Aadya Shakti Bhagavati Durga

 

महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती –   ये तीनों नाम जगन्नियन्ता परमात्मा की चितिशक्ति के हैं। शास्त्रकारों का दृढ़ विश्‍वास है कि परमात्मा को स्वरचित सृष्टि की मर्यादा रक्षार्थ युग-युग में अपनी अलौकिक योगमाया का आश्रय लेकर पुरुष या स्त्रीरूप से अवतीर्ण होना पड़ता है। जब वे पुरुषवेष में अवतार लेते हैं, तब जगत् उनकी ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि नामों से स्तुति करता है और जब वे स्त्रीरूप से जगत् में अवतीर्ण होते हैं, तब उन्हें महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती कहते हैं।

 

जिस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, महेश- सत्त्व, रज और तम प्रधान हैं, उसी प्रकार चितिशक्ति के ये तीनों रूप भी सत्त्व, रज और तम आदि गुणों की अधिकता के अनुसार वेश धारण करते हुए तद्गुणानुरूप कार्य करते हैं।

 

चितिशक्ति के तम प्रधान रौद्ररूप को महाकाली कहते हैं, जो प्रधानतया दुष्टों का संहार करती हैं।

 

चितिशक्ति के सत्त्वप्रधान वैष्णवी रूप को महालक्ष्मी कहते हैं जो जगत् का पालन करती हैं।

 

चिति शक्ति के रज प्रधान ब्राह्मीशक्ति को सरस्वती कहते हैं, जो जगत् की उत्पत्ति और उसमें ज्ञान का संचार करती हैं।

 

दुर्गासप्तशती में चितिशक्ति के इन तीनों स्वरूपों की उत्पत्ति-कथा इस प्रकार है-

 

स्वारोचिष प्रथम मन्वन्तर में चक्रवर्ती राजा सुरथ राज्य करता था। एक समय शत्रुओं द्वारा पराजित होकर वह अपने राज्य में आकर शासन करने लगा,परंतु वहां पर भी उसके शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया, जिससे दुःखी होकर वह शिकार के बहाने से वन में जाकर मेधा मुनि के आश्रम में रहने लगा। परंतु वहां भी उसे रात-दिन अपने राज्य, कोष आदि की ही चिन्ता घेरे रहती थी। एक समय राजा आश्रम के निकट घूम रहा था कि उसकी दृष्टि एक वैश्य पर पड़ी। उसे उदास देखकर राजा ने पूछा कि ‘तुम कौन हो और यहां किसलिये आये हो? तुम्हारा मुख उदास और चिन्तित क्योें प्रतीत होता है?’

 

राजा के वचन सुनकर विनीत भाव से वैश्य कहने लगा कि ‘महाराज! मेरा नाम समाधि है। मैं उच्च कुल में उत्पन्न वैश्य हूं, परंतु दुर्भागयवश मेरे दुष्ट पुत्रों ने मेरा धन छीनकर मुझे निकाल दिया, जिससे मैं इस वन में भटकता फिर रहा हूं। यद्यपि अर्थलोलुप पुत्रों ने मुझे निकाल दिया, फिर भी मेरा चित्त उनके मोह को नहीं छोड़ता।

 

इस प्रकार परस्पर बातें करते-करते वे दोनोंे मेधा ॠषि के आश्रम में गये और राजा ने ॠषि के आगे विनीत भाव से कहा कि ‘क्या कारण है कि मेरा सम्पूर्ण राज्य छिन जाने पर भी अभी तक उसमें मेरी आसक्ति बनी हुई है और यही दशा इस वैश्य की भी हो हीे रही है? आप हमें उपदेश देकर चिन्ता से छुड़ाइये।’

 

मुनि ने कहा- ‘राजन्! महामाया की विचित्र लीला के द्वारा समस्त प्राणी ममता और मोेह के गर्त में पड़े हुए हैं-

 

महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत्।
ज्ञाननिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।
तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्च्राचरम्॥

 

जिसके द्वारा सम्पूर्ण जगत् मोहित हो रहा है, वह भगवान् विष्णु की महामाया हैं। वह महामाया देवी भगवती ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक आकृष्ट कर मोह में डाल देती हैं। उसी के द्वारा यह सम्पूर्ण चराचर जगत् रचा गया है। वह जिस पर प्रसन्न होती हैं, उसे मुक्ति प्रदान करती हैं और वे ही संसार के बन्धन का हेतु हैं। मुक्ति की पराविद्या भी वे ही हैं।’

 

राजा ने पूछा – महाराज! जिसका आपने वर्णन किया, वह महामाया देवी कौन हैं और कैसे उत्पन्न हुई है? उनके गुण, कर्म, प्रभाव और स्वरूप कैसे हैं?

 

ॠषि ने कहा- वे नित्या हैं, समस्त जगत् उनकी मूर्ति हैं, उनके द्वारा ही यह जगत् व्याप्त है। फिर भी देवकार्य करने के लिये वे जब प्रकट होती हैं, तब उसे उत्पन्न हुईं कहते हैं।

 

महाकाली की उत्पत्ति

 

प्रलय काल में सम्पूर्ण संसार के जलमग्न होने पर भगवान् विष्णु शेषशय्या पर योगनिद्रा में सो रहे थे। उस समय भगवान् के कर्णकीट से उत्पन्न मधु और कैटभ नामक दो घोर राक्षस ब्रह्मा को मारने के लिये उद्यत हो गये। भगवान् के नाभि कमल में स्थित प्रजापति ब्रह्मा ने असुरों को देखकर भगवान् को जगाने के लिये एकाग्र हृदय से भगवान् के नेत्र कमल स्थित योगनिद्रा की स्तुति की –

 

‘हे देवि! तुम ही इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाली है, तुम ही महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति और महामोहस्वरूपा हैं, दारूण कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम ही हैं। आपने जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय करने वाले साक्षात् भगवान् विष्णु को भी योगनिद्रावश कर दिया है और विष्णु, शंकर एवं मैं (ब्रह्मा) शरीर ग्रहण करने को बाधित किये गये हैं। हे देवि! अपने प्रभाव से भगवान् को जगाओ।’

 

इस प्रकार स्तुति करने पर वह महामाया भगवती भगवान् के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु तथा हृदय से बाहर निकलकर प्रत्यक्ष खड़ी हो गयीं। भगवान् भी उठे और देखा कि दो भयंकर राक्षस ब्रह्मा को खाने के लिये उद्यत हो रहे हैं। ब्रह्मा की रक्षा के लिये स्वयं भगवान् उनसे युद्ध करने लगे। युद्ध करते-करते पांच हजार वर्ष बीत गये, पंरतु वे राक्षस नहीं मरे। तब महामाया ने उन राक्षसों की बुद्धि मोहित कर दी, जिससे वे अभिमान पूर्वक विष्णु भगवान् से कहने लगे कि ‘हम तुम्हारे युद्ध से अति संतुष्ट हुए हैं, तुम ईप्सित वर मांगो।’ भगवान् कहने लगे-‘यदि आप मुझे वर ही देना चाहते हैं तो यही वर दीजिये कि आप दोनों मेरे द्वारा मारे जाएं।’ मधु-कैटभ ने ‘तथास्तु’ कहा और बोले कि ‘जहां पृथ्वी जल से ढंकी हुई हो वहां हमको नहीं मारना।’ अन्त में भगवान् ने उनके सिरों को अपनी जंघाओं पर रखकर चक्र से काट डाला। इस प्रकार देवकार्य सिद्ध करने के लिये उस सच्चिदानन्दरूपिणी चितिशक्ति ने महाकाली का रूप धारण किया।

 

महालक्ष्मी की उत्पति

 

एक समय देवता और दानवों में सौ वर्ष तक घोर युद्ध हुआ। देवताओं का राजा इन्द्र था और दानवों का महिषासुर। पराक्रमी दानवों द्वारा देवताओं को पराजित कर महिषासुर जब स्वयं इन्द्र बन बैठा, तब सम्पूर्ण देवगण पद्मयोनि ब्रह्माजी को आगे कर भगवान् विष्णु और शंकर के पास गये और उन्हें अपनी सम्पूर्ण विपत्ति-गाथा सुनायी। देवताओं की आर्तवाणी सुनकर भगवान् विष्णु तथा शंकर कुपित हो गये और उनकी भृकुटी चढ़ गयी। उनके शरीर से एक महान् तेजःपुञ्ज निकला और वह एकत्रित होकर प्रज्वलित पर्वत की तरह सम्पूर्ण दिशाओं को देदीप्यमान करता हुआ नारी-शरीर बन गया। उस भगवती को देखकर सब देवता प्रसन्न हुए और उसे अपने-अपने शस्त्र समर्पण किये। तब प्रसन्न होकर देवी ने अट्टहास किया, जिससे समस्त दिशाएं गूंज उठीं, समुद्र उछलने लगे, पृथ्वी कांप उठी और पर्वत भी डगमगाने लगे, देवताओं ने जयध्वनि की और मुनिगण स्तुति करने लगे।

 

उस भयंकर गर्जना को सुनकर महिषासुर क्रोधित होकर अस्त्र-शस्त्र-सुसज्जित दानव-सेना को लेकर वहां आया और तेजः पुञ्ज महालक्ष्मी को उसने देखा। तदनन्तर असुरों का देवी के साथ अति भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें सम्पूर्ण दानव मारे गये। महिषासुर भी अनेक प्रकार की माया करके थक गया और अन्त में महालक्ष्मी के द्वारा मारा गया। देवताओं ने भगवती की विविध प्रकार से स्तुति की।

 

महासरस्वती की उत्पत्ति

 

पूर्व काल में जब शुम्भ और निशुम्भ ने इन्द्रादि देवताओं के सम्पूर्ण अधिकार छीन लिये तथा वे स्वयं ही यज्ञभोक्ता बन बैठे, तब अपने अधिकारों को पुनः प्राप्त करने के लिये देवताओं ने हिमालय पर जाकर देवी भगवती की अनेक प्रकार से स्तुति की। उस समय पतितपावनी भगवती पार्वती आयीं और उनके शरीर में से शिवा प्रकट हुईं। सरस्वती देवी पार्वती के शरीर कोश से निकली थीं, इसलिये उनका कौशिकी नाम प्रसिद्ध हुआ। कौशिकी के  निकल जाने के बाद पार्वती का शरीर काला पड़ गया, इसलिये उन्हें कालिका कहते हैं।

 

तदनन्तर भगवती कौशिकी परम सुन्दर रूप धारण कर बैठी हुईं थीं कि उन्हें चण्ड-मुण्ड नामक शुम्भ-निशुम्भ के दूतों ने देखा। उन्होंने जाकर शुम्भ-निशुम्भ से कहा कि ‘हे दानवपति! हिमालय पर एक अति लावण्यमयी परम मनोहरा रमणी बैठी हैं। वैसा मनोरम रूप आज तक किसी ने नहीं देखा। आपके पास ऐरावत हाथी, पारिजात तरू, उच्चेैःश्रवा अश्‍व, ब्रह्मा का विमान, कुबेर का खजाना, वरूण का सुवर्णवर्षी छत्र तथा अन्य विविध रत्न विद्यमान हैं, पर ऐसा स्त्रीरत्न नहीं है, अतः आप उसे ग्रहण कीजिये।’

 

दूतों की वाणी सुनकर शुम्भ-निशुम्भ अपने सुग्रीव नामक दूत से उस देवी को प्रसन्न करके अपने पास लाने को कहा। दूत ने जाकर देवी को शुम्भ-निशुम्भ का आदेश सुनाया और उनके ऐश्‍वर्य की बहुत प्रशंसा की। देवी ने कहा कि तुम जो कुछ कहते हो सो सब सत्य है, परंतु मैंने पहले एक प्रतिज्ञा कर ली थी, वह यह है कि-

 

यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥

 

‘जो मुझे संग्राम में जीतकर मेरे दर्प को चूर्ण करेगा, वही मेरा पति होगा।’ अतः तुम अपने स्वामी को जाकर मेरी प्रतिज्ञा सुना दो कि मुझे युद्ध में जीतकर मेरा पाणिग्रहण कर लें। दूत ने देवी को बहुत समझाया, परंतु देवी नहीं मानीं।

 

तब कुपित होकर दूत ने सम्पूर्ण वृत्तान्त शुम्भ-निशुम्भ को जाकर सुनाया, जिससे कुपित होकर उन्होंने अपने सेनापति धूम्रलोचन को देवी के साथ युद्ध करने के लिये भेजा। परंतु देवी ने थोड़े ही समय में उसे सेना सहित मार डाला। इसी प्रकार चण्ड और मुण्ड को भी देवी ने मार डाला, तब क्रुद्ध होकर उन्होंने अपनी समस्त सेना लेकर देवी को चारों ओर से घेर लिया।

 

भगवती ने घण्टाध्वनि की, जिससे सम्पूर्ण दिशाएं गूंज उठीं। इस समय ब्रह्मा, विष्णु, महेश, कार्तिकेय और इन्द्रादि के शरीरों से शक्तियां निकलकर चण्डिका के पास आयीं। वे देवियां जिनकी शक्ति थीं, तत्तत् शक्ति के अनुरूप स्वरूप, भूषण और वाहन से युक्त थीं। उन शक्तियों के मध्य में स्वयं महादेवजी आये और देवी से बोले कि ‘मुझे प्रसन्न करने के लिये सम्पूर्ण दानवों का संहार कीजिये।’ उसी समय देवी के शरीर से अति भीषण चण्डिका-शक्ति प्रकट हुईं और शिवजी से बोलीं कि ‘हे भगवन्! आप हमारे दूत बनकर दानवों के पास जाइये और उन्हें कह दीजिये कि यदि तुम जीना चाहते हो तो त्रैलोक्य का राज्य इन्द्र को समर्पित कर पाताल लोक को चले जाओ।’

 

शिवजी ने शुम्भ-निशुम्भ को देवी की आज्ञा सुनायी, पर वे बलगर्वित दानव कब मानने वाले थे फलस्वरूप भयंकर युद्ध छिड़ गया और अस्त्र-शस्त्र-प्रहार होने लगे। शक्तियों द्वारा आहत होकर दानव-सेना गिरने लगी। तब क्रुद्ध होकर रक्तबीज युद्धभूमि में आया। इस दानव के रक्त से उत्पन्न दानव-समूह से सम्पूर्ण युद्ध-स्थल  भर गया, जिससे देवगण कांप उठे। तब चण्डिका ने काली से कहा कि, तुम अपना मुख फैलाकर इसके शरीर से निकले हुए रक्त का पान करो, जब यह क्षीणरक्त होगा तब मारा जायेगा।’

 

फिर देवी ने रक्तबीज पर शूलप्रहार किया। उससे जो रक्त निकला, उसे काली पीती गयीं। क्षीणरक्त होते ही देवी के प्रहार से वह धराशायी हो गया। तत्पश्‍चात् शुम्भ और निशुम्भ भी युद्ध-भूमि में मारे गये। देवगण हर्षित होकर जयध्वनि करने लगे।

 

देवतागण महासरस्वती की स्तुति करने लगे- ‘हे देवि ! आप अनन्त पराक्रमशाली वैष्णवी शक्ति हैं, संसार की आदिकारण महामाया आप ही हैं। आपके द्वारा समस्त संसार मोहित हो रहा है। आप ही प्रसन्न होने पर मुक्ति की दाता हैं। हे देवि! सम्पूर्ण विद्याएं आपके ही भेद हैं, सम्पूर्ण स्त्रियां आपका ही स्वरूप हैं। आपके द्वारा समस्त संसार व्याप्त है। कौन ऐसी विशेषता है कि जिससे हम आपकी स्तुति करें। हे देवि ! आप प्रसन्न हों और शत्रुओं के भय से सर्वदा हमारी रक्षा करें। आप समस्त संसार के पापों का और उत्पातों के परिणामस्वरूप उपसर्गों का नाश कर दीजिये।’ देवताओं की स्तुति सुनकर भगवती प्रसन्न होकर कहने लगीं-‘हे देवगण! तुम्हारी की हुई स्तुति के द्वारा एकाग्रचित्त होकर जो मेरा स्तवन करेगा, उसकी समस्त बाधाएं मैं अवश्य नष्ट कर दूंगी।’ यह कहकर देवगणों के देखते-देखते ही भगवती अन्तर्धान हो गयीं।

 

मेधा ॠषि ने देवी की उत्पत्ति और देवादिकृत स्तुति सुनाकर कहा कि ‘ हे राजन्! तुम और यह वैश्य तथा अन्य विवेकीजन सभी इन महामाया भगवती की माया से मोहित हो रहे हैं, अतः तुम इन्हीं परमेश्‍वरी की शरण ग्रहण करो। आराधना करने से वे मनुष्यों को शीघ्र ही भोग, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान कर देती हैं।’ ॠषि के वचन सुनकर वे दोनों नदी के किनारे जाकर देवी की पार्थिव मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने लगे। देवी को प्रसन्न करने के लिये उन्होंने अनेक संयम-नियमों का पालन करते हुए तीन वर्ष तक कठोर तपस्या की। उनके तप को देखकर भगवती प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष आ खड़ी हुईं और बोलीं-‘ मैं तुम दोनों पर प्रसन्न हूं। इच्छित वर मांग लो!’ तब राजा ने अपने राज्य और वैश्य ने ज्ञान-प्राप्ति की याचना की। देवी ने ‘तथास्तु’ कहा। दोनों के मनोरथ पूर्ण हुए, वैश्य मुक्त हो गया और राजा ने अपना राज्य प्राप्त किया तथा वह दूसरे जन्म में सूर्यपुत्र होकर सावर्णिमनु हुआ।
Secrets of Shakti

Durga Saptshati

 

Aadhya Shakti Bhagwati Durga

The Secret of Origin

Of

Trinity of Shakti

Mahakali, Mahalakshmi, Mahasaraswati

 

——

Mahakali, Mahalakshmi, Mahasaraswati – These three names symbolize the ultimate divine Trinity of Supreme Shakti power. The scriptures  firmly believe that God has to take an avatar in His self-created creation  in the form of either man or woman using His supreme supernatural powers to protect values and morality. The world reverentially glorifies Them as Brahma, Vishnu and Mahesh in the masculine form, and as Mahakali, Mahalakshmi and Mahasaraswati in the feminine form.

Just as Brahma, Vishnu and Mahesh are manifestations of Sattva, Raja and Tama guna-attributes, similarly these Supreme Shakti powers also manifest in the form of Sattva, Raja and Tama.

The primary Tama  Rudra-form of supreme Shakti power is Mahakali, who primarily destroys the wicked.

The primary  Sattva Vaishnavi form of supreme Shakti power is  Mahalakshmi, who nurtures the universe.

The primary  Raja Brahmi-shakti form of supreme Shakti power is  Saraswati, who creates the universe and imparts knowledge-wisdom.

 

The Durga Saptashati narrates the tale of origin of these three supreme powers as follows:

 

In an ancient age of first era of Swarochisha, Emperor Surath ruled over a vast kingdom. Once he got badly defeated by his enemies in his own kingdom. He got depressed, and went to the forest on the pretext of a hunt. He started living in the hermitage of Sage Medha. However he did not find peace and was always worried about his kingdom and treasury. Once he chanced upon a Vaishya while wondering around the hermitage. The Vaishya seemed depressed and sad, and the king enquired – “Who are you and why have you come here?  Why is your face full of sadness and anxieties?”

The Vaishya replied politely that – “My name is Samadhi. I was born in a highly prosperous family, but unfortunately my evil sons have seized my wealth and have drove me out to wonder in the forest. Inspite of their cruel deed, I am unable to eradicate my attachment to my vile sons.”

They reached the hermitage of Sage Medha while discussing these topics, and the King questioned the sage – “What is the reason that I am still attached to my kingdom, even though I have been driven out of it. Similarly, this Vaishya continues to be attached to his evil progeny. Kindly guide us how to get riddance from this anxiety.”

The Sage replied – ” O King! All the living beings are wrapped in a maze of attachment and bonds, through the strange workings of the grand illusion (Mahamaya) –

 

Mahaamaayaa Hareshreshaa Tayaa Sammohyate Jagata |

Gyaanninaamapi Chetaansi Devee Bhagavatee Hi Saa ||

Balaadaakrishya Mohaaya Mahaamaayaa Prayachchhati |

Tayaa Visrijyate Vishrvam Jagadetachchraacharama ||

 

The grand illusion of Lord Vishnu attracts and fascinates the entire creation. This grand illusion Mahamaya Goddess strongly captivates and tempts even the powerful stable minds of wise sages and hermits. This Goddess has composed this entire universe. She is the sole controller of bondages within this world, and She provides liberation only to those who please Her.

The King enquired – “My Lord! Who is this Mahamaya Goddess whom you just described, and how was She created? Please provide more detailed information about Her quality-attributes, actions, powers and form.”

The Sage replied – “She is the Nitya, a personification of the universe itself. The entire creation is Her form, and She drives this entire universe. Yet, when She personifies to perform divine actions, we consider Her as being created.”

 

Origin of the Mahakali

Lord Vishnu was sleeping in Yoga-Nidra on the Sheish-bed after the submergence of entire world upon Armageddon. At that instant, two dark monsters, Madhu and Keitabh, who were born from ear-worms of the Lord, decided  to destroy Lord Brahma. Prajapati Brahma, situated in the navel lotus of the God, prayed with full concentration to the Lotus-Eyed Divine Yoga-Slumber of the  God to awaken Him.

“O Goddess! You only are the Creator, Preserver and Destroyer of this entire universe. You are the Mahavidhya, Mahamaya, Mahamedha, Mahasmriti and Mahamohaswaroopa. You yourself are the Daarun Kaalraatri, Maharaatri and Moharaatri. You have caused even Lord Vishnu, the creator, preserver and destroyer of the universe, to go into the deep Yoga-slumber. You have influenced Lord Vishnu, Shankar and Myself (Brahma) to attain a personal-form. O Goddess! I beseech you to please awaken Lord with your influence. ”

After this prayer, Goddess Mahamaya Bhagwati emerged from the eyes, face, nostrils, arms and heart of Lord Vishnu. Lord Vishnu also got up and noticed that two ferocious monsters were getting ready to eat Brahma. God Himself started to fight them to protect Brahma. He was unable to vanquish the monsters even after fighting for five thousand years. Then Mahamaya captivated the minds of those monsters, and they proudly boasted to Lord Vishnu – “We are very pleased with your style of fighting. Ask for a boon.” Lord Vishnu requested them to grant Him a boon to destroy both of them. Madhu-Keitabh agreed and recommended – ” Do not try of kill us where the land is covered with water.” Finally Lord Vishnu killed them with His Chakra after placing their heads on His thighs. Thus the ever-powerful Sacchidanand form Goddess attained Mahakali form to accomplish the Divine mission.

 

Origin of Mahalakshmi

Once a ferocious war raged between  the gods and demons for a hundred years. The King of the gods was Indra and Mahishasur was of the demons. The mighty demons finally defeated the gods and Mahishasur himself assumed the position of Indra. All the gods, led by Lord Brahma, went to Lord Vishnu and Lord Shankar, and narrated their tale of misfortune. Both Lord Vishnu and Lord Shankar got incensed with fury after listening to their heart-wrenching tale. A powerful light emanated from Their forms, resplendent in all directions, and assumed a female form. All the gods were glad to see that Goddess and offered their arms-armaments. This pleased the Goddess. The sound of Her laughter echoed in all the directions, the sea began to sprout, the earth trembled and the mountains started to wobble. The gods and the sages started to pray and sing Her glories.

The terrible roar angered Mahishasur and he came along with a well equipped-armed army of the demon-monsters. A fierce battle ensued between the demons and the Goddess, in which all demons-monsters got killed. Mahishashur also ran out of his illusory tricks and was finally killed by the

Goddess Mahalakshmi. The gods praised Her glory in a variety of ways.

 

Origin of Mahasaraswati

Once upon a time, in the ancient ages,  Shumbha and Nishumbha snatched away all rights of the gods and started to consume the holy sacrificial offerings themselveṣ. The gods went to the Himalayas to pray to Goddess Mother for restoration of their rights. Holy Mother Parvati appeared and Shivaa form emerged from Her. Since Goddess Saraswati had emerged from Mother Parvati’s form, so She was also known as Kaushiki. Mother Parvati’s body turned dark after this event, and therefore She is also known as Kaalika.

Thereafter Goddess Kaushiki was once sitting in a very beautiful-resplendent form, when Chand-Mund, the messengers of  Shumbh-Nishumbh noticed Her. They praised Her beauty to Shumb-Nishumbh – “Oh King of Demons, a highly adorable lovely beauty is seated on yonder Himalayas. No-one has ever seen such an endearing form. You own Airavat elephant, Paarijaat tree, UccheHShrvaa stallion, Brahma’s plane, Kuber’s treasure, Varun’s golden umbrella, and various other wonderful gems; but your invaluable collection is incomplete without such an adorable lady. Therefore, you should possess her.”

Listening to these statements of their messengers, Shumbh-Nishumbh commanded one of their angels – Sugreeva to please Her and bring Her to them. The angel conveyed their message to the  Goddess and praised their greatness. The Goddess replied that she understands their message, but she is bound by a vow which she had made earlier –

Yo Maam Jayati Sangraame Yo Me Darp Vyapohati |

Yo Me Pratibalo Loke Sa Me Bhartaa Bhavishyati ||

 

“Whomsoever crushes my pride by conquering me in a battle, will be my spouse”. So you go and convey my pledge to your master that he can wed me only after winning me over in the battle-field. The angel tried to convince and explain to the Goddess in many different ways, but the Goddess did not relent.

The enraged angel recounted the entire sequence of the events to Shumbh-Nishumbh. The infuriated kings sent their general Dhoomralochan to fight with the Goddess. However, the Goddess killed him within a few moments with his army. Similarly She also vanquished and killed Chand and Mund in same fashion. The furious kings surrounded the Goddess with their entire army.

Mother Goddess sounded the bell, which reverberated across all directions. The power-Shaktis emerged from Gods like Brahma, Vishnu, Mahesh, Kartikeya et al, and came to Chandika. All these Shaktis were equipped with the arms-armaments-vehicles appropriate to the respective God-Goddess. Lord Mahadev Himself emerged within this circle and requested the Goddess to please Him by destroying all the demons-monsters. An extremely strong power-Shakti emerged from the Goddess, and requested Lord Shiva to act as Her messenger and convey a message  to the demons to surrender the kingdom of three realms to Indra, and thereby relocate in future to the Paataal-realm.

Lord Shiva conveyed the message of the Goddess to Shumbh-Nishumbha, but they did not pay any heed to it. A fierce battles ensued. The power-Shaktis started to destroy the demon-army. Then, an infuriated Raktbeeja joined the battle. The collection of demons generated from his blood filled up the battle-site, which trembled the gods. Then Chandika told Kali to expand her mouth to drink the blood falling from these demons. This demon would be vanquished upon reduction of his blood.

Thereafter, Mother Goddess hit Raktbeeja with a spear. Mother Kali kept on drinking the blood coming out of Raktbeeja. He became weak and was killed upon reduction of his blood. Shumbh and Nishumbh also were killed on the battlefield. The gods starting singing praises and glories with joy.

The gods praised glory of Mahasaraswati Goddess – “O Goddess! You are the eternal absolute powerful Vaishnavi Shakti-power. You are the core Mahaamaya Shakti of the universe. You fascinate the entire world. You liberate your devotees. O Goddess, all the knowledges sprout from within you, and you are the origin of the feminine nature. You drive the entire universe. Words are not enough to describe your qualities. O Goddess, may you be pleased, and save us from our foes. Please destroy the results of all sinful actions in the universe!” The Goddess got pleased with the Gods and stated – “O ye Gods! Whomsoever prays with full focus-concentration to me with the praises sung by you, will get salvation from all kinds of troubles and problems.” Then the  Goddess retreated.

Sage Medha recited the worship done by the gods, and suggested – “O King! You, this Vaishya and all wise people are getting trapped in the illusory fascination created by the Mahamaya Goddess. Therefore, you should pray and surrender yourself unto Her. She grants pleasures, heaven and salvation to all those who worship Her”. Both of them went to the river bank, and creating a statue of the Goddess, started the worship, as guided by the wise Sage. They performed rigorous penance for three years and endured multiple austerities, whilest following all rules-regulations. Goddess got pleased with their worship, and manifesting towards them – “I am pleased with your austerities. What boon do you wish for.” Then the king requested for his kingdom and the Vaishya for knowledge-wisdom. The Goddess granted them the boon and both succeeded in their endeavors. The Vaishya achieved salvation and the king attained his kingdom. He took rebirth as son of Sun-God and became Saarvarnimanu.

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