An auspicious start for Good Life

मुक्त जीवन का शुभारम्भ

 

गृहस्थ जीवन में वैराग्य
आनन्द से परमानन्द की यात्रा

 

मैं कौन हूं?, मैं ये सभी कार्य किसके लिये कर रहा हूं?, मैं क्यों ये सभी कार्य कर रहा हूं? क्या शरीर से ही मेरा जीवन शरीर प्रारम्भ होता है और क्या शरीर समाप्ति के बाद यह मेरा जीवन समाप्त हो जायेगा?

 

 पतंजलि योग सूत्र वास्तव में भारतीय दर्शन का सम्पूर्ण विवेचन और दर्पण ही है जो वेद, उपनिषद्, पुराण, महाभारत, रामायण, भागवद् का सारभूत तथ्य स्पष्ट करता है। आज से हजारों वर्ष पूर्व पतंजलि ॠषि ने जीवन के प्रत्येक सूत्र की विशद् व्याख्या की थी। उनका प्रत्येक अध्ययन स्वः अनुभव पर आधारित था। उनके द्वारा प्रदत्त गृहस्थ, संन्यास, वैराग्य के सूत्र कालजयी हैं। ये सूत्र सम्पूर्ण मानव समाज को सदा-सर्वदा दिशा निर्देश प्रदान करते रहेंगे।

 

पतंजलि के समक्ष यह प्रश्‍न उपस्थित हुआ कि –

 

  • गृहस्थ जीवन क्या है?
  • संन्यास जीवन क्या है?
  • क्या गृहस्थ जीवन की समाप्ति से ही संन्यास प्रारम्भ होता है?
  • क्या दोनों में कोई सामंजस्य है?
  • क्या दोनों जीवन एक साथ जीए जा सकते हैं?
  • क्या संन्यास से पुनः गृहस्थ में आया जा सकता है?

 

इन सब प्रश्‍नों पर उन्होंने मंथन किया और प्रथम सामान्य सूत्र यह प्रतिपादित किया कि गृहस्थ और संन्यास अलग-अलग नहीं हैं। संन्यास जीवन कोई अलग जीवन नहीं है। इस हेतु उन्होंने एक नवीन सूत्र दिया जिसे ‘वैराग्य’ सूत्र कहा जाता है।

 

पतंजलि ने कहा कि – प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में इन्द्रिय सुख अर्थात् शरीर के अंगों से प्राप्त सुखों को सम्पूर्ण रूप से प्राप्त करना चाहता है। इस इन्द्रिय सुख के आधार पर ही उसके जीवन में रिश्ते-नाते बनते हैं, उसके जीवन में आपसी व्यवहार होता है। उसके जीवन में लालसा, कामना, इच्छा उत्पन्न होती है। सब कुछ शरीर से प्रारम्भ होता है और शरीर की अनन्तः कामनाओं का विस्तार यह दृश्यमान संसार है।

 

पांच शरीर इन्द्रियां-स्वादेन्द्रि, रसेन्द्रि (जिह्वा) श्रवणेन्द्रियां (कान) स्पर्शेन्द्रियां (त्वचा) , दृश्येन्द्रियां(आंखे), घ्राणेन्द्रियां(नाक) तथा कर्मेन्द्रियां (हाथ-पांव) से वह संसार के कार्य सम्पन्न करता है। इन्हीं शरीर इन्द्रियों का कार्य वाणी, स्पर्श, जनन, श्रवण और दृश्य हैं। इनसे ही सारी कामनाएं उत्पन्न होती हैं। यद्यपि ये जीवन का आधार है लेकिन कभी कभी व्यक्ति इन इन्द्रिय सुखों से संतप्तः हो जाता है और विचार करने लगता है कि क्या इसके अलावा भी जीवन में कोई और तत्व है?

 

क्या संतान, नौकरी, व्यापार, भ्रमण, रिश्ते, नाते, शरीर सुख के अलावा भी जीवन में अन्य कोई विशेष वस्तु है। जब यह भावना उसके मन में आती है तो उसके जीवन में एक अजीब प्रकार की प्यास उत्पन्न होती है। सबसे पहले तो मनुष्य इन पांच इन्द्रिय सुखों के पीछे ही भागता है लेकिन इस भागदौड़ में थक भी जाता है तो उसे यह विचार आता है कि मैं कौन हूं?, मैं ये सभी कार्य किसके लिये कर रहा हूं?, मैं क्यों ये सभी कार्य कर रहा हूं? क्या शरीर से ही मेरा जीवन शरीर प्रारम्भ होता है और क्या शरीर समाप्ति के बाद यह मेरा जीवन समाप्त हो जायेगा?

 

ऐसा मंथन आने पर वह आकुल-व्याकुल हो जाता है। उस स्थिति में उसके मन में एक विशेष प्रकार की भावना आती है। जिसे वैराग्य कहा गया है। यह वैराग्य का भाव बड़ा ही महत्वपूर्ण है।

 

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्यवशीकार संज्ञा वैराग्यम्

 

जब मन स्वयंमेव से इन इन्द्रिय सुखों के पीछे दौड़ना-भागना बंद कर देता है और जो उसने अपने मानस में जो अनुभव किया होता है अथवा जो उसने कहीं सुना, कहीं पढ़ा होता है, उस सत्य को जानने को उत्सुक हो जाता है। यह उत्सुकतावस्था उसकी इन्द्रिय सुखों की प्यास को अथवा उन्हें पाने की प्यास को थाम देती है। उस नियन्त्रित कर देती है। मन की इस अवस्था को ‘वैराग्य’ कहा गया है। इसे ही ‘निर्वासना’ कहा गया है।

 

दृष्ट सुख

 

प्रत्येक मनुष्य के जीवन का सामान्य सुख ‘दृष्ट सुख’ कहलाता है। ‘दृष्ट सुख’ का अर्थ है – अपनी इन्द्रियों से प्राप्त होने वाला अनुभव, उसका सुख और उस सुख के लिये प्राप्त की गई वस्तुएं। इस कारण दृष्ट सुख इन्द्रियों की पहुंच के भीतर होते हैं और उनके अनुभव भी दृष्ट अनुभव कहलाते हैं। मैंने देखा है, मैंने भोगा है, मैंने पाया है, मैंने अनुभव किया है। यह सब दृष्ट सुख कहलाते हैं। इस दृष्ट सुख में पीड़ा भी हो सकती है और हर्ष भी हो सकता है।

 

अनुश्रविक सुख स्तर

 

इससे परे (हटकर ऊपर की और) जीवन का एक और स्तर होता है, जिन्हें अनुश्रविक कहा जाता है। ये वे वस्तुएं होती हैं जिनका व्यक्ति ने स्वयं अपनी इन्द्रियों से तो कोई अनुभव नहीं किया लेकिन उसके बारे में कहीं न कहीं पढ़ा या सुना अवश्य होता है, किसी और से ये जो पढ़ा सुना जाता है यही अनुश्रविक ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया है इसे ‘वैराग्य’ का प्रथम सोपान कहा गया है। यह वैराग्य की पहली सीढ़ी है।

 

वैराग्य पूर्ण रूप से एक बौद्धिक प्रक्रिया है। वैराग्य का कोई सम्प्रदाय नहीं है और यदि आप यह सोचते हैं कि वैराग्य के लिये वर्तमान जीवन को पूरी तरह बदलना पड़ेगा तो यह सही नहीं है। हमने संन्यास को वैराग्य मान लिया है। इसीलिये हमने संन्यास और गृहस्थ को अलग-अलग छोर पर बिठा दिया है और यह गलत सिद्धान्त बना लिया है कि गृहस्थी  में जब तक व्यक्ति है तब तक केवल गृहस्थी ही रहेगा और केवल गृहस्थी छोड़कर ही संन्यासी हो सकता है और संन्यासी व्यक्ति को गृहस्थ जीवन से क्या मतलब? क्या लेन-देन?

 

मूल भाव है – वैराग्य। यदि वैराग्य की स्थिति नहीं है तो इन्द्रिय सुखों का आकर्षण उसी प्रकार बना रहेगा जैसे पहले था तो ऐसा संन्यासी भी पूर्ण तरह से गृहस्थी ही है। उसने केवल वस्त्र बदल लिये हैं, वेशभूषा बदल ली है उससे कोई मूलभूत अन्तर नहीं पड़ सकता है। मूलभूत अन्तर तब हो सकता है जब वैराग्य की स्थिति आये मन के भीतर से उपभोग की पिपासा मिट जाए। संन्यास का मूल आधार वैराग्य है और यह गृहस्थी में भी संभव है और संन्यास में भी संभव है। सीधी-सरल बात कहें तो जब हम वस्तुओं के पीछे भागना बंद कर देते हैं, केवल और केवल इन्द्रिय सुख की कामना के पीछे ही दौड़ना छोड़कर अपने आपको मनः स्थिर कर लेते हैं तो हम संन्यास के मूल भाव ‘वैराग्य’ को धारण सकते हैं।

 

गृहस्थ में वैराग्य

 

पतंजलि स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हम समाज में रहकर अपनी सारी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए भी अपने भीतर वैराग्य का भाव ला सकते हैं। वैराग्य के लिये अपने कर्त्तव्य से विमुख होना और सब कुछ छोड़ देना आवश्यक नहीं है।

 

आप अपने सारे निर्धारित कार्य करते रहिये लेकिन इसके साथ ही साथ जीवन में न राग रखिये, न द्वेष रखिये। सारी पीड़ा का आधार राग और द्वेष ही हैं। जब तक ये दो महादोष, महाशत्रु रहते हैं तो अवचेतन मन में पीड़ा का अनुभव होता है। शरीर की पीड़ा से मन की पीड़ा निश्‍चित रूप से गंभीर है। इस पीड़ा को निकालने के लिये मानसिक रूप से वैराग्य का भाव अपनाना आवश्यक है।

 

इसी बात को तो गीता में समझाया गया है। गीता का सूत्र है कि – मनुष्य अपने इसी जीवन में अपने सांसारिक जीवन में अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी मुक्त हो सकता है जीवन मुक्त हो सकता है, पर वह एक प्रमुख बात को ध्यान में रखे जो मुक्ति के लिये आवश्यक है-कि वह स्वयं को अपने कार्यों के अच्छे और बुरे परिणामों से पृथक रखे।

 

इसके लिए आपको स्वयं से प्रश्‍न करना होगा कि आपके हाथ में क्या है? कार्य करना और आप अपना प्रत्येक कार्य अच्छे के लिये ही करते हैं। यह संभव है कि आपने अच्छे के लिये कार्य किया है लेकिन उसका परिणाम समुचित प्राप्त नहीं हुआ है आपके मन के अनुसार परिणाम प्राप्त नहीं हुआ अथवा समय पर प्राप्त नहीं हुआ है। यह भी हो सकता है कि परिणाम जैसा आपने सोचा था वैसा नहीं मिला है लेकिन जब आप अपने कार्यों के फल के साथ अपने आपको जोड़ देते हैं तो आपके सुख और दुःख दोनों की मात्रा बढ़ जाती है। जब परिणाम अनुकूल होता है तो आप सुख का अनुभव करते है है और जब परिणाम में प्रतिकूलता आती है तो आप उसी अनुरूप तीव्रतम् दुःखी हो जाते हैं। यह सुख और दुःख की अतिरेक की स्थिति आपको बहुत विचलित कर देती है।

 

सदैव चलें वैराग्य की ओर

 

साधक के जीवन का उद्देश्य क्या है? वह वैराग्य भाव की ओर बढ़े। उसके लिये वह ध्यान, जप, तप के मार्ग पर आगे बढ़ता है। आन्तरिक सुख के मार्ग पर आगे बढ़ता है तो सबसे पहले यह आवश्यक है कि आन्तरिक जीवन में वर्जनाएं, दमन और कुण्ठा न हो। साधक का मानसिक तल एकदम त्रुटि रहित हो। इस बात का बहुत महत्व नहीं है कि मनुष्य अपने बाह्य जीवन में क्या करता है?

 

एक उदाहरण बताता हूं – कबीर जुलाहे का काम करते थे, रेदास मोची का काम करते थे और संन्यासियों की तरह वस्त्र एवं जीवन भी नहीं जीते थे, बाह्य जीवन में आप क्या काम कर रहे हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है। आन्तरिक जीवन में कहीं कोई कुण्ठा, दमन, रोक, वर्जना अथवा स्वयं पर अत्याचार नहीं होना चाहिए।

 

अपने भीतर सब है

 

इसीलिये वैराग्य का प्रारम्भ सदैव व्यक्ति के भीतर से होता है, इस बात का कोई महत्व नहीं है कि आप क्या पहनते हैं? कैसे स्थान पर रहते हैं? कैसे व्यक्ति आपके आस-पास हैं? सफेद कपड़े पहने हुए हैं या लाल कपड़े पहने हुए हैं। चार मालाएं हैं या कोई माला नहीं है, दिगम्बर हैं या वस्त्र सहित हैं। ये सब बातें संन्यास और वैराग्य के लिये बिल्कुल ही आवश्यक नहीं हैं। वैराग्य और संन्यास को वेशभूषा, शरीर आकृति, कार्य से नहीं नापा जा सकता। आपके लम्बे बाल हैं या नहीं हैं, बाल आपने बिल्कुल साफ करा दिये हैं। ये सब बातें वैराग्य भाव के लिये बहुत महत्वहीन हैं।

 

वैराग्य हमें क्या प्रदान करता है? 1. संतुलित मनोवृत्ति, 2. प्रेम, 3. करुणा, 4. विभिन्न कार्यों के परिणाम के प्रति असंलग्नता (परिणाम से अविचलित होना)।

 

इस प्रकार वैराग्य मानसिक शांति और पवित्रता की अभिव्यक्ति होता है। जिस साधक में वैराग्य आ जाता है, उसकी सुख और शांति सदैव बाधा रहित और अपरिवर्तित होती है। वह घटनाओं के शुभ और अशुभ परिणाम पर निर्भर नहीं करती। उसकी मानसिक शांति चिरन्तन स्थायी रूप से उसके साथ स्थापित हो जाती है। यही वैराग्य और संन्यास की सुन्दरता है।

 

अब प्रश्‍न उठता है कि यदि व्यक्ति ध्यान के द्वारा समाधि की स्थिति में जा सकता है तो उसके लिये वैराग्य का होना या न होना कहां आवश्यक है? कई लोग कहते हैं कि योग, प्राणायाम, ध्यान द्वारा साधक अपने मानसिक स्तर को ऊपर उठा सकता है। उसे परिष्कृत कर सकता है। इसीलिये बार-बार कहा जाता है कि – योग, प्राणायाम और ध्यान संन्यास का द्वार हैं लेकिन यह बात पूर्णतः तर्क और विश्‍वास की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

 

आप अपने मन का निष्पक्ष भाव से विश्‍लेषण करें। आपके मन के गहरे तल में, अवचेतन मन में अनेक इच्छाएं, वासनाएं, कामनाएं, महत्वाकांक्षाएं आदि भरी पड़ी रहती हैं। जिन्हें व्यक्ति पूरा करना चाहता है और ये अतृप्त इच्छाएं, वासनाएं, अवश्य ही द्वंद्व और तनाव को जन्म देती हैं। हम अपने दैनिक जीवन में अवचेतन मन के इन तनावों से, इन द्वंद्वो से भले ही परिचित नहीं हों लेकिन इनके रहते मन को शांत कर पाना तो अत्यन्त दुष्कर होता है। दैनिक साधना, दैनिक ध्यान, दैनिक प्राणायाम द्वारा अपने मन की इच्छाओं, कामनाओं पर नियन्त्रण करने का प्रयास अवश्य करते हैं लेकिन पूर्ण रूप से शांत होने के लिये अपने भीतर के इन तनावों से स्वयं को मुक्त करना सबसे आवश्यक है।

 

यह है वैराग्य का, संन्यास का प्रथम सूत्र। जब मनुष्य अपने आपको, अपने आन्तरिक तनावों से मुक्त कर ले।

 

अवचेतन मन की पीड़ा

 

प्रत्येक मानव मन में पांच मूलभूत वासनाएं, इच्छाएं होती हैं। जो मनुष्य की इन्द्रियों से उत्पन्न होती हैं। जिन्हें अवचेतन की पीड़ा कहा गया है। इन आन्तरिक पीड़ाओं से मुक्ति आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो साधक को आन्तरिक रूप से शांति और स्थिरता प्राप्त नहीं हो सकती है। मूल भाव है भीतर ही भीतर समाधि लगे और समाधि का अर्थ है – अन्तःर्मन में शांति हो, संन्यास का भाव ही वैराग्य और आन्तरिक समाधि है। मूल बात है कि अवचेतन की पीड़ा से अपने आपको मुक्त करना ही लक्ष्य है।

 

आनन्द का प्रारम्भ

 

सामान्य मनुष्य का यह स्वभाव है कि उसे संसार में वस्तुओं के प्रति, स्थान के प्रति, अपने शरीर के प्रति, दूसरों के प्रति या तो आकर्षण होता है अथवा इसके विपरीत अरूचि होती है। राग और द्वेष दोनों ही स्थितियां रहती हैं। इसी से मन लबालब भरा हुआ होता है। अब साधक के जीवन में जब वैराग्य की स्थिति आती है तो वह अपनी इच्छा, अपनी कामना, अपनी घृणा, अपनी मानसिक हिंसा पर नियन्त्रण करने का प्रयास करता है। इस अवस्था को राग, द्वेष पर विजय प्राप्त करने के लिये संघर्ष की अवस्था कहा गया है। यह स्थिति सामान्य रूप से साधना द्वारा किसी न किसी रूप में प्राप्त हो ही जाती है। इन पर पल-प्रतिपल नियन्त्रण रखना होता है और नियन्त्रण के लिये तो निरन्तर संघर्ष करना पड़ता है। आगे संन्यास का अगला अध्याय…।
Sanyaas Diwas Special

14 November 2016

Kartik Poornima

 

Launch of Liberated Life

Asceticism in Domestic Life

From Joy to Ecstasy

 

Who am I?, For whom I am doing all this work? Why am I doing all these work? Does my life start with this body and will my life terminate after death of this body?

 

Patanjali Yoga Sootra is the absolute description and reflection of the Indian philosophy, which explains the essential summary of the Vedas, Upanishads, Puranas, Mahabharata and Ramayana. Rishi Patanjali had created detailed explanations of each essential element of life thousands of years ago. Each study was based on self-experience. These classic principles about Domestic, Ascetic and Abstainers are immortal. These principles will continue to guide the human society for ever.

The question that arose before Patanjali were-

  • What is family-domestic life?
  • What is ascetic life?
  • Does asceticism start only after termination of domestic life?
  • Is there any compatibility between the two?
  • Can both lives be led together?
  • Can one return back to domestic-life from asceticism?

 

He analysed all these questions and postulated the first general principle that the domestic and asceticism are not separate. Asceticism is not a different life. He initiated a new principle in this context which is called Detachment Principle.

Patanjali stated- Every person wishes to obtain the full sensual pleasures i.e. the pleasures derived from different parts of the body. These sensual pleasures are the basis for creation of relationships in his life and mutual interaction. These trigger the passions, longings, wishes and desires in his life. Everything starts from the body, and this entire physical world is a manifestation of expanding infinite desires of the body.

He accomplishes his worldly tasks through his five physical senses – Swaadendri, Rasendri i.e. Taste (Tongue); Shravanendriyaan i.e. listen (Ears); Sparshendriyaan i.e. touch (Skin); Drishyendriyaan i.e. vision (Eyes); Ghraanendriyaan i.e. smell (Nose) and Karmendriyaan i.e. limbs (Hands-Legs). These physical senses provide speech, touch, generation, hearing and sight. All desires are created from them. Although these form the basis of life, but sometimes the man gets tired of them and starts exploring for any other element in the life.

Is anything else more important than children, job, business, travel, relationships and physical desires. This thinking generates a strange thirst in his life. Initially the man runs after these five sensual pleasures, but when he gets tired of them, he ponders – Who am I? I am doing all this work for whom? Why am I doing all these work? Does my life start with this body and will my life terminate after death of this body?

Such thinking shakes him and causes distraught state. This restlessness generates a special emotion in his mind. This emotion is termed as Detachment. This feeling of detachment is very significant.

 

Drishtaanushra vikavishayavirtakshna syavashikaara Sangyaa Veiraagyam

When the mind automatically stops running after these desires and becomes curious to know the truth which it would have experienced, read or heard somewhere. This curiosity halts his thirst for the sensual pleasures. It controls the senses. This mental condition is called as Veiragya (Detachment). It is also called as “Nirvasana

 

Visible Pleasures

Generally each pleasure of every human being is called as “Visible Pleasure“. “Visible Pleasure” means – the feelings and experiences generated from the senses, its pleasure, and objects used to obtain that pleasure. Therefore the Visible Pleasures are embedded within the senses and its experiences are also called as Visible Experiences. I have seen, I have lived, I have found, I have experienced. All of these are termed as Visible Pleasures. These Visible Pleasures may provide either pain or happiness.

 

Inner Pleasure Level

Beyond the Visible Pleasures, there is an elevated level which is called as “Anushravik“. A person would not have experienced these pleasures through his own senses, but he would have heard-read from somewhere. Reading-Hearing from someone else is the initial process to obtain this “Anushravanik Wisdom“, this is called as the first level towards detachment. This is the first step of detachment.

The Detachment or Stoicism is a strictly intellectual process. There is no specific community around detachment and you are mistaken if you feel that you will need to completely change your life to attain detachment. We have assumed asceticism as detachment. So we have set Asceticism and Domesticity on two different edges and have created a wrong doctrine to separate the two. We wrongly feel that a domestic householder can become an ascetic only upon leaving the domestic life. We have separated domestic-householder and ascetic, with no interactions between the two.

The basic element is – Detachment. The attraction towards physical pleasures will continue in absence of detachment, and such an ascetic is completely like a domestic-householder. He has only altered his clothes and costumes, but there is no fundamental difference between the two. The fundamental difference can arise only when feeling of detachment comes from within, when the thirst for consumption terminates from the mind. Detachment is the fundamental basis for asceticism. Detachment is possible both within the family-domestic life and the renunciation-ascetic life.  Simply stated, we can adorn the detachment when we stop rushing after physical objects, and stabilize our mind instead of rushing to quell the sensual thirsts.

 

Detachment in Domestic Life

Patanjali clearly stated that we can bring the inner feeling of renunciation within ourselves even when completing all responsibilities of family and community while living in our society. Renunciation does not mean termination of responsibilities and leaving everything.

Continue to perform all the required tasks in your life, but remove the attachment and malice from your life. Passion and Prejudice are the basis for all suffering in life. Both of these imperfections are our arch-enemies, and they cause pain to our sub-conscious. This mental pain is more serious than the physical pain. It is important to follow mental detachment to eradicate this suffering.

Gita also explains same thought. The essence of Gita is – A person can stay liberated in this physical life while discharging his responsibilities, and can lead a free life. However keep one primary thought in mind to attain this liberty – Maintain distinct distance from the good and bad consequences of your action.

For this you will have to question yourself that what can you control? You can only perform work, and you already perform all of your tasks with noble intentions. It is possible that you performed the task well, however you did not obtain the proper result, or the result was different from your wish, or you received the result late. It is also possible that you did not get the results as per your desire. When you merge yourself with the results of your actions, then the quantity of your happiness and sorrow enhances. You feel very happy when you get the desired result, and similarly you feel very bad when you do not get the desired result. These extremes of happiness and sorrow causes high mental disturbance.

 

Always walk towards detachment

What is the goal of a Sadhak’s life? To move towards detachment state. He progresses on the path of meditation, chanting and penance. When he moves towards inner peace, then it is essential that the inner life should be free from deprivation, oppression and frustration. The mental state of the Sadhak should be completely free from any defect. What a person does in his physical world is not significant.

Let me quote an example – Kabir used to work as a weaver, Redas used to work as a cobbler, and they did not dress or live like the ascetics.  Whatever you are doing in the physical worldly life is not important. There should not be any frustration, repression, restriction, or self-torture in the inner life.

 

Everything is within us

Therefore, the detachment always starts from within. It is not important what you wear, where you live, or what type of people are with you. It is inconsequential whether you are wearing white or red clothes. It does not matter if you are wearing four rosaries or no rosary. It is insignificant if you are digambar (naked) or wearing any cloth. All these facts are completely insignificant for asceticism or detachment. You cannot quantify detachment and asceticism with clothes, body structure, or work. It is completely unimportant for detachment whether you have long hair, or no hair, or if you have shaved off all your hair.

 

What do we get from detachment?

  1. Balanced attitude
  2. Love
  3. Compassion
  4. Stability unshaken by the results of various actions

Thus detachment is the expression of mental peace and purity. Arrival of detachment within a Sadhak’s life ushers in uninterrupted and unchangeable happiness and peace. His happiness does not depend on good or bad results of events. His mental peace gets set for ever. This is the beauty of detachment and asceticism.

Now a question arises that if the person can enter the Samadhi state through Dhyaan, then what is the importance of detachment to him. Many people say that a Sadhak can elevate his mental consciousness through Yoga, Pranaayam and Dhyaan. He can refine his mental state. Therefore it is repeatedly stated that Yoga, Pranaayam and Dhyaan are the entry doors to Asceticism but this fact does not meet the test of logic and faith.

Perform a honest and fair analysis of your mind. Your mind and mental subconsciousness is pack-filled with multiple desires, passions, wishes and ambitions. The person wants to fulfil them, and these unquenchable desires and passions generate conflict and stress. We may not be familiar with the stresses and conflicts within our subconscious mind, but these do not let us to calm our mind. We try to control our mental desires and wishes through daily Sadhana, daily meditation and daily Pranaayam; but it is very important to liberate ourselves from these inner stresses.

This is the first principle of the detachment and the asceticism. When  a person liberates himself from his inner stresses and conflicts.

 

Suffering of the subconscious mind

Every human mind has five basic senses and desires which arise from the physical senses. These are termed as the pains of the subconscious mind. It is necessary to obtain freedom from these inner pains. These do not let the Sadhak achieve inner peace and stability. The basic fact is that – the Samadhi should be generated from within, and Samadhi means – peace within inner mind. The expression of asceticism is detachment and inner Samadhi. Basically our goal is to obtain freedom from this inner suffering.

The initiation of Joy

It is a normal human nature that he either has attraction or hatred towards various worldly objects, places, own body, and others. He either has attachment or prejudice. The mind is pack-full of these emotions. The arrival of detachment within the Sadhak causes him to control his wishes, desires, hatred and mental violence. This state of conquering attachment and prejudice is termed as the state of inner conflict. Normally the Sadhak reaches this state in one or other form during Sadhana. He has to constantly control this at every moment, and therefore, has to eventually struggle to exert this control.

Continued.  Next Step of this Asceticism.

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