Are you Slave to your mind or Is mind your Slave

तुम मन के गुलाम हो
या
मन तुम्हारा गुलाम हो
मन वशीकरण

तो जगत् वशीभूत


आत्मज्ञान का अर्थ ही है स्वयं की खोज और स्वयं की खोज करने के लिए आपको कहीं बाहर की यात्रा करने की जरूरत नहीं होती। उसके लिए तो आपको अपने भीतर ही जाना होता है। अपने भीतर की यात्रा से ही हम अपने वास्तविक स्वरूप को जान पाते हैं और इस काम को करने का मतलब यह बिलकुल भी नहीं कि इसके लिए आपको अपना घर परिवार छोड़ करके जंगल में तपस्या करने जाना होगा। उसके लिए आपको अन्तर्मन की यात्रा करनी होगी।

 

एक ऐसी यात्रा जिसमें आप उस ईश्‍वर के वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करते हैं जो आपके अपने ही मन मंदिर में छुपा बैठा है और इस पूरी सृष्टि को चला रहा है।

 

जिस प्रकार बाहरी दुनिया में किसी गंतव्य स्थान पर जाने से पहले हम उसके बारे में कुछ जानकारी हासिल कर लेते हैं तो यात्रा थोड़ी आसान हो जाती है, वैसे ही अंतर्मन की यात्रा करने से पहले भी उसकी थोड़ी जानकारी हासिल करना जरूरी है। अंतर्मन यानी मन के अंदर की यात्रा।

 

हालांकि हम बचपन से ही सुनते आए हैं कि मन लगाकर पढ़ो या मन लगाकर काम करो, लेकिन क्या कभी आपने यह जानने की कोशिश की है कि ये मन लगता कैसे है? मजेदार बात यह है कि मन की इस यात्रा की शुरूआत में ही सबसे बड़े पहाड़ के रूप में हमारा अपना मन ही अवरोध बनकर खड़ा होता है, जबकि हमको तो इसी मन के भीतर जाना है लेकिन मन है कि मानता नहीं।

 

मन तो ऐसी चीज है कि उस पर काबू करना ज्यादातर लोगों को असंभव सा कार्य लगता है। मन ऐसी चीज है कि पल भर को भी स्थिर नहीं रहता। ये कभी ठहरने का नाम ही नहीं लेता। सच तो यह है कि हम मन के गुलाम बनकर जीवन गुजार देते हैं और बोलते भी हैं कि मन ये कर रहा है, मन वो कर रहा है। मन मुताबिक काम हो जाए तो हम खुश और मन के विपरीत हो जाए तो हम दुःखी हो जाते हैं।

 

मन नचाता है और हम नाचते हैं

 

दरअसल यह मन हमें बंदर की तरह नचाता रहता है। हमको लगता है कि भीतर कहीं हमारा अपना वजूद है लेकिन फिर भी हम मन को अपना स्वामी बनाकर उसके दास के रूप में हमेशा खटते रहते हैं। हम दिन रात इस मन के इशारों पर नाचते रहते हैं लेकिन यह मन हमें एक पल भी चैन से नहीं रहने देता।

 

 इसकी उड़ान की गति तो अतरिक्ष यानों से तेज और गहराई समुद्र से भी गहरी है, इसका एक छोर हमारी इंद्रियों से जुड़ा होता है तो दूसरा छोर किसी कंप्यूटर की हार्ड डिस्कनुमा हमारे चित्त से जुड़ा रहता है। हम अपनी आंख से जो देखते हैं, कान से जो सुनते हैं, मुंह से जो बोलते हैं और नाक से जो गंध लेते हैं तथा शरीर से जो स्पर्श अनुभव करते हैं वो हमारे अवचेतन से गुजरकर चित्त में अनुभव, याद्दाश्त के रूप में जमा होते रहते हैं।

 

हम जरा सा ध्यान दें तो हम अपने मन को अपने अनुभवों, याद्दाश्त अर्थात् मेमोरीज के आसपास घूमते हुए पाते हैं या अपनी इंद्रियों के जरिये मन तक पहुंचने वाले किसी ताजा दृश्य, नाम, श्रवण, गंध या स्पर्श के इर्द गिर्द ही घूमता हुआ पाएंगे। यदि किसी दृश्य, श्रवण, गंध, नाम या स्पर्श को हमारी इंद्रियों ने कभी ग्रहण नहीं किया हो हमारा मन भी उनकी ओर नहीं जाता।

 

मन में बोया जो पाया

 

उदाहरण के लिए अगर हम नाम लेते हैं ‘गुलाब’ का तो आपके मन में तुरंत गुलाब की तस्वीर आ जाती है और जरूरत पड़ने पर गुलाब से संबंधित वो सभी जानकारियां आप सोच पाते हैं जो पहले से ही आपके विवेक में, जेहन में दर्ज होती हैं। लेकिन अगर आपके सामने नाम लिया जाए ‘त्वासे’ तो आप कुछ भी नहीं सोच पाते क्योंकि जापान के इस फूल के बारे में आपके अनुभव, याददाश्त् अथवा मेमोरी में पहले से कुछ भी फीड नहीं है इसलिए आपका मन त्वासे की ओर कभी जाएगा भी नहीं।

 

कुल मिलाकर हमारा मन सिर्फ दो चीजों के इर्द गिर्द घूमता है। एक नाम, दूसरा दृश्य। हम वस्तु, पदार्थ, व्यक्ति आदि सभी चीजों को या तो दृश्य के तौर पर अपनी मेमोरी में रखते हैं या फिर नाम के तौर पर। इस तरह कोई भी नाम लेने पर दृश्य और दृश्य सामने होने पर उसका नाम स्वत: ही हमारे मन में आ जाता है।

 

अब इतना स्पष्ट हो जाने पर हम यह जान सकते हैं कि अंतर्मन की यात्रा में सबसे पहले पहाड़ के रूप में आने वाली बाधा ‘मन’ ही है यानी अपना ही मन कितनी जटिल चीज है। लेकिन जो मन हमको गुलाम बनाकर इधर-उधर भटकाता रहता है, उसी मन को अगर हम अपना गुलाम बना लें तो दुनिया में कोई ऐसी शक्ति नहीं, जिसे हम अपने भीतर जाग्रत नहीं कर सकते। एक बार अगर मन हमारी गुलामी स्वीकार कर ले, तो फिर उसको अपना मित्र बनाकर भी रखा जा सकता है। लेकिन मन की गुलामी छोड़ कर उसको अपना गुलाम बनाना ज़रूरी है।

 

इसके बगैर अंतर्मन की यात्रा शुरू नहीं की जा सकती। पर इस कार्य को किया कैसे जाये? क्या मन को गुलाम बनाना एक दिन में संभव है?

 

हमारी इंद्रियां मन की दासी हैं। वे वही कार्य करना चाहती हैं, जो मन चाहता है। मन इंद्र जैसा है। वह विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए ‘मेनका’ रूपी कामनाओं को भेजता रहता है। कभी आपने जानने की कोशिश की है कि इंद्र देवता को विश्वामित्र जैसे ऋषि की तपस्या भंग करने की क्या जरूरत थी? यह काम तो राक्षसों का था। इन्द्र तो देवताओं के राजा थे। उनको यह सब करने की क्या जरूरत थी?

 

मन रूपी इन्द्र अपना आधिपत्य हमारे सत्चित्त् बुद्धि पर स्थापित करना चाहता है, मन नहीं चाहता कि बुद्धि स्वतंत्र होकर उस पर हावी हो, इसीलिये मेनका अर्थात् कामना को भेजा। इन्द्र की दासी थी मेनका और विश्‍वामित्र अपनी कामना के अधीन हो गये।

 

ये कथाएं सत्य हैं, इनके पीछे गूढ़ रहस्य छिपे हैं। यह मन ही है, जो हमारा ‘ध्यान’ किसी एक बिंदु पर ज्यादा देर टिकने नहीं देता। वह नई-नई इच्छाओं को जन्म देता है। हमारी अत्यधिक इच्छाएं ही हमारी उन्नति में बाधक हैं। हमारी बुनियादी जरूरतों में और अंतहीन इच्छाओं में फर्क है। इच्छाओं की पूर्ति न होना ही हमारे दु:खों का कारण है। इच्छा पैदा भी मन करता है और इच्छा पूर्ति न होने पर मन ही दु:ख के भाव को जन्म भी देता है। जिसकी जितनी ज्यादा इच्छाएं होंगी, वह जीवन में उतना ही ज्यादा असंतुष्ट और दु:खी नजर आएगा।

 

कामना नियन्त्रण – इच्छा शक्ति से

 

यह सब कहने का ये अर्थ बिल्कुल भी नहीं है कि हमारे भीतर कोई इच्छा पैदा ही नहीं होनी चाहिए या इच्छाओं का होना कोई बुरी बात है। लेकिन हां, हमें ज्यादा इच्छाएं पैदा करने से खुद को रोकना जरूरी है। बहुत ज्यादा इच्छा पैदा करने से हमारी ‘इच्छाशक्ति’ क्षीण होती है। जबकि प्रबल इच्छाशक्ति ही एक ऐसी शक्ति है, जिससे पूरी तरह असंभव जैसा प्रतीत होने वाला ‘कुछ भी’ होना संभव हो जाता है। प्रबल इच्छाशक्ति से ही मनोबल पैदा होता है। प्रबल  इच्छाशक्ति और उच्च श्रेणी के मनोबल से किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है।

 

मन के यहां-वहां जाने कहां-कहां भटकने से और हमेशा चलायमान रहने से हमारी जो ऊर्जा व्यर्थ जाती है, उसे एकत्र करके जो ‘बल’ (फोर्स) जागृत होता है, वही मनोबल है।

 

विशेष परिस्थितियों में मनुष्य का मनोबल किसी तीव्र इच्छा से स्वत: ही जागृत हो जाता है।

 

सामान्य परिस्थितियों में मन को किसी एक जगह केंद्रित करना ही जटिल है। लेकिन यदि मन पर नियंत्रण करने की ठान ही लें तो यह उतना मुश्किल भी नहीं, जितना ज्यादातर लोगों को बगैर प्रयास किये लगता है। इसके लिए बस सही मायने में जिज्ञासु होना पर्याप्त है। जिज्ञासा हमें हर उस जानकारी तक पहुंचा देती है, जिसके न होने पर हमें ‘अज्ञान’ का आभास होता है।

 

प्रकाश-अधंकार की समाप्ति

 

सच तो यह है कि अज्ञान नामक कोई चीज होती ही नहीं है। जिस प्रकार हमें अंधकार’ और प्रकाश’ दो अलग-अलग चीज लगती हैं, लेकिन वास्तव में अंधकार का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है। प्रकाश की अनुपस्थिति ही हमें अंधकार होने का आभास कराती है। अंधकार तो होता ही नहीं। बस जहां रोशनी नहीं पहुंच पहुंचती, वहां हमें अंधेरा लगता है। इसी प्रकार ‘अज्ञान’ कुछ नहीं होता।

 

‘ज्ञान’ यानि किसी विषय-वस्तु की जानकारी न होने से ही हमें ‘अज्ञान’ का आभास होता है। सही जानकारी मिलते ही ‘अज्ञान’ उसी प्रकार गायब हो जाता है जैसे दीपक जलते ही अंधेरा भाग जाता है।

 

‘मन’ से संबंधित बातों को विस्तार से रखने का अभिप्राय भी यही है। अंतर्मन की यात्रा के लिए मन पर नियंत्रण जरूरी है। यह तभी संभव है, जब हमें मन का ज्ञान हो। यानी मन से जुड़ी सभी जानकारियां हासिल हों।

 

मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार

 

हमारा अंत:करण चार भागों में विभक्त होता है – मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।

 

ये चारों बेहद सूक्ष्म हैं। ये आपस में इस तरह जुड़े होते हैं कि बगैर ‘ज्ञान’ के इनमें भेद कर पाना मुश्किल है। सामान्यत: मन हमारी बुद्धि पर भी राज करता है। बुद्धि के जरिए वह हमारी इंद्रियों को निर्देश देकर ‘कर्म’ करवाते रहता हैं। हम ऐसा कोई ‘कर्म’ नहीं करते, जिसका जाने-अनजाने में बुद्धि ने इंद्रियों को निर्देश न दिया हो। यहां ‘जाने-अनजाने’ शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया है कि बहुत सारे कर्म हम बुद्धि का सही इस्तेमाल किये बगैर ही कर बैठते हैं। बस मन किया तो कर डाला।

 

वैसे तो बुद्धि इतनी शक्तिशाली है कि वह सब जानती है कि क्या सही है क्या गलत? क्या करना चाहिए, क्या नहीं? बुद्धि पल भर में ही किसी विचार का विश्‍लेषण करके उसके दूरगामी परिणामों की सटीक जानकारी देने में सक्षम होती है। लेकिन हमारा मन उसे ठीक से काम नहीं करने देता। मन एक पल में इतने अधिक विचार उत्पन्न करके बुद्धि को देता रहता है कि बुद्धि बेचारी चक्कर में पड़ जाती है कि वह किस विचार को कर्म में बदलने के लिए इंद्रियों को निर्देश दे कि – लो इसे करो।

 

बुद्धि भी आपकी – मन भी आपका

 

ऐसे में अक्सर बुद्धि बगैर विश्‍लेषण के ही इंद्रियों से कर्म करवाती रहती है। जाहिर है कि हर कर्म अपने फल को प्राप्त होता है। मन को पता होता है कि कुछ बातों को बुद्धि नहीं मानेगी तो मन उन विचारों को पैदा ही नहीं करता। जैसे यूं तो कुंए में कूदने में किसी का भी मन नहीं करेगा, लेकिन अगर मन अत्यधिक दु:खी हो जाए तो वह बुद्धि पर पूरी तरह से नियंत्रण कर उसकी विश्‍लेेषण क्षमता को खत्म कर सकता है। ऐसे में बुद्धि मन की गुलाम बनकर व्यक्ति को कुंए में कूदने को भी विवश कर देती है।

 

मन का सबसे बड़ा मित्र अहंकार होता है। एक तरफ अत्यधिक मात्रा में अनावश्यक विचार उत्पन्न कर-करके मन बुद्धि को थकाता रहता है, दूसरी तरफ अहंकार भी बुद्धि को इस हद तक दबाकर रखता है कि बुद्धि अपना अस्तित्व ही भूल जाती है। उसको बस ‘मैं ही मैं’ नजर आने लगता है। मन, बुद्धि और अहंकार से जुड़े चित्त का कार्य एकदम अलग है। हम जो कर्म करते हैं, हमारा चित्त बस सूक्ष्म रूप में उसका संग्रह कर लेता है।

 

चित्त का कार्य हर कर्म को ‘मेमोरी’ के तौर पर दर्ज करना है। सब कुछ नाम, दृश्य या अनुभूति के रूप में सूक्ष्म तौर पर रिकॉर्ड होता रहता है। हमारे मन, बुद्धि या अहंकार को जब जरूरत होती है, चित्त पल भर में उस मेमोरी’ का ऐसा चित्रण  पेश कर देता है, जैसे हम कोई फिल्म देख रहे हों।

 

निद्रा के दौरान जब हमारी इन्द्रियां निष्क्रिय होती हैं तो यही चित्तवृत्तियां स्वप्न बनकर सजीव सी प्रतीत होती हैं। हम जिस कार्य को निरंतर और बार करने लगते हैं, वह हमारे चित्त में गहरे तक बैठ जाता है। उसका इम्प्रेशन बहुत ज्यादा तीक्ष्ण हो जाता है। जैसे किसी पत्थर पर गहरी चोट कर कुछ उकेर दिया हो। ऐसे इम्प्रेशन को चित्त बार-बार मन को भेजता है या यूं कहें कि मन बार-बार चित्त से उसे लेता रहता है और बुद्धि के जरिये उसे बार-बार कर्म में परिवर्तित करवाता रहता है। ऐसे ही कर्मों को हम आदत बोलते हैं।

 

बस लगाम अपने हाथ में रखें –

 

तो इस प्रकार मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार एक चक्र, एक साईकिल की तरह है, जो एक दूसरे से जुड़कर कर्म को गति प्रदान करते रहते हैं। इस गति को देखने, इसे पहचानने के लिए हमें अपने मन की गति को नियंत्रित करना आना चाहिए। एक बार इस बे-लगाम घोड़े पर लगाम कस जाए तो हम बुद्धि के जरिए उस पर सवारी कर सकते हैं। सभी जीव-जन्तुओं में मनुष्य श्रेष्ठ है, क्योंकि उस जैसी तीक्ष्ण बुद्धि किसी जीव को प्राप्त नहीं है। ज्ञान के अभाव में यही बुद्धि, मन की गुलाम होती है और ज्ञान के जरिए इसी बुद्धि से पहले मन को गुलाम बनाया जा सकता है और फिर अंतर्मन के गूढ़ रहस्यों को भी जाना जा सकता है।

 

अपने मन रूपी अश्‍व पर नियन्त्रण रखने हेतु अर्थात् लगाम लगाने हेतु क्रियायोग साधना करें।

Are you a slave of your mind

Or

Is your mind your slave….

Control of Mind -> Victory over the world


The literal meaning of the word Enlightenment means “Discover the Self” You don’t need to tread outside to discover your own self.. You need to transcend into your own self to make this discovery. We can find our true nature only by travelling inside our own self. Meditating into a forest, leaving your own family is not required to achieve this. Instead, you need to travel into your own inner mind.

This is a journey in which you strive to understand the true nature of God who is  hidden inside your own mind and is driving this creation.

In the external physical world,  before starting on any trip, we  generally make plans and try to get some basic background information to ease our journey.  Similarly, it is necessary to obtain some  prior information before starting to tread into our inner mind.  Inner mind means inside our own mind.

Although we have been told innumerable times since our childhood to apply our mind  to work or to study, have you ever tried to find out how to actually apply our mind?  The funny thing is that the mind itself poses the biggest resistance at the onset of this particular  journey.  We desire to enter our mind,  but our mind does not allow us to proceed.

The mind is such a major obstacle that most people find it almost impossible to control it. The mind does not stay still even for a single moment. The real truth is that we spend all our life under the control of our mind.  We do not feel bad in publicly stating the desires of our mind. We feel very happy if work gets done according to our mind, and any contrary action makes us sad.

 

We dance to the tunes of our mind

This mind treats us as its slave and makes us dance to its wishes like a  stage monkey.  We do feel our specific existence somewhere within us, but we allow the mind to beat us like a slave. We spend our entire life dancing to its tunes, but this mind does not allow us to rest even for a single moment.

It is faster than the speed of light, and its depth is deeper than the ocean abyss. One end of our mind is connected to our senses, while the other end is connected to our memory. Whatever we see from our eyes, listen from our ears, speak from our mouths, smell from our nose or touch from our skin, passes through our subconscious and continue to accumulate in the form of memories and experience in the mind.

If we pay a little attention, we will certainly find our mind roaming around our experiences and memories. Or we will find it transcending around the results of our senses eg some specific scenes, sound, smell or touch. Our mind will not focus on anything which we have never seen, heard, smelt or touched.

 

Actions germinate in mind

For example, if we utter the name of “Rose” flower, then immediately a picture of rose flower flashes through our mind, and we can recall all the information details which are already registered in our memory conscience. However, if someone utters the name “Twase”, then our mind will be absolutely blank since our memory does not contain any information about any details or experience about these Japanese flower. So your mind will not be able to focus on “Twase”.

In summary, our mind revolves around just two items – first is the name and second is the picture. We store every object, substance or person in our memory either as a visual image or as a named item. Thus our mind can easily recall the visual upon hearing the name , or recall the name upon viewing the visual.

Now, as this principle becomes more clear,  we realize that the first obstacle in the journey to inner mind is our “mind” itself. Our mind is a very complex entity. We are slave to this mind of ours. However, if we enslave this mind, then nothing in this whole wide  world will be out of our reach. Upon enslaving, we can also force our mind to become our friend.  However it is important to free oneself from the slavery of the mind, and to enslave this mind itself.

We cannot start our journey to the inner mind without accomplishing this.  But how to achieve this?  Is it possible to enslave our mind within a day?

Our senses are the servants of the mind. They want to do whatever the mind wants to do.  The mind is like the Indra. It keeps on sending wishes-desires like “Menaka” to disturb the penance of Sage Vishwamitra. Have you ever wondered why a God like Indra needed to disturb the penance of  a sage like Vishwamitra? The demons do such deeds. Indra was the king of Gods. Why did he need to do all this?

The Indra i.e. our mind wishes to  establish its control over our conscience-intellect. It does not want the intellect to attain freedom and control it. Therefore it sends desires like Menaka. Menaka was a servant of Indra and Vishwamitra became a subject of her desires.

These stories are true, mysterious facts are encapsulated within them. This mind does not let us concentrate or focus on a particular point for a long duration. It releases new kinds of desires and wishes. Our excessive desires hinder  our progress.  There is a difference between our basic needs and infinite desires. The cause of our sorrow is non-fulfillment of desires. The mind germinates the desires, and it also causes us to feel sad on non-fulfillment of them. The more desires one has, the more dissatisfied and sad that person will be.

 

Control Desires –  Through Will-Power

The purpose of stating the above facts does not imply that we should not have any desire or that it is a bad habit to have a  desire. However, we should control ourselves from having excessive desires. Creation of  too many desires weakens our “will-power”. A strong will-power can easily enable us to accomplish even impossible-looking tasks. We can achieve any goal through a combination of strong will-power and high motivation.

The ever wondering mind makes us waste lot of energy. The force which can be generated by focusing this energy is called as Motivation.

The motivation of a person automatically increases manifold in special circumstances of intense desires.

Under normal circumstances, it is complex to concentrate the mind to a single point. However, it is not that difficult, if we decide to accomplish it. Some people can control their mind easily. Curiosity and inquisitive nature is enough to accomplish it. The curiosity leads us to every type of information, the absence of which, causes an illusion of “ignorance”.

 

Light – Termination of Darkness

The real  truth is that there is nothing called ignorance.  We generally consider  darkness and light as two separate entities. However, in reality the darkness has no existence. We feel darkness only in the absence of light. Darkness does not exist. The place which does not receive light, is known as a dark place. Similarly there is nothing called “ignorance”.

“Knowledge” i.e. the absence of information about any topic causes us to feel ignorant. The ignorance vanishes immediately upon receipt of correct knowledge, as darkness vanishes upon lighting a lamp.

This is also the principle of keeping detailed information in the mind. Control over mind is mandatory for journey into the inner mind.  It is possible only when we have enough knowledge about the mind i.e. when we become aware of all information related to the mind.

 

Mind-Intellect-Memory-Ego

Our inner-mind  is divided into four parts – Mind, Intellect, Memory and Ego.

All of these four entities are extremely subtle.  They are interconnected so intricately that it is difficult to differentiate between them in absence of “knowledge”.  Generally mind controls our intellect. It utilizes the intellect to get the senses to perform various actions. Our senses do not perform any action which has not been instructed by the intellect knowingly-unknowingly. Here we have used the term “knowingly-unknowingly” because we perform a number of actions without involving the intellect. We act directly on instructions from the mind.

The intellect is very powerful. It can easily distinguish between right and wrong. It can easily decide between “What to do” and “what not to do”. The intellect can immediately analyze a situation within a fraction of a moment to provide  accurate information about the future implications and  consequences. However our mind does not let it operate properly. The mind generates and transmits so many thoughts to the intellect that it gets confused about which thought to choose to act upon.

 

The Intellect is Yours. The Mind is yours too

In such cases, the intellect instructs the senses to perform actions without doing any analysis.  Obviously every action results in corresponding consequences. The mind knows that the intellect will not act on  some thoughts, and therefore it does not invoke those thoughts. For example, generally nobody’s mind will generate a thought to jump into a well. However, if the mind becomes very sad, then it can suspend the analyzing capability of the intellect. In such cases, the intellect also becomes a slave of the mind, and can force a  person to jump into the well.

Ego is the best  friend of mind. On one hand, the mind generates unnecessary thoughts in excessive amounts, to tire out the intellect. Secondly, the ego suppresses the intellect to such an extent that the intelligence forgets its own existence. The person starts thinking only about “I,  Me and Myself”. The memory is linked to the mind, intellect and ego. However, it has a totally different function. Whatever we do, the memory records the action in a  subtle form.

The function of the memory is to record each and every action.  Everything gets recorded in a subtle form of name, visual or cognitive-experience. Whenever our mind, intellect or arrogance express requirement for a particular recollection, our memory provides a vivid illustration within a  moment, like a movie.

During slumber, when our senses are inactive, these memories express as dreams. Whatever task we repeatedly perform, it gets sharply impressed within our memory, like a deep engraving on a stone. The memory repeatedly sends this impression to the mind, or rather the mind keeps obtaining these impressions from the mind, and gets them converted into actions through the intellect. Such actions are termed as the habit.

 

Retain control with yourself –

Thus the combination of mind-intellect-memory and ego act as the two wheels of a bicycle, which continue to perform actions by working in tandem. We should learn to control the pace of our mind to recognize and comprehend this pace. We can easily ride on this bicycle through our intellect, once we learn how to control it. The human species is the most excellent of all creatures, since no other animal species possess such a  strong intellect. This intellect serves as a slave to the mind in absence of knowledge. However, we can enslave the mind through the intellect  after acquiring the knowledge. We can even peer into the intriguing mysteries of inner mind through this process.

Perform Kriya Yoga Sadhana to control your mind.

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