श्रीकृष्ण की नीति

क्या श्रीकृष्ण की नीति आज भी सार्थक है?
कृष्ण नीति व्याख्या

 

अपने ही कामों में अपने आपको पूरी तरह से आत्मार्पित कर दो। जिस काम को तुम उचित समझते हो, उसे खुलकर तो करो, जमकर तो करो। भक्ति हो, साधना हो, सेवा हो, तप हो, तपस्या हो, दोस्ती हो, गृहस्थी हो, प्रेम हो जो भी करो पूरी तन्मयता से करो।

 

श्रीकृष्ण जीवन चरित की प्रत्येक बात निराली है। उनके जीवन की प्रत्येक घटना हम सबसे जुड़ी हुई लगती है एक आम आदमी के जीवन को आधार बनाकर ही जैसे उन्होंने घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया की हो ऐसा प्रतीत होता है लेकिन इसके उपरान्त भी कुछ घटनाएं ऐसी हैं जो हमारे अन्तर मन को प्रेरित करती हैं। महाभारत की सारी कथाएं सभी लोग जानते हैं, रस ले-लेकर पढ़ते हैं। महाभारत युद्ध का एक प्रसंग आता है, जब युद्ध अपने पूरे शिखर पर होता है। भीष्म पितामह के हाथ में सेना की कमान होती है, विचित्र बात यह है कि जब दुर्योधन श्रीकृष्ण के पास आया और कहा कि मुझे आपका सहयोग चाहिये, तब श्रीकृष्ण ने कहा कि – मैं अवश्य सहयोग दूंगा, इधर युधिष्ठर श्रीकृष्ण के पास आये तो श्रीकृष्ण ने कहा कि – आपको भी मैं पूरा सहयोग दूंगा। है ना बड़ी विचित्र बात। दोनों को सहयोग का वचन दे दिया और फिर श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा कि इस युद्ध में, मैं हथियार नहीं उठाऊंगा। तुम दोनों में से एक पक्ष मेरा चयन कर ले और एक पक्ष मेरी सेना का चयन कर ले।

 

दुर्योधन ने सोचा कि निहत्थे श्रीकृष्ण का क्या उपयोग? इससे तो भला है कि मैं श्रीकृष्ण की सेना ले लूं। जिससे मेरी सेना के बल में वृद्धि हो जायेगी। पाण्डव बड़े निराश हुए, उन्होंने श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि – आप हमारे साथ रहिये, युद्ध में हमारा मार्गदर्शन कीजिये और हमारे सेनापति बन जाईये। श्रीकृष्ण ने कहा कि – नहीं यह संभव नहीं है। मैं तुम्हारे साथ रहूंगा लेकिन इस धर्मयुद्ध में मैं स्वयं हथियार नहीं उठाऊंगा। सेनापति का चयन तुम अपने में से ही किसी का करो। हां! इतना अवश्य है मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करता रहूंगा। पाण्डवों ने पुनः कहा कि आप लड़ेंगे नहीं, युद्ध में नहीं रहेंगे तो हमारा मार्गदर्शन कैसे करेंगे?

 

श्रीकृष्ण ने भोले भाव में कहा कि मैं अर्जुन का सारथी बनकर युद्ध में हर क्षण तुम्हारे साथ रहूंगा। तुम मेरी बनाई गई नीति पर चलते रहना। मैं हर क्षण तुम्हें निर्देशित करता रहूंगा। पाण्डवों को श्रीकृष्ण पर पूरा भरोसा था और उन्हें विश्‍वास था कि बस श्रीकृष्ण हमारे साथ रहने चाहिए, विजय अवश्य प्राप्त होगी।

 

युद्ध के नौवें दिन कौरवों के सेनापति भीष्म पितामह ने चारों तरफ कहर बरपा रखा था। वो अकेले ही पूरी पांडव सेना पर भारी पड़ रहे थे। भीष्म पितामह अपने वचन और प्रतिज्ञा पर अडिग रहने के लिए जाने जाते थे। उनका मानना था कि जो प्रतिज्ञा उन्होंने की है वह प्राण देकर भी पूरी करनी है। एक तरफ श्रीकृष्ण अपने निहत्थे रहने के वचन से बंधे थे लेकिन वहीं भीष्म पितामह पांडव सेना पर आग उगल रहे थे ऐसा लग रहा था मानो कुछ क्षण में ही भीष्म पांडवों को हरा देंगे।

 

श्रीकृष्ण शांति पूर्वक सब कुछ देख रहे थे वो जानते थे कि अर्जुन भीष्म का मुकाबला नहीं कर सकता। लेकिन उन्होंने अर्जुन से वादा किया था कि वह पांडवों को ही विजयी बनाएंगे। वहीं महाबलशाली भीष्म पांडवों को तहस नहस करने में लगे थे, यही सोचकर श्रीकृष्ण ने भीष्म पितामह को रोकने के लिए रथ का पहिया उठा लिया। लेकिन भीष्म पितामह जानते थे कि श्रीकृष्ण भगवान हैं इसीलिए उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने धनुष बाण एक ओर रख दिए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

 

भीष्म पितामह – भगवन! आपने तो युद्ध में कोई शस्त्र ना उठाने का वादा किया था और आप तो भगवान हैं आप अपना वादा कैसे तोड़ सकते हैं?

 

श्रीकृष्ण –  हे भीष्म! आप तो स्वयं ज्ञानी हैं। आप कभी अपना वचन या प्रतिज्ञा नहीं तोड़ते इसीलिए आपका नाम भीष्म पड़ा लेकिन शायद आप नहीं जानते कि मेरे लिए धर्म और सत्य की रक्षा करना, अपनी प्रतिज्ञा से ज्यादा बढ़कर है। आप अपनी प्रतिज्ञा और वचन पर अटल हैं लेकिन अपनी प्रतिज्ञा निभाने के चक्कर में अधर्म का साथ दे रहे हैं।

 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

 

याद रहे, जब जब दुनिया में धर्म का नाश होगा तब-तब मैं इस धरती पर अधर्म का नाश करने को अवतरित होता रहूंगा। तुम एक इंसान होकर अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ पाये और अधर्म का साथ दे रहे हो लेकिन मैं भगवान होकर भी धर्म की रक्षा के लिए अपनी प्रतिज्ञा तोड़ रहा हूं। अगर मेरी किसी प्रतिज्ञा या वचन की वजह से धर्म और सत्य पर कोई आंच आती है तो मेरे लिए वो प्रतिज्ञा कोई मायने नहीं रखती है और मैं धर्म के लिए ऐसी हजारों प्रतिज्ञा तोड़ने के लिए तैयार हूं। अगर आपके सामने धर्म का नाश हो रहा हो और आप धर्म की रक्षा के लिये कुछ नहीं कर रहे तो भी आप पाप के भागी हैं।

 

कितना सटीक और गहरा वचन है, भगवान श्रीकृष्ण का। यह बात हमें इस बात की प्रेरणा देती है कि सत्य की रक्षा, धर्म की रक्षा, हमारे हर स्वार्थ, वचन और मजबूरी से बड़ी है। हम कभी भी अपने स्वार्थ का बहाना नहीं बनायें, अपनी मजबूरी का बहाना नहीं बनायें। सत्य की रक्षा के लिये अपने आपको निरन्तर परिवर्तित करते रहें।

 

जो भी करो – जमकर करो –

 

तभी तो कृष्ण श्रीकृष्ण कहलायें, जगद्गुरु कहलाये। श्रीकृष्ण जो कुछ करते थे पूरी तन्मयता से करते थे। भोजन भी तन्मयता से, प्यार भी तन्मयता से, रक्षा भी तन्मयता से। पूर्ण भोग, पूर्ण प्रेम, पूर्ण रक्षा यही तो श्रीकृष्ण की महान् क्रियाएं हैं। जिन्हें लोग लीला कहते हैं। वास्तव में ये लीलाएं नहीं हैं। श्रीकृष्ण की स्वभाविक क्रियाएं हैं। जिसके माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि जो भी काम करो, पूर्ण तन्मयता से करो। ऐसे स्थितप्रज्ञ बनो जो अपनी शक्ति का पूरी तरह से प्रयोग करता हो। किसी प्रकार की कमी नहीं रखता हो। श्रीकृष्ण ने ही मनुष्य को कर्मगामी बनाया। उन्होंने कहा कि – ‘जिस प्रकार कछुआ अपने हाथ पैर सिकोड़ कर अपने को कवच के भीतर सुरक्षित कर लेता है, उसी प्रकार मनुष्य का अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण हो। कुछ भी बिखरा-बिखरा नहीं हो।

 

जो भी काम करो, जमकर करो। अपना पूरा शरीर, मन उसमें लगा दो। क्या हो गया है आज मनुष्य को, देवता बनने की कोशिश में, साधु बनने की कोशिश में, ज्ञानी बनने की कोशिश में तो मनुष्य और अधिक कृपण बन गया है। श्रीकृष्ण ने कहा – पूर्ण आत्म समर्पण, कहीं कोई दुराव, छिपाव नहीं। किसी दूसरे के सामने समर्पण आवश्यक नहीं है। अपने ही कामों में अपने आपको पूरी तरह से आत्मार्पित कर दो। जिस काम को तुम उचित समझते हो, उसे खुलकर तो करो, जमकर तो करो। भक्ति हो, साधना हो, सेवा हो, तप हो, तपस्या हो, दोस्ती हो, गृहस्थी हो या प्रेम हो जो भी करो पूरी तन्मयता से करो। आधे मन से, आधी शक्ति से कुछ भी नहीं करना है। होता क्या है? मनुष्य करता कुछ और है, ध्यान कहीं और रहता है। कार्य में सफलता कैसे मिलेगी? श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं, खुलकर करो, समझ कर करो, पूरी तन्मयता से करो।

 

श्रीकृष्ण और इन्द्र प्रसंग –

 

एक बार मां यशोदा देवताओं की पूजा कर रही थी, इन्द्र इत्यादि देवताओं को भोग लगा रही थी। श्रीकृष्ण ने मां को पूछा कि क्या इन्द्र देवता स्वयं आकर आपका यह व्यंजन ग्रहण करेंगे। यशोदा ने कहा कि – देवता तो सिर्फ वास से ही तृप्त हो जाते है। देवताओं में बड़ी शक्ति है, जब प्रसन्न होते हैं तो बहुत वरदान दे देते हैं और नाराज होने पर बहुत कष्ट दे देते हैं।

 

श्रीकृष्ण ने कहा कि – यह तो बड़ी अजीब बात हुई और इन्द्र देवता को अर्पित की जाने वाली पूरी थाली, पूरा भोजन स्वयं ग्रहण कर लिया। उन्होंने कहा कि – देवता तो वास से तृप्त होते हैं, मैं तो पूरा खा लेता हूं। मां यशोदा बड़ी रुष्ट, नाराज हुईं। इन्द्र भी नाराज हुए। जमकर बरसे, आकाश से। पानी, ओले, मूसलाधार जल वर्षा करने लगे। पूरा वृंदावन त्रस्त हो गया।

 

श्रीकृष्ण ने कहा – कोई बात नहीं आओ हम सब मिलकर वृंदावन की रक्षा करते हैं। हम सब मिलकर अपने गौऊ धन की रक्षा करते हैं और सबको एकत्र किया, विशालकाय गोवर्धन पर्वत को उठा लिया।

 

आप जानते हैं कि आखिर इन्द्र को भी श्रीकृष्ण के सामने नमित होना पड़ा, झुकना पड़ा, और वे श्रीकृष्ण के स्वरूप को पहचान गये।

 

कृष्ण – अबोध मानव का स्वरूप –

 

वास्तव में श्रीकृष्ण ही एक ऐसे देव हैं जो निरन्तर और निरन्तर मनुष्य बनने की कोशिश करते रहे और उसमें उन्हें पूर्ण सफलता मिली। श्रीकृष्ण क्या हैं? सामान्य-अबोध मनुष्य का स्वरूप हैं। सामान्य अबोध मनुष्य के रूप में खूब खाया-पीया, सबको खूब प्रेम किया, प्रेम करना सिखाया, जन-गण की रक्षा की, धर्म युद्ध में मार्ग दिखलाया और निर्लिप्त भोग के महानतम् त्यागी और योगेश्‍वर कहलाये।

 

जीवन में भोग यदि निर्लिप्त भाव से है, तो वह भोग ही योग बन जाता है। इसीलिये हमारे श्रीकृष्ण – योगेश्‍वर श्रीकृष्ण हैं, जगद्गुरु श्रीकृष्ण हैं।

 

श्रीकृष्ण की शिक्षा – आज के युग में –

 

श्रीकृष्ण का जीवन चरित, श्रीकृष्ण के कार्य, श्रीकृष्ण के वचन शाश्‍वत् हैं। हर युग में श्रीकृष्ण की प्रत्येक क्रिया शिक्षाप्रद है, प्रेरणास्पद है, समझने, अपनाने और जीने योग्य है। अभी 21 वीं शताब्दी में भी इन्टरनेट के युग में भी श्रीकृष्ण के वचन सार्थक हैं। कहा जाता है कि वर्तमान युग बड़ा ही प्रतिस्पर्धा का युग है, हर ओर भाग-दौड़ मची हुई है। मैनेजमेंट ही सबसे बड़ा मूल मंत्र है। दौड़ में कौन-कैसे आगे निकले यही युग धर्म बन गया है। तो आज के युग में श्रीकृष्ण की ये दस बातें बड़ी ही सार्थक हैं।
1. श्रीकृष्ण हर स्थिति में, हर मोर्च पर विचारों के धनी रहे। वह किसी भी बंधी-बंधाई लीक पर नहीं चले। जैसी परिस्थिति थी, उसी के अनुसार उन्होंने अपनी भूमिका बदली और यहां तक की द्वारका के राजा होकर भी धर्म युद्ध महाभारत में अर्जुन के सारथी बन गये। जिससे वे उसे पल-पल गाईड कर सकें।

 

2. मित्र वही होता है जो कठिन से कठिन परिस्थिति में भी आपका साथ दे। मित्रता के लिये कोई शर्त नहीं होती। जीवन में आपके पास ऐसे मित्र होने चाहिए, जो हर मुश्किल परिस्थिति में आपका संबल बनें, आप उनके संबल बनें। श्रीकृष्ण ने भी पाण्डवों के साथ अपनी मित्रता जीवन पर्यन्त निभाई। हर मुश्किल वक्त में पाण्डवों के साथ रहे।

 

3. महाभारत के सबसे बड़े योद्धा अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य से ज्ञान प्राप्त किया लेकिन उसके बाद भी अपने अनुभव से कुछ न कुछ नया सीखते रहे। यहां तक की अपने मित्र श्रीकृष्ण से भी निरन्तर निर्देश लेते रहे। हर विद्यार्थी के लिये आवश्यक है कि वह अपने शिक्षक से ज्ञान प्राप्त करे और उसके उपरान्त अपनी गलतियों और असफलताओं से भी निरन्तर सीखता रहे।

 

4. सदैव खुश रहो, क्यों व्यर्थ की चिन्ता करते हो। गीता में श्रीकृष्ण ने बार-बार यही तो कहा – ‘क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो? क्यों व्यर्थ में डरते हो? कौन क्या बिगाड़ सकता है?

 

5. किसी भी संस्था को चलाने का सबसे बड़ा नियम होता है कि अनुशासन में रहो। बिना बात की चिन्ता मत करो। भविष्य की बजाय वर्तमान पर ध्यान दो। यही तो श्रीकृष्ण ने बार-बार समझाया है।

 

6. श्रीकृष्ण को सर्वश्रेष्ठ नीतिकार कहा जाता है। यह सच है कि श्रीकृष्ण की नीति नहीं होती तो पाण्डव युद्ध नहीं जीत सकते और नीति में भी निरन्तर परिवर्तन आवश्यक है। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा, व्यापार में सफलता के लिए नीति बनाना आवश्यक है और समय-समय पर अपनी नीति में परिवर्तन (नीति का मूल्यांकन) भी करना चाहिए।

 

7. श्रीकृष्ण ने यह ज्ञान दिया कि हिम्मत की ज्यादा आवश्यकता तो मुसीबत के समय है। सफलता नहीं मिलने पर भी हिम्मत न हारना बुद्धिमानी है। हार का विश्‍लेषण करो और आगे बढ़ो। जिसने डर को जीत लिया, वह सबको जीत सकता है।

 

8. श्रीकृष्ण की हर कथा से यही सार मिलता है कि व्यक्ति को दूरदर्शी बनना चाहिए। तात्कालिक लाभ की जगह दूरगामी लक्ष्य रखना चाहिए। उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए।

 

9. जिन्दगी में सब रास्ते सीधे नहीं होते हैं। सीधे मार्ग पर चलकर हर बार विजय प्राप्त नहीं की जा सकती है। जब विरोधी भारी हों तो कूट नीति को प्रयोग में लायें। इस जीवन में कूटनीति का अर्थ है – साम, दाम, दण्ड और भेद। श्रीकृष्ण ने यही चारों क्रियाएं सम्पन्न कीं। पहले समझाया, फिर लालच दिया, फिर कौरवों में आपस में भेद डाला, फिर भी नहीं माने तो दण्ड दिया।

 

10. मित्रता कैसी हो? यह तो श्रीकृष्ण से सीखें। जब श्रीकृष्ण ने सुदामा की गरीबी देखी तो उसके बिना मांगे, उसे सबकुछ प्रदान कर दिया। इसलिये मित्रता में कभी ऊंच-नीच का भेद नहीं होना चाहिए।

 

आप किसी भी रूप में श्रीकृष्ण को पढ़ें, नित्य नवीन प्रेरणा आपको प्राप्त होती रहेगी। रासलीला हो, गीता का ज्ञान हो, महाभारत का युद्ध हो सब कुछ हमारे जीवन से जुड़ा हुआ है, शिक्षाप्रद है, प्रेरणास्पद है।

 

श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं, ज्ञान देने वाले हैं, जीवन को जीने वाले श्रेष्ठतम् व्यक्तित्व हैं।

 

कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं
Is the Policy of Shree Krishna still relevant?Explanation of Shree Krishna Policy

 

Completely immerse yourself in your work.

Whatever you feel pertinent,

Do it properly, with full focus.

Devotion, Sadhana, Service, Meditation, Austerity, Friendship, Family, Love, whatever you do, do it with total concentration.

 

Everything about character of Shree Krishna is unique. We instinctively sense a connection with each incident of his life, as He intentionally responded to problems like a normal person. There are many events which inspire our inner mind. Everybody knows the tales of Mahabharata, and reads them with relish. There is a particular event during Mahabharata war, when the war was at its peak. Bhishma Pitamah was the commander. Duryodhan visited Shree Krishna and requested for assistance, and Shree Krishna replied – certainly, I shall assist. Yudhishthir also approached Shree Krishna with a similar request, and Shree Krishna also promised him of full assistance. Isn’t it strange? He promised assistance to both and then smilingly stated that He will not fight in this war. He asked one party to choose Him, and the other to choose His army.

Duryodhan thought that an unarmed Shree Krishna will be of no use. The army will be useful, and it will increase the number of my soldiers. The Pandavas got frustrated and they requested Shree Krishna – Please stay with us, guide us and become our commander. Shree Krishna said – No, it is not possible. I shall stay with you but will not pick up any arms in this Dharma-yudh. You select someone else as your general. Yes, it is certain that I shall guide you. Pandavas again requested that if you will not fight, will stay out of war, then how will you guide us.

Shree Krishna simply said that I will stay continuously with you as charioteer of Arjuna. You follow my directions. I will keep guiding you each moment. Pandavas had full faith on Shree Krishna and they were confident that if Shree Krishna is with us, then we will certainly be victorious.

The General of Kauravas, Bhishma Pitamah had wreaked havoc all around on the ninth day of the war. He alone completely overshadowed the entire Pandava army. Bhishma Pitamah was renowned for staying true to his words and vows. He believed that he ought to fulfil his promise, even by giving up his own life. Shree Krishna was tied to his pledge of staying un-armed, while Bhishma Pitamah was spitting fire on the Pandava army, it seemed that Bhishma Pitamah will defeat the Pandavas in few moments.

Shree Krishna was quietly noticing all the events, and He knew that Arjuna was incapable of defeating Bhishma. However, He had promised Arjuna that the Pandavas will triumph. The valiant Bhishma was destroying the Pandava army, and Shree Krishna picked up a chariot wheel to stop Bhishma Pitamah. However Bhishma Pitamah knew that Shree Krishna was a form of God, and he smilingly put away his arms and stood with folded hands.

Bhisma Pitamah- “Lord! You had promised to not pick up any arm in this war, you yourself are the God, how can you break your own promise?”

Shree Krishna- “Hey Bhishma! You are extremely wise. You never break your word or vow, and so you are called Bhishma, but probably you don’t know that the protection of Truth and Religion is much important to me compared to breaking a vow. You are stuck to your vows and promises, but you are helping the adharma (evil) in fulfilling your vows.”

Yada Yada He Dharmasya Glaanirbhavati Bharat |

Abhyutthanamadharmsya Tadaatmaanam Srijaamyaham ||

 

Remember, whenever anyone tries to destroy religion in the world, I will descend and incarnate on the earth to destroy the evil. In-spite of being a human being, you could not break your vow and are cooperating with the evil, but as God I am breaking my vow to protect the religion. If any of my promise or vow impacts Truth or Religion, then that promise does not mean anything to me, and I am ready to break hundreds of such vows to protect Religion. If someone is destroying Religion in front of you, and you do not take any step against it, then you are also contributing to this Sin.

How precise and profound are the words of Lord Shree Krishna. It inspires us to defend the truth, to protect the religion at the cost of our every interest, promise or compulsion. We should not make excuses for our selfishness or compulsions. We should continuously transform us for the sake of the Truth.

 

Whatever you Do – Do with Total Dedication –

Therefore, Krishna became known as Shree Krishna, became known as Jagad-Guru or Master of the Universe. Whatever Shree Krishna did, He did with full focus. Deep eating, deeply loving and deeply protective. Total enjoyment, total love and total protection, these are the great actions of Shree Krishna, which people term as Leelas. In reality, these are not leelas, rather these are normal pastimes of Shree Krishna. He gave a message to do everything with full dedication and concentration. Control yourself to fully utilize your energies. Do not leave any scope for any deficiency. Shree Krishna taught humans to become action-oriented. He stated – “As a turtle completely protects itself within its shell by shrinking its entire body, similarly a person should have complete control our his senses. Nothing should be fragmented.

Whatever you do, do it with full dedication. Immerse your entire body and complete spirits within it. What has happened to humans these days? The man has become more miser in the race to become a God, a sage, or a wise-man. Shree Krishna said – Complete surrender, with no reservation, hesitation or concealment. It is not necessary to surrender to someone else. Surrender yourself in your own actions. Whatever work you consider relevant, do it openly, with full dedication. Devotion, Sadhana, Service, Meditation, Austerity, Friendship, Family or Love, whatever you do, do it with total dedication. Do not do anything with half-heartedness or half-energy.  What happens? A person performs something, however his mind is engrossed elsewhere. How will he obtain success in his endeavour? Shree Krishna clearly advises – Do candidly, with full understanding and complete dedication.

 

Shree Krishna and Indra incident –

Once Mother Yashoda was worshipping Gods, and was offering food to God Indra and other Gods. Shree Krishna asked her if Gods will physically come to take this food. Yashoda replied – The Gods get satisfied with just thoughts. The Gods are very powerful. They grant a big boon when They are happy, and give a lot of trouble when displeased.

Shree Krishna said – This sounds very strange, and ate the entire plate, the entire food being offered to God Indra. He said that the Gods get satisfied with just thoughts, I shall eat it completely. Mother Yashoda became very angry. Lord Indra also became angry. It rained heavily from the sky. Vrindavan got stricken with rain, hail and thunder.

Shree Krishna said – No worries. Come let us all work together to protect Vrindavan, to protect our cows. He collected everyone together and lifted the big Govardhan mountain.

You know that even Indra had to bow to Lord Shree Krishna and recognize the divinity of Lord Shree Krishna.

 

Krishna – Embodiment of Human Innocence –

In fact, Shree Krishna is the only God who continuously and constantly tried to become a human, and He got complete success in this endeavour. Who is Shree Krishna? It is a form of a normal-innocent human. Like an innocent-normal person, he ate a lot, loved a lot, taught to love, protected everyone, guided during the religious-war, demonstrated great sacrifice with complete detachment and became known as Yogeshwar.

Enjoyment of pleasures in life with a detached feeling converts this enjoyment into Yoga. Therefore our Shree Krishna is – Yogeshwar Shree Krishna, JagadGuru Shree Krishna.

 

Teachings of Shree Krishna – in today’s world –

The life Gospel of Shree Krishna, His actions, and His words are eternal. Each action of Shree Krishna is instructive, inspiring, invigorating and meaningful in every era. Shree Krishna’s words are still relevant in this internet era of the 21st century. It is said that the present era is the era of great competition, where everyone is engaged in the rat race. Management is the biggest key. The main religion of this age is to race ahead of the others. The following ten teachings of Lord Shree Krishna are highly relevant in this age.

  1. Shree Krishna had thoughts and ideas for every situation at every front. He did not follow the old treaded path. He changed his role according to the situation, and became Arjun’s charioteer in the Ethical-war inspite of being the king of Dwarka. This enabled Him to guide at every step.
  2. A friend is one who accompanies you through difficult circumstances. There are no conditions in friendship. You should have such friends in your life, who support you in difficult situations, and you do the same for them. Shree Krishna continued His lifelong friendship with the Pandavas, and supported the Pandavas through each of their difficult periods.
  3. The great Mahabharata warrior Arjun learned from Guru Dronacharya, but kept on improving his skills based on various experiences. He even followed the instructions of his friend Shree Krishna. Every student should obtain knowledge from his teachers and keep on learning from his successes and failures.
  4. Always be happy, why do you worry unnecessarily. Shree Krishna repeatedly stated this in Geeta – “Why do you worry unnecessarily? Why do your fear unnecessarily? Who can harm you?”
  5. The core rule to run any organization is to stay within the discipline. Do not worry about anything? Concentrate on the present instead of on the future. Shree Krishna has repeatedly explained this fact.
  6. Shree Krishna is called as the best strategist. It is true that the Pandavas would not have won the war without Shree Krishna’s strategy, and there is always a need to modify the strategy according to the circumstances. It is important to make a strategy for any competitive exam, or for success in business; and it is necessary to evaluate and accordingly modify the strategy.
  7. Shree Krishna taught that the strength is more necessary during difficult times. It is wise to keep up the strength in absence of success. Evaluate the defeat, and move ahead. One who has conquered fear, can win everything.
  8. Every narrative of Shree Krishna stresses that a person should be a visionary. One should keep a distant vision, instead of immediate, short-term goals. One should continuously try to achieve that distant vision.
  9. Life is not always straight. One cannot achieve victory just by following the straight paths. If the competitors are strong, then one should act diplomatically. Diplomacy in this life means- use of sweet-talk, bribery, punishment and intrigue. Shree Krishna used all these four methods. First he tried to explain, then gave a greed, then caused a split among Kauravas, and in the end, gave them punishment.
  10. What is friendship? Learn this from Shree Krishna. When Shree Krishna saw the poverty of Sudama, he gave him everything without Sudhama asking for anything. Therefore there should not be any distinction within the friendship.

You will always get inspired, in whatever form you study about Shree Krishna. Raasleela, wisdom of Geeta, the great Mahabharata war, all of it is connected with our life. It is instructive and highly inspiring.

Shree Krishna is Jagadguru, the Master of the universe. He is the provider of wisdom, He is the best personality to emulate for leading life.

 

Krishnam Vande JagadGurum.

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