बन्ध होता है, प्राणों का सम्बन्ध होता है। गुरु शब्द होठों पर आते ही स्वतः मन में पवित्रता का बोध होने लगता है।

 

गुरु के हृदय में भी सदैव एक बैचनी का भाव रहता है जब तक गुरु अपने शिष्य को पूर्ण की ओर अग्रसर नहीं कर लेते, तब तक अपने शिष्य के उत्थान के लिए प्रयासरत ही रहते हैं। अपनी सूक्ष्म दृष्टि से उसकी देख-रेख करते ही रहते हैं। गुरु और शिष्य दोनों ही एक दूसरे से मिलने को कितना आतुर रहते हैं, यह इन पंक्तियों से स्पष्ट है –

 

गुरु ढूंढ़े तो गुरु न मिले, मिले न मन को चैन
शिष्य ढूंढ़े तो शिष्य न मिले, गुरु भी रहे बैचेन
कहां कहा ढूंढ़े गुरुदेव को, 
कोई न बतायो दियो न यकीन
जैसे रह गए यतीम।

 

सद्गुरु सदैव अथाह करुणा एवं कल्याण की भावना लेकर गतिशील रहते हैं। अपने योगबल के प्रयास से शिष्य को अपने पास बुला लेते हैं और जब शिष्य अपने गुरुदेव को अर्थात् अपनी मंजिल को सामने देखता है, तो उसके हृदय की सम्पूर्ण वेदना एक क्षण में ही समाप्त हो जाती है।

 

वर्चस्व – भौतिकता और आध्यात्मिकता का

 

भौतिकता के बारे में हर एक अपने आपको जानकार समझता है। वास्तव में अध्यात्म की धरा पर ही भौतिकता की स्थापना हो सकती है। अध्यात्म ‘अधि+आत्म’’ में स्वयं और आत्म स्वरूप का अधिक ध्यान है। एक हरे भरे पेड़ के लिये आवश्यक उसकी पुष्ट जड़ें दिखाई नहीं देती लेकिन वे जड़ें ही तो आधार हैं। साधक अपने भीतर गहराई में उतरता है तो वह अपने आपसे प्रेम करने लगता है। सन्तुष्ट होने लगता है और तब उसका अपने भीतर के ब्रह्मत्व से, गुरुत्व से साक्षात्कार हो जाता है, मिलन हो जाता है तो फिर एकदम एक योग बल, एक शांति, एक सन्तुष्टि, एक ध्यान, प्राप्त होता हैै जो रोम-प्रतिरोम को चैतन्य कर उसमें अमृत का सिंचन कर देता है।

 

गुरु तो ज्ञान रूपी अमृत गंगा हैं। शिष्य के पास अटूट प्यास होनी चाहिए, ऐसे शिष्य को गुरु गंगा तृप्ति के लिये प्राप्त हो ही जाती है। अविरल गंगा की तरह गुरु प्रतिपल अपने शिष्य का सिंचन करते हैं और तब ब्रह्मत्व जाग्रत होता है और वह शिष्य अपने आप से जुड़ता है। वह अपनी कामनाओं को पूर्ण करता है, क्योंकि उसका सम्पर्क अमृत गंगा गुरु से स्थापित होता है।

 

ब्रह्म वर्चस्व एक महान् क्रिया है, जहां गुरु शिष्य के जीवन की भौतिक न्यूनताओं और आध्यात्मिक न्यूनताओं दोनों को देखकर, उन न्यूनताओं को पूरा करने के लिये अपनी ज्ञान गंगा का प्रवाह शिष्य के आज्ञा चक्र पर करते हैं। वे शिष्य का हाथ पकड़ते हैं, उसे सहारा देते हैं। जिससे शिष्य के भीतर की इच्छाएं पूर्ण हो सकें।

 

Brahma Varchasva Shishyabhishek Deeksha

 

The act by which the disciple moves towards spiritual and material enlightenment

 

Once a disciple asked Sad Gurudev Nikhil, “I have achieved phenomenal success in my life, still I am not contented. Happiness continues to elude me! Why so?”

Sad Gurudev Nikhil was intrigued. He probed, “How do you define success my dear son? What have you achieved in your life? Tell me.”

The disciple answered –

“I enjoy good health.

I am affluent and am doing well professionally.

10-12 people report to me.

My family life is blissful.

I have received state recognition.

I have traveled far and wide.

I have a pleasing personality.”

If I assess my life, I have been successful on conventional parameters. Yet, happiness is away from me.

Sad Gurudev Nikhil responded, Son! What you have achieved is nothing new. Many people do it, but the vacuum in your heart comes from the fact that your life lacks spiritual success.

Until, we merge spiritual and material success, life will lose meaning and perspective and the feeling of incompleteness will continue to haunt you.

The disciple was a bit confused. He requested Sad Gurudev Nikhil to explain in detail.

Sad Gurudev Nikhil elaborated –

There are 16 stages of material success and there are 16 stages of spiritual success and in life you have to fuse both these elements of success, only then happiness will flow in your life.

The 16 stages of material & spiritual accomplishments are –

Material Accomplishments Spiritual Accomplishments
1.       Good health Peace of mind
2.      Ancestral wealth Contentment
3.      Graceful looks Meditation
4.      Masculine vigour Surrendering to the Guru
5.      House Self-illumination
6.      Heir (Son) Enthusiasm
7.      Education Thoughtless mind
8.      Subduing Enemies Absolute surrender to the Guru
9.      Marriage Samadhi
10.  Happy conjugal life Success in sadhanas
11.   A long life Awakening of the Kundalini
12.  Fortune Enlightenment of super consciousness
13.  State recognition Witnessing God in its Absolute manifestation
14.  Abundant income Travelling at the pace of mind
15.   Success as desired Reaching Self enlightenment
16.  Authority Going to Siddhashrama

 
Against each stage of material success, corresponds a stage of spiritual success. Until both converge, the life will remain incomplete. Happiness may come in spurts but absolute joy will continue to elude you. If you introspect your life, you would realise that your life is empty in terms of spiritual progress. You have equated success with material progress.  Therefore, you feel incomplete. To establish your supremacy in your life you should also aspire to reach Siddhashram.

What meets the eye is finite and what does not is infinite

This world is a material world and there is extreme emphasis on achieving these 16-stages of success. However, these stages of success will not make you whole. Joy will continue to elude you until you will start progressing spiritually. Life becomes complete when both spiritual and material successes fuse, but for most of us life has lost meaning because we are concentrating only on material growth. Spiritual advancement has been relegated to the background. Consequently, we are alienated from the fundamental direction of life which Upanishdas have spoken time and again.

 

The touch of immortality

It is to move towards immortality. Paradoxical, isn’t it? Since the time, we are born we are inching towards death because the time is finite. We are racing against time in a bid to establish our supremacy or authority on others. This is what is driving most of us.

 

So lost are we in this mad rush that we forget, “Charity begins at home.” Before we establish our supremacy on anyone else, we need to exercise authority on ourselves. We have to reach a stage where the body and the mind start functioning for the sake of soul, the divine light that shines bright in all of us.

Once, we have established our authority on ourselves, we cease to get ruffled by the cyclic occurrence of happy and sad events in our lives. The realization dawns that life is above and beyond these moments and equanimity dawns in such enlightened souls.

 

How self control can lead to enlightenment?

Self-control is the domain of enlightenment. As long as you will keep running after material signs of success, there will be something lacking in your life. You will become trapped in the rat race and your soul will continue to hanker for spiritual growth. And if you neglect material aspect of life, there will be again an imbalance in your personality.

 

Life is meant to be lived. Completely. For this you need to connect with your soul, where the Supreme Being resides. This Supreme Being is the reservoir of wisdom and it banishes ignorance. It knows the ephemeral nature of human life and is keen to move beyond death.

 

Death and fear coincide and the day you move beyond fear, you have conquered death. You are moving towards tasting that divine nectar where the impermanence of life ceases to affect, because life is just a stop-over for the soul. The immortal soul is a reflection of divinity in all of us. Connecting with that soul and making it paramount is the crux of the spiritual progress.

Materialistically, we move outward and spiritually, we move inward. Until, we start peeling our layers of personality and uncovering our real self, we cannot access the soul-the centre of unbridled joy.

How to bring joy in your life?

Material acquisitions will bring happiness and spiritual growth will bring joy. The difference is that happiness relies on objects. As long as you keep acquiring them, it stays with you, but it is transient. Soon, happiness will wear out and you will start looking for another acquisition to experience it once again.

 

On the contrary joy springs from the soul. It is bliss – child-like. You can remain joyful for no reason and it radiates in you. Joy envelops you and it surrounds you. It eats that feeling of sadness, incompleteness that you get even after acquiring material symbols of success.

Surrender to the enlightened Guru. Unless you surrender to the Guru, your life will be an experiment. At times you will succeed in those experiments and at times you will not. What is a bigger worry that when failures will touch you, you will lose your enthusiasm? This is a bigger loss than failure because you are no longer connected to your soul, the source of joy.

 

Know thy Guru: the source of supreme power

The Guru is an awakened soul. He knows his real self, whereas you don’t. When you surrender to the Guru, you merge with Him – the enlightened soul. Naturally, you also become enlightened. You discover your inner strength, your supreme power and elements of spiritual success like mental peace, contentment and self-supremacy manifest.

 

For a disciple, the Guru is the manifestation of the Supreme Being. This is the truth and the disciples who allow this truth to seep in their being start achieving spiritual and material success quickly. In Guru deities converge and Supreme being resides. Once you have surrendered to the Guru, the rest will fall in place, sooner or latter because now you are not travelling alone in the life. There is a savior with you. He is  your Guru and come what may, the Guru is not going to leave you in lurch.

 

Therefore, Shankaracharya found it difficult to explain Guru.

In this whole world, there is no force or power equivalent to the Guru. The alchemy of Guru transforms you totally and you are reborn, when He takes in you in his wings. That’s the reason the Guru is addressed as the Brahma, the creator. The Guru guides you to the path of fulfillment where the disciple becomes Guru-like and his life successes flow unhindered and joy blossoms in his heart.

Knowing thyself is knowing the supreme authority

How do you define yourself? You are the outward trappings that the world gave you or you are something distinct and different from those. Your identity extends beyond the body. It goes deep inside your soul, where the supreme power resides. You are the soul. The moment soul makes a move the body perishes. Nothing remains and all the trappings that you have guarded with so much effort bite the dust.

 

You are the supreme being. This is the ultimate realization and your true identity.

Think about it, you are different from others and in you resides your soul, the ultimate light that guides you in all difficult moments of life. In fact, the whole point of your existence is to become ‘soul-ful’ and when you relate to others you communicate to the soul of another person.

 

Transcending the superficiality of a relationship and delving deep into the soulful existence is the purpose of life which can happen only when you are in touch with your real self. You need to recognise yourself, who is an abundant source of energy. The bigger question is where does this energy come from? It comes from the soul, the centre of your supreme being, the core of your being. When you surrender to the Guru you begin to flower spiritually and materialistically. But, the aim of your life changes, it is to reach Siddhashrama, the abode of awakened and enlightened souls in this lifetime.

 

When Guru touches your Ajna Chakra, his electrifies the nerves which harness the energy from your Mooladhara to Saharasara. The downward travel of energy is procreation and the upward travel of the energy is enlightenment. As long as energy is centered in the Muladhara, you are focused on materialism. In a way it is good but too much of focus on it will blind your ambitions. Life is about learning the fine art of balancing attachment and detachment and for the upward flow of the energy you need to become a bit detached and focus on spiritual progress.

Are you thirsty enough for the Guru?

Sad Guru seeks disciples and disciples seek the Sad Guru. They are inseparable when they meet, because they are two sides of the same coin. Here, the coin refers to the soul. Their relationship transcends lives and is beyond petty motives. The moment the word is Guru is spoken and the disciple’s heart fills with joy then at least some spiritual progress has been made by the disciple.

There is a terrible urge to see each other and the disciple feels like an orphan as long as the Guru doesn’t take him in His wings.

Sad Guru is dedicated towards the welfare of the disciples and His magnetism attracts the disciples. It is like a soulful connection and when the twain meet agony disappears and only abundant joy remains.

 

The fusion of spiritual and material supremacy!

 

Such is life that end justifies the means. Therefore, blinded by greed and ambition we get lost in the material acquisitions. In spite of all these successes, when sadness envelops us we start to look beyond the obvious. There is something that material growth fails to fulfill. This thought is a moment of divide and motivates us to delve deep inside – the seat of the soul – because happiness can be bought but joy is beyond money. It is the nature of the soul to remain joyful.

 

At this point, the seeker realizes that life is a beautiful journey where spirituality and materialism should co-exist, not compete. Only when these two shores will meet, the supremacy of the soul will be established. Until you nurture your soul, it will be a lifeless existence. Living will elude you because you are in this world for the soul. The soul is the master and if the body is not in tune with the master there will be a dis-connect just like if you water the leaves and not the roots, the tree is not going to blossom.

The Guru is the authority who makes you aware of your soulful existence. He has answers to all your doubts that have stolen your peace, but you need to be a seeker. A seeker is someone who has dropped his egos. He is without ambitions and for him Guru is the destination of his life. When you become a seeker the wisdom of Guru will flower in your soul. Your desires will manifest because in universe, what you ask, you receive.

 

Through the act of Brahma Varchasva, the Guru vanishes the spiritual and material insufficiencies from the life of a disciple. After 18 years, this momentous event is occurring once again, when all Nikhil disciples will get an opportunity to realise their maximum potential. Brahma Varchasva is the culmination of divine grace and Guru’s blessings. This once in a lifetime opportunity is going to transform you forever! Surrender to the grace of the Guru.

 

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