स्थितप्रज्ञ (Self-Conscious)

जीवन सिद्धान्त
सुख की मात्रा = पूर्ण हुई इच्छाओं की संख्या/ मन में स्थित इच्छाओं की संख्या

ठहर रे मनवा
मत भाग वारे वारे
तू मत मचल न्यारे न्यारे

स्थितप्रज्ञ 

संतुष्ट, शान्त, आनन्द मगन
सुख ही सुख 

क्या आपने कभी सोचा है? कि ऐसी अवस्था आनी चाहिए, जिसमें आनन्द बाह्य परिस्थितियों और बाह्य वस्तुओं पर आश्रित नहीं हो। ऐसा परम आनन्द और पूर्ण आनन्द प्राप्त हो जो हमेशा-हमेशा बना रहे। 

याद रखिये, संसार में कोई भी व्यक्ति आपको निराशा नहीं दे सकता है। निराशा केवल और केवल आप स्वयं अपने आपको दे सकते हैं और आशा आप स्वयं अपने आप से ले सकते हैं।

गीता का तो प्रत्येक श्‍लोक मनुष्य की बुद्धि को नये-नये आयाम देने वाला एवं उसकी सोच, कार्य, विचार को बदलने की क्षमता से युक्त है। इसलिये गीता स्वाध्याय प्रत्येक पुरुष-स्त्री-बालक-युवा-वृद्ध के लिये उपयोगी ही नहीं, आवश्यक है।

कई बार यह प्रश्‍न व्यक्ति के मन में आता है कि महाभारत काल अलग था, उस समय तो युद्ध का वातावरण था, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध का उपदेश दे रहे थे, उसे युद्ध करने के लिये उकसा रहे थे, उसे उत्साह दे रहे थे। वह समय दूसरा था, वह प्रसंग दूसरा था हर समय मनुष्य युद्ध थोड़े ही करता है?

प्रत्येक मनुष्य कहता है कि – मैं तो विद्यार्थी हूं, मैं तो नौकरी कर रहा हूं, मैं व्यापार चला रहा हूं, मैं गृहस्थ हूं, मैं तो आयु से बड़ा हो गया हूं। मेरे पास तो पचास कामनाएं हैं, मेरे पास तो पचास जिम्मेदारीयां हैं, मैं तो एक फैक्ट्री में काम करता हूं, मैं सरकारी कार्यालय में काम करता हूं अथवा मैं तो बड़ा आफिसर हूं, मैं तो दिनभर कम्प्युटर का काम करता हूं। मेरे जीवन में युद्ध (गीता) के सारे उपदेश कैसे सार्थक हो सकते हैं?

इस विषय में गीता के उपदेश हर व्यक्ति के लिये सार्थक, आवश्यक और निराशा में आशा देने वाले, हर स्थिति में प्रेरणा देने वाले, हर कार्य में सहयोग देने वाले विचार हैं। आप अपने कार्य के साथ इन विचारों को जोड़ देंगे तो आपके लिये ही श्रेष्ठ होगा।


एक शब्द गीता में बार-बार आया है और वह शब्द है, स्थितप्रज्ञ होना और इसका सामान्य अर्थ यह निकाला गया कि – जो ठहर गया है, रुक गया है, जिसकी गति रुक गई है वह स्थितप्रज्ञ है। जो अविचलित रहता है, भले-बुरे से, कामना-अकामना से ऊपर उठ गया है वह स्थितप्रज्ञ है।

आजकल के जीवन में ऐसा संभव थोड़े ही हो सकता है। हर मनुष्य को निरन्तर जीवन में गतिशील रहना पड़ता है, अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिये और अधिक प्रयत्न करने पड़ते हैं। तभी तो कामनाएं पूर्ण होती हैं और मनुष्य कामना से युक्त प्राणी है इसीलिये वह पशुओं से अलग है। वह केवल निद्रा, भय, मैथुन और आहार से ऊपर उठा हुआ प्राणी है। जिसमें चेतना है और जो चेतना से युक्त होता है वह सुख-दुःख से युक्त अवश्य होगा।  ऐसे तर्क देने वाले व्यक्ति एक-दो नहीं हजारों-लाखों में हैं, जिन्होंने वास्तव में स्थितप्रज्ञ शब्द के मर्म को समझा ही नहीं है।

स्थितप्रज्ञ शब्द दो शब्दों से बना है, पहला शब्द है – स्थिर और दूसरा शब्द है प्रज्ञा। स्थिर का अर्थ है – रुकना, ठहर जाना और प्रज्ञा का अर्थ है – चेतना युक्त ज्ञान जिसमें मनुष्य अपने हृदय से, अपनी आत्मा से जान लेता है, समझ लेता है जिससे आत्मा में प्रकाश होता है। जिसे भीतर का प्रकाश कहा गया है।

इस सम्बन्ध में एक सुन्दर श्‍लोक है जिसमें अर्जुन, श्रीकृष्ण को पूछता है –

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥
गीता – 2/54

हे श्रीकृष्ण! जिस व्यक्ति ने अपने आपको समझ लिया है और जिसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है, जो स्थिर बुद्धि का व्यक्ति है, उसके क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे चलता है, कैसे बैठता है, कैसे कार्य करता है? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं –

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
गीता – 2/55

जो मनुष्य जिस समय में, अपने मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं के ऊपर विजय प्राप्त कर, अपनी आत्मा से, अपनी आत्मा में संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ हो जाता है। जब-जब भी वह उतावला, व्यग्र, भय से युक्त, चिन्ता से युक्त, आशंका से युक्त होता है, उस समय वह अपने किसी भी सांसारिक कार्य को ठीक प्रकार से नहीं कर सकता है। उसका यह बार-बार विचलित होना ही उसे पराजय दिलाता है। इसलिये स्थितप्रज्ञ होकर, चिन्ता से ऊपर उठकर, एकाग्र मन से अपनी आत्मा की आवाज सुनकर, अपनी आत्मा के अनुसार जो कार्य करता है वह प्रसन्न रहता है, संतुष्ट रहता है और उसी के सभी कार्य पूर्ण होते हैं।

विशेष प्रश्‍न यह है कि स्थितप्रज्ञ का अर्थ क्या है? स्थितप्रज्ञ का अर्थ है – निर्धारित दृढ़ निश्‍चय किया हुआ, आचरण में दृढ़ अर्थात् दृढ़मना, प्रतिज्ञा का पक्का। सब प्रकार के भ्रमों से मुक्त, समझदारी में दृढ़।

ये गुण तो सब में होने चाहिए। चाहे बालक हो, युवा हो, नौकरी वाला हो या व्यापार करने वाला, यदि व्यक्ति स्थितप्रज्ञ नहीं है तो उसका कोई भी कार्य पूर्ण नहीं हो सकता है। उसके लिये कहा गया है कि –

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
गीता – 2/50

सब बुद्धि युक्त व्यक्ति, सब प्रकार के दोषों से मुक्त हो जाते हैं और समत्व भाव से, समत्व योग से कार्य करते हैं यही कार्य की कुशलता है और कर्म सिद्धि करने का उपाय है।

तो स्थितप्रज्ञ क्या है? स्थितप्रज्ञ अर्थात् जिसे अपने भीतर के ज्ञान की परम अनुभूति हो चुकी है। जो मनुष्य मन में आने वाली नित्य नई कामनाओं से ऊपर उठकर आत्मभाव में संतुष्ट रहता है वही पुरुष स्थितप्रज्ञ है। जिसे न सांसारिक सुख लुभा सकता है और जिसे न ही सांसारिक दुःख डिगा सकता है वही स्थितप्रज्ञ है।

स्थितप्रज्ञ वही है जिसे सुख की अनुभूति के लिये बाहरी, अनित्य (जिनका क्षय, क्षरण होना निश्‍चित है।) वस्तुओं पर आश्रित रहने की आवश्यकता नहीं रहती है अर्थात् यह मिल जायेगा तो ही सुखी रह सकता हूं। यह नहीं मिला तो मैं दुःखी हूं। इस भाव से ऊपर उठकर जो अपने भीतर ही पूर्ण सुख की खोज कर लेता है, वही स्थितप्रज्ञ है।

आप यह न समझें कि जो स्थितप्रज्ञ पुरुष हैं, व्यक्ति हैं। उनके जीवन में कोई रस नहीं है। वे तो हर समय अविचलित रहते हैं, उन्हें सांसारिक सुखों की क्या आवश्यकता, वे तो रसहीन होते हैं, नहीं-नहीं ऐसा कदापि नहीं है, वास्तविक सत्य यह है कि जीवन में परम आनन्द की अनुभूति स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को ही प्राप्त होती है। क्योंकि वह क्षणिक आनन्द देने वाली बाहरी वस्तुओं पर आश्रित नहीं रहता है। वह अपने भीतर ही आनन्द को खोजता है और उस आनन्द को प्राप्त कर सदैव रस से युक्त रहता है।

एक छोटा सा उदाहरण देता हूं – बचपन में हम अपने खिलौनों पर आश्रित थे, अपने खिलौनों को किसी को स्पर्श भी नहीं करने देते थे। यहां तक की रात को सोते समय भी खिलौने अपने पास रखकर सोते थे। सबसे ज्यादा चिन्ता खिलौनों की रहती थी। यदि कोई खिलौना गुम हो जाता अथवा टूट भी जाता तो रोने लगते थे।

आज बड़े होने पर वही बात अलग हो जाती है, अब हमारे लिये उन खिलौनों का महत्व ही नहीं है। पहले हम खिलौनों के साथ मन बहलाते थे, आज अपने परिवार के साथ मन बहला रहे हैं। अब हमारे बच्चे, हमारे पोते, हमारे लिये मन बहलाने वाले खिलौने हैं। आज आपको कोई बाल्यावस्था के खिलौने भेंट करेगा तो आप कहोगे कि मुझ इतने बड़े व्यक्ति को ये बचकाने खिलौने कोई कैसे भेंट कर सकता है?

मूलतः हमारे आनन्द का साधन बदलता रहता है। यह तो बाल्यावस्था से युवावस्था की बात हुई। युवावस्था में भी आनन्द के लिये साधन बदलते रहते हैं। युवावस्था में आनन्द की वस्तुएं बदलती रहती हैं। पिछले महीने आपने जो वस्तु आनन्द के लिये खरीदी थीं, आज वही वस्तु आपको उतना आनन्द नहीं देती है। पिछले महीने कोई कपड़ा पहना था, वही कपड़ा आज उतना आनन्द नहीं दे रहा है। पिछले महीने कोई जूते, चप्पल खरीदे थे वे उस समय तो आनन्द दे रहे थे, एक दो-महीने बाद वे ही वस्तुएं आनन्द नहीं देती हैं। अतः यह सिद्ध हो गया है कि समय के साथ-साथ आपके आनन्द की परिभाषा भी बदलती रहती है। आप अपने आनन्द के लिये बाहरी परिस्थिति, बाहरी वस्तुओं को बदलते-बदलते थक जाते हैं। सोचते हैं कि शायद कुछ और नया प्राप्त करूं, कुछ और नई वस्तु प्राप्त करूं, जिससे आनन्द प्राप्त हो जाए।

यही तो जीवन की चूहा दौड़ (ठरीं ठरलश) रेस है। जिसमें दौड़ते-दौड़ते हम थक जाते हैं। सब दौड़ रहे हैं इसलिये आप भी दौड़ रहे हैं। सब वस्तुएं प्राप्त कर रहे हैं और दूसरों को देखकर आप भी नई-नई वस्तुएं प्राप्त करना चाहते हैं।

क्या आपने कभी सोचा है? कि ऐसी अवस्था आनी चाहिए, जिसमें आनन्द बाह्य परिस्थितियों और बाह्य वस्तुओं पर आश्रित नहीं हो। ऐसा परम आनन्द और पूर्ण आनन्द प्राप्त हो जो हमेशा-हमेशा बना रहे।

यह संभव है – इसके लिये अपनी बुद्धि को स्थिर करना पड़ता है। अपनी प्रज्ञा, समझ को स्थिर करना पड़ता है। यही तो स्थितप्रज्ञ ज्ञान का परम स्वरूप है। अब आप विचार करेंगे की जीवन में दुःख क्यों प्राप्त होते हैं, दुःख प्राप्त होते हैं तो निश्‍चित रूप से दुःखों का कोई न कोई कारण होगा। इसके भी मूल में जायेंगे तो यह पायेंगे कि आपने अपने मन को इस जीवन की बाहरी परिस्थितियों पर आश्रित कर रखा है, आसक्त कर रखा है। थोड़ी भी परिस्थिति बदलती है, परिवेश बदलता है जो आपको पसन्द नहीं होता है तो आप दुःखी हो जाते हैं। हर बार दूसरों को बदलने की कोशिश करते हैं, अपने आपको बदलने की कोशिश नहीं करते हैं। वास्तव में सामान्य मनुष्य तो अपने आपको बदलना ही नहीं चाहता है। वह तो चाहता है कि सारी स्थितियां उसके अनुकूल रहें, अपने आपको हर परिस्थिति में आसक्त बना रखा है। इसलिये थोड़ा सा परिवर्तन होते ही दुःखी हो जाता है। इस स्थिति में क्या होता है? थोड़ी भी चोट पहुंचाने वाली स्थिति में हम आहत हो जाते हैं और दुःख हमें घेर लेता है। कई बार तो हमारा मन इतना कमजोर हो जाता है कि किसी ओर के द्वारा बनाई गई परिस्थिति, स्थिति हमें बहुत अधिक आहत कर देती है और हम उदासीनता की न्यूनतम स्थिति में पहुंच जाते हैं, तब कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। आधुनिक विज्ञान की भाषा में इसे डिप्रैशन कहा गया है और यह डिप्रैशन की स्थिति कब बनती है जब दूसरों के द्वारा बनाई गई परिस्थितियों के कारण हम स्वयं आहत हो जाते हैं और सोचते हैं कि सब कुछ बुरा ही बुरा हो रहा है, कुछ भी अच्छा नहीं हो सकता है और हम एक गहरे मानसिक दलदल में फंसते जाते हैं। याद रखिये, भीतर का दलदल बहुत गहरा है और इसमें एक बार डूब गये तो बाहर निकलने का मार्ग बड़ी मुश्किल से मिलता है और इस दलदल में फंसने को डिप्रेशन कहते हैं और वास्तव में संसार की सारी बीमारियों की जड़ डिप्रैशन ही है।

इस डिप्रैशन से निकलने के लिये विचार कीजिये, इसके लिये अपनी समझ को विकसित करना पड़ेगा और यह अवस्था स्थितप्रज्ञ पुरुष को प्राप्त है। इसका सीधा अर्थ है कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वह व्यक्ति है जिसने अपने आत्मबल से, अपने मन पर विजय प्राप्त कर ली है और जो विचलित नहीं होता है। सुख-दुःख का सामना करता रहता है, दुःख से लड़ने का मार्ग निकालता है लेकिन दुःख में निराश नहीं होता है। निराशा ही मृत्यु है, निराशा ही व्याधि है, निराशा ही आपके जीवन को तार-तार कर सकती है और इस निराशा को आप ही अपने मन ही मन में बढ़ा भी सकते हैं अथवा साथ ही साथ घटा भी सकते हैं।

 निराशा आपके जीवन का अंधेरा पक्ष है, तो आशा आपके जीवन का उजला पक्ष है। दोनों ही आपके मन में कूदते रहते हैं, इसलिये स्थितप्रज्ञ ज्ञान और चेतना से युक्त होकर निराशा रूपी शत्रु को समाप्त कर आशा रूपी मित्र को अपने साथ रखना है।

यह सत्य है कि स्थितप्रज्ञ पुरुष कामना रहित होता है, उसे अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण स्वामित्व प्राप्त होता है, हो सकता है ‘चार्वाक’ सिद्धांत के अनुयायी और आज के युग में कुछ लोग यह कुतर्क भी दें कि अपनी कामनाओं को मत रोको, अपनी इच्छाओं की पूर्ति अधिक से अधिक करो, जिससे आनन्द की अनुभूति बढ़ती जाए लेकिन वास्तव में क्या ऐसा होता है। क्या कभी आपकी इच्छाओं का अंत आपको दूर-दूर तक कहीं पर भी  नजर आता है। एक कामना की पूर्ति करोगे तो दूसरी तत्काल सामने उपस्थित हो जाएगी। फिर आप दूसरी कामना की पूर्ति में लग जाओगे। तब क्या होगा, पहली कामना पूर्ति में जो सुख प्राप्त हुआ था, वह तो गायब हो जाएगा और आप दूसरी कामनाओं की पूर्ति में पूरी तरह से लग जाओगे, उसके लिये मन दिन-रात परेशान रहने लगेगा। अतः यह सिद्ध हो गया कि आनन्द की अनुभूति तो असंख्य कामनाओं की पूर्ति में नहीं है। आनन्द को बढ़ाना है तो मन में स्थित इच्छाओं को नियन्त्रण में रखना पड़ेगा, उनकी संख्या को कम से कम करना पड़ेगा।

एक सरल फॉर्मूला है –

**** सुख की मात्रा = पूर्ण हुई इच्छाओं की संख्या/मन में स्थित इच्छाओं की संख्या। ****
अब आप ही विचार करें, यदि आपके जीवन में पूर्ण हुई इच्छाओं की संख्या ज्यादा है और मन में स्थित अपूर्ण इच्छाओं की संख्या कम है तो जीवन में सुख ही सुख है।

यदि आपके जीवन की पूर्ण इच्छाओं की संख्या कम है और मन में स्थित इच्छाओं की संख्या ज्यादा है तो आपके जीवन में सुख कम है और दुःख ज्यादा है। होता क्या है कि जो हमारी इच्छाएं पूर्ण हुईं, जो हमें जीवन प्राप्त हुआ, जो हमने आनन्द के क्षण प्राप्त किये, उन्हें तो हम नकार देते हैं और यह सोचते हैं कि वो तो आये थे और चले गये, उस आनन्द को हम मन की अनुभूति में नहीं रखते हैं, मन की अनुभूति में ऐसी बातों को रखते हैं ऐसी इच्छाओं को रखते हैं जो पूर्ण नहीं हुई हैं और केवल उन अपूर्ण इच्छाओं के बारे में ही विचार करते रहते हैं। इसीलिये दुःख का अनुभव करते हैं। मूलतः हम कृतघ्न (ढहरपज्ञश्रशीी) हो गए हैं

यदि सुख और दुःख को समान मान लें, तो किसी प्रकार का कोई विरोध नहीं रहता है। तभी स्थिति ठीक हो सकती है और यदि हम अपने जीवन में जो प्राप्त हुआ है और जो प्राप्त हो रहा है उस सुख को मन की अनुभूति में बसा लें तो हमारा जीवन बदल सकता है। हम हर समय सुख की अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं।

यह सरल सिद्धान्त अर्थशास्त्र का एक सिद्धान्त है कि हम किसी वस्तु का जितना भोग करते जायेंगे, उतनी ही उस वस्तु में आनन्द की अनुभूति कम होती जायेगी। अतः अपने भोग पर नियन्त्रण रखना, अपनी कामना पर नियन्त्रण रखना ही तो स्थितप्रज्ञ बनना है।

विशेष रूप से एक बात और, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कभी यह नहीं कहा कि – तू लड़ या मत लड़। श्रीकृष्ण ने यह कहा कि – तू स्थितप्रज्ञ होकर कार्य कर, जो कार्य कर रहा है वह सम बुद्धि से, शांत मन से कर। ये जो संसार चक्र तू देख रहा है, यह तो संसार चक्र चलता रहेगा, इसमें जन्म-मरण भी चलता रहेगा लेकिन इस संसार में तेरी क्या गतिविधि, तेरा क्या योगदान है वह महत्वपूर्ण है।

इस जीवन में हम सबका योगदान होना चाहिए, हम अपने-अपने योग के साथ, समबुद्धि के साथ स्थितप्रज्ञ होकर कर्मशील रहें, यही तो जीवन का आनन्द है, यही तो सुखों की प्राप्ति का आधार है, यही तो कामनाओं पर विजय प्राप्त करने का उपाय है और इसके लिए हमें अपने नजरिये को बदलना (परिवर्तित करना) होगा।
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