Live a life of Consciousness

जिन्दा नहीं जीवन्त बनिये
जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है
मुर्दा दिल क्या खाक जिया करते है
सजग भाव से इच्छानुसार जिये
 

 

सभी अपना जीवन अपनी इच्छानुसार जीना चाहते हैं और चाहते हैं कि उनके जीवन में सभी घटनाएं उनकी पंसद की हों, कहने को तो यह बड़ी ही सरल एवं सीधी बात लगती है लेकिन क्या केवल जिन्दा रहना और सांसारिक कर्मों को करना, उनका दायित्व निभाना ही जीवन है?
तो फिर सन्तुलन बनायें अपनी जिन्दगी में। सजगता के साथ क्रिया करें, अस्त-व्यवस्तता को समाप्त करें और आनन्द के साथ इच्छानुसार जीवन जियें।

एक बड़ी ही सरल बात है, जीवन का मतलब जिन्दा होना मात्र नहीं है बल्कि इच्छानुसार जीना है। यह बात बड़ी आसानी से समझ में आती है और बात बड़ी स्वाभाविक लगती है। अरे! भाई हमें ईश्‍वर ने जीवन दिया है तो केवल जिन्दा रहने के लिये थोड़े ही दिया है। ईश्‍वर चाहता है कि हम स्वाभाविक रूप से आनन्द के साथ अपना जीवन जीएं। इच्छानुसार जीवन जीने की बात कैसे पूरी हो सकती है? इस पर थोड़ा विचार करना आवश्यक है। तो सबसे पहले यह बात जान लीजिये कि इच्छानुसार जीने के लिये जीवन में सही लक्ष्य का बहुत महत्व है। लक्ष्य अर्थात् जीवन का नक्शा। जिस लक्ष्य या गन्तव्य पर आप जाना चाहते हैं, उसका नक्शा तो आपके दिमाग में स्पष्ट होना ही चाहिए। यदि आप रायपुर से दिल्ली जाना चाहते हैं और आपको मद्रास जाने का नक्शा दे दिया जाता है तो आप दिल्ली कैसे पहुंचेगे? गलत नक्शे से जो अपने जीवन में चाहते हैं वह कैसे हासिल कर सकते हैं। बड़ी अजीब बात है कि कुछ लोग अपने लक्ष्य का निर्धारण कुछ मिनटों में कर लेते हैं। जबकि बाजार में एक चीज खरीदने जाते हैं तो पचासों चीजें देखते हैं फिर उनमें से एक को चुनते हैं। आपका जीवन तो बहुत कीमती है, उसके लिये जल्दबाजी में लक्ष्य निर्धारण कैसे कर सकते हैं? पूरी तरह से सोचिये विचार कीजिये, आंकलन करिये। अपनी स्थिति का सही निर्धारण करिये और उसके पश्‍चात् ही लक्ष्य निर्धारित कीजिये। तो फिर क्या बात हो जाती है कि लोग अपने जीवन को इच्छानुसार नहीं जी पाते हैं? बल्कि केवल और केवल जिन्दा रहते हैं, इसका कारण एक ही है जीवन में किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं है, लक्ष्य नहीं है, कार्य की योजना नहीं है। सबकुछ उल्टा-पुल्टा, अस्त-व्यस्त चला आ रहा है और हम उसे अपनी आपाधापी वाली जीवन शैली में जीए जा रहे हैं।

 

वर्तमान आधुनिक जीवन में तो यह हाल है कि सब लोग बड़ी जल्दी में हैं और सब तेज गति से भाग रहे हैं। सबको डर है कि कहीं धीमे पड़ गये तो आगे बढ़ने की रेस में पीछे छूट न जाएं। इस आपाधापी के चक्कर में सब प्रकार की गड़बड़ियां शामिल हैं।

 

व्यस्त रहें अस्त व्यस्त न रहें

 

इस तरह के जीवन ने व्यक्ति को लापरवाह और अस्त-व्यस्त बना दिया है। न सोने का निश्‍चित समय है और न जागने का निश्‍चित समय है। अपनी नियमित दिनचर्या का तो कोई अता-पता ही नहीं है। दिनचर्या का अर्थ है? आप अपने पूरे दिन में निश्‍चित रूप से किस प्रकार कार्य करते हैं?

 

याद रखिये आपकी सोच ही आपको अस्त-व्यस्त करती है और कोई दूसरा आपको आकर अस्त-व्यस्त नहीं कर सकता है।

 

ये जान लीजिये कि इस जीवन में निरन्तर छोटी-छोटी समस्याएं आती रहती हैं। यह भी सत्य है कि आपकी प्रगति का घौंसला भी आपकी छोटी-छोटी आदतों के तिनकों से बुनकर ही तैयार होता है। एक दिन में आपकी प्रगति नहीं हो सकती है। इसलिये अपने जीवन के हर पल को सार्थक बनाना आवश्यक है और इसके लिये आपको व्यस्त भी रहना पड़ेगा लेकिन व्यस्त रहिये, अस्त-व्यस्त मत रहिये।

 

सही समय पर, सही कार्य करना ही संतुलित जीवन का आधार है। यही तो दिनचर्या का सरलतम सिद्धान्त है। जो समय बीत गया वह फिर नहीं आता है इसलिये समय को पहचानो, समय की परवाह करो अन्यथा समय आपकी परवाह नहीं करेगा।
जो समय की कद्र करता है समय उसकी कद्र करता है। इसी प्रकार अंग्रेजी में भी एक कहावत है कि time and tide wait for none अर्थात् समय और लहरें किसी का इंतजार नहीं करते।

 

एक विशेष बात है, यदि आप वर्तमान में, इस क्षण में असन्तुष्ट हैं तो किसी अन्य क्षण में और आने वाले समय में भी असन्तुष्ट ही रहेंगे। आप अपनी वर्तमान स्थिति में संतुष्ट नहीं हैं और यह सोचते हैं कि यदि अमुक बात ऐसे हो जाए, अमुक काम ऐसे हो जाए तो आप संतुष्ट हो जायेंगे, सुखी हो जायेंगे तो यह आपके मन का भ्रम है।

 

मन के गोल घेरे (चक्र/मायाजाल) में जीने वाला और मन की बात मानकर जीने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता है। वह सदैव असंतुष्ट रहेगा क्योंकि असन्तुष्ट रहना मन का स्वभाव है। यह मन बड़ा ही विचित्र है, यह भविष्य में जीता है, महत्वाकांक्षाओं में जीता है, वहीं मन भूतकाल में भी जीना पंसद करता है जो लोग वर्तमान में कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे होते हैं वे अपने मन को इस बात की इजाजत दे देते हैं कि वह भूतकाल की बातों या उपलब्धियों में ही उसे जो संतुष्टि मिली थी उसी की बातें सोचें, बातें करें इस तरह से मन व्यक्ति को भरमाता रहता है।  इसकी सदैव यह चाह रहती है कि आप दूसरों के जैसे हो जाएं तो क्या करें? मन को नियन्त्रण में रखकर इसमें असन्तुष्टि का भाव आने से रोकें।

 

सफल और असफल का अन्तर

 

जीवन में कुछ लोग अपने कार्य में सफल हो जाते हैं और कुछ लोग असफल हो जाते हैं लेकिन असफल रहने वालों की भी दो श्रेणियां हैं। एक श्रेणी के लोग तो वो हैं जो अपने विचार पर पूरा मनन नहीं करते और बिना योजना के अपने विचार को कार्यान्वित करने लग जाते हैं। दूसरी श्रेणी के वो लोग असफल होते हैं जो कि अपने प्रत्येक विचार पर खूब मनन करते हैं, पूरी योजना बनाते हैं परन्तु उसे कार्य रूप में आगे ही नहीं बढ़ाते हैं।

 

इसीलिये अपने विचार पर मनन करें, योजना बनाएं और क्रिया भी करें। विचार, मनन, योजना और क्रिया इन चारों का सहयोग आपको सफलता दे सकता है। विचार तो बहुत हैं, मनन का किसी के पास समय नहीं है। किसी के पास यह सोचने और बताने का समय नहीं है कि आखिर उसे कहां जाना है। हर कोई यह अनुभव कर रहा है कि दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है, वह (दूसरे लोग) दौड़ रहा है इसलिये हमें भी दौड़ना है।

 

दो-चार प्रतिशत व्यक्तियों को छोड़ दो, तो सौ में से पचानवें प्रतिशत (95%) व्यक्ति इसी प्रकार व्यवस्तता का जीवन जी रहे हैं क्योंकि उनकी पूरी जीवन शैली प्रवृत्ति प्रधान है, भोग प्रधान है, भौतिकता प्रधान है और इस शैली के कारण व्यक्ति का जीवन व्यस्त नहीं बल्कि अस्त-व्यस्त हो जाता है।

 

प्रत्येक व्यक्ति के लिये व्यस्तता बुरी नहीं है क्योंकि व्यस्त नहीं रहेंगे तो ‘खाली दिमाग शैतान का घर’ वाली कहावत चरितार्थ हो सकती है लेकिन यह भी ध्यान रहे कि ‘अति सवर्त्र वर्जयते’ अति व्यस्तता व्यक्ति के लिये हानिकारक है। इसका कारण है कि प्रत्येक मनुष्य उतावला और अधीर है। यह सबसे बड़ी बीमारी है। प्रत्येक कार्य के प्रति व्यक्ति की जल्दबाजी, काम तत्काल होना चाहिए, उसका परिणाम भी तत्काल मिलना चाहिए और इस चक्कर में उसका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

 

यदि व्यक्ति को किसी डॉक्टर के पास जाना हो, किसी अफसर से मिलने जाना हो, किसी साधु, गुरु से मिलने जाना हो वह मिलने अवश्य जाता है और उसके लिये वह कुछ भी देने को तैयार भी हो जाता है लेकिन एक मांग करता है, उसका काम शीघ्रातिशीघ्र होना चाहिए। प्रतिक्षा करना तो किसी को आता ही नहीं है। जब जीवन में इतनी अधीरता और जल्दबाजी होती है तो वह व्यक्ति निश्‍चित रूप से अस्त-व्यस्त हो जाता है। व्यक्ति की अधीरता उसके भीतर का लावा होता है। ऊपर से वह सामान्य दिखाई देता है लेकिन मानसिक तौर पर और अधिक उलझ जाता है।

 

ऐसी स्थिति में उसके बनते हुए काम भी बिगड़ जाते हैं। वह स्वयं अपने लाभ को हानि में और सफलता को असफलता में बदल देता है।

 

आखिर उतावलापन किस बात का? 

 

पहले यह जान लीजिये कि जल्दबाजी किसे कहते हैं? किसी भी कार्य के दूरगामी परिणामों पर विचार किये बिना हड़बड़ी में बिना सोचे समझे कार्य को कर डालने की आदत उतावलापन कहलाती है। ऐसी आदत व्यक्ति के स्वयं के जीवन को तो अस्त-व्यस्त करती ही है साथ ही उसके पूरे परिवार और समाज में अव्यवस्था को जन्म दे देती है।

 

किसी मन्दिर में दर्शन करने जाएं या ट्रेन में, बस में चढ़ें। किसी टिकट काउन्टर पर खड़े रहें, पंक्तिबद्ध खड़े रहने पर आपका कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न होगा या धक्का मुक्की करने पर आपका कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न होगा। पहले मैं, पहले मैं करने से तो आपका कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न नहीं होगा। हर कार्य में अधीरता, मत दिखाइये। इस युग की सबसे बड़ी समस्या ही बैचेनी और अधीरता है। हर समय दौड़-धूप और हर काम में उतावलेपन और अधीरता ने मनुष्य के मन-मस्तिष्क को खोखला कर दिया है। यह बहुत बड़ा सच है कि अधीर व्यक्ति हमेशा, कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने से कतराता है, ऐसा व्यक्ति मानसिक तौर पर उदासी, मायूसी, घबराहट और तनाव से घिरा रहता है और इसी कारण ब्लड-प्रेशर, अल्सर, हार्ड अटैक जैसी बीमारियां आती हैं।

 

इसी अधीरता को तो फास्ट लाईफ कहा जाता है और इस फास्ट लाईफ से जीवन का सुख-चैन समाप्त हो गया है और सबसे बड़ी बीमारी आ गई है, ‘नर्वस ब्रेक डाउन’। जिसके कारण व्यक्ति का मन हर समय शंका, कुशंका, भय और भ्रम की आशंका से घिर जाता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं तो परेशान रहते ही हैं, दूसरों के लिये भी परेशानी पैदा करते रहते हैं।

 

वर्तमान युग की इस सबसे बड़ी बीमारी से निपटने के लिये केवल और केवल एक ही उपाय है, मनुष्य अपने भीतर धैर्य का विकास करे, कार्य करने की शैली को योजनाबद्ध ढंग से अपनाए। छोटी-छोटी समस्याओं का रोना नहीं रोएं।

 

व्यक्ति को दुनिया को जीतने से पहले स्वयं अपने आपको जीतना आवश्यक है। वर्तमान की सबसे बड़ी समस्या तो मन की उथल-पुथल से पार पाने की है। हर अस्त-व्यस्त इंसान यह अनुभव करता है कि उसे लम्बे अरसे से शुकून, आराम और संतुष्टि नहीं मिली है। जबकि इस शुकून को अपने ही मन में खोजना पड़ता है। कोई दूसरा आकर आपके हाथ में शुकून नहीं देगा और कोई भी यह नहीं कह सकता है कि भाई ये लो शुकून और इसका उपभोग करो।

 

यह निश्‍चित रूप से जान लीजिये कि जिन्दगी का कोई क्षण साधारण, मामूली नहीं होता है। जिन्दगी का हर पल हमारे लिये कुछ न कुछ नया प्रस्तुत करता रहता है। इसके लिये यह आवश्यक है कि हम रोज स्वयं अपने आपको अनुशासित करने का प्रयास करते रहें। रोज अपने मन को समझाते रहें।

 

जीवन का एक छोर है – ‘भोग’ और दूसरा छोर है – ‘त्याग’, जिसे शास्त्रों में प्रवृत्ति और निवृत्ति कहा गया है। जीवन का एक छोर है – ‘काम’ और दूसरा छोर है – ‘अकाम’। जीवन का एक छोर है – ‘क्रिया’ और दूसरा छोर है – ‘निष्क्रिया’। इन दोनों के बीच में संतुलन स्थापित करना है। यह पूरा जीवन केवल ‘प्रवृत्ति’ अर्थात् ‘भोग’, एक ही ढर्रे पर चलते रहने, निरन्तर-निरन्तर प्राप्त करना, निरन्तर संग्रह के भाव से युक्त रहने की दिशा में भी चल नहीं सकता है और यह जीवन केवल त्याग, अकर्मण्यता,  संन्यस्त भाव, छोड़ देने के भाव और केवल मुक्ति के भाव से भी नहीं चल सकता है।

 

स्वस्थ और संतुलित जीवन शैली के लिये आवश्यक है कि प्रवृत्ति और निवृत्ति के मध्य एक संतुलन बनाएं। इन दोनों के बीच में अपने मानस में एक सेतु का निर्माण करें, जिससे प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों भावों का आनन्द ले सकें और आपके जीवन की अस्त-व्यस्तता दूर हो सके।

 

इसीलिये हमारे योग शास्त्र में एक सुन्दर शब्द है – ‘सजगता’।  जिसका अर्थ है जो भी कार्य करें जाग कर करें, अपने पूरे होशो-हवाश में करें। आप जो भी कार्य कर रहे हैं, जो बोल रहे हैं, उसका आपको स्वयं बोध होना चाहिए। अपने कर्त्तव्य का भी बोध हो और अपने व्यक्तित्व का भी बोध हो। जब यह दोनों आपके भीतर रहते हैं तो आप सजग होकर जीवन जीते हैं। तब इस जीवन में आनन्द आता है।
अब आप सोचिये आपके जीवन की सबसे अच्छी घटना कौनसी है, इसका उत्तर आप स्वयं दीजिये। यदि आपको अपने जीवन में यह याद करने के लिये सोचना पड़ रहा है तो इसका सीधा सा अर्थ है, आप जीवन बिता रहे हैं, ‘जी’ नहीं रहे हैं और आपका यह जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। इस अस्त-व्यवस्ता को नियन्त्रित कर, सजग भाव से अपना जीवन, अपनी इच्छानुसार जीना है।

 

 Don’t just remain Alive, Enliven your life

Life is full of vim and verve

The dead hearts just wither away

Live consciously on your terms

 

Everyone wishes to live their life as per their choice, and wish all events to occur according to their desire. This seems to be an easy and simple statement, but does the life comprise only survival and performing worldly deeds?

Therefore, create a balance in your life. Execute your actions with awareness, terminate the messiness and live joyfully according to your choice.


Simply stated, life doesn’t mean just survival, rather it means choosing to live as per your wish. This statement seems very easy to comprehend, and sounds natural. Oh brother! if God has gifted us this life, He didn’t intend us just to survive and stay alive. God desires that we lead our lives naturally with full joy. How to lead life on our choices? It is necessary to give some thought to this. You should first understand that setting up the right goals is very significant in trying to lead life on our choices. The goal i.e. the destination where you wish to take your life to. You should have a clear map in your mind about the destination which you desire to reach. If you need to travel from              Raipur to Delhi and you use the map to Madras, then how will you reach Delhi? How can you achieve your desired wishes using an inaccurate map. It is very strange that some people take decisions to determine their goals within a few minutes. You check and investigate hundreds of items in multiple shops, before purchasing a single item in the market. Your life is very valuable, how can you decide a goal in haste. Think thoroughly, do a complete analysis, assess your situation carefully, before determining your goals. Then, what is the reason that people are unable to lead their life as per their choice. They just survive and stay alive, the only reason for this is the absence of any organization, any goal or any plan in their life. Everything is messy and disorderly, and we continue to lead a chaotic lifestyle in the mad rush.

In the current modern life, everyone is in a hurry and is rushing faster. Everyone is scared of being left out in the rat race. All sorts of disturbances occur in the pursuit of this melee.

 

Stay busy, instead of being chaotic

Such lifestyle has made a person reckless and chaotic. There is no fixed time to sleep or to wake up. There is no regularity in daily routine. Routine means – What you usually do throughout a day.

Always remember, only your thinking causes chaos in your life, none else can disrupt you.

You ought to realize that small minor problems keep occurring in the life. It is also true that the nest of your progress is also weaved from the strings of your habits. You cannot develop in a single day. So it is important to utilize each moment of your life and you will have to get busy to achieve this. However stay busy, but without any chaos.

Performing the right work at the right time is the basis of the balanced life. This is the simple principle of routine. The time once passed, never comes back. Recognize the importance of time else time will not care for you.

The Time appreciates the person who respects it. There is a saying in English – Time and Tide wait for none.

Another important fact is that if you are dissatisfied at the current moment, then you will definitely be dissatisfied at another future moment as well. You are not satisfied with the current situation and wish for a few favourable events or tasks to happen as per your choice. You are mistaken if you feel that you will get satisfied or happy if those events occur.

Anyone who lives within the ring of his mind and who lives as per his mind, will never be happy in life. He will always be dissatisfied because dissatisfaction is the primary nature of the mind. This mind is very odd, it lives in the future among its desires. It also likes to live in the past. People facing tough situations force their mind to remember about the satisfactions received in the past events or past achievements. The mind deceives the person. It always tries to make you become like the others. So what to do? Should we control the mind to prevent entry of any dissatisfaction.

 

Difference between success and failure

Some people achieve success in their life while others fail. There are two categories of failures. The first category consists of people who do not think thoroughly and start working without any prior plan. The second category of failures are the people who carefully think and make plans, but do not act on their plans.

Therefore think thoroughly, make plans and act on them. You can achieve success through thought, analysis, plan and action. There are thousands of thoughts but someone does not have any time to contemplate them. Others do not have time to think and understand where they need to go. Everybody feels that the world is rushing at a fast pace, others are also running, so we also need to run.

If we leave aside three or four percent of persons, Ninety Five (95%) of people are living this chaotic life. Their lifestyle is focused on nature, luxuries and materialism; and such a lifestyle makes life chaotic instead of busy.

A busy lifestyle is not bad for a person because “an ideal mind is a devil’s workshop”. However, you should remember that being excessive busy is also harmful. This is so because everyone is too eager and impatient. This is the biggest disease. Everyone wishes to complete everything in a hurry, everything should be done quickly, the results should be immediate, and this ecosystem makes life highly chaotic.

If a person has to go to a doctor, or to meet an officer or to visit a monk or sage, then he certainly goes there and is ever-ready to give anything in return. His only demand is that his work should be done quickly. Everyone has forgotten to wait. Such impatience and haste definitely makes the person chaotic. The impatience is the slag within him. He appears normal from outside, but he is highly tangled mentally.

Such situation worsens his jobs. He himself converts his gains into losses; and success into failure.

 

After all, what’s the hurry for?

First you should understand the meaning of hurry. The habit to quickly perform the task without thinking about its results is called impatience. Such a habit creates turbulence within his life, along with causing chaos in his family and society.

Imagine going to visit a temple, or standing in a queue to obtain ticket for a train or a bus. Will your task be done smoothly by standing quietly in a queue, or by jostling in a scuffle. You will not be able to complete your tasks smoothly with this attitude of “Me First”. Do not get impatient in everything. The biggest problem of this age is restlessness and impatience. The human mind has become empty with all this rush and anxious impatience. It is a fact that an impatient person always tries to avoid difficult and adverse situations. Such a person’s mind is always filled with sadness, despair, anxiety and stress. Therefore he is afflicted with diseases like high blood pressure, ulcers and Heart-attacks.

This impatience is termed as the Fast Life, and this fast life has eliminated peace from the life. The latest disease is – “Nervous Breakdown“.  This fills the person’s heart with suspicion, doubt, fear and confusion. Such people are always anxious, and spread this anxiety to others.

The only remedy to cure this disease is to develop patience within yourself, and to strategically plan your actions.  One should not cry over small trifles.

A person needs to win himself before starting to win the world. The biggest problem of current age is to cure the inner mental turmoil. Every harried person experiences absence of relaxation, comfort and satisfaction in his life. One has to search for this satisfaction in one’s mind, it is not possible for someone else to offer you this satisfaction, nor can you make use of his satisfaction.

You should take a moment to realize that none of the life’s moment is trivial. Every moment of life produces something new for us. It is necessary for us to discipline ourselves. You should daily coach your mind.

The twin ends of life are – “enjoyment” and “sacrifice” which the scriptures refer to as trend and retirement. One end of life is “work” and the other end is “idle“. One end of life is “action” and the other end is “indolence“. One should constantly maintain a balance between these two points. One cannot lead the whole life only on the “trend” i.e. “indulgence“, continuing on the same path, continue to obtain, constant accumulation; and similarly life cannot be led only through the path of renunciation, lethargy, sacrifice, giving-up or liberation-sense.

Creating a balance between trend and sacrifice is essential to lead a healthy and balanced lifestyle. Build a bridge in your mind between these two points, to enjoy both senses and to remove chaos from your life.

Therefore our yoga scripture contain a beautiful word – “alertness“. Whatever you do, do with full consciousness, do with full awareness. You should have complete realization of whatever you do or whatever you speak. You should be fully aware of your duties as well as of your personality. You lead a conscious life when both these elements reside within you. Only then will you realize joy in your life.

You should think about the best incident of your life, you should yourself answer this question. If you have to think hard to answer, then it simply means that you are just leading a life, and are not living it. Your life has become chaotic. You should control this chaos, and live life consciously on your terms.

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